अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कहानी
तन का देश : मन का देश
बल्लभ डोभाल
 

जन्म : १९३०

बचपन से ही यायावरी और लेखन में प्रवृत्त। विभिन्न विधाओं में अब तक ३५
पुस्तकें प्रकाशित। अन्य भारतीय भाषाओं में रचनाओं का अनुवाद। वर्तमान में भी लेखन जारी।
संप्रति : स्वतंत्रा लेखन।
डब्ल्यू-४६, सेक्टर-१२, नोएडा
पफोन-०१२०-२५४७९८२

   

अब उसे नींद नहीं आ रही थी, इसलिए कि नींद का वक्त निकल चुका है। रात को साढ़े नौ बजे के लगभग वह बिस्तर पर होता और अगले दस-पंद्रह मिनट के अंदर नींद की गहराइयों में उतर जाता। लेकिन आज... जैसे किन्हीं चिंताओं ने नींद का अपहरण कर लिया हो। उसे लगा कि अब नींद नहीं आएगी। वह सोचने लगा, नींद भी क्या चीज है। आदमी जैसे कि मर गया हो। नींद न आए तो आदमी सचमुच मर ही जाएगा। नींद आती है, कुछ देर के लिए आदमी मर जाता है। लेकिन नींद से जब उठता है तो तरोताजा होकर। इस मौत जैसी चीज में भी कैसी जिंदगी है।
उसने दो-एक बार जबरन साने की कोशिश की। पर लगा कि नींद पर किसी तरह का जोर-जबर नहीं। तब?... उसने अपने आप से प्रश्न किया। साथ ही बगल में पड़ी चारपाई की तरपफ उसकी नजरें उठती हैं, जैसे कोई मरीज अपनी दवा की ओर देख आश्वस्त हो रहता है। पिछली बातें याद आती हैं जब अकारण ही नींद उड़ जाया करती थी। पत्नी को उसे नींद न आने का पता चलता तो पूछ लेती, 'नींद क्यों नहीं आती?' उसे मालूम रहता। लेकिन नींद न आने का कोई कारण वह पत्नी को न बताता। तब उसे नींद दिलाने के खातिर पत्नी उसे अपने पास खींच लेती। 'बेकार की चिंता और झंझटों को दिमाग में रखे रहते हो, कभी दिल-दिमाग में परेशानी के कारण भूख-प्यास और नींद उड़ जाया करती है।'
वह जानती थी कि नींद का मर्म क्या है। पुरुष स्त्राी के बारे में उतना कहाँ जानता है जितना कि स्त्राी को मालूम है। उसे याद है, पत्नी की बाहों में आकर वह क्या महसूस करता रहा है। सब तरपफ से उसका अस्तित्व उन कोमल बाहों में सिमट कर आ जाता। वह देखता कि पत्नी है और मैं हूँ, पिफर कुछ देर बाद उसे लगता कि मैं हूँ, केवल मैं। मेरे अलावा कहीं कुछ नहीं... और अगले ही क्षणों में नींद की खामोशी के सिवा कुछ न होता। सुबह आँखें खुलने पर बदन पफूल की तरह खिला लगता। शरीर में कोई जैसे रोशनी भर गया हो।
यही नींद की दवा है, नींद की ही नहीं, जिंदगी के सारे दुःख-दर्दों की दवा।... उसने बगल में पड़ी चारपाई की तरपफ हाथ बढ़ाया। पत्नी नींद की द्घाटियों में गहरे उतर चुकी है। यकायक उसे ख्याल आया। पत्नी?... नहीं, अब वह पत्नी कहाँ रह गई है। पत्नी से वह औरत बन चुकी है। औरत हमेशा पत्नी नहीं रहती। उसे लगा कि अपनी सारी जिम्मेदारियां पत्नी के ऊपर डालकर उसे औरत बना दिया गया है। एक ऐसी औरत, जिसे सब तरह की चिंताएँ हैं, हर तरह की आशंकाएँ हैं। दुनियादारी के सभी मामलों में जो पुरुष को मात दे रही है। हर मुसीबत से अपने आप अकेली लड़ रही है, वह अब धीरे-धीरे पुरुष बनती जा रही है। उसे लगा कि औरत की उस खाली जगह को वह अपने से भरता जा रहा है। उसकी जगह स्वयं औरत बनता जा रहा है। पर नहीं, औरत कैसे मरद बन सकती है, वह पत्नी बन सकती है। कुछ और बन सकती है, मरद नहीं बन सकती।
नींद की बात उसके दिमाग में बस गई है। रात भर यदि नींद न आये तो सारे दिन कैसे काम चलेगा। उसे लगा कि नींद का इलाज जरूरी है। बगल में पड़ी चारपाई पर उसका हाथ किसी अनिश्चित जगह पर जा पहुँचा, औरत जिस्म के किसी हिस्से पर... जिसका ठीक से अनुमान नहीं लग पाता। थोड़ा-सा इधर-उधर हिलने पर ही मालूम हो सकता है कि वह कौन-सा मर्म भाग है। उसके दायें-बायें कहाँ क्या है। लेकिन हाथ को वह आजादी के साथ इधर-उधर हिला नहीं सकता। औरत गहरी नींद में सो रही है। उसे बड़ी मुश्किल से नींद आती है, दिन में काम की थकान के कारण कुछ देर के लिए शरीर में खामोशी पैदा होती है। कुछ समय के लिए शरीर निश्चेष्ट पड़ जाता है। इसी को नींद मान लिया। नींद का यह पहला झटका अगर निकल गया तो पिफर मन उचट जाता है। तड़के उठने की पिफक्र में सारी रात करवटों में निकल जाती है। इस उम्र में अब यह महसूस होने लगा है कि जिंदगी एक झटके के अलावा कुछ नहीं है। जिंदगी का सारा सिलसिला झटकों पर चल रहा है। जिस दिन यह झटका भी न रहेगा, उस दिन नींद की-सी खामोशी सर्वत्रा छा जाएगी।
औरत-शरीर के किसी हिस्से पर उसका हाथ चिपककर रह गया है। उसे इधर-उधर पिफसलने को आजादी नहीं। कहीं औरत जिस्म को पता चल गया तो... कुछ भी हो सकता है। उसे निश्चय नहीं होता कि कौन-सी बात हो सकती है। औरत-शरीर से बेबस चिपका हाथ साँसों के उतार-चढ़ाव से उसकी हरकत जानना चाहता है। वह हाथ दायें-बायें कुछ टटोलना चाहता है। लेकिन उंगलियों में इतना साहस कहाँ?
कैसी मजबूरी है स्साली...! वह समय था, जब इसी अौरत को वह कच्ची नींद जगा देता था। रात में, दिन में... वक्त-बे-वक्त, जहाँ-कहीं भी गुंजाइश दिखाई दी, वहीं अपना मर्दाना-कर्म शुरू कर दिया। शुरू-शुरू में इस कुंवारी कन्या को पत्नी बनाने में कितना समय लगा? इसी रफ्रतार से उसने बहुत जल्दी पत्नी को औरत बना दिया और अब वह औरत मरद बनती जा रही है। ऐसा मरद, जो इच्छा के विरू( कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। उसे लगा कि औरत को मरद बनाने में अकेला उसका ही हाथ नहीं है। जीवन है और जीवन के बदलते हुए मूल्यों की एक परिणति यह भी है। परिस्थितियों ने पुरुष को जहाँ-जहाँ तोड़ दिया वहीं से उसने औरत बनना स्वीकार कर लिया है। टूटना अब तक औरत का काम रहा है। टूटन का दूसरा नाम औरत है। लेकिन हालातों ने ऐसा रुख बदला कि आज मदों के हौसले पस्त हुए जा रहे हैं। आदमी टूटकर गिरता जा रहा है। पुरुष की इस टूटन से औरत को कुछ मिल रहा है। राजनीतिक-पार्टियों की तरह एक के पतन पर दूसरे की तरक्की कायम हुई जाती है। उसे लगता है कि स्त्राी और पुरुष, दो अलग-अलग पार्टियाँ हैं जिनमें आरंभ से ही सत्ता प्राप्त करने के षड्यंत्रा चल रहे हैं।
जीवन के हर क्षेत्रा में अब तक पुरुष ने स्त्राी को नीचा दिखाया है, उसे उभरने नहीं दिया। उस पर जो अत्याचार हुए हैं उनका भी कोई अंत नहीं। इन्हीं अत्याचारों के कारण आज वह टूट चुका है। जैसे कि उसका पाप उसे ले रहा है। वह कमजोर हो चुका है और धीरे-धीरे औरत बनता जा रहा है। आज उसमें इतना साहस नहीं कि औरत जिस्म पर बिना उसकी इजाजत के हाथ भी रख सके। इससे पहले कई बार यह औरत अपने बदन पर पड़े हुए उसके हाथ को उठाकर एक ओर झटक चुकी है, 'चलो जाओ, अब कुछ नहीं होगा!'
वह चुपचाप सहता रहा। सह रहा है। अब जो भी आन पड़े, सह लेना है। इस सहन करने की कोई सीमा नहीं है। परेशानियों में पड़कर वह कभी भगवान को याद कर लेता है। वाह रे भगवान! तूने भी यह औरत नाम की क्या निराली चीज पेश की है। उसे इस बात का विश्वास हो गया कि यह जो कुछ भी दिखाई देता है इसका निर्माता वही प्रभु है। प्रभु की आज्ञा के बिना किसी को कुछ नहीं मिलता। जीवन तो उसकी अकथ-देन है ही, पर जीवन के अलावा संसार की दूसरी चीजें भी उसकी प्रेरणा से ही मिलती हैं। आज से पहले उसने ऐसा कभी नहीं सोचा था। उसे इस बात का ऐहसास नहीं था कि उसकी अपनी ही औरत अपने शरीर पर पड़े हुए उसके हाथ को इतनी लापरवाही के साथ उठाकर पफेंक सकती है। लेकिन जिसदिन ऐसा हुआ, उसी दिन उसे अपने अस्तित्व का बोध हुआ। उसे लगा कि मैं कुछ भी नहीं हूँ। मेरी इच्छा से किसी औरत की इच्छा ज्यादा प्रबल और शक्तिमान है तथा औरत की इच्छा से भी बढ़कर उस प्रभु की इच्छा प्रबल है। सोचकर उसने अपने को बदलना चाहा।
हरि को हरिनाम। हरिनाम की भक्ति उसके मन में जाग उठी। मंदिर, पूजा और साधु-संतों का असर बढ़ने लगा। वह मन की शांति चाहने लगा। जरा-सी शांति मिले। सिपर्फ थोड़े समय के लिए मन की एकाग्रता... वही जो शुरू में कुंवारी-कन्या को पत्नी बनाने के बाद मिली थी। उसके बाद पत्नी को बाँहों के दायरे से निकल कर वह जो अनुभव करता रहा है। सिपर्फ उतना ही पाने के लिए उसने भगवान को याद किया है। उसे लगता है कि अपने भक्तों को उनकी आखिरी मंजिल तक पहुँचा देने वाला वह भगवान जरूर उसकी सुध लेगा।
धर्म में उसकी प्रवृत्ति जानकर किसी ने बताया कि सबकुछ त्याग देने के बाद ही आदमी सबकुछ पाने का अधिकारी बनता है। उसे लगा कि यही सच है। यह औरत तमाम दिन जुए की तरह उसकी गर्दन पर सवार रहने लगी है। राशन, लकड़ी-पानी से लेकर बच्चों की सपफाई-धुलाई तक... इस व्यवस्था ने उसे पहले ही तोड़ दिया। पिफर जितना कुछ मर्दानापन बच रहा था उसे इस औरत ने हरण कर लिया है। उसकी जगह अब वह स्वयं मर्द बनकर रहने लगी है। जिसके कारण मन में धीरे-धीरे विराग जग रहा था। वह इस निर्णय पर जा चुका कि विराग-अनुराग दोनों का कारण औरत ही है। वही जिंदगी है, वही मौत। वह चाहे तो जिंदगी की कलकल-धारा में मौत का सन्नाटा पैदा कर दे। चाहे तो मौत की खाई को लबालब जिंदगी से भर दे।
उसे लगा कि अब यह औरत मौत की खाई को जिंदगी से नहीं भरेगी। अब वह औरत नहीं रह गई है। मरद होकर वह भी ज्यादा देर तक औरत बना नहीं रह सकता। यह द्घर-गृहस्थी का चक्कर स्साला... बड़े-बड़ों को जमीन दिखा देता है। उन्हें औरत की तरह जमीन पर लिटा देता है। बस, कापफी हो चुका। यह जनानी जात... आखिर यह चीज है क्या? सोचकर एक दिन वह चुपचाप द्घर से निकल पड़ा और सि( बाबा की मढैय़ा पर जा बैठा। उसने निश्चय कर लिया कि अब वापस नहीं जाएगा। दुनियादारी के नरक से निकलकर भगवान की भक्ति कहीं श्रेष्ठ है।
लेकिन अगले ही क्षण इस औरत ने उसे ढूंढ़ लिया और ढूंढ़कर द्घसीट लाई। 'मरदुए! अब तेरी खैर नहीं। मुझ पर अपना मरदानापन झाड़कर सि(गुरु बनने चला है? अब तेरा बाप आकर इन पिल्लों को टुकड़े डालेगा?'
उस दिन तो यह औरत मर्द से भी ज्यादा कुछ बन गई थी। भगवान ही उस दिन रक्षा कर गया। वरना यह क्या नहीं कर सकती थी। औरत क्या नहीं दिखा सकती। वह दिखा रही है। हालातों में किसी तरह का अंतर आज भी नहीं आया। वही मर्दाना व्यापार आज भी चल रहा है जिसे देखकर मन आज भी अस्त-व्यस्त है। आत्मा में वही अशांति... इस अशांति से बचने के लिए आदमी भगवान की शरण में जाता है। पूजा-पाठ करता है। दया-धर्म के काम करता है। बड़े-बड़े महामुनियों और सन्त-महन्तों के प्रवचन सुनता है। तीर्थों की यात्राा करने के पीछे भी यही कारण है कि मन और आत्मा को शांति प्राप्त हो। वह सब करके भी देख लिया।
सोचते हुए औरत जिस्म पर पड़े हाथ ने हरकत शुरू कर दी। मालूम हुआ कि पेट के आसपास ही कहीं वह हाथ रेंग रहा है। लिजलिजे माँस के ढेर जैसी जगह पर उंगलियां धंसने लगी हैं। औरत कुनमुनाई, 'क्या है?' जैसे कि वह पहले से ही जग रही है। वह डरा। सहमी हुई आवाज में बोला-'नींद नहीं आ रही है।'
सुनकर औरत ने धीरे से करवट ली और दूसरी ओर मुँह पफेर लिया। उसका हाथ बेलाग होकर चारपाई पर छूट गया। जैसे शरीर से अलग जा पड़ा हो। किसी बुरे सपने के कारण आने वाली नींद उचट गई। लेकिन सपना इतना भयंकर नहीं कि दुबारा नींद ही न आये। उसे लगा कि देर से सही, नींद अवश्य आएगी। इस बार औरत ने उसके हाथ को उठाकर झटक नहीं दिया था। साहस बटोर कर वह अपने ही बिस्तर पर थोड़ा आगे सरक लिया और हाथ उठाकर पिफर एक बार उसके ऊपर चढ़ा लिया।
औरत कुछ न बोली। थोड़ी देर हाथ को यों ही रखे रहने के बाद उंगलियों में सिहरन जमा होने लगी। उंगलियां पिफर हल्के-हल्के इधर-उधर कुछ टटोलने में लग गई। औरत की चुप्पी को सर्वसम्मति से पारित समाजवादी प्रस्ताव मानकर उसके सब अंगों में आजादी की लहर दौड़ गई और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की तरह शरीर का रोम-रोम अपनी हरकतें दिखाने को आतुर हो उठा। उसे लगा कि स्त्राी-शरीर एक संपूर्ण देश है, जिसके अंदर कितनी ही योजनाएँ एक साथ चलने लगी हैं। अब तक यहाँ कुछ भी न था। केवल भय था, निराशा थी। बीहड़-बियाबान में उसका मानव जीवन की तलाश में भटकता रहा। वह उजाले की तलाश में था, उसे उजाला नहीं मिला। अंधकार का साम्राज्य ही मन की दुनिया में दूर-दूर तक छाया रहा है। इन अंधेरी द्घाटियों को पार करते-करते वह हार गया, वह थक गया। आज भी वह टूट रहा है। टूटकर बिखर जाना चाहता है। गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई ने मिलकर इस देश को तबाह कर दिया है। व्यवस्था ने उसके अस्थि-पंजर खोलकर रख दिए हैं। अब धीरे-धीरे इस देश में लकवा पफैलता जा रहा है। वह दुर्बल हो गया है। दुर्बलता... जिसका दूसरा नाम है औरत। वह औरत बनता जा रहा है। दुर्बल अंगों वाली औरतों के देश की तरह।
अगले ही क्षण उसने औरत जिस्म से अपने को समूचा लगा हुआ पाया। लगा कि वह औरत जिस्म न होकर किसी मरद का जिस्म है। इस जिस्म पर उंगलियाँ जहाँ पड़ती हैं वही मजबूती उभर आती है। सारे बदन में कसाव आ गया है। उंगलियाँ इस कसाव को पकड़ नहीं पा रही हैं। यह कसाव उसके अनुभव में नहीं जमता। उसने हथेलियों से काम लेना शुरू किया। धीरे-धीरे सारा हाथ, यहाँ तक कि अब बाँहें भी औरत जिस्म को पाने के लिए मचल उठी हैं।
निर्बल बाँहों को एकाएक यह कैसे जिंदगी मिल गई है। जैसे एकाएक आसपास कहीं चमेली का वन महक उठा है। मन के झुलसते हुए रेगिस्तान की तरपफ ठंडे पानी की नहर किसने छोड़ दी है। एक वह नई दुनिया में धंसता चला जा रहा है। धीरे-धीरे एक नई जमीन उभर कर सामने आ रही है। मन में आया, इस औरत से पूछ ले कि यह सब क्या हो रहा है। क्या तुम्हें भी ऐसा कुछ महसूस हो रहा है? लेकिन पिफर उसने कुछ नहीं पूछा। पूछने की जरूरत भी शायद नहीं है, जो कुछ चल रहा है उसे चुपचाप चलने दो।
अगले ही क्षण उनके चार हाथ मिलकर एक-दूसरे के वस्त्राों को नोचने में लग गये। वे एक-दूसरे के उधाड़ देना चाहते थे। जैसे एक पार्टी वाले दूसरी पार्टी को उधाड़ कर रख देते हैं। आदमी को नंगा कर देने में कितनी देर लगती है। पिफर जब कोई मरद किसी औरत, या कोई औरत किसी मरद के हाथों नंगा होना चाहे तो वहाँ देर-सबेर का प्रश्न ही नहीं उठता। बड़े धैर्य के साथ वे एक दूसरे को नंगा करते चले गये।
नंगेपन में भी क्या मजा है। नंगा, नंगे को तलाशता है। नंगा, नंगे को प्यार करता है। नंगा, नंगे का साथी है। बदन एक हो जाने के बाद पिफर कहीं क्या रह जाता है। किसे होश रहता है। आदमी सब कुछ भूल जाता है।
उसने महसूस किया कि अब कहीं कुछ नहीं है। वह भूल गया कि अभी पिछले क्षण यह औरत उसके ऊपर मरद बनकर रही है। इसने पुरुष-जाति पर कितने जुल्मो-सितम ढाये हैं। वह पिछली सभी बातें भूल रहा है। ठीक वैसे ही-जैसे कि चुनाव में कामयाबी हासिल करने के बाद नेता सब कुछ भूल जाता है, यदि कोई बात याद आती है तो वह भी कड़वी न लगकर मीठी ही लगती है। इस वक्त उसे भी सबकुछ मीठा लग रहा है।
खुले औरत-जिस्म के स्पर्श ने इस शरीर के देश में क्रांति पैदा कर दी है। जैसे वर्षों की गुलामी को तोड़कर एकाएक आजादी मिल गई हो। बहुत दिनों के बाद सब कुछ करने की आजादी मिली है, आजादी बहुत बड़ी चीज है, उसके अभाव में कोई कुछ नहीं कर सकता। गुलामी आखिर गुलामी है, वहाँ औरत जिस्म पर पड़े हाथ की तरह आदमी बेबस रह सकता है। लेकिन वह आजादी भी क्या, जो आदमी के लिए एक पराई औरत की तरह बन जाए। जिसके शरीर पर हाथ पड़ते ही हाथ ठंडा पड़ जाए, मर जाए या पत्थर बनकर एक जगह टिका रह जाए।
इस आजादी को प्राप्त कर चुकने के बाद ही उसे अपनी सामर्थ्य का बोध हुआ। लगा कि वह भी किसी नेता से कम नहीं। ऐसा नेता... जिसने अपनी कुर्बानी देकर आजादी को हासिल किया है। आज पहली बार आजादी का अर्थ समझ में आ रहा है। यह आजादी कितनी महंगी है। शायद इसीलिए हर कोई उसे सीने से लगा लेना चाहता है। कितना सुख, कितना निर्द्वन्द्व और निर्भय... पत्नी ने सबकुछ उस पर छोड़ दिया है। पूरी आजादी दे दी है। जो मर्जी में आये, करो। अब वह पत्नी न लगकर आजादी की साकार-प्रतिमा जैसी लगती है, जिसे वह झपट कर अंक में भर लेना चाहता है। उसे गले लगाकर जीना चाहता है। वह उस पर टूट पड़ता है। लेकिन यह क्या? इतनी कठोर और इतनी तपी हुई चीज...! तपे हुए लोहे की तरह शरीर का हर भाग...। इस जीती-जागती प्रतिमा के अंदर जैसे लावा भरा पड़ा है। ऊपर से लेकर नीचे तक उसके पिद्घलने जैसी आवाज आ रही है। जैसे कि देश की तमाम जनता इस औरत की रग-रग में हरकतें कर रही है। जनता पर भारी बोझ आ पड़ा है। जनता दबती जा रही है। औरत जिस्म के अंदर पैदा होने वाली हलचल को वह भलीभांति महसूस कर रहा है। कई दिलों की धड़कनें और कुर्बानियों का इतिहास जैसे कि इस नंगे-जिस्म पर लिख दिया है। जनता की उमड़ती हुई भीड़ और भीड़ से उठती हुई आवाजें वह सापफ सुन रहा है। वह देख रहा है कि बेकारी और महंगाई ने मिलकर आदमी को चारों खाने चित कर दिया है। अपने अधिकारों के लिए जनता आज भी कट-मरने को तैयार है। कहीं आंदोलन, कहीं हड़तालें, कहीं भाषण में आश्वासनों की बौछार... इन आश्वासनों की गरमी ने जनता को गरमा दिया है। माँगें अस्वीकृत होने पर उपद्रव शुरू हो गये हैं। दनादन लाठियाँ और गोलियों की बौछार होती है। इन सब द्घटनाओं ने मिलकर देश के हर हिस्से को गरमा दिया है। शरीर के इस देश में आदमी के मरने और पैदा होने का क्रम भी बराबर चल रहा है। दूसरी ओर अन्नकाल, अनावृष्टि और सूखे की चर्चा जोरों पर है। इस पर कहीं देशभक्ति की त्रिावेणी बह रही है तो किसी आवाज में जाति, धर्म और राष्ट्र के नाम संदेश वह सुन रहा है। कई आवाजें इस नंगे औरत-जिस्म से पफूट रही हैं। उसे लगा कि एक संपूर्ण-देश इस औरत जिस्म के अंदर हंगामा किये हुए है। कई आवाजें एक साथ उठकर पूछ रही हैं कि तुम नेता जरूर बन गये हो, पर हमें बताओ कि वह आजादी कहां है।... जिसका हमने बड़ी बेसब्री के साथ इंतजार किया है, जिसे हमने अपना खून देकर प्राप्त किया था। हमारी उस आजादी को लेकर तुम कहाँ छिप गये हो। बोलो कहाँ?
वह सब सुन रहा है, लेकिन चुप! चुप्पी लाख नियामत है। आजादी भी चुप है। उधड़ी हुई औरत की तरह। पुरुष-शरीर का भार कभी पफूल से हल्का और आरामदेह लगता है, जो नस-नस को खोल दे रहा है। वह अभी तक धरती के ऊपर भार-रूप जैसे पड़ा है। औरत सचमुच धरती का ही रूप है और धरती के समान ही सब कुछ सह लेती है। आदमी की तमाम हरकतों को चुप-चाप झेल जाती है। उसकी सामर्थ्य के साथ-साथ उसकी नपुंसकता और कमजोरी को भी।
उसे याद आया। एकबार पत्नी ने उसे कमजोर करार दे दिया था, 'तुम कमजोर आदमी हो, कमजोर आदमी को अमुक-अमुक काम नहीं करने चाहिए।' लेकिन वह तब की बात थी। बंधन में पड़ा आदमी भला बलवान कैसे हो सकता है। बंधन अपने आप में नपुंसकता है, आज जबकि वह ऐसा कुछ महसूस नहीं करता। पत्नी को सामर्थ्य का एहसास कराते हुए कहता है, 'तुम्हें मैं अक्सर कमजोर लगता हूँ, पर जैसा तुमने समझ लिया है, वैसा नहीं हूँ। आखिर मैं मरद हूँ। दुनिया में ऐसे बहुत लोग हैं जो दिखने में कमजोर हैं, पर काम बड़े-बड़े शैतानों जैसा कर जाते हैं। ऐसे काम कि... कहते हुए वह एकाएक रुक गया। लगा कि पत्नी को वह यूं ही झूठ-मूठ आश्वस्त करना चाहता है। सच्चाई तो यह है कि वह कहीं टिक नहीं सकता। जमकर स्थिति का सामना करने की हिम्मत उसमें नहीं रह गई है। वह कमजोर हो चुका है। कमजोरी छिपाए नहीं छिपती। वह सब जगह सामने आ रहती है। इस कमजोरी का क्या हो? सोचकर वह एक क्षण के लिए चुप रहा। शरीर के हर अंग ने अपनी क्रिया स्थगित कर दी! अब क्या हो, कैसे काम चले। ऐसी हालत में वह देर तक चल नहीं सकता। वह कमजोर नहीं बनना चाहता। वह दिखाना चाहता है कि मरद कमजोर नहीं हुआ करते। लेकिन कैसे...?
सोच ही रहा था कि एकाएक कोई भूली-सी बात उसके दिमाग में आती है। अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए उसने बहुत-सी कमजोरियों को इकट्ठा कर लिया और एक-एक कर उन पर विचार करने लगा। शरीर के हर अंग में तनाव ज्यों का त्यों बना है। लेकिन दिल-दिमाग अब वहाँ न रहकर कहीं और जा चुका है। अब उसके सामने अपनी समस्या नहीं, बल्कि देश की मौजूदा समस्याओं को वह एकदम करीब से देख रहा है। उसका अनुमान है कि गरीबी को हटाने के लिए इस पंचवर्षीय योजना में इतना अरब रुपया लग जाएगा। हर पाँच साल बाद खरबों रुपया देश की उन्नति में लग जाता है। लेकिन उपलब्धि क्या है? इधर हमारी योजनाएँ हैं, उधर पाकिस्तान की नीयत अच्छी नहीं लगती। यह पड़ोसी देश अपनी तरक्की में कैसी-कैसी रुकावटें उत्पन्न कर रहा है। एक अमेरिका है जो पाकिस्तान में अपनी जड़ें जमाता जा रहा है। उधर चीन भी पाकिस्तान से साँठ-गाँठ लगाए हुए है। पाकिस्तान अगर जंग छेड़ दे तो देश में होने वाली सारी तरक्की रुक जाएगी। जंग भी क्या बुरी चीज है। उसे वियतनाम की याद आती है, कितनी बेदर्दी के साथ इस देश पर बम बरसाये गये थे। लेकिन वह देश...। एकाएक बंगलादेश का ख्याल आ जाता है। इस देश में स्वतंत्राता की स्थापना कर हिन्दुस्तान ने दुनिया की नजरों में बहुत बड़ा काम किया है। उसे आश्चर्य है कि इतना बड़ा काम कर दिखाने वाला देश अपनी गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को खत्म करने का एक छोटा-सा काम क्यों नहीं कर सकता? शायद पार्टियों की इसमें कोई चाल है। हाँ, इस देश को पार्टीबाजी ने तबाह कर डाला है। पार्टीबाजी भी क्या चीज है... वह सोचने ही जा रहा था कि औरत कुनमुनाई। विचारों की दुनिया से वह अपनी यथार्थ दुनिया में वापस लौट आया। उसने महसूस किया कि औरत जिस्म की गर्माहट के कारण वह तपता जा रहा है। यह तपन कितनी सुखद बनी है।
विचारों का तारतम्य टूट जाने पर उसने पूछा। 'क्या है?'
'कुछ नहीं।' औरत को आश्चर्य हो रहा था कि इतना कमजोर आदमी आज किस बूते इतना जोर दिखला रहा है।
औरत के कहने से वह समझ गया कि अब उसके मन में पुरुष के कमजोर होने की बात नहीं रह गई है। वह समझ गई है कि मरद, मरद ही होते हैं। शायद उसकी यही सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह औरत से मात खा जाता है। लेकिन उसने आज ऐसा रास्ता ढूंढ़ लिया था। वह अभी लम्बे अरसे तक अपना कार्यक्रम चालू रख सकता था। अपने देश में ही नहीं, दुनिया के कई ऐसे मसले हैं, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र-संद्घ, जिसकी नीतियाँ हमेशा अस्पष्ट रही हैं। ताकतवर देशों का यह कितना दुर्बल संद्घ है। आज उसका भी अस्तित्व खतरे में है। वह भी टूट रहा है। टूटकर औरत बन जाना चाहता है। इसके अलावा दूसरे देशों की समस्याएँ हैं, जिनकी ओर अपना ध्यान ले जाकर वह हर स्थिति पर काबू पा सकता है। लेकिन पत्नी की स्थिति को संतोषजनक पाकर उसने दुनिया के मसलों से अपने को एक किनारे खींच लिया। मरने वाला दम तोड़ने के पहले प्रभु का स्मरण करता है। अपने यथार्थ का स्मरण करते ही वह भी एक बार जोर से भड़क उठा। चिरकाल से मनबसी इच्छाएँ जैसे एक ही झटके में बाहर निकल आयी हों। तने हुए अंग-प्रत्यंग धीरे-धीरे खिसकने लगे और वह छिटक कर दूर जा पड़ा। जैसे कोई पुरानी दीवार टूटकर अपनी बुनियाद से दूर जा गिरती है। अगले ही क्षण उसे लगा कि जनता को उसके अधिकार दिलाने के प्रयत्न में, किसी प्रदर्शन पर जैसे पुलिस ने अश्रुगैस छोड़कर ऊपर से लाठी चार्ज कर दिया है। जिसके कारण आँखें मुँद रही हैं। शरीर दर्द से सिकुड़ता जा रहा है। मन का देश अब बिखरता जा रहा है और तन के देश में लकवा जैसे कुछ पफैलता जा रहा है।

 
धर्म में उसकी प्रवृत्ति जानकर किसी ने बताया कि सबकुछ त्याग देने के बाद ही आदमी सबकुछ पाने का अधिकारी बनता है। उसे लगा कि यही सच है। यह औरत तमाम दिन जुए की तरह उसकी गर्दन पर सवार रहने लगी है। राशन, लकड़ी-पानी से लेकर बच्चों की सपफाई-धुलाई तक... इस व्यवस्था ने उसे पहले ही तोड़ दिया। पिफर जितना कुछ मर्दानापन बच रहा था उसे इस औरत ने हरण कर लिया है। उसकी जगह अब वह स्वयं मर्द बनकर रहने लगी है
 
 
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