अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
अदबी हयात
समकालीनों पर शमशेर की राय
राजीव रंजन गिरि
प्रगतिवादी कविता के महत्वपूर्ण कवि शमशेर बहादुुर सिंह अपनी कविता में शब्दों की मितव्ययिता के लिए जाने जाते हैं। कम से कम शब्दों में कविता का पूरा वितान खड़ा कर देना उनकी खासियत है। 'कवियों के कवि' माने जाने वाले शमशेर के भीतर बेहद संवेदनशील समीक्षक होने का सबूत मिलता है, अपने समकालीनों के बारे में जाहिर की गयी उनकी राय से। छायावादोत्तर कविता में एक साथ इतने महत्वपूर्ण कवि इसी दौर में थे। अपने समकालीनों के बारे में शमशेर की राय जानने-पढ़ने का मौका मुहैया कराया है, 'उद्भावना' के शमशेर
बहादुर सिंह विशेषांक 'होड़ में पराजित काल' ने। इस अहम्‌ विशेषांक का संपादन किया है कवि-समीक्षक विष्णु खरे ने। इसमें शमशेर का एक निबंध 'एक बिल्कुल पर्सनल एसे' प्रकाशित हुआ है। जिसमें वे शमशेर अपने सखा कवि नागार्जुन के बारे में लिखते हैं कि 'मेरे कुछ प्रिय हिन्दी कवि.. इनमें सबसे पहले, सबसे पहले मेरे ध्यान में नागार्जुन आते हैं। क्यों? मैं सोचता हूं, तो ऐसा मालूम होता है कि इसकी वजह उनका यह खरा और सच्चा-सीधा व्यक्तित्व है, जिसके कण-कण से अपने देश की मिट्टी का सौंधापन महसूस होता है। नागार्जुन, भाषा और साहित्य का रस-मर्मज्ञ पंडित होता हुआ भी गांव-गंवई की चिलम-सा 'रपफ' और अपनाव भरा हैऋ जैसे अनुभवी जनों के चुटुकलों का गहरा संकेत।'
शमशेर बहादुर सिंह ने अपने प्रिय हिन्दी कवि के तौर पर
अतिरिक्त जोर देकर नागार्जुन का नाम लिया है। शमशेर जैसे मितव्ययी कवि के लिए 'सबसे पहले' दो बार कहना अतिरिक्त बल को दर्शाता है। शमशेर ने लिखा है कि नागार्जुन के शब्द बड़ी टेढ़ी उंगलियों से हमारी चेतना को पकड़ते हैं। उसके भाव हमारी आंखों में आंखें डालकर हमसे बात करते हैं। यह मुंहपफट कवि अक्सर मुझे सबसे बड़ा, सुलझा हुआ, सबसे आधुनिक, सबसे जागरूक कवि लगता है। काश! कि मैं स्वयं कभी उसकी कविताओं का चयन करता - कोई सौ-सवा सौ कविताओं का, और तब दिखा सकता, इस कवि के प्रयोग, इस कवि की गूढ़ व्यंजनाएंऋ दिखा सकता, कैसे इस युग का हिन्दी का सबसे बड़ा व्यंग्यकार कवि जिसको इतिहास भुलाएगा नहीं, यही कवि है। 'तालाब की मछलियां', 'प्रेत का बयान', 'पर्चा बांटने वाला', 'दुखहरन मास्टर', इसके उदाहरण हैं। हम कटु व्यंग्य और हास्य के नानारूप ही नहीं देखते- जिनमें शासन और समाज का भ्रष्टाचार और पाखंड और पूंजीवादी तत्वों की बर्बर हिंसात्मक लिप्सा अपने नग्न रूप में सामने आती है,- उनकी कविताएं संद्घर्षरत साहसी युवकों और शोषित श्रमिक वीरों की दुनिया में भी हमें ले जाती हैं। शहीदों की पावन याद को हमारी आंखों में बसाने वाला और कौन दूसरा कवि हिन्दी में लिख रहा है, कोई मुझे बताए। आज के अत्यंत सस्ते, खोखले दंभ के युग में नागार्जुन की कविताएं कीमती दस्तावेज हैं। इसीलिए यह मुझे आज के कवियों में सबसे अधिक प्रिय है। शमशेर के मुताबिक नागार्जुन के यहां उत्कृष्ट से उत्कृष्ट शिल्प है। शमशेर यह भी बताते हैं कि नागार्जुन के यहां भोंड़ा शिल्प भी मौजूद है। पर, ऐसी कविताओं को एकदम अलगाना किंचित भी कठिन नहीं, जो किसी वक्ती काम के लिए रवा-रवी में लिख दी गई है। शमशेर मानते हैं कि नागार्जुन की दो कविताएं 'बहुत दिनों के बाद,' और 'ज्येष्ठ' ;मैथिलीद्ध शीर्षक कविताएं प्राचीन क्लासिकों के बराबर हैं। इन कविताओं को प्राचीन क्लासिकों के बराबर रखकर देखने पर इनकी आब जरा भी कम न दिखेगी, बल्कि और भी इनकी खूबसूरती आंखों में तैरने लगेंगी। इनमें कैसा गहरा- जैसे मानों पीढ़ियों-पीढ़ियों- का अनुभव एक-एक शब्द के प्रयोग में बोलता है। यह खास एहसास मुझे आज के किसी भी दूसरे कवि में नहीं मिलता- और इस सहजता के साथ तो नहीं ही मिलता। भावनाओं का सामाजिक परिवेश में विश्लेषण, हृदय को छूने वाला स्वर, उसके स्वर की निर्भीकता, स्वर में ओज और मर्यादा, उसका दो-टूक पन, और पूरे नाटकीय पफोर्स के साथ अनेक चरित्राों के संग-संदर्भ चित्राण ... यही कुछ है जो नागार्जुन की तगड़ी चीजों को शमशेर के लिए अत्यंत प्रिय और महत्वपूर्ण बना देता है।
 
त्रिालोचन
 
अपने दूसरे सखा कवि त्रिालोचन के बारे में शमशेर ने लिखा है कि इनमें सृजन की अपार, अकूत, अतुलनीय शक्ति है। इनमें गहराई को छूने, मर्म को सांस्कृतिक अर्थ में पकड़ने की बड़ी सहज क्षमता है। त्रिालोचन सानेट लिखने पर आएं तो एक सिलसिले में सात सौ सानेट लिख जाएंगे, गजल की तरपफ झुकें, तो पांच सौ गजलें लिख कर ही दम लेंगे, गीतों की तरपफ शुरुआत की थी, आरंभ में तो कहते हैं कि एक लाख से अधिक लिख गए थे। त्रिालोचन के कवि की उपलब्धियां सहज चौंकाने वाली नहीं हैं, इसलिए कि वे अनुभूतियां हमारे सामान्य और व्यापक जीवन की अनेक तहों को छूकर बार-बार, और एक अजीब निर्विकार रूप से उन तहों की मिट्टी लाकर हमारी मुट्ठी में रखती हैं। लंगोट कसे हुए सांस बांधकर, देर तक गोता लगाने वाला एक शांत व्यक्ति चुपचाप आकर हमारी हथेली पर जो कुछ रख देता है, वह बड़ा सामान्य लगता है... मगर वह 'सामान्य' कुछ ऐसा सामान्य नहीं जैसा कि लगता है। त्रिालोचन सामान्य में ही असामान्य का दर्शक है, तो वह इसलिए कि इस असामान्य के माध्यम से पुनः सामान्य को और अच्छी तरह समझ सकें। त्रिालोचन के यहां सामान्य जीवन की कठोर परिस्थितियों से जूझने वाले के साथ असीम सहानुभूति है। साथ ही, बीच-बीच में गत्‌ युगों के संत कवियों और समाज के उन्नायकों का बहुत सुलझा हुआ, तात्विक मूल्यांकन मिलेगा, विशेषकर सानेटों में। अनीति और अत्याचार पर त्रिालोचन का हृदय खुद पफुंकने लगता हैऋ मगर इसके अंदर जो सहन-शक्ति है, कई प्रकार के विष को पी जाने की जो क्षमता है, वह इस अति साधारण लगने वाले व्यक्ति को एक असाधारण कवि बना देती है। बकौल शमशेर बहादुर सिंह 'मैं त्रिालोचन के शिल्प और शैली पर बहुत कठोर मत रखते हुए भी, उनकी कम से कम सौ से अधिक चीजों को दुनिया के अच्छे से अच्छे शिल्पी की रचनाओं के बराबर निःसंकोच रख सकता हूं, उनके यहां जो कमजोरियां हैं, वह सहज ही कब की दूर हो सकती थीं, मगर कई बातों की तरह भाषा और शैली पर भी उनके दृष्टिकोण में एक तरह का कट्टरपन है, एक कड़ापन। इस दिशा में मैं समझता हूं कि उनके और मेरे बीच कहीं न कहीं बुनियादी मतभेद हैं। त्रिालोचन खड़ी बोली की हिन्दी भाषा और साहित्यिक अभिव्यक्ति के आधुनिक इतिहास में एक बड़े महत्वपूर्ण कवि बनकर आते हैं, एक विशिष्ट दृष्टिकोण के कारण उन्होंने अपने लिए जाने या अनजाने, जो सीमाएं निर्धारित कर ली हैं, उनको पार करके आगे बढ़ना, ऐसा लगता है, उनके लिए सहज नहीं है, मगर पिफर उनके लिए संभव क्या नहीं है।'
 
अज्ञेय
 
शमशेर ने लिखा है कि अज्ञेय को मैं चुपचाप अपना एक
पफेवरिट कवि मानता हूं- और मैं अपने पफेवरिट कवि के प्रति अत्यधिक कड़ी आलोचनात्मक दृष्टि भी रखता हूं- मगर अपनी समझ के लिए, सार्वजनिक व्याख्या के लिए नहीं। अज्ञेय की कविता को प्यार करने के साथ-साथ उसको विशेष आदर से पढ़ता हूं, उससे सीखने की कोशिश करता हूं। शमशेर को अज्ञेय में सबसे अधिक जो चीज मोहती है, वह है उनकी व्यापक और गहरी सुरुचि, जिस पर भरोसा किया जा सकता हैऋ भावों की सच्ची गंभीरता और अभिव्यक्ति में कुछ वह सादगी सी, जो एक उस्ताद शिल्पी के यहां मिलती है। उनके वातावरण में एक क्लासिकल उदासी, वास्तविक शांति की खोज में... बल्कि मूल्यों, ईस्थैतिक मूल्यों के उत्स की... बल्कि उत्स से अधिक मूल्यों की मौन, तटस्थ मोहकता।... अज्ञेय में जो चीज शमशेर को खटकती है और साथ ही आकर्षित करती रही, वह है उनका सदैव अपनी भावनाओं के प्रति सचेत रहना। कभी वह अपने को भूल नहीं सकते, खो नहीं सकते, वह बड़ी बात भी है। ऐसा आर्टिस्ट निरंतर उफपर उठता जाएगा- अगर प्रज्ञावान है और विनम्रता एवं क्षमा उसका आंतरिक स्वभाव है। शमशेर के मुताबिक मौन का अर्थ शून्य नहींऋ न शांति का अर्थ मौन है। उत्सर्ग में शांति हैऋ मगर और भी कुछ है। प्रेम.. उत्सर्ग ही नहीं है। ...'होना' का अर्थ समझना, जीवन को समझना हैऋ मगर जीवन उसके आगे और उसके अलावा भी और कुछ है। कला में इन बातों का प्रतिबिंब चतुराई के बल पर, गूढ़ और सूक्ष्म योजनाओं के माध्यम मात्रा से ही संभव नहीं है। एक सरलता अपेक्षित है, जो इन सब चतुराइयों और माध्यमों को पार करने पर ही उपलब्ध होती है। महान है उनका जन्म जिनके संस्कार में यह सहज ही विद्यमान हो। ऐसे जन कलाकारों और शिल्पियों की प्रतीक्षा करता है, जो अपनी महान और गहन अनुभूतियों की अभिव्यतियों में सरल से सरल हों।
अज्ञेय के बारे में अपना मत जाहिर करते हुए शमशेर ने लिखा है कि वे नगर के कवि हैं, किंचित उफंचे मध्यवर्ग के सरल, भावुक, मध्यवर्ग के निष्ठावान, संतोषी, मित्‌भाषी, जिज्ञासु, सतर्क, आवश्यकता पड़ने पर साहसी, व्यक्ति के आदर्श मूल्यों के पुजारी, मगर ;पूंजीवादी समाज केद्ध चौतरपफा सांस्कृतिक ह्रास की क्षुब्धता से अपने को एकाकी चिंतन-मनन और कला साधना द्वारा 'सुरक्षित' किए हुए। अपने अथक परिश्रम के बल पर ही सपफल, मर्यादावान, तटस्थ। मुझे ऐसे कवि का व्यक्तित्व बहुत अच्छा लगता है और वह अभी कला के कई सोपान और उफपर उठेगा, मुझे विश्वास है। यहां धर्म, जाति और संस्कृति में जो कुछ कुलीन और श्रेष्ठ और सुंदर और शांतिप्रद, उठाने वाला और पवित्रा बनाने वाला है, उसकी संज्ञा एक हो जाती है। इसी संज्ञा में कलाकार की अनुभूति उपादेय, पावन और आध्यात्मिक अर्थ में मूल्यवान है। इसीलिए अज्ञेय का कवि व्यक्ति मुझे प्रिय है। जहां तक अज्ञेय मेरी कला चेतना को जरा कम 'संतोष' देते हैं, वहां दो कारण हैं। एक मेरे उर्दू के संस्कार का आग्रह और दूसरा मेरा अपना प्रयोगात्मक असंतुलन, कला मेंऋ या रोमानी रुझान। और दोनों से अज्ञेय 'क्लासिकल' हो जाने की हद तक बचते हैं। यही उनकी शक्ति है, और मेरी और कभी-कभी मेरे पाठक की सीमा।
 
मुक्तिबोध
 
शमशेर के मुताबिक मुक्तिबोध वैज्ञानिक कथा-साहित्य बहुत पढ़ते हैं। मुक्तिबोध निम्न मध्यवर्गीय कटु संद्घर्षों पर दीर्द्घ कालीन चिंतन की उफहापोह में, एक विचित्रा भुतहे लोक ने उनकी कल्पना को भर दिया है। यह कटु संद्घर्ष अपने ही जीवन और परिवार के रहे हैं। अतः कल्पना का यह भुतहा ;पफेंटास्टिकद्ध लोक अत्यधिक यथार्थ है, जैसा कि उनकी पंक्तियों के स्नायविक तनाव से स्पष्ट है। मुक्तिबोध के यहां व्यंजनाएं हैं गूढ़ सामाजिक विश्लेषण की। विश्लेषण है वर्ग संद्घर्ष के उस अंश या रूप का जहां निम्न मध्यवर्ग जूझता है। उसको परास्त करने वाली रुढ़ियों और शोषक शक्तियों को मुक्तिबोध प्रतीकों के रूप में खड़ा करते हैं। ये प्रतीक प्राचीन गाथाओं के टुकड़े जान पड़ते हैं, मगर इन टुकड़ों में संदर्भ आधुनिक होता है, मगर यह आधुनिक यथार्थ कथा का भयानकतम अंश होता है। ये भयानक अंश निम्न वर्गों का सार्वभौम शोषण है, यह है 'ब्रह्‌मराक्षस'। एक व्यापक विद्रूप जो व्यक्ति को आतंकित रखता है। निम्न मध्यवर्ग का शिक्षित व्यक्ति अजब सी शूली पर लटका रहता है और भी जिंदा रहता है नरक में जाने के लिए और अपने परिवार के साथ नरक ही भोगता है। मुक्तिबोध की लंबी कविताओं का पैटर्न विस्तृत होता है, एक विशाल म्योरल पेंटिंग- आधुनिक प्रयोगवादीऋ अत्याधुनिक। जिसमें सब चीजें ठोस और स्थिर होती हैंऋ किसी बहुत ट्रेजिक संबंध के जाल में कसी हुई। मुक्तिबोध की कविता जो कथानक होती है, इसमें विद्रूप और क्रूर भाव रूपक को भरपूर नाटकीय बनाने के लिए आवश्यक होता है। चित्राों में जो खुरदरी अस्पष्टता आंखों में चोट सा करती है, वह पूरी कविता में, अपने विस्तार क्रम के कारण, रूपक भाव को कुछ बिखरा देती है। पिफर भी कवि की बेपनाह नर्वस शक्ति का आभास पद-पद में मिलता है। एक चट्टानी कड़ापन, एक खुर्री नग्नता, हिंस्र चांदनी, अपशकुनों से भरा मानव लोक, रात का या दिन का, जिंदगी जो विद्रूप और क्रूर व्यंग्य है। मुक्तिबोध एक अजब मार्क्सवादी व्यंग्यरूपकार कवि हैं।
 
;लेखक युवा आलोचक हैंद्ध
६८०, वेस्ट परमानंद ;नियर किंग्सवे कैम्पद्ध, दिल्ली-९
मो. ०९८६८१७५६०१
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)