अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
सृजन-संदर्भ
नौ दिन चले अढ़ाई कोस
 
भारत भारद्वाज

 

   

हिन्दी भाषी समाज में प्रचलित यह एक लोकप्रिय मुहावरा या कहावत है जिसका शाब्दिक अर्थ है जहाँ का तहाँ यानी नौ दिन की अवधि में की गई यात्राा का हासिल है अढ़ाई कोस की दूरी। एक तरह से इस मुहावरे का विपर्यय और उपहास। लेकिन नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया द्वारा नई दिल्ली के प्रगति मैदान में २५ पफरवरी २०१२ से ४ मार्च २०१२ तक आयोजित नौ दिवसीय २०वें विश्वपुस्तक मेला ने इस मुहावरे को झूठा साबित कर दिया। इस मेले में भारत के अनेक हिस्से से आए लेखकों की गहमागहमी रही। लोकार्पण और संगोष्ठियों की भरमार रही। मेले की हरी डाल कश्मीर में बपर्फपात के बाद सेब की डालियों की तरह झुकी हुई, धरती का स्पर्श करती रही। धरती-आकाश की दूरी नापती रही।
किसी विद्वान ने बिल्कुल ठीक कहा है कि किसी शहर की बौ(कि ऊँचाई का पता लगाना हो तो आप देखें उस शहर में कितने पुस्तकालय और पुस्तकों की दुकाने हैं। शब्दों की सत्ता किसी भी तानाशाह की गोली से ज्यादा शक्तिशाली होती है। १९५८ की 'अटलांटिक' पत्रिाका में एक लेख छपा था- 'दुनिया का महानतम प्रकाशन-गृह गालीमार।' उस लेख की शुरुआत ही हुई थी इस पंक्ति से-'जब हिटलर ने ांस पर कब्जा किया ;द्वितीय विश्वयु( के दौरानद्ध तो दो ही आदेश जारी किए थे-'बैंक डी-ांस और
गालीमार को अपने हाथ में ले लो।' आगे उसमें बताया गया था कि किस तरह ांस के पिछले पचास वर्षों के साहित्य-संस्कृति का इतिहास-केवल गालीमार-का इतिहास है। आधे दर्जन से अधिक नोबेल पुरस्कार प्राप्त साहित्यकारों का यह प्रकाशक आंद्रेनीद, आंद्रे मालरो, ज्यां काक्यू, कामू, सार्त्रा और सिमोन दे बोउवार जैसे प्रसि( नामों से जुड़े रहे हैं। सार्त्रा और कामू आपस में न बोलते हों, लेकिन जिन दो पत्रिाकाओं के संपादक हैं, उनके प्रकाशक हैं गालीमार!' ;सहयात्राी-ओमप्रकाश -राजेन्द्र यादव, 'औरों के बहाने' पुस्तक, पृ. ९३द्ध।
विश्व पुस्तक मेला के आयोजन का इतिहास बेहद रोमांचक और दिलचस्प है। पहली बार १९७२ में नई दिल्ली के विडंसर प्लेस ;जनपथद्ध में लगभग २०० प्रकाशकों के साथ शुरू हुआ नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला का यह आयोजन आज बढ़कर १२०० से अधिक प्रतिभागियों तक जा पहुंचा है जो प्रगति मैदान जैसे विशाल परिसर में आयोजित होता है। राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने एक बातचीत के क्रम में बताया कि उन्होंने १९७२ में आयोजित पहला विश्व पुस्तक मेला स्कूल के विद्यार्थी के रूप में देखा था। पहली बार मैंने प्रगति मैदान में आयोजित आठवां विश्व पुस्तक मेला १९८६ में देखा था। हिन्दी प्रकाशकों का स्टाल हॉल नं. १४ में ही था। लेकिन इस मेले की एक बड़ी विशेषता यह थी कि प्रमुखता के साथ इस हॉल में उस वर्ष प्रकाशित हिन्दी की २५ पुस्तकों की स्वतंत्रा प्रदर्शनी लगाई गयी थी जिसमें एक चयनित पुस्तक 'शब्द जहाँ सक्रिय हैं'
भी थी, जो उसी वर्ष नेशनल पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित हुई थी। यह परंपरा अब खत्म हो गई है। इसे जारी रखी जाती तो हिन्दी पाठकों को श्रेष्ठ पुस्तकों के चयन में मदद मिलती।
२०वें विश्व पुस्तक मेला पर नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया की ओर से जारी 'पफेअर डायरेक्टरी' के अनुसार इस मेले में ४५००० ैफ उजे में २५०० से ऊपर पुस्तकों के स्टाल थे। १३०० प्रदर्शनी थीं, जिसमें विदेशी प्रदर्शनी की संख्या ३० थी और इसमें ूीवए नदमेबव और ूवतसक इंदा की सहभागिता थी। मेला हॉल नं. १ से लेकर १४ में आयोजित था। इस बार मेला का थीम था-'सिनेमा और साहित्य'। शिल्पायन के प्रबंध निदेशक कांति शर्मा बताते हैं कि इस मेले में 'वर्तमान साहित्य' का सिनेमा पर केंद्रित पुस्तक की १०० प्रतियां बिकीं। हिन्दी के प्रकाशकों का स्टॉल हॉल नं. १४ में था। इस मेले में विभिन्न प्रकाशकों द्वारा हिन्दी की लगभग १०० से ऊपर पुस्तकें लोकार्पित हुईं। राजकमल प्रकाशन ने हिन्दी के प्रतिष्ठित समालोचक प्रो. नामवर सिंह की चार पुस्तकें-
'आलोचना और विचार धारा', 'साहित्य की पहचान', 'साथ-साथ' और 'सम्मुख' लोकार्पित कीं। वाणी प्रकाशन के द्वारा ओम थानवी द्वारा संपादित 'अपने-अपने अज्ञेय' ;दो खंडद्ध एवं अशोक वाजपेयी की पुस्तक 'कुछ खोजते हुए' ;'कभी-कभार' स्तंभ का संकलन-संपादन पीयूष दईयाद्ध लोकार्पित हुई। मेधा बुक्स, स्वराज प्रकाशन, प्रकाशन संस्थान की पुस्तकें भी सामने आई। इस मेले में में डॉ. नामवर सिंह पर केंद्रित दो पुस्तकें रिलीज हईं। भारत यायावर द्वारा लिखित एवं किताब द्घर से प्रकाशित पुस्तक-'नामवर होने का अर्थ' एवं सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित एवं पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज द्वारा संपादित पुस्तक-'नामवर सिंह : एक मूल्यांकन।' अनेक और महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लोकार्पित हुईं जिसकी सूची मैं प्रस्तुत करने नहीं जा रहा। लेकिन इस मेले में दो पुस्तकें लोकार्पित नहीं हुईं। भ्ाारतीय ज्ञानपीठ से प्रो. नंदकिशोर नवल की प्रकाशित पुस्तक 'आधुनिक हिन्दी कविता का इतिहास' और राजकमल
प्रकाशन से प्रकाशित श्याम कश्यप का दूसरा कविता संग्रह 'लहू में पफंसे शब्द'। भारत यायावर मुझे 'मीता' कहते हैं। रेणु रचनावली का संपादन करते उनकी कहानी-'तीसरी कसम' के हिरामन-हीराबाई से यह संज्ञा उन्होंने उठाई है। वे मुझे प्रिय लगते हैं। इस मेले के दौरान वे मेरे निवास पर ही ठहरे थे। वे जब कभी दिल्ली आते हैं, दिल्ली को रौंदकर-पूरब पश्चिम, उत्तर दक्षिण चले जाते हैं। इस बार दिल्ली प्रवास के दौरान उन्होंने रेणु की एक कविता 'मेरा मीत सनीचर!' सुनाई थी। हम रातभर रेणु के साथ लहालोट रहे। पुस्तक मेला खत्म हुआ लेकिन इसकी अनुगूंज अगले मेला ;२०१४द्ध तक हमारे मन-प्राण को मथती रहेगी।

विश्व के अनेक देशों का भ्रमण करने के बाद मुझे इस बात का गहरा अपफसोस है कि अपने ही देश के अनेक प्रदेशों की मैंने कभी यात्राा नहीं की। पिछले दिनों जब कुल्लू से निरंजन देव शर्मा ने मुझे पफोन पर आमंत्रिात किया कि वहाँ के एक कॉलेज की संगोष्ठी में भाग लेना है, मैं उन्हें मना नहीं कर सका। यह हिमाचल प्रदेश की मेरी पहली यात्राा ही नहीं थी, उस प्रदेश में पहला प्रवेश था।
इस यात्राा के दौरान एक दिलचस्प एवं मनोरंजक द्घटना द्घटी। 'हंस' पत्रिाका में मैंने मई १९९१ से अपना स्तंभ लिखना शुरू किया था। संभवतः १९९२-९३ में मंडी के लेखक योगेश्वर शर्मा से मेरा पत्रााचार आरंभ हुआ था। उन्होंने तब अपनी दो कहानियाँ-अपनी हस्तलिपि में लिखकर- 'पानी पिओगे भैक्षया?' और 'दादूचूर्ण बेचते हैं'-१९ अप्रैल १९९३ को भेजी थी। मुझे ठीक से नहीं मालूम इन कहानियों के साथ मैंने कैसा न्याय किया। लेकिन हस्तलिपि में लिखी उनकी दो कहानियों को २० वर्षों तक संभालकर जरूर मैंने रखा। मेरा डर था कि हस्तलिपि में लिखी इन कहानियों की प्रतिलिपि उनके पास शायद नहीं होगी। मैं १८ पफरवरी २०१२ को कुल्लू में था और निरंजन देव शर्मा ने कृपापूर्वक मोबाइल पर उनसे मेरी बात करा दी। बातचीत के दौरान पता चला कि उनकी दोनों कहानियाँ-उनके नए कहानी संग्रह 'आ गया भराड़ी द्घाट' में संकलित हैं। मैं सचमुच एक अपराध बोध से बच गया।
सच्चिदानंद वात्स्यायन द्वारा संकलित संपादित ग्रंथ 'रूपाम्बरा' श्री सुमित्राा नंदन पंत की षष्ठिपूर्ति के उपलक्ष्य में राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में १९६० ई. में उन्हें भेंट किया गया था। पंत को समर्पित यह एक अप्रतिम ग्रंथ है। प्रकृति के विलक्षण पंत जैसे श्रेष्ठ कवि के प्रति अज्ञेय की यह श्र(ा निवेदन मात्रा नहीं है, इसमें हिन्दी कविता के एक हजार वर्ष का इतिहास भी है। अज्ञेय ने अमीर खुसरो से लेकर 'तीसरा सप्तक' की तब की युवा कवयित्राी कीर्ति चौधरी को भी इसमें शामिल किया था।
१९६० में ज्ञानपीठ से प्रकाशित 'रूपाम्बरा' की प्रति मैंने हाई स्कूल के दिनों में देखी थी। पंत की षष्ठिपूर्ति पर समर्पित प्रकृति-परक कविताओं का यह अद्भुत संकलन था। मैं इस उधेड़बुन में था कि यह संकलन देखने का अवसर मुझे कैसे मिला। संपर्क करने पर मेरे अग्रज नंद किशोर नवल ने पफोन पर मुझे बताया कि इस संकलन में रामगोपाल रूद्र ;ज. १९१२द्ध की एक कविता 'भूले कुसुम!' संकलित थी और अज्ञेय ने उनको एक प्रति भिजवाई थी। अब मेरे सामने 'रूपाम्बरा' के प्रकाशन का इतिहास ही नहीं था, स्मृति के आधार पर १९६० में प्रकाशित 'रूपाम्बरा' का मूल स्वरूप भी था। यह पुस्तक दशकों से मेरी स्मृति में थी। पिछले दिनों भारतीय ज्ञानपीठ जाने पर जब मैंने
निदेशक रवीन्द्र कालिया से इस पुस्तक की चर्चा की तो
उन्होंने कृपापूर्वक इस पुस्तक का सद्यः प्रकाशित पुनर्नवा संस्करण २०१२ मुझे उपलब्ध करवा दिया। अनुमानतः दशकों बाद प्रकाशित पुस्तक का यह नया संस्करण नयनाभिराम है। आवरण पृष्ठ पर डालियों में खिले दो बैगनी रंग के पफूलों के साथ। 'रूपाम्बरा' के खूबसूरत बिम्ब और प्रतीक के रूप में।
एक बात मैं भूल गया। जब यह पुस्तक छप रही थी, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने पंतजी की षष्ठिपूर्ति पर अपनी शुभकामनाएं भेजी थीं-'मिले संत के अनुप्रास से तुम हमको प्रिय पंत/भोगो अपनी जन्मभूमि के शत-शत शरद-वसंत'
पहली बार जब 'रूपांबरा' छपी थी, नरेश मेहता ने अपनी कविताएँ नहीं दी थीं और अज्ञेय ने उनकी तीन कविताओं का शीर्षक देकर पन्ना-खाली छोड़ दिया था। अब इस पुस्तक के
पुनर्नवा संस्करण में उनकी दो कविताएँ- 'पीले पफूल कनेर के' एवं 'किरण धनुएं' संकलित हैं। यह कैसे हुआ मुझे नहीं मालूम। लेकिन पुस्तक के मूलरूप को सुरक्षित रखा जाता तो ज्यादा अच्छा होता। यह दुखद बात है कि अज्ञेय जन्मशती वर्ष में अज्ञेय पर खूब चर्चा तो हुई लेकिन किसी ने भूलकर भी अज्ञेय द्वारा संपादित इस पुस्तक की चर्चा नहीं की। मुझे लगता है, अज्ञेय जन्मशती वर्ष में उन्हें हमने आधे-अधूरे रूप में याद किया। अज्ञेय ने अपने अग्रज कवि के प्रति जिस तरह आँण्ा चुकाया, हम उसे भूल गए। यह एक त्राासद द्घटना है।

मीर का एक शेर है-'दिल की विरानगी का क्या मजकूर है, यह नगर सौ मरतवहः लूटा गया।' यह दिल्ली है। इसी शहर में कभी एक कॉपफी हाउस था। और इस कॉपफी हाउस की जगह भी बदलती रही है। कभी टेंट में, कभी 'टी हाउस' और अभी मोहन सिंह प्लेस कॉपफी हाउस। कभी अस्सी के दशक में यह कॉपफी हाउस गुलजार हुआ करता था। विष्णु प्रभाकर कॉपफी हाउस के कुलपति हुआ करते थे और हिन्दी के प्रतिष्ठित और नवोदित लेखक उनके इर्द-गिर्द मंडराते थे। धीरे-धीरे कॉपफी हाउस में आने वाले लेखक छंटते गए। लेकिन विष्णु प्रभाकर के स्कूल के मेधावी छात्रा पंकज बिष्ट अब भी कॉपफी हाउस आते हैं। पिछले दिनों कवि श्याम कश्यप ने पिफर यह सिलसिला शुरू किया है। अब पिफर शनिवार को लेखक कापफी हाउस आने लगे हैं। वर्षों बाद पिछली बार १७ मार्च २०१२ को मैं श्याम कश्यप के साथ पिफर कॉपफी हाउस गया। भीतर जहाँ हम बैठे थे-मैंने कहा यही वह जगह है जहाँ बीस वर्ष पूर्व हम लोग बैठते थे। 'जनयुग' से रविवारी पृष्ठ लहराते श्याम कश्यप, केवल गोस्वामी, उदय प्रकाश, राजकुमार सैनी कॉपफी हाउस आते थे। इसी टेबुल के नीचे कुमार विकल, राज कुमार सैनी की ब्रीपफकेस पाँव के बीच पफंसाकर शराब-पीते थे और हम लोग टेबुल पर कापफी। इस बीच दुनिया बदल गई। पंकज बिष्ट ने कहा-देखो तो साला! अब कितनी बदतमीजी से बात करता है। हम कॉपफी हाउस में मिल रहे हैं। शायद मिलते-मिलते एक नई दुनिया की तलाश हम करें। जगदीश चतुर्वेदी ने कॉपफी हाउस को केन्द्र में रखकर एक पुस्तक लिखी। स्व. द्रोणवीर कोहली, जो धर्मयुग में बुनियाद अली के नाम से लिखते थे, की कॉपफी हाउस पर लिखी पुस्तक पिछले दिनों चर्चित रही। वही कॉपफी हाउस है लेकिन अब पुराने चेहरे कम ही दिखते हैं। और तो और डॉ. रमेश सक्सेना ने इस बार कॉपफी हाउस में होली की पूर्व संध्या पर मिलन गोष्ठी भी नहीं की।
पत्रिाकाएँ
१. वाघ्‌मय-२०१२, संपादक-डॉ. एम.पफीरोज अहमद, संपर्क-२०५, ओहद रेजीडेंसी, नियर पानवाली कोठी, दोद पुररोड, अलीगढ़-२०२००२, इस अंक का मूल्य : १०० रुपये।
गुलशेर खाँ शानी पर केंद्रित पत्रिाका का यह विशेषांक हमारे समय के एक विस्तृत विलक्षण कथाकार और संपादक को याद करने का उपक्रम ही नहीं है, उन्हें साहित्य के समय-संदर्भ से जोड़ने और उनके महत्व को उजागर करने का एक विनम्र प्रयास भी है। शानी ने 'काला जल' जैसा उपन्यास लिखा, जिसमें बस्तर जैसे पिछड़े इलाके के मुस्लिम समाज के दुख-दर्द को प्रस्तुत किया, 'साक्षात्कार' जैसी पत्रिाका का संपादन किया और पिफर दिल्ली में साहित्य अकादमी की पत्रिाका 'समकालीन भारतीय साहित्य' के संपादन का दायित्व कुशलतापूर्वक निभाया, उन्हें याद करना सचमुच आँण चुकाने जैसा है। इस विशेषांक के दो खंडों में उनके जीवन और लेखन को गंभीरता से प्रस्तुत किया गया है। डॉ. धनंजय वर्मा, नासिरा शर्मा, मधुरेश, रोहिताश्व, शिवचंद प्रसाद, तारिक असलम-तस्लीम अवध बिहारी पाठक और पफीरोज अहमद के लेख में उनकी जीवन-यात्राा की रेखाएँ ही नहीं, 'काला जल' के तल का प्रामाणिक दस्तावेज भी है। पफीरोज अहमद ने यह मुनासिब कार्यवाही की है, जिसकी तारीपफ की जानी चाहिए।
२. कल के लिए ;सित-२०१०-सितंबर २०११द्ध, सं.-डॉ. जय नारायण, संपर्क : 'अनुभूति', विकास भवन बहराइच- २७१८०१, मूल्य : २० रुपये।
द्घोषित रूप से पत्रिाका का यह अंक कवि एवं संस्कृति कर्मी कुबेर दत्त पर केंद्रित नहीं है लेकिन इस अंक में कुबेर दत्त पर अनेक सामग्री हैं। पत्रिाका के दूसरे आवरण पृष्ठ पर कुबेर की एक आकर्षक तस्वीर के पार्श्व में संपादक जय नारायण की एक अच्छी कविता है-'कुबेर चुप नहीं बैठा होगा।' लेकिन इस कविता का वाक्य-विन्यास गड़बड़ा गया है अन्यथा सचमुच यह कुबेर पर लिखी एक अच्छी कविता हो सकती थी। विजय राय ने 'कुबेर की कविताएँ' पर लिखा है तो कवि बु(निाथ मिश्र ने उन्हें
मार्मिकता के साथ याद किया है। इस पत्रिाका में कुबेर 'एक पाठक के नोट्स' स्तंभ लिखा करते थे। स्तंभ की अंतिम किस्त भी है। श्रीलाल शुक्ल, प्रो. चंद्रवली सिंह और अनिल सिन्हा पर संस्मरण-श्र(ांजलि क्रमशः सुशील सि(ार्थ, राम सुधार सिंह और कौशल किशोर ने लिखे हैं। इसके अतिरिक्त भी पत्रिाका में बहुत कुछ है। जयनारायण में साहित्य, समाज और राजनीति की अच्छी समझ है। इसीलिए 'कल के लिए' का महत्व है।
३. समागम ;पफरवरी २०१२द्ध, सं.-मनोज कुमार सं.-३, जू. एम आई जी, द्वितीयतल, अंकुर कालोनी, शिवाजी नगर, भोपाल-१६, मूल्य : ५० रुपये।
यदि लद्घु पत्रिाकाओं में 'समागम' चर्चित रही है तो इसका एक स्पष्ट कारण यह है कि संपादक में अपने समय-समाज को परखने की दृष्टि है। पत्रिाका का यह अंक 'सिनेमा सौ साल का' पर केंद्रित है। अनुमानतः २०वें विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली की थीम-'को ध्यान में रखकर पत्रिाका के इस विशेषांक की योजना बनाई गई होगी। सिनेमा के १०० साल के सपफर का यह लद्घु वृतांत है, लेकिन संकेत के अनेक छोर हैं। यह अच्छी बात है कि सिनेमा, जो हमारे समय-समाज से जुड़ा एक सशक्त माध्यम है, उसकी ओर देर से ही सही लेकिन हम ध्यान दे रहे हैं।
४. शीतल वाणी ;जुलाई-दिसंबर २०११द्ध, सं.-डॉ. वीरेन्द्र 'आनग' २-सी/७५५, पत्राकार लेन, प्रद्युमन नगर, मल्हीपुर रोड, सहारनपुर ;उ.प्र.द्ध, मूल्य ४० रुपये।
इस साहित्यिक पत्रिाका का शीर्षक 'शीतल वाणी' आध्यात्मिक लगता है, गुरुओं के प्रवचन जैसा। पत्रिाका के उप शीर्षक में इसे 'साहित्य की शीतलता और जीवन की जीवंतता का मंत्रा' कहा गया है। लेकिन पत्रिाका का प्रमुख सरोकार साहित्य है। इस पत्रिाका ने पहले भी अनेक दिवंगत साहित्यकारों पर अंक केंद्रित किए हैं। पत्रिाका का प्रस्तुत अंक-कमला प्रसाद स्मृति अंक है। इस अंक में समाहित सामग्री महत्वपूर्ण है।
५. साहित्य अमृत ;मार्च २०१२द्ध, संपादक- त्रिालोकीनाथ चतुर्वेदी, संपर्क : ४/१९, आसपफ अली रोड, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य : ७५ रुपये।
पत्रिाका का यह २००वां अंक कहानी विशेषांक है, जिसमें नए-पुराने कहानीकारों की अनेक उल्लेखनीय कहानियाँ प्रस्तुत हैं। प्रति स्मृति में स्व. राधाकृष्ण की एक कहानी है और 'साहित्य का विश्व परिपार्श्व' में शेक्सपियर की कहानी 'आधी रात का स्वप्न' का अनुवाद है। पत्रिाका के परामर्शदाता ब्रजेन्द्र त्रिापाठी जिस मनोयोग से इस पत्रिाका का संपादन करते हैं और प्रति स्मृति में जब-तब विस्मृत लेखकों की कहानियाँ देकर कौंध पैदा करते हैं, देखकर मुझे अच्छा लगता है। इस अंक में महीप सिंह, रामदरश मिश्र और गिरिराज किशोर की कहानियाँ मुझे अच्छी लगी हैं।
६. वचन ;जनवरी २०१२द्ध, सं.-प्रकाश त्रिापाठी, संपर्क : ५२, तुला राम बाग, इलाहाबाद-२११००६, मूल्य ५० रुपये।
युवा लेखक प्रकाश त्रिापाठी जिस लगन और उत्साह के साथ 'वचन' निकालते हैं, मुझे आकृष्ट करता है। एक अच्छी बात है कि समय की नब्ज पर उनकी ऊंगली रहती है। प्रस्तुत अंक में गंगा प्रसाद विमल, देवी प्रसाद त्रिापाठी, सुवास कुमार, अरविंदाक्षन की कविताएँ एवं कवि दिनेश कुमार शुक्ल से बातचीत इस अंक को महत्वपूर्ण बनाता है। हितेश कुमार ने महेन्द्र राजा जैन की पुस्तक-'विराम चि''्‌न : क्यों और कैसे की समीक्षा करते हुए आचार्य किशोरी दास वाजपेयी की चर्चित पुस्तक 'शब्दानुशासन' को किशोरीलाल गोस्वामी के हवाले कर दिया है। संपादक की इस असावधानी से मैं चिंतित हूँ।
७. प्रेरणा ;अक्टूबर-दिसंबर २०११द्ध, सं.-अरुण तिवारी, संपर्क : ए-७४, पैलेस आरचर्ड पफेज-३, सर्वधर्म के पीछे, कोलार रोड, भोपाल-४६२०४२ ;म.प्र.द्ध मूल्य : २० रुपये।
पत्रिाका के संपादक अरुण तिवारी की प्रतिब(ता का ही नहीं, उनकी संपादकीय दृष्टि का भी कायल हूँ। बहुत मनोयोग से अपनी पत्रिाका का वे हर अंक निकालते हैं। प्रस्तुत अंक-उपन्यास अंक है और ठीक है। लेकिन उनकी दिक्कत यह है कि वे सब कुछ समेट लेना चाहते हैं। पत्रिाका में चुनी हुई पुस्तकों की समीक्षा दी जानी चाहिए। लेकिन वे समझौता करते हैं। इसलिए 'प्रेरणा' ऊपर से तो देती दिखती है, लेकिन भीतर से नहीं।
८. तनाव ११९-१२० ;जुलाई-सितंबर २०११, अक्टूबर-
दिसंबर-२०११द्ध, सं. बंशी माहेश्वरी, संपर्क : ५७, मंगलवारा, पिपरिया-४६१७७५, मूल्य : १० रुपये। 'तनाव' संभवतः हिन्दी की एक मात्रा ऐसी लद्घु पत्रिाका है, जो तमाम आर्थिक संकट से गुजरती, दशकों से हिन्दी समाज को विश्व के अनेक देशों के महान कवियों की कविताओं से परिचित कराती रही है। इस बार पत्रिाका के दो अंकों में-ांसीसी कवि ज्याक प्रिवर की कविताएँ ;अनुवाद-प्रमोद पांडेयद्ध और जापानी कवयित्राी इजुमि शिक्बु की कविताएँ ;अनुवाद मधु शर्माद्ध प्रकाशित हैं। बंशी माहेश्वरी जिस तरह विश्व कविता को हिन्दी पाठकों के सामने ला रहे हैं, न केवल आह्‌लादक लगता है, बल्कि सुखद भी कम नहीं। उनके इस प्रयास के लिए मैं उन्हें बधाई देता हूँ।
९. रंग अभियान २४, सं.- डॉ. अनिल पतंग, संपर्क : नाट्य विद्यालय, बाद्घा, पो. सृहृद नगर, बेगूसराय ;बिहारद्ध-८५१२१८, मूल्य : २० रुपये।
अनिल पतंग तूपफानी रंग अभियानी हैं। रंग में सराबोर डूबे हुए। पत्रिाका के प्रस्तुत अंक में पतंग ने कई अच्छी सामग्री दी है-'लोक परंपरा से जुड़ी नाट्य कला 'रम्पत' ;आशीष देशांतरद्ध, 'हिन्दी नाट्य लेखों का भाषा सच' ;अभिषेक अवतंसद्ध और विदूषक का गोदान' ;विनय कुमार परीरद्ध एक छोटी पत्रिाका में एक भी महत्वपूर्ण सामग्री मुझे मिल जाती है, मुझे उसका उल्लेख करना नैतिक कर्तव्य लगता है।
पत्रिाकाओं के नए अंक
१. हिन्दी ;अंग्रेजी मेंद्ध ;जनवरी-मार्च २०१२द्ध, संपादक-ममता कालिया, संपर्क -प्रकाशन विभाग, म.ग.अ.हि.वि., वर्धा ;महाराष्ट्रद्ध, मूल्य : १०० रुपये।
२. बहुवचन ;अक्टूबर-दिसंबर २०११द्ध, सं.-अरविंदाक्षन, संपर्क : वही, मूल्य : ५० रुपये।
३. बया ;अक्टूबर-दिसंबर-२०११द्ध, सं.-गौरीनाथ, संपर्क : अंतिका प्रकाशन, सी-५६/यूजीएपफ-४, शालीमार गार्डन एक्सटेंशन-२, गाजियाबाद-२०१००५, मूल्य : ३० रुपये।
४. जनपथ ;अक्टूबर२०११-बाबा नागार्जुन पर केंद्रितद्ध, सं.-अनंत कुमार सिंह, संपर्क : सेंट्रल को-आपरेटिव बैंक, मंगल पांडेय पथ, आरा-८०२३०१, जिला-भोजपुर ;बिहारद्ध, मूल्य : ३० रुपये।
५. उद्भावना ;दिसंबर २०११द्ध, सं.-अजेय कुमार, संपर्क : ए-२१, झिलमिल इंडस्ट्रियल एरिया, जी.टी. रोड, शाहदरा, दिल्ली-११००९५, मूल्य : २५ रुपये।
६. समावर्तन ;मार्च २०१२द्ध, संपादक- निरंजन श्रोत्रिाय, संपर्क : 'माधवी', १२९, दशहरा मैदान, उज्जैन ;म.प्र.द्ध-४५६०१०, मूल्य : २५ रुपये।
७. माटी ;प्रवेशांक, जन-मार्च २०१२द्ध, सं.-नरेन्द्र पुण्डरीक, संपर्क : डी.एम. कॉलोनी, सिविल लाइंस, बांदा-२१०००१, मूल्य २० रुपये।
८. आर्य कल्प २६, सं.-लोलार्क द्विवेदी, संपर्क : बी-२/१४३-ए, भदैनी, वाराणसी-२२१००१, मूल्य २५ रुपये, प्रयाग प्रेस, गुरु टोला, आजमगढ़ ;उ.प्र.द्ध, मूल्य : २० रुपये।
१०. सामयिक परिवेश ;भ्रष्टाचार विशेषांक-जुलाई २०११ एवं जनवरी २०१२द्ध, सं.-ममता मेहरोत्राा, संपर्क : १८० बी, पंचवटी अपार्टमेंट, एस.के. पुरी, पटना ;बिहारद्ध मूल्य : क्रमश २० रुपये एवं ५० रुपये।
११. ज्ञानायनी ;अक्टूबर-दिसंबर २०११द्ध सं.-प्रो. शिशिर कुमार पांडेय, संपर्क : २/१०५, विवेक खंड, गोमती नगर, लखनऊ, मूल्य : उल्लिखित नहीं
१२. ᅠगर्भनाल ;पफरवरी २०१२द्ध, सं.-सुषमा शर्मा, संपर्क-डीएक्सई २३, मीनाल रेजीडेंसी, जे के रोड, भोपाल-४६२०२३, मूल्य २० रुपये।
१३. आधारशिला ;पफरवरी-मार्च २०१२-विश्व कविता अंकद्ध, सं.-दिवाकर भट्ट, संपर्क : बड़ी मुखानी, हल्द्वानी-२६३१३९, नैनीताल ;उत्तराखण्डद्ध मूल्य ४० रुपये।
१४. अलाव ;जनवरी-पफरवरी २०१२द्ध, सं.-रामकुमार कृषक, संपर्क : सी-३/५९, नागार्जुन नगर, सादतपुर विस्तार, दिल्ली-११००९१ मूल्य : ३० रुपये।
नए प्रकाशन ;चयनद्ध
१. आलोचना और विचारधारा-लेखक-नामवर सिंह,
प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन, १-बी, नेताजी सुभाष नगर, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य ४५० रुपये।
२. साहित्य की पहचान-लेखक-नामवर सिंह, प्रका.-वही, मूल्य ३५० रुपये।
३. सम्मुख-ले.-नामवर सिंह, प्रका.-वही, मूल्य ४५० रुपये।
४. साथ-साथ-ले.-नामवर सिंह, प्रका.-वही, मूल्य २५० रुपये।
५. प्रेमधन संचयिता-सं. भवदेव पांडेय, म.ग.अ.हि.वि. का प्रकाशन, वर्धा प्रकाशक-शिल्पायन, १०२९५, लेन नं.-१, वेस्ट गोरखपार्क, शाहदरा, दिल्ली-११००३२, मूल्य : ३७५ रुपये।
६. अमरकांत संचयन-सं-रवीन्द्र कालिया, प्रका.-भारतीय ज्ञानपीठ, १८, इंस्टीटयूशनल एरिया, लोदीरोड, नई दिल्ली-११०००३, मूल्य : ४८० रुपये।
७. रूपाम्बरा- सं. सच्चिदानंद वात्स्यायन, प्रका.-वही, मूल्य ३९० रुपये।
८. अपने-अपने अज्ञेय ;दो खंडद्ध-सं.-ओम थानवी, प्रका.-वाणी प्रकाशन, २१-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य : १५०० रुपये।
९. कुछ खोजते हुए ;कभी-कभार स्तंभ का संकलनद्ध-ले. अशोक वाजपेयी, प्रका.-वही, मूल्य : १४९५ रुपये।
१०. कभी के बाद अभी ;कविताद्ध, ले.-विनोद कुमार शुक्ल, प्रका.-राजकमल प्रकाशन, दिल्ली-११०००२, मूल्य : २०० रुपये।
११. मैं वो शंख महाशंख ;कविताद्ध, ले.-अरुण कमल, प्रका.-वही, मूल्य : १५० रुपये।
१२. कामरेड मोनालिजा तथा अन्य संस्मरण ले.-रवीन्द्र कालिया-प्रका.-वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य : ३९५ रुपये।
१३. तेरा क्या होगा कालिया ;स्तंभद्ध-लेख.-रवीन्द्र कालिया, प्रका.-वही, मूल्य : २०० रुपये।
१४. विस्मय का बखान ;संगीत-कलाद्ध, ले.-यतीन्द्र मिश्र, प्रका.-वही, मूल्य : ३९५
१५. चिंगारी : पाकिस्तान का अतीत और भविष्य-ले. एम.जे. अकबर, अनुवाद-नीलाभ, प्रका.-हिन्दी हार्पर कालिंस, ए-५३, सेक्टर-५७, नोएडा-२०१३०१, मूल्य : २९९ रुपये।
;स्तंभकार हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक और म.ग.अ.हि.वि. वर्धा ;महाराष्ट्रद्ध द्वारा प्रकाशित द्वैमासिक समीक्षा पत्रिाका 'पुस्तक-वार्ता के संपादक हैं।

 
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मो. ०९३१३०३४०४९
 
 
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