अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
आपका पन्ना
सुख देता है 'पाखी' पढ़ना
 
'पाखी' के जनवरी और पफरवरी अंक न केवल पठनीय हैं, बल्कि संग्रहणीय हैं। स्त्राी लेखन पर केंद्रित दोनों अंक ताजगी से परिपूर्ण हैं। साम्प्रदायिकता की लपटें और विशु( प्रेम को रेखांकित करती उर्मिला शिरीष की कहानी 'अंगारों की हंसी' ;पफरवरीद्ध समाज का कटु सत्य सामने लाती है, लेखिका ने समूचे दृश्य को साकार किया है। नीला प्रसाद की कहानी 'शिकंजा' ने भी प्रभावित किया। अनामिका और सविता सिंह की कविताएँ समाज की तल्ख हकीकत हैं। भाषा का दावानल रचते टी.वी. चैनल और अखबारों
के दौर में पाखी को पढ़ना शीतल जल और बयार का सुख देता है।
मनोहर 'मंजुल' पिपल्या-बुजुर्ग, म.प्र.
 
रिश्तों और संवेदनाओं की प्रतिध्वनि
 
'पाखी' का पफरवरी १२ अंक देखा, यह अंक स्त्राी लेखन पर केंद्रित है, और कई मामलों में अनूठा है, इसका अनुभव इस अंक की कविताएँ-कहानियाँ पढ़कर कर सकते हैं। हमारे यथार्थ का चेहरा लगातार बदलता जा रहा है। मूल्यविहीन हो रहे समाज ने हमारे आपसी रिश्तों और संवेदना को विकृत कर दिया है। इसकी प्रतिध्वनि नये रचनाकारों की रचना में सुनाई देती है, संपादकीय में इसका उल्लेख किया गया है। रंगमंच के दृश्य कापफी लोमहर्षक हैं और हमारे सामने अविश्वसनीय पात्रा दिखाई दे रहे हैं।
बलराम और गरिमा श्रीवास्तव के लेख, शोधपरक एवं दिलचस्प हैं। भाई भारत भारद्वाज की उपस्थिति किसी भी पत्रिाका को उल्लेखनीय बना देती है। उनकी स्मरण शक्ति और साहित्य ज्ञान गजब की है।
स्वप्निल श्रीवास्तव, अमानीगंज, पफैजाबाद
 
हाशिए की पीड़ा को महसूसती 'पाखी'
 
आपके द्वारा जो साहित्यिक अनुष्ठान किया जा रहा है वह अपने आपमें हिन्दी की सतत और महान रवायत का ही हिस्सा है। समाज के बहुसंख्यक वर्ग को साथ लेकर चलने की चाह और हाशिये की पीड़ा को शिद्दत के साथ महसूसने की ताकत ही पाखी को विशिष्ट बनाती है। आपकी दृष्टि और सच को बड़े स्पष्ट रूप से उठाने के अंदाज ने मुझे प्रभावित भी किया और कुछ अनगढ़ सा लिखने की ताकत भी दी। 'अश्वत्थामा द्घूम रहा है बैचेन' ने मुझे भी बैचेन कर दिया और तिलमिलाहट से भर दिया। बस यह लगा अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे।
पत्रिाका में जो युवा पीढ़ी को आगे लाकर प्रोत्साहित किया जा रहा है वह काबिले तारीपफ है।
विपिन शर्मा, अनहद, मेल स
 
विवाह प्रथा क्या वैध चकलेबाजी है?
 
'पाखी' के जनवरी अंक में प्रकाशित जयश्री राय की कहानी 'देह के पार' विलम्ब से पढ़ पाई। पढ़ते हुए एक जगह चौंककर अटक गई। कहानी का पात्रा कहता है कि 'जिस इंसान से तुम नपफरत करती हो, उसी का सिंदूर लगाकर उसके नाम का करवाचौथ करती हो, ...सुनने पर बहुत बुरा लगता है, मगर यह भी तो एक अर्थ में वेश्यावृत्ति ही है..' ;पृष्ठ ४८द्ध लगा जैसे कथादेश मई २०११ में छपी अपनी कहानी 'ये चकलेवालियाँ, ये चकलेबाज' के संवाद पिफर से पढ़ रही हूँ। वह तो पूरी कहानी ही इसी थीम पर है- देह से इतर दिल का बाजार लगाए बैठे इमोशनल प्रोस्टिट्यूड्स पर, लाभ के लिए भावनाओं के व्यापार पर, विवाह में बनी रहकर पति के लिए करवाचौथ करती हुई उसे चीट कर रही पत्नियों की जमात पर..उस कहानी की पात्रा कहती है 'पिफर इस चकलेवाली खुद को, मैंने अपने ग्राहक, अपने पति को समर्पित होते और बदले में पैसे की जगह सामाजिक प्रतिष्ठा, सिन्दूर और मातृत्व का सुख पाते देखा.. क्या विवाह प्रथा भी एक वैध चकलेबाजी है?' ;पृष्ठ ७८द्ध अपने विचारों का इस तरह समर्थन और प्रचार पाकर बड़ी खुशी हुई।
नीला प्रसाद, नोएडा, उ.प्र.
 
नारी विमर्श का दस्तावेज
 
'पाखी' का पफरवरी २०१२ का अंक भाई हरीश जोशी द्वारा प्राप्त हुआ, 'स्त्राी लेखन : पीढ़ियाँ साथ-साथ' वास्तव में नारी विमर्श के वर्तमान स्वरूप का जागता दस्तावेज है। नारी मुक्ति के विराट संद्घर्ष की कड़ी में आपका मसिमय सहयोग अत्यंत सराहनीय है। उत्तर आधुनिकता के इस दौर में जहाँ सृजनशीलता हाई पफाई मुकाम पा रही है वहीं साहित्य को साहित्य की नजाकत के साथ पेश करने में आपने पर्याप्त तत्परता दिखाई है। प्रस्तुत अंक की संपूर्ण सामग्री ज्ञानवर्धक, सुरुचिपूर्ण एवं प्रासंगिक है, खासकर कविताएँ बेहद अर्थपूर्ण एवं भावगाम्भीर्य से परिपूर्ण हैं, सुंदर छपाई आकर्षक गेट अप और प्रूपफ की सावधानी से स्तरीय पत्रिाका का कलेवर मार्गदर्शी बन पड़ा है।
हेमचन्द्र दुबे 'उत्तर', बागेश्वर उत्तराखण्ड
 
पीढ़ियों को साथ पढ़ना रुचिकर
 
आपकी पत्रिाका 'पाखी' का पफरवरी २०१२ का अंक पढ़ा। इस अंक को स्त्राी कविता विशेषांक कहना ज्यादा उचित होगा। इस अंक में आपने वरिष्ठ कवियत्राी स्नेहमयी चौधरी के साथ-साथ नवोदिता गायत्राी प्रियदर्शनी को देकर पाठक को एक विस्तृत वांडन्मय प्रदत्त किया है। कई पीढ़ियों को एक साथ पढ़ना रोचक अौर ज्ञानवर्धक रहा है।
जहाँ रश्मिरेखा का कथन कि 'पाने की कोशिश में ज्यादा खोया ही है', जीवन की सच्चाईयों से रू-ब-रू कराता है वहीं अंजना वर्मा का कथन कि 'दिए तो जलाओ सुनहरे दिन लौट आएँगे, भटके मुसापिफर कई, राह पा जाएँगे।' नई आशा का संचार करता है। ज्योति चावला कन्या की विकास यात्राा का वर्णन करती हैं। संध्या नवोदिता स्त्राी का दर्द बिखेर देती हैं।
किसको-किसको गिनाऊँ। सभी ने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है।
जहाँ तक कहानियों की बात है सूर्यबाला ने पति-पत्नी के संबंध में थोड़ा नमक होने की वकालत की है। सबकुछ मीठा होने से जीवन नीरस हो जाता है। उर्मिला शिरीष ने सांप्रदायिकता की पृष्ठभूमि पर एक सुंदर प्रेम कहानी को जन्म दिया है। इस कहानी की सांप्रदायिकता वास्तविक है। आज भी दोनों समुदायों में प्रेम विश्वास लगभग नगण्य हैऋ पिफर! प्रेम तो सदैव ही सलीब पर चढ़ाया जाता है। पूनम सिंह ने अपनी कहानी के माध्यम से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन से गाँव के खत्म होते जाने का सटीक चित्राण किया है। रजनीगुप्त की कहानी 'उसके हिस्से का सच' दिशा के माध्यम से नई पीढ़ी की परिपक्वता को प्रदर्शित करती है, नौजवान होशियार सुंदर लड़की अच्छी नौकरी वाले युवा को ही शादी के लिए चुनेगी, अगर अच्छी नौकरी नहीं मिली तो 'नूतन' जैसी लड़की से ही काम चलाना होगा, दिशा तो अपनी दिशा बदल लेगी। यह युवा नारी की नवीन आर्थिक सोच का प्रेम है।
अनिता भारती ने 'नीला पहाड़ लाल सूरज' में प्रेम विवाह में विश्वास को बनाए रखने की वकालत की है। सुधा ओम ढींगरा की कहानी 'आग में गर्मी कम' नितांत नए, अनछुए विषय पर लिखी कहानी है। शादीशुदा पुरुष का किसी पराई स्त्राी के प्रेम में पड़कर आत्महत्या करते तो सुना था, परंतु शादीशुदा पुरुष का किसी पुरुष के प्रेम में पड़कर आत्महत्या करते नहीं सुना था, यह समलैंगिकता पर लिखी श्रेष्ठ कथा है। किसी की मृत्यु दुःखदायी होती है परंतु इस कथा के नायक की मृत्यु शोक नहीं संतोष देती है, इस दृष्टि से सुधा ओम अपने उद्देश्य में सपफल रही हैं।
रंजना जायसवाल की कहानी 'दूसरा थप्पड़' इस अंक की सर्वश्रेष्ठ कथा है। पति जन अपने रिश्ते का दुरुपयोग करता है तो इसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं, यह कहानी भलिभांति स्थापित करती है, दिखाती है। निशा का यह कथन कि 'स्त्रिायां सच बोलने लगे तो आप जैसे मर्द मुँह छीपाते पिफरें।' संपूर्ण पुरुष जाति के मुँह पर थप्पड़ है तथा यह वाक्य संपूर्ण पुरुष जाति को आइना दिखा जाता है। पुनः निशा का यह कथन कि हर स्त्राी का स्वाद एक जैसा होता है। इसका आनंद प्रेम के कारण मिलता है, स्त्रिायां बदलने से नहीं।' ऐसा वाक्य है जो किसी भी पुरुष को नहीं भूलना चाहिए। लेखिका पुरुष जाति को आइना दिखाने के उद्देश्य में सपफल रही हैं।
अचला बंसल की कहानी 'झाल वाली मछली' रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी है। स्त्राी बदला लेने के लिए अपनी लड़की को बचाने के लिए किसी की हत्या भी कर सकती है, परंतु लेखिका द्वारा हत्या करने का उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो पाया है। इसमें और विस्तार की जरूरत थी, कहानी के अंत में सहानुभूति हीरालाल को मिलती है, रूपमती को नहीं? जिससे लेखिका का उद्देश्य विपफल हो जाता है। नीला प्रसाद की कहानी 'शिकंजा' पति पत्नी के आपसी प्रेम, संदेह, समझदारी की स्वाभाविक परिणति है। लेखिका की भाषा दार्शनिक है तथा वे अपना मंतव्य पाठक तक पहुँचा पाने में सपफल रही हैं।
रोहिणी अग्रवाल का लेख 'सवालों का कटद्घरा' आधुनिक स्त्राी कथा लेखन पर की गई सारगर्भित टिप्पणी हैऋ परंतु लेखिका की भाषा अत्यंत ही क्लिष्ट है जो कि उनके पद के अनुरूप है पर साधारण पाठक ;हम जैसेद्ध के लिए सर के ऊपर से चले जाने वाली है। लेखिका अनावश्यक रूप से जयश्री राय के प्रति कठोर हो गई हैं। मुझे तो जयश्री राय की कहानियां बहुत अच्छी लगती हैं।
अंत में यही कहूँगा आपने सर्वश्रेष्ठ लेखन किया है आपकी संपादकीय, कविता, कथा का चयन लाजवाब हैऋ आपकी पत्रिाका के बारे में यही कहूँगा-
'किसको मारूं, किसको पफेंकूं
किसको लगाऊं सीने से।
आपकी पत्रिाका का हर एक लेख, लेखक,
हीरा लगता है।'
आर.एन.त्रिापाठी, वैशाली, बिहार
 
 
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