अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
बीज
पिता जी सूर्या जीजी के लिए नहीं रोए थे।
निर्देश निधि

जन्म : ३ जून

लेखन विधा-कहानी, कविता, संस्मरण एवं सम सामयिक लेख। विभिन्न पत्रिाकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। एक कहानी एवं एक काव्य संग्रह शीद्घ्र प्रकाश्य। वर्तमान में साहित्यिक पत्रिाका, बुलंद प्रभा में उप संपादक।
द्वारा डॉ.प्रमोद निधि, विद्या भवन, कचहरी रोड
बुलंदशहर उ.प्र.
मो. ०९३५८४८८०८४

पिता जी अभी इलाहाबाद से लौटे नहीं थे, माँ हमेशा की तरह उनके इंतजार में जाग रही थीं। अलाव सामने रखकर रजाई में बैठी-बैठी भइया का स्वैटर बुन रही थीं। अचानक याद आया कि तुलसी को ओढ़नी ओढ़ाना भूल गईं, पाला एक ही रात में नरम-नरम पत्तियों को झुलसा डालेगा। यही सोचकर माँ तुलसी की ओढ़नी लेकर चौरे की तरपफ चलीं। तुलसी को ओढ़नी वो स्वयं ही ओढ़ातीं हटातीं और उसे स्वयं ही धोतीं-सुखातीं, किसी को उसे छूने की इजा८ात नहीं।
तुलसी को ओढ़नी ओढ़ाकर लौट ही रहीं थीं कि शेरा ते८ा-ते८ा भौंकता हुआ सदर दरवाजे की तरपफ दौड़ा, जो आंगन के पार जाकर खुलता था। बाहर से पिता जी की रौबीली आवा८ा सुनाई दीऋ ''चौधरी वीरेन्द्र प्रताप सिंह दरवाजा खोलिए।'' डेढ़ बरस के वीर भइया को पिता जी जब भी आवाज लगाते, इतने ही सम्मान के साथ लगाते, माँ ऐसा बताती थीं। गहरी नींद में सोए वीर प्रताप सिंह के कानों पर तो जूं भी नहीं रेंगी, हाँ माँ और शेरा अवश्य क्षण भर में दरवाजे पर पहुँच गए। ड्योढ़ी पर लगे जीरो वाट के बल्ब की मटियल पीली रोशनी में भी पिता जी की आँखों की खुशी की चमचमाहट स्पष्ट दीख रही थी। शायद वही उस मरियल रोशनी को भी थोड़ा दम दे रही थी। माँ समझीं शायद इलाहबाद वाली जमीन की बात बन गई। परंतु मा८ारा कुछ और ही था। पिता जी अपनी छह पफुट दो इंच की ऊंचाई के साथ कंबल लपेटे हुए एक तरपफ से अपने आपको छिपाते हुए से अंदर आए। ओह, पिफर किसी को उठा लाए, माँ समझ गईं। पिछले बरस लगभग इन्हीं दिनों इस शेरा को अपने
ओवरकोट की जेब में रखकर ले आए थे। बाइस बरस की छोटी सी वयस में माँ स्वयं दो बच्चों, गौरांगी यानी गौरा जीजी और वीर भइया की माँ बन गईं थीं। दोनों बच्चों के हिस्से से ही नन्हें से शेरा को भी खूब समय देना पड़ा था। अब कौन आ गया? अबकी बार पिता जी के कंबल में छिपा हुआ था झक सपफेद अट्ठाइस-तीस किलो का द्घोड़े का हृष्ट-पुष्ट बच्चा। माँ ने राहत की सांस ली, चलो इसे संभालना तो साईस की जिम्मेदारी होगी। परंतु पिता जी के विचार में इतना छोटा बच्चा साईस कैसे संभाल सकता था? अतः उसके लाड़-प्यार की जिम्मेदारी भी हमारी छोटी सी ममतामई माँ पर आन पड़ी। उस बच्चे के लिए अगले दिन से ही बकरी का दूध लगा दिया गया, ताकि उसकी हड्डियाँ चौड़ी और म८ाबूत हो सकें।
पिता जी कहते, देखना बकरी का दूध पीकर इसका दो सौ पाँच हड्डियों का ढाँचा चार सौ दस हड्डियों जैसा दिखेगा। बेसन के लड्डू और चने का दाना उसकी खास पसंद बन गए थे। माँ अंगूरी बाई के साथ मिलकर उसके लिए मनों लड्डू बनवातीं और वो दिनों में चटकर जाती। नाम रखा गया 'सुरइया'। गायिका सुरइया की आवाज के पफैन पिता जी कहते कि पिफल्मी गायिका सुरइया की सुरीली आवाज से कमतर नहीं है इसका हिनहिनाना। वो भी जल्दी ही अपना सुरीला नाम पहचानने लगी। पिता जी दूर से ही पुकारते, 'सुरइया' वो तुरंत से पहले उठ खड़ी होती, प्यार से हिनहिनाती। पिता जी उसे देखकर पफूले नहीं समाते। पिता जी की लाडली वो झक सपफेद, सुरीली सुरइया शुक्ल पक्ष के चाँद सी दिनों-दिन बढ़ती चली। पैलोमीनो नस्ल की होने की वजह से बेहद सुंदर और गुणों की खान थी वो। सहनशील इतनी कि बड़ी और कड़ी परीक्षाओं को भी कुछ नहीं के बराबर समझती। ते८ा-तर्रारी में भी किसी 'मुश्टैंग' किस्म के द्घोड़े से उन्नीस तो नहीं थी।
उस जमाने में पेट्रोल-डी८ाल से चलने वाले वाहनों का प्रचलन आज के जितना नहीं था। धनाढ्यों की भी पहली पसंद अच्छी किस्म के द्घोड़े ही हुआ करते थे। पिता जी की जीप भी कभी-कभार ही निकाली जाती। चार-पाँच द्घोड़े उनके अस्तबल की शान हुआ करते थे। सुरइया हमारे द्घर आने वाली पहली द्घोड़ी थी।
पिता जी अक्सर आश्चर्य करते कि जब लगभग तीन सौ प्रजातियों के द्घोड़े, पैंतालीस से पचपन मिलियन वर्षों पूर्व ही अस्तित्व में आ गए थे तो पिफर इंसान ने उन्हें पालतू पशु में परिवर्तित करने में चार हजार बीसी तक आने का लम्बा समय व्यर्थ क्यों गंवाया? सचमुच बड़ी शान की सवारी है। न प्रदूषण, न हरी-भरी वसुंधरा को कोई हानि-ग्लानि। इन्सान से जुड़ाव भी पूरी तरह भावनात्मक।
सुरइया चार-पाँच द्घोड़ों में इकलौती द्घोड़ी, सबकी बेहद लाडली। उसका ध्यान न रखने पर पुराना साईस भी अक्सर डांट खा जाता। गौरा जीजी या वीर भइया भी उसके साथ कोई अन्याय नहीं कर सकते थे। तर्क था, वो तुम दोनों से छोटी है। चार-साढ़े चार वर्षों तक उसका पालन-पोषण और ट्रेनिंग बड़े ढंग से की गई। उसके आगे के बारह और पीछे के चौबीस के चौबीस दांत, उसके गुलाबी मुँह में बगुलों की श्वेत अनुशासित पंक्तियों से खड़े दिखाई देते। अब वो लगभग साढ़े तीन सौ किलो की पैंसठ इंच ऊंची श्वेतवर्णा सुरइया, सौंदर्य से भरी नवयौवना सी बन गई थी। वो जिधर से निकल जाती, हर दृष्टि उसकी ओर उठ जाती। भाव चाहे प्रशंसा, ईर्ष्या या अन्य और कोई भी होता हो। पिता जी की पसंद थी आखिर। इस बात का उन्हें स्वयं भी गर्व था। उन्हें सबकुछ चाहिए था अद्वितीय। सुरइया के चर्चे दूरदराज तक थे, जैसे वो कोई साधारण द्घोड़ी न होकर राणाप्रताप के चेतक की सहोदर हो। निःसंदेह वो अद्वितीय थी। जब अपनी तीव्रतम गति से दौड़ती तो द्घर से पचास किलोमीटर दूर धामपुर द्घंटे भर में पहुँचा देती। परंतु अब वो द्घर में सबसे छोटी तो नहीं रही थी। उससे छोटे चौधरी धीरेन्द्र प्रताप सिंह यानी मेरे छोटे भइया का जन्म हो चुका था। परंतु माँ और पिता जी का लाड़ उसके प्रति रत्तीभर कम न हुआ। बेचारे साईस को तो कभी भी दो लात जड़ देती। अगर खूंटे से खुल गई तो जब तक पिता जी की आवा८ा उसके कानों में न पड़े तब तक उसका किसी के हाथ आना लगभग असंभव था। उसके लिए चाहे उसे अस्तबल का लोहे वाला गेट ही क्यों न लांद्घना पड़े। पिता जी की अनुपस्थिति में साईस माँ को ही उसे पुकारने के लिए बुलाने भागता।
धीर भइया लगभग चार-पाँच बरस के रहे होंगे। नटखट भइया बैठी हुई सुरइया के ऊपर जा चढ़े और उसे खड़ी हो जाने के लिए तिक-तिक करने लगे। छोटे मालिक के आदेश पर आज्ञाकारिणी तुरंत उठ खड़ी हुई। उसके खड़े होते ही अनाड़ी धीर भइया उसके नीचे आ गिरे। उसका बांया पैर धीर भइया के ठीक पेट के ऊपर। संयोगवश माँ सामने ही खड़ी थीं, वो ८ाोर से चिल्लाईं,
''सुरइया पाँव मत रख, पाँव मत रख।'' न जाने कैसे समझी वो चतुर? पाँव ऊपर ही किये खड़ी रही तब तक, जब तक माँ ने भइया को उसके पाँव के नीचे से खींच नहीं लिया। पिता जी ने उसकी इस समझदारी पर उसके लिए मन भर बेसन के लड्डू उसी दिन बनवाए। निःसंदेह उसने समझदारी भी गजब की ही दिखाई थी। माँ तो उस दिन के बाद छोटे भइया का जीवन उसी की देन मानती रहीं। बहरहाल, कहने की जरूरत नहीं कि वो हमारे द्घर का हममें से ही एक सदस्य बन गई थी।
पिता जी की प्यारी इकलौती बहन चंद्रकुंवर बुआ की बड़ी बेटी सूर्यबाला जीजी हमारे ही द्घर रहकर पली-बढ़ीं। वो गौरा जीजी से भी बड़ी थीं, इतनी बड़ी कि अब उनके ब्याह का समय हो आया था। पिता जी ने सूर्या जीजी का रिश्ता अपनी ही पसंद के एक ८ामीदार और खानदानी माने जाने वाले द्घराने में किया। सब खुश थे। पिता जी खुशी-खुशी जीजी का दहेज जुटा रहे थे। एक से बढ़कर एक पफर्नीचर, बर्तन, बिस्तर, कपड़े, नायाब गहने और अनोखे उपहार, वगैरा-वगैरा और लड़के के लिए मोटर साइकिल। क्योंकि नई पीढ़ी के लड़के ने बातों-बातों में अपनी पसंद की सवारी बता दी थी। सो पिता जी ने उसके लिए शान से चलने वाली रॉयल एन पफील्ड की बुलेट मोटर साइकिल खरीद दी। सगाई के दिन लड़के के ताऊ जी ने अपने लिए द्घोड़ी की मांग कर दी। पिता जी सहर्ष द्घोड़ी देने को तैयार हो गए। परंतु नहीं, इस मांग को पूरी करने में 'सहर्ष' जैसी कोई बात नहीं थी। क्योंकि द्घोड़ी पुष्कर या सोरों के मेले से थोड़े ही आनी थी। द्घोड़ी तो वो चाहिए थी जिसका नाम था सुरइया। क्योंकि सुरइया के किस्से लड़के के ताऊ जी ने खूब सुन रखे थे। पिता जी इस मांग पर अवाक्‌ रह गए। दूसरी दो-दो द्घोड़ियां उन्हें देने को कहकर मोल भाव सा करने लगे। आशावाद के पक्षधर पिता जी ने थोड़ा अड़ियल रवैया भी अपनाया परंतु प्रिय भांजी सूर्यबाला ससुरालियों की नारा८ागी के साथ ससुराल में पहला कदम रखेगी, सोचकर उन्होंने अपनी आवा८ा नरम कर ली। तब उन्होंने अपने व्यवहार से उलट कृपया, कृपा करके आदि कौन-कौन से शब्द प्रयोग नहीं किये। परंतु लड़के वाले होने का द्घमंड लड़के के ताऊ जी को मूंछें ऊपर रखने के लिए उकसा रहा था। अंततः एक ही विवाह में द्घर के दो सदस्य देना निश्चित हुआ। सूर्या जीजी के साथ विदाई थी द्घर की लाडली सुरइया की भी। जीजी के विवाह का प्रतीक्षित उत्साह सुरइया के अनायास होने वाले विछोह से पनपी कड़वाहट के गहरे कुंड में डूब गया था कहीं। पिता जी की रातों की नींद उचटे व्यवहार की हो गई थी, माँ दुखी थीं। सूर्या जीजी, गौरा जीजी, वीर और धीर भइया सबके सब उदास थे। मैं तो खैर पैदा ही उसके जाने के बाद गुमी हुई खुशी को ढूंढ़ते उदास माहौल में हुई थी। इसलिए मेरे नामकरण में सबसे छोटी दावत दी गई और मेरी जन्म कुंडली तो आज तक पूरी नहीं हो सकी है।
सूर्या जीजी का विवाह संपन्न हुआ। विदाई के समय लड़के के ताऊ जी को वधू ले जाने की अपेक्षा सुरइया को ले जाने में ज्यादा दिलचस्पी थी। आखिर साईस उसे अस्तबल से ले आया। लगाम लड़के के ताऊ जी को सौंप दी गई, परंतु उस चंचला ने पल भर में स्वयं को उनसे छुड़ा लिया। वो लड़की और लड़के वालों का भेद समझ पाने में सर्वथा असमर्थ थी। दस बार पकड़ाने पर भी उनके पास नहीं रुकी, अंततः पिता जी को उसे डांटना पड़ा। वो बचपन से उनकी बात सुनती, समझती और मानती आई थी, अतः कान दबाकर, सिर झुकाकर चुपचाप खड़ी हो गई। लड़के के ताऊ जी शान से मुस्कुरा रहे थे। एक बार को तो सूर्या जीजी ने लड़के के ताऊ जी की इस मांग पर विवाह करने से ये कहकर इनकार कर दिया था कि, मेरे मामा की प्यारी सुरइया को जिद्दन मांगने वालों के यहाँ मैं नहीं जाना चाहती। वो तो और भी न जाने क्या-क्या ८िाद लगा बैठें। परंतु अपने दिल पर पत्थर रख कर पिता जी ने उन्हें समझाया कि, 'सूर्या बेटी सुरइया मुझे प्यारी है, पर तुमसे प्यारी तो नहीं? जब मैं तेरा विवाह उस द्घर में कर रहा हूँ तो सुरइया को उन्हें देने में क्या हर्८ा है बता? तू अपना और उसका खयाल रखना बस।' और जीजी मान गईं। क्योंकि जीजा जी का बड़ा द्घराना और उनका खुद का व्यक्तित्व जीजी को भा जो गया था।
पिता जी की डांट खाकर सुरइया ने इस बार अपनी लगाम लड़के के ताऊ जी के हाथों सौंपे जाने पर कोई विरोध नहीं किया। परंतु उस निरीह के अंतःकरण का प्रबल विरोध विवशता की आंच से पिद्घल, तरल होकर उसकी गहरी काली आँखों की कोर से टप-टप, टपक पड़ा। वो जाते हुए बार-बार मुड़कर कभी पिता जी की तरपफ देखती तो कभी माँ की तरपफ। इस आशा के साथ कि वो आएँगे और लड़के के इस संवेदनहीन मुच्छड़ ताऊ से उसकी लगाम अपने ममता भरे हाथों में ले लेंगे और वो हमेशा की तरह आगे के दोनों पैर उठाकर खुशी से हिनहिना देगी। परंतु नहीं, उन दोनों में से कोई भी सुरइया की विदाई पर उससे दृष्टि मिलाने का साहस नहीं कर सका। हवा पर सवार रहने की आदी सुरइया के पाँव ऐसे उठ रहे थे जैसे नाल की जगह किसी ने उसके कत्थई खुरों में चक्की के पाट ठोक दिये हों। पिता जी अपनी विवशता और उसकी आज्ञाकारिता पर पफपफक-पफपफक कर रो दिये थे। दादी के देहावसान के बाद, पिछले तीस बरसों के अंतराल में लोगों ने उन्हें पहली बार इस तरह अपनी भावनाओं को स्वतंत्रा छोड़ते देखा। निश्चय ही, उस दिन पिता जी सूर्या जीजी के लिए नहीं रोए थे।
शायद, उस द्घर में विवाह से सूर्यबाला जीजी का इनकार ही ठीक था। उनकी ससुराल में सुरइया की तो क्या खुद उनकी ही कदर नहीं हुई। जीजी ने बहुत कुछ सहा। परंतु वो मर्यादित परिवार की, संस्कारों की डोर से बंधी इंसान की बेटी अपनी मर्यादाओं को संगिनी बनाकर आजीवन उस परिवार में रहने का साहस दिखा पाईं। परंतु सुरइया की अपनी विवशता थी। आखिर वो पशुपुत्राी ऐसी मर्यादाओं में बंधना कैसे जान पाती? उसने तो की अपने मन की। जीजी की ससुराल के एक भी सदस्य को, एक भी बार ढंग से सवारी नहीं दी। बेसन के लड्डुओं पर पलने वाली पिता जी की उस लाडली ने, उपेक्षा से डाले गए चारे को सूंद्घा तक नहीं। भले ही उसका दो सौ पाँच हड्डियों का ढांचा सूख कर मात्रा सौ हड्डियों का सा ही क्यों न दिखने लगा। उसकी अनुशासनहीनता पर उसके साथ दुगना दुर्व्यवहार हुआ। उसके दाग रहित झक सपफेद रंग के नरम-नरम रोंए, जगह-जगह हंटरों की तस्वीर खुद पर उतारे खड़े थे।
सूर्यबाला जीजी ने जब हड्डियों का पिंजर बनी उस उदास सुरइया को अपनी ससुराल में पहली बार देखा तो उसकी हालत देखकर वो बेतहाशा रोई थीं। जिसकी वजह से उन्हें खूब डांट खानी पड़ी एक जानवर के लिए द्घर में अपशगुन पफैलाने के लिए। उन्होंने पिता जी से सुरइया को वापस ले जाने का बहुत आग्रह भी किया। पिता जी ने अपना अहं त्यागकर जीजा जी के मुच्छड़ ताऊ को सुरइया को वापस भेजने के आग्रह से भरा विनम्र पत्रा भेजा। संवेदनाओं, आग्रह, विनती, विनम्रता से भरे पत्रा के उत्तर में एक पत्रा ही आया, बेहद रूखा और असभ्यता से भरा। जिसका सबसे भद्दा रूप था कि ''दहेज में दी हुई चीजें वापस मांग लेने वालों का क्या भरोसा, कल अपनी बेटी भी वापस मांग लें।'' उसके बाद उनके और पिता जी के बीच कोई वार्तालाप नहीं हुआ, न मौखिक न लिखित।
सुरइया को अपने लिए नकारा समझकर सूर्या जीजी के ससुरालियों ने उसे अपने किसी रिश्तेदार को दे दिया। पर वो वहाँ लंबे समय तक नहीं रह सकी। वो वहाँ से चली गई थी, परंतु कहाँ? ये कोई नहीं जान पाया। सूर्यबाला जीजी तो जीवन भर द्घर आती-जाती रहीं, पर वो मानिनी अपनी मर्जी के खिलापफ एक बार द्घर से विदा होकर पिफर कभी वापस नहीं लौटी। कितना रोष रहा होगा उसके मन में खुद को अलग किये जाने का।
उस बरस हमारे द्घर में बड़ी आपदाएँ आईं। चैत्रा मास में सूर्यबाला जीजी का विवाह हुआ था, बैसाख में खलिहान में रखी हमारे कटे हुए गेहूं की पूलियों के ढेर के ढेर क्षण भर में जलकर राख हो गए। कौन जाने क्यों धान की बालियों में दाना नहीं पड़ा, माँ इतनी ज्यादा बीमार हुईं कि लगभग मरकर ही जिंदा हुईं। पिता जी भी महीने भर अवसाद में ही रहे। हम इलाहाबाद वाली जमीन का मुकदमा हार गए। और भी न जाने कितने छोटे-बड़े नुकसान हुए।
मेरा जन्म सुरइया के द्घर से जाने के बाद हुआ था। सो मैंने उसे कभी नहीं देखा था। परंतु रोज पिता जी से कहानियाँ सुनकर सोने के मेरे शौक ने, बल्कि कहूँगी मेरी लत ने, सुरइया से मेरा परिचय कराया, और खूब कराया। रामायण, महाभारत आदि अनेक पौराणिक कहानियाँ सुनाने के बाद पिता जी मुझे रोज सुरइया की कोई एक चुनिंदा स्मृति जरूर सुनाते। हर स्मृति सुनाने के बाद वो बड़े मलाल के साथ कहते, 'वैसे तो द्घोड़ों की औसत आयु पच्चीस से तीस बरस ही होती है, परंतु अगर सुरइया मेरे पास रह गई होती तो मैं यकीनन ये दिखा पाता कि अच्छी देखभाल के साथ वो ज्यादा भी जी सकते हैं।'' ये कहते हुए लगभग रो८ा ही उनकी मोटी-मोटी आँखों में आँसू छलक पड़ते, जिन्हें वो मुझसे छुपा लेने का भरसक प्रयास करते, अक्सर छुपा भी लेते परंतु कभी-कभी वो उद्दण्ड होकर आँखों से बाहर दौड़ पड़ते और उनकी छोटी सी बेटी के सामने उन्हें कम८ाोर साबित कर देते। पिता जी की लाडली सुरइया का दर्द उनके साथ-साथ अक्सर मेरी भी आँखों से निकलता। इस तरह सुरइया से मेरी द्घनिष्ठता भी लगभग उतनी ही हो गई थी जितनी पिता जी की थी। आज जब मैं बड़ी हो गई हूँ तब पूरी तरह समझ सकती हूँ कि पिता जी ने कितने प्यार से पाला होगा सुरइया को और कुछ बात तो उसमें भी विशेष रही जरूर होगी जो मात्रा दस-बारह बरस के साथ को पिता जी मरते दम तक भुला नहीं पाए। अब वो स्वयं तो नहीं रहे परंतु मुझमें सुरइया की सैकड़ों यादें रोप गए, जो आज तक मेरे मन मस्तिष्क में पफल-पफूल रही हैं, हरा-भरा कथा वृक्ष बनकर।

 
 
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