अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
ग़ज़ल
 
कुर्बान 'आतिश'
 

भारत-पाकिस्तान की शीर्षस्थ उर्दू साहित्यिक पत्रिाकाओं में सैकड़ों ग़ज़लों, नज़्म, दोहा आदि प्रकाशित।
खेताड़ी मोहल्ला, आरा, भोजपुर-८०२३०१, बिहार
मो. ०९३०४०८५३४४

 
1.
 

दिल जो अभी है जलथल-जलथल रोते-रोते
हो नहीं जाये इक दिन पागल रोते-रोते

यूं ही अगर तूपफाने-बला का जोर रहा तो
बन जायेगा शहर भी जंगल रोते-रोते

उसने अपनी आँखों में वो खार चुभोये
और हुआ दिल अपना द्घायल रोते-रोते

इतने जब्रो-सितम ढाये जाते हैं मुझपर
जाने लगी बीनाई हर पल रोते-रोते

पफ़र्से-८ामीं से अर्शे बरीं तक पफैल गया है
ये अपनी आँखों का काजल रोते-रोते

किसने पूछा हमसे सबब रोने का 'आतिश'
भीग गया था सारा कम्बल रोते-रोते

 
2.
 

नये चिराग़ की परछाइयों के पीछे हम
तबाह हो गये रानाइयों के पीछे हम

शिकस्ता जिस्म में ख़ंजर उतारते ही रहे
तमाशबीन थे बलवाइयों के पीछे हम

उन्हीं ने दीन का परचम भी दाग़दार किया
नमा८ा पढ़ते हैं जिन भाइयों के पीछे हम

बुराई अपनी तरपफ़ कैसे खींच लेती हैं
क़दम तो रखते हैं अच्छाइयों के पीछे हम

कहाँ किसी ने दिखाया हमें तिलिस्मी खेल

सिसक रहे थे तमाशाइयों के पीछे हम

ख़ुशा के झूठ से दामन छुड़ा लिया मैंने
टहलते आ गये सच्चाइयों के पीछे हम

 
3.

हम हैं जग में सबसे अनाड़ी हमको नहीं मालूम
क्या खेलेगा खेल खिलाड़ी हमको नहीं मालूम

चीख रही है रूह हमारी बंद हवेली में
कब आजाये मौत की गाड़ी हमको नहीं मालूम

झूम रहे थे मस्ती में क्या रंग बिरंगे पफूल
किसने ८ामी की कोख उजाड़ी हमको नहीं मालूम

देख के ये न८८ाारा अपनी आँखें हुईं हैरान
किसने डुबोई खून में साड़ी हमको नहीं मालूम

देख रहे हैं सबके बदन पर इक जैसी पोशाक
कौन है शहरी कौन पहाड़ी हमको नहीं मालूम

कोई न कोई रो८ा शजर हम ८ाख़्मी पाते हैं
कौन चलाता है कुल्हाड़ी हमको नहीं मालूम

'आतिश' ऊँची इमारत वाले शहरों में कैसे
पफैल गई है जंगल-झाड़ी हमको नहीं मालूम

 
 
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