अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
पारूल की कथाएं
एक नया आशियां
दया दीक्षित
 

जन्म : १ जनवरी १९६३

दर्जनभर कहानियाँ विभिन्न पत्रिाकाओं में प्रकाशित। साहित्य की अन्य विधाओं में भी लेखन। पेशे से प्राध्यापक।
१२८/३८७, ब्लॉक-वाई १,
किदवई नगर, कानपुर, उ.प्र.
मो. ०९४१५५३७६४४

 

अनत,
कुदरत के अनमोल उपहार की तरह मिला तुम्हारा पत्रा! बहुत देर से शायद अनंत युगों बाद! मेरे रोम रोम ने पढ़ा-कई बार, सुबह ...दोपहर...शाम, ...रात ...आधी रात..तुमने लिखा है मुझे-''मेरी चिन्मई,
मुबारक बसंत आँतु।
'....'
तो सुनो, तुम्हारे इस नन्हे से पत्रा ने बसंत के भरपूर खुशरंगों से मुझे लबरेज कर दिया है! नहीं तो क्या रह गया था जीवन में, मैंने तो समझ लिया था कि अंतहीन प्रतीक्षा में साँस-साँस मरना ही मेरी नियति है...। क्या यही प्रारब्ध है? मेरे साथ क्या हुआ? जानते हो, शिशिर की तेज हवाओं ने हवाओं क्या, विकराल बपर्फीली आंधियों ने बाग के वृक्षों की मर्मर ध्वनि करते पत्तों के साथ तुम्हारा यह पत्रा भी शामिल कर लिया...। अनत, इन हवाओं ने निर्दय कठपुतली की तरह तुम्हारे इस पत्रा को ऐसा उड़ाया कि कमरे की जमीन छोड़ बरबस अल्मारी की छत पर जा बैठा। डाकिये ने भी कहाँ सोचा होगा कि बंद दरवाजों की झिरी से सरकाया लिपफापफा उड़न खटोला बन गया होगा! अल्मारी की तरपफ मेरे पलंग का सिरहाना है! तुम्हारा पत्रा मेरे सिरहाने था! और मेरी साँसे हर पल इंत८ाार करती रहीं तुम्हारी चिट्ठी का...। आँखें उस जनशून्य पथ को देखती थीं, डाकिया अपरिचित की तरह सामने से निकलता और मेरी खामोश निराशा मुझसे बार-बार कहती कि जिसने तुम्हें बिसार दिया है, क्यों तुम उस पर निसार हो? विकलता की इस अवधि ने अच्छी तरह बता दिया कि विषाद कितना गहरा और कैसा होता है...।
मेरे जीवन के वसंत, लिखो कि अब आ रहे हो! कहीं मेरे इस संदेश का हश्र भी तुम्हारे पत्रा की तरह न हो, सो रजिस्ट्री करने जा रही हूँ! ताकि अपने हस्ताक्षर को अंकित कर हाथों-हाथ इसे पढ़ सको। अब इन हवाओं को क्या कहूँ! शाप दूँ या धन्यवाद। अनत, कल आई आंधी ने अल्मारी की छत पर आसनस्थ तुम्हारे पत्रा को सीधा मेरे पलंग पर गिरा दिया! और तब से पहाड़ जैसे समय ने पल छिन के वस्त्रा पहन लिए हैं।
जब तक पत्रा तुम्हें मिलेगा, पफागुन के पूरे चाँद वाली रात आ चुकी होगी! मेरे चैतन्य का एक-एक कण आवाज दे रहा है, यह होली तुम्हारे सर्वांग को आस्था, विश्वास, श्र(ा और प्रेम के पवित्रा और पक्के रंगों से सराबोर कर दे! ये रंग कभी न छुटें। दिन-दिन, प्रगाढ़ होते जाएँ!
सिपर्फ तुम्हारे लिए, तुम्हारी राह में,
चिन्मई
पत्रा भेजने के दूसरे दिन से शुरू हो गया पत्राोत्तर की प्रतीक्षा का अभंग क्रम। सुबह बीतती, दोपहर सांझ में ढलती, परेवा पखेरुओं की कलरव करती पंक्तियाँ पिफर पिफर लौटतीं अपने नीड़ की तरपफ। मगर लौटा नहीं तो बस चिन्मई के पत्रा का उत्तर! न कोई खबर न संदेशा न पत्रा। चिन्मई की साँसें उसाँसों में ढलती और उसाँसों की मूक वेदना हृदय को तार-तार कर देती! कभी आशंकाएँ सिर उठा-उठाकर मन में उझक पड़तीं वह सोचने लगती। जरूरी तो नहीं कि जैसी मैं उसकी बीमार हूँ, वह भी मेरा हो, मेरे लिए दीवानावार हो, क्या पता उसके लगाव की मंजिल कोई और हो, या वह केवल मित्रा ही समझता हो मुझे, या केवल शुभचिंतक ही! या...या... उसे पत्रा ही न मिला हो और इसीलिए उत्तर नहीं आया। अब क्या करूँ मैं! क्या कभी वो दिन भी आयेगा। जब वह अनत को देख पायेगी या उसकी चिट्ठी देखेगी! बातें करेगी। सुनेगी। अब तो स्थिति यह थी कि उसे लगता जैसे सबकी आँखों में ये ही प्रश्न हैं। खिड़की दरवाजों से लेकर चलती राहों के गलियां, पत्ते, स्कूटर, साइकिल, गाड़ियां, सैलानी, बूढ़े बच्चे वृक्ष वनस्पति... सारा परिवेश जैसे कह रहा है-कब आयेगा अनत? कब आयेगी अनत की चिट्ठी। वह क्या जवाब दे! पथराई सी आँखों से देखती, तो सब कुछ चली जाती।

और एक दिन अनत अप्रत्याशित रूप से उसके सामने उपस्थित!! आश्चर्य और प्रसन्नता के आवेग ने चिन्मई को जड़वत बना दिया। मुश्किल ये अवरु( गले से स्वर निकला-'कैसे हैं आप?'
-जैसा आपने चाहा!
-मैंने?
-हाँ, आपने
-मैं समझी नहीं?
-जरूरत ही क्या है?
-प्लीज, अनत बताइये न, मैंने क्या चाहा?
'आपने चाहा कि मैं व्यथित रहूँ! तनाव में रहूँ! आपको भूल जाऊँ या सर पटकते जान दे दूँ!
अनत की ये बातें काँच की किरच बनकर लहूलुहान कर गईं चिन्मई को, पिफर भी उसने पूछा-कैसे कह सकते हैं आप?
जवाब देने के बजाय अनत ने प्रतिप्रश्न किया-मेरे पत्रा का जवाब क्यों नहीं दिया आपने? आपकी कंपनी से दो बार माल की सप्लाई हुई थी आर्मी ऑपिफस में, सप्लायर से ही आप ख़त भेज सकती थीं! अभी अनत कुछ और कहता कि डाकिया लिपफापफे वाली रजिस्ट्री चिन्मई को देकर चला गया, यह कहकर कि वहाँ इसे किसी ने नहीं लिया, वापस आ गया! अनत को याद आ गया था कि वह एक टूर पर गया था कुछ दिनों के लिए! इसी अवधि में शायद यह रजिस्ट्री आई होगी। लिपफापफा खोला और जैसे-जैसे पत्रा पढ़ता गया वैसे-वैसे उसके चेहरे पर उपालंभ मान और तनाशाही की जगह चाहत और लगाव का भाव-समंदर, इस विचित्रा से साम्य पर दोनों को हँसी आ गई। पास के रेस्तरां में बैठे दोनों! बातें होती रहीं देर तक!
अनत ने बताया था कि वह कितना बेचैन रहता था चिन्मई के लिए। दिन रात उसी के ख्वाब-ख्याल। एक बार किस तरह वह पर्यटकों को ओरछा की नर्तकी जहाँगीर की प्रेयसी रायप्रवीण के बारे में बताते बताते कह गया था कि वह पफौजियों की वर्दी बनाने वाली कंपनी में
सुपरवाइजरी करती रहती है। इस पर
विदेशी पर्यटक ने आश्चर्य के साथ पूछा था 'तो क्या जहाँगीर की लवर अभी जिंदा हाय!'' जब तक वह कुछ कहता, तब तक स्वदेशी यात्राी ने कैसी बोली मारी थी-'गाइड साहब! अपनी प्रेमिका के बारे में बता रहे हैं क्या?' सुनकर अपनी इस बेखुदी पर उस दिन कितना झेंपा था। कुछ समय तक उनमें ऐसी ही बातें होती रहीं।
साँझ हो रही थी। वे रेस्तरां से बाहर आ गए थे। अब वे हरी भरी पहाड़ी पगडंडी की ओर बढ़ रहे थे। दूर कहीं मृदंग की थाप के साथ पफागों के मंद स्वर सुनाई पड़ रहे थे। अनत का ध्यान वहीं लगा था। वह चिन्मई से कह रहा था, 'चीनू जिंदगी एक वाद्ययंत्रा ही तो है। सुख दुख आसक्ति-विरक्ति की लयात्मक थापों पर निरंतर गतिमान हो बजने वाला।' चिन्मई ने भी उसी अंदाज में जवाब दिया-'यह तो हम पर निर्भर करता है कि उसे कितना और किस तरह से बजाएं कि जिंदगी का राग बेसुरा न होने पाए!' कहकर वह अनत को देखने लगी।
अनत ने कहा-'क्या मैं तुम्हारे जीवन गीत की संगत कर सकता हूँ। पर रुको, कुछ कहने, उत्तर देने से पहले मेरी बात सुनो। मैं तुम्हें आगे के बारे में बताना चाहता हूँ। चीनू, क्या तुमने 'डर्टी पिक्चर' देखी है? दरअसल अच्छा या बुरा कुछ होता नहीं, अपनी नजर का पफेर है बस। चीनू को सिर हिला स्वीकृति देते देख वह पिफर बोला-पिफल्म में डायरेक्टर पूछता है सिल्क से-'तुम्हें कितने लोगों ने टच किया।' उसका जवाब था कि-'टच तो बहुत लोगों ने किया, पर छुआ किसी ने नहीं।' चीनू यही जवाब मेरा भी समझ लो। सच है कि गाइड होने की वजह से कई देशी-विदेशी लेडी पर्यटकों के संपर्क में रहा हूँ, उनमें से कई एक से सेक्स किया है। एक बात बताऊँ तुम्हें, विदेशिनीयों को भारतीय पुरुषों से सेक्स करने की बेहद लालसा होती है, अब तो बड़े-बड़े होटलों में उनके लिए यह सुविधा प्रोवाइड की जाने लगी है, पैकेज में इसका भी चार्ज जुड़ता है, पर इस तरह से तो नहीं मगर कभी जरूरत महसूस हुई या किसी ने ऑपफर दिया तो...। लेकिन उनका होकर भी मैं उनमें से किसी का भी नहीं। और तुम्हें तो हाथ तक नहीं लगाया, न जाने किस बात पर रो पड़ो! चीनू मैं नहीं चाहता था कि तुम मेरी कमजोरी बन जाओ, मगर अब यह हो गया तो हो गया। शगल की तरह तुम्हारा जुनून मुझ पर ...उसकी आँखें भर आयी शब्द भारी हो गए...' वह चुप हो गया। चिन्मई ने धड़कते दिल से सारी बातें सुनीं। उत्तर में वह क्या कहे? यह तो उसकी चिरसंचित साध थी। अनंतकाल से, शायद तब से जब सृष्टि संचालन का सूत्रा अनत के रूप में मनु था, और वह सृष्टि संवाहिका में कायांतरित शतरूपा...। अनत जो न होना या झुकना नहीं जानता। सभ्यता की यह इक्कीसवीं पायदान शायद उसे इसने मत को जीना सीखा दे... किसी ने लिखा है-मेरी मन अनत कहा सुख पाए
उसका भावावेग शब्दों में ढला-''अनत, हम एक दूसरे के जीवनराग की संगत तो करेंगे, पर निर्बन्ध हों तो कैसा रहे?''
अनत-'हाँ हम निर्बन्ध रहेंगे। प्रेम की पवित्रा शक्ति बांधती नहीं, मुक्त करती है। शासन नहीं, सहयोग करती है। लादती नहीं, साधती है। तुमने मेरे हृदय की बात कही है। प्रेम की अदृश्य डोर से हम मजबूती से बंधे रहेंगे। बेबसी के तंत्राजाल में पफंसे छटपटाते जीवन को मैंने बहुत नजदीक से देखा है चीनू। तुम शायद इसे कहानी ही समझोगी पर यह शब्दशः हकीकत है उस स्त्राी की जो दुर्भाग्यवश मेरी सगी भाभी है। सात पफेरों ने ऐसा उसे बांधा कि तड़प-तड़प कर तिलतिल मर रही हैं। तुमने सड़क चलते अचानक कभी एकदम से सांड की चढ़ाई देखी होगी गाय पर! मैं बचपन से ही बेबस देखता रहा यह दृश्य अपने द्घर में! भाभी खाना बना रही है, या कपड़े धुल रही है या झाडू बुहारू लगा रही है, कभी भी एकदम से भाई उसका हाथ द्घसीटते भीतर ले जाता है... कुछ ही देर में मुड़ी तुड़ी धोती, जख्मी सा चेहरा लिए सिसकियों में रोती भाभी यथावत काम काज में जुट जाती...।
कभी उनकी चूड़ियाँ, कंगन, कभी दूसरे जेवर कान या गले के, कभी साड़ी कभी स्वेटर या शॉल... गुम होते रहते हैं, वे जानती हैं कि कौन गुम करता है इन्हें और 'अपनियों' में लुटा देता है, मगर भाभी ने हमेशा यही कह कर संतोष कर लिया कि चीजें ही तो गईं हैं, जिंदगी तो है! उनके उदास, नीरस और पफीके विषादमय जीवन का जिम्मेदार कौन है? सात पफेरों का बंधन ही तो! हार कर भाभी ने तलाक की अर्जी लगाई थी। भैया ने रिश्तेदारों की पंचायत जोड़ी, अपने सुधार करने की झूठी सच्ची कसमें खाईं, और तलाक नहीं लेने दिया।'
चिन्मई-'भाभी को चीजें ताले में रखनी थी! पिफर देखतीं कि कैसे गुम हो जातीं?'
अनत-'हाँ, तुम ठीक कह रही हो, पर इतनी अक्ल तो भाभी में थी ही। मगर भाई की शातिर बु(ि हर लुकाव या ताले को खोलना जानती है। और पिफर द्घर में रहने वालों से, निरंतर के संग-साथ वालों के आगे भी कोई चीज छुप सकती है भला? मैं तो सोचकर दंग रह जाता हूँ कि हरेक बात की सीमा होती है, क्या सहन करने की कोई सीमा नहीं? यह कहाँ का न्याय है कि एक शासन करे, दूसरा दासवत जीवनयापन करे। ऐसा क्रीतदास कि 'निज' का कहने के लिए उसके पास कुछ भी न हो, किसी पर कोई अधिकार ही न हो!
जरा सोचो चीनू, मौका बखत के लिए तुम बाजार से कुछ लाओ, सुरक्षित रखो और वक्त जरूरत पर वही तुम्हें न मिले, गुम हो जाए! मैंने हमेशा से देखा है, भाभी की नई चप्पल खो गई, साड़ी नहीं मिल रही, शॉल, स्वेटर...। उनके लिए भाई ने पागल और गंवार दो शब्दों के विशेषण रखे हैं। भाभी ने दबे मुँह जब भी कहा कि पफलां चीज खो गई या नहीं है, वैसे ही भैया तपाक से जड़ देते गंवार औरत पागलपन कर रही है, इसकी बातों का क्या ठिकाना? जब देखो तब एक न एक उलझन किए रहती है...। एक बार तो गजब ही हो गया! तब भाभी बिंदियाँ बनातीं थीं दुकानों के लिए। एक बार उसने अपने लिए बड़ी सी सतरंगी बिंदी तैयार की। तीन अलग रंगों की बैलवेट की बुंदकियाँ काट कर उसमें चिपकाईं थीं। महीना नहीं बीता कि वही बिंदी पिफन्नी की दीदी लगाकर आई थी हमारे यहाँ। चोरी और सीनाजोरी पर मेरा खून खौल उठा, पर भाभी न खुद कुछ बोली, न मुझे बोलने दिया। बाद में हंस कर कह रही थीं-बाबू, बिंदी उसने लगाई या मैंने, क्या पफर्क पड़ता है..दूसरों से जीतना जितना सरल है, अपनों से उतना ही कठिन। मैं तो दखल दे ही नहीं सकता! मेरी दखलंदाजी से भाभी और भी मुसीबतों में पड़ जाएँगी। वह बेबस इस यंत्राणापूर्ण माहौल में तड़पफड़ाती रहती हैं और मैं देखता रह जाता हूँ।'
चिन्मई-'अनत, क्या तुमने ऐसे पुरुषों को देखा है, जो पत्नी से पीड़ित होते हैं! आपकी भाभी की दुरगत कल्पनातीत नहीं है, यह तो अनेक स्त्रिायों का भोग-भाग है, जिसे अपने 'सुखी' होने के अभिनय से वे छुपाए रहती हैं। नारी का सम्मान करने के छद्म में दरअसल पुरुष बार बार उसकी कामनाओं की निर्दय हत्याएँ करता रहता है। पर आपको कैसे विश्वास दिलाऊँ कि स्त्रिायाँ भी कुछ कम नहीं हैं, आप सोच भी नहीं सकते एक स्त्राी मेरे भाई के जीवन में किस तरह विनाशलीला रच रही है। मैं तो आपकी भाभी पर बीती को कहानी नहीं समझी, मगर आप मेरे भैया की दुर्दशा पर विश्वास नहीं कर पायेंगे। भैया के सालों ने उनका जीवन तहस-नहस करके रख दिया है। भैया ने जब अपने ससुर से इसका हल निकालने को कहा था, तो वे बेचारे रो पड़े थे, बुरी तरह पुत्राों से पीड़ित थे, उसके बाद भी उन्होंने बेटों को समझाया था कि बहन बहनोई के जीवन में अंगारे न भरें। अनत, इसका जैसा सिला उन्हें मिला! किसी को न मिले। बड़े पुत्रा ने उन्हें ऐसा पटका कि रीढ़ की हड्डी में चोट लग गई, हॉस्पिटल में भर्ती रहे और वहीं चिरनिद्रा में चले गए। यह शब्दशः सच है अनत, भले आप इसे कहानी समझें। कहते-कहते चिन्मई की नरम हृदय की नर्मी आँखों से टपकने लगी।
अनत ने रुमाल से उसके आँसू पोंछे। सांत्वना दी। रात द्घिरने लगी थी। चलते-चलते वे चिन्मई के ऑपिफस से अटैच्ड क्वार्टर में आ गए। आया दो गिलासों में पानी और मिठाई ले आई। पानी पीने के बाद चिन्मई ने कहना शुरू किया-अनत, आप मेरे भाई की पीड़ा का अंदा८ा नहीं लगा सकते। केंद्रीय सचिवालय में इतना महत्वपूर्ण पद पाने वाले भैया बुरी तरह से अपने द्घर में ही अपदस्थ हैं। मैं भी बचपन से देखती आ रही हूँ। भाभी के मायके वालों की गुंडागर्दी और दबंगियत के चलते भैया को अपने द्घर में चैन के दो दिन भी नसीब नहीं हो पाते हैं। मैं तो हॉस्टल में पढ़ी थी इसलिए पढ़ गई। मगर भाई के दोनों बच्चों की पढ़ाई डिस्टर्ब है। भैया की सारी प्रॉपर्टी पर भाभी के भाइयों का राज चलता है। सर्विस के कारण भैया अधिकतर दिल्ली में रहने को बाध्य हैं। और तो और बच्चे तक आतंक भरा जीवन जी रहे हैं। भैया पिछले सात आठ सालों से कई स्वयं सेवी संस्थाओं, एन.जी.ओ. को अर्जियाँ लिख रहे हैं, मगर कहीं से कुछ होता नहीं दिखता। उनका अपना ही नहीं निपट पा रहा है, मेरी तो पिफर बात ही कौन पूछने वाला है। वैसे मैंने भाई को आपके विषय में बताया था।'
'क्या? क्या बताया था?' अनत ने व्यग्र होकर पूछा! चिन्मई उसकी उत्कंठा पर मुस्कराई पिफर धीरे-धीरे बोली-भैया ने पूछा था आपके बारे में। यह तो वे जानते थे कि आर्मी कैम्प के साथ मैं महीने भर की लांग ट्रिप पर गई थी-भारत दर्शन के लिए। मैंने उन्हें बताया था कि आप अक्सर आर्मी कॉलेज आते रहते थे। एकेडमिक वर्कशॉप में। जिस एजेंसी ने हमारे कैम्प की लॉजिंग पफूडिंग का जिम्मा लिया था, उसी ने आपको बतौर गाइड हमारे साथ भेजा था। मैंने उनसे आपकी और अपनी औपचारिक अनौपचारिक मुलाकातों का जिक्र किया था। और...
'और क्या चिन्मई?' अनत को एक पल का भी विराम स''्‌य नहीं था।
चिन्मई-'और यह भी कि शायद आपसे, ...आपसे शादी के लिए भी कह दिया था! अनत मुझे बहुत तो नहीं, मगर आपकी बातों से कुछ तो आभास हो ही गया था कि आप मुझमें इंट्रेस्टेड हैं। आपको याद है, एक बार कैम्प में गीतों का प्रोग्राम था। उसमें आपने गाया था- 'जिंदगी प्यार का गीत है, इसे हर दिल को गाना पड़ेगा...।' और हँसकर मैंने कहा था-मेरा जीवन ऐसा गीत है, जिसे किसी ने नहीं गाया, गाने की बात दूर पढ़ा तक नहीं!'
और आपने कहा था, चिन्मई की बात को पूरा करते हुए अनत ने कहा 'हाँ मुझे याद है, मैंने कहा था-चिन्मई जी, गाने वाला आपके सामने बैठा है, अगर आपने अवसर दिया, तो वादा करता हूँ, बेसुरा नहीं गाऊँगा।' चिन्मई-'बिल्कुल सही कहा था आपने!' थोड़ी देर तक दोनों खामोश रहे, अनत-'चीनू हम अपनी दुनिया नई जगह बनाएँगे! मुझे जस ओबरॉय समूह का टूरिज्म वाला पैकेज मिल रहा है। कहो तो ले लूँ। पफार्नर्स को इंडिया टूर पर ले जाना, उन्हें देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों की सैर कराना, गाइड करना।'
चिन्मई एकदम से बोल पड़ी-'हमारे बच्चों की पढ़ाई लिखाई का क्या होगा? वहाँ तो पफार्म में माँ-बाप का नाम...'
अनत-'अपने बच्चे? जरा पिफर से कहना!' सुनकर चिन्मई की न८ारें ऊपर न उठ सकीं, जमीन पर गड़ी रह गई हों जैसे, कुछ न सूझा तो होंठ भींच लिए उसने। बड़ी शर्म आई उसे अपने आपसे भी।
अनत- 'पफार्म में क्या माँ बाप का मैरिज सर्टिपिफकेट लगता है? हो जाएगा सब, चिंता मत करो!'
चिन्मई ने आशंकित सी होकर कहा-'सब हमारे रिश्ते के बारे में पूछेंगे तब? इस पर अनत ने चिन्मई की ओर देखकर कहा-'देखो, एक तो जगह नई होगी, दूसरे कोई किसी से मतलब रखता नहीं। वे कुछ नहीं पूछेंगे। खुद ही समझ लेंगे कि हम पति पत्नी हैं। या न भी समझें तो क्या पफर्क पड़ता है, हमें अपने लिए जीना है। अनत ने अपनी चीनू का हाथ थामा और उसकी आंखों में आंखें डाल हल्के से मुस्करा दिया। इस
मुस्कराहट में भरोसा था, आजादी थी-नई लीक पर चलने का अदम्य साहस भी।

 
तुमने सड़क चलते अचानक कभी एकदम से सांड की चढ़ाई देखी होगी गाय पर! मैं बचपन से ही बेबस देखता रहा यह दृश्य अपने द्घर में! भाभी खाना बना रही है, या कपड़े धुल रही है या झाडू बुहारू लगा रही है, कभी भी एकदम से भाई उसका हाथ द्घसीटते भीतर ले जाता है... कुछ ही देर में मुड़ी तुड़ी धोती, जख्मी सा चेहरा लिए सिसकियों में रोती भाभी यथावत काम काज में जुट जाती...।
 
 
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