अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
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पंजाबी कहानी

ज्ञान पाप है!

गुरदयाल सिंह
 

जन्म : ११ जनवरी १९७०

पंजाबी के वरिष्ठ लेखक, दर्जन भर कहानी-संग्रह, उपन्यास
प्रकाशित। साहित्य सबसे बड़े सम्मान ज्ञानपीठ से सम्मानित।
७/२६२ ज्ञानपीठ मार्ग, जैतो ;जिला पफरीदकोटद्ध पंजाब
पिन-१५१२०२


   
एक कुत्ते को देखकर भक्त राम कृष्ण जी कहने लगे, 'मास्टर संत राम जी, देखो कैसी बुरी योनि है। क्या पता पिछले जन्म में क्या-क्या पाप किए होंगे। अब उनका पफल भुगत रहा है। दर-दर से दुत्कारा जाता है, डंडे-गालियाँ खाता है। बासी रोटी के लिए, बु( राम जैसे कंजूसों के भी आगे-पीछे पूंछ हिलानी पड़ती है। परंतु पेट भर कर पिफर भी कभी नहीं सोया होगा। हे भगवान! सबके पाप हरना। ऐसी योनि में किसी वैरी को भी मत डालना!...'
मैं हँस दिया। समझदारी यही थी कि उनके साथ किसी बहस में कभी न उलझूं। कुछ समय पहले ऐसी मूर्खता कर
 
बैठता तो पछताना पड़ता। अब सुखी हूँ। जैसे कहते हैं, 'सत वचन' कह कर मान लेता हूँ। परंतु उन्हें भ्रम बना हुआ है कि मैं अभिमानी हो गया हूँ। परंतु और कर भी क्या सकता हूँ? यदि मैं उन्हें अपने विचार बताऊँ तो वे अपना आध्यात्मिक ज्ञान लेकर बैठ जाएँगे। वह यह कैसे मान लेंगे कि यह कुत्ता अपने किसी पिछले जन्म की सजा नहीं भुगत रहा। इस छोटे जीव का 'दोष' सिपर्फ इतना ही है कि यह, अपनी इच्छा के
बिना अचानक किसी कुतिया के पेट से जन्म 'ले बैठा'-'ले बैठा' भी नहीं कहना चाहिए, कहना यह चाहिए कि इसे जन्म लेना 'पड़ गया'। इस बेचारे को तो बिल्कुल भी ज्ञान नहीं कि यदि किसी अमीर देश की कुतिया के पेट से जन्म लिया होता तो किसी गोरे ने इसे बिस्कुट खिलाने थे। अपने साथ बिठाकर टी.वी. दिखाना था। किसी मित्रा के द्घर पर दावत में भी लेकर जाना था, जहाँ किसी खूबसूरत महिला ने इसके मुलायम बालों को सहलाते हुए कहना था, 'ओ...! कितना प्यारा कुत्ता है! कहाँ से लेकर आए हैं आप इसे?...'
परंतु भगत जी इस बात पर विश्वास नहीं कर सकते। उनका दृढ़ विश्वास है कि यह तो कुत्ते की योनि भोग रही कोई 'दुष्ट आत्मा' है, जिसे चौरासी लाख योनियाँ भोग कर भी शायद ही दोबारा मनुष्य की योनि मिले। मैं तो डर के मारे ऐसी बात उन्हें कह भी नहीं पाता परंतु संभव है कि यह दुष्ट आत्मा, हमारे मोहल्ले के सौणी मल्ल की ही हो। उसका निधन हुए दस वर्ष हो चुके हैं। सभी जानते हैं कि वह कैसा 'दुष्ट' था। न सारी उम्र स्वयं खाया, न किसी को खाने दिया। किसी के साथ ठग्गी करने से नहीं झिजकता था। तीन के तेरह लिखने, वसूल करने, हिसाब-किताब में प्रत्येक के साथ झगड़ा करना, उसका 'नित्य नियम' था। वह सुबह-सुबह जिसको दिखाई दे जाता, उसका माथा तभी ठनक जाता कि आज का दिन खैर-सुख के साथ नहीं बीतेगा। परंतु उसकी मृत्यु पर शोक प्रकट करने गए सभी व्यक्तियों के मुँह से ;मेरे बिनाद्ध यही सुना, 'कोई पिछले जन्म के पुण्य किए थे, जो इस तरह संतों की मौत मिली है।'
'संतों की मौत' वह इस कारण कह रहे थे क्योंकि सौणी मल्ल रात को सोया और पिफर नहीं जगा। जिस डॉक्टर से उसका बड़ा पुत्रा दवाई लेकर आता था ;क्योंकि सौणी मल्ल दवाई नहीं लेता था, अपने पुत्राों के साथ झगड़ने लगता कि वह दवाई पर पैसे 'बर्बाद' कर रहे हैंद्ध उस डॉक्टर ने बाद में कई व्यक्तियों को बताया कि सौणी मल्ल को दिल की ऐसी बीमारी थी जिससे इस तरह अकस्मात्‌ मृत्यु हो जाती है। भगत जी भी हैरान थे कि इतने दुष्ट व्यक्ति को इतनी सरल मौत कैसे मिली। सौणी मल्ल की मृत्यु होने पर वह कई दिन गुम-सुम रहे थे। एक दिन उन्होंने मेरे पास इसे अभिव्यक्त भी किया, 'संत राम जी देखो, उस भगवान के रंग कितने न्यारे हैं। ...उसके द्वारा किए गए का कोई भेद नहीं पा सकता। सौणी मल्ल तो कितने आराम से इस संसार से चला गया, परंतु सारी उम्र गायों की सेवा करने वाला और चीटीं पर भी पैर न रखने वाला ज्ञान चंद किस तरह साल भर चारपाई पर पड़ा रहने के बाद मरा।' पिफर वह जैसे ज्ञान चंद की मृत्यु से भयभीत होकर बोले, 'हे बंसी वाले! ऐसी कुमौत किसी दुश्मन, दुष्ट, पापी को भी मत देना!'
परंतु मैं जानता हूँ कि भगत जी की बात किसी ने भी नहीं सुनी थी-जब सुनने वाला है ही कोई नहीं, तो पिफर सुनेगा कौन? कोई भी ऐसा धर्म राज नहीं है जो सौणी मल्ल और ज्ञान चंद की मृत्यु निश्चित करता हो। यह धरती के सभी प्राणियों की नियति है कि जिस जीव ने जन्म लिया है उसकी मृत्यु अवश्य होगी। परंतु कैसे होगी? ...इसका निर्णय किसी के अच्छे-बुरे कर्म नहीं करते, उसकी देह के साध्य-असाध्य रोग करते हैं, या पिफर उसके माँ-बाप की देह के रोग करते हैं जो पुश्तों तक चलते रहते हैं। मृत्यु के और भी अनेक वैज्ञानिक कारण हैं। परंतु भगत जी ऐसी बातों को नहीं मानते। एक दिन उन्हें कह दिया या कहा गया, 'भगत जी यदि प्रत्येक व्यक्ति की आयु परमात्मा ने निर्धारित की हुई है तो हमारे देश की औसत आयु तीस वर्षों में ही तीस से पचास वर्ष कैसे हो गई?'
वह नारा८ा हो गए। ऐनक ठीक करते हुए उनके चेहरे पर खीझ सापफ न८ार आई। पिफर वह निराश होकर बोले, 'तुम तो
नास्तिकों वाली बातें करते हो। उसकी लीला अपरम्पार है। जो चाहे करे, उसे कौन रोक सकता है!'
परंतु एक बात बहुत दिलचस्प है। जब भगत जी द्घर की किसी समस्या का ८िाक्र करते हैं तो मेरे तुम्हारे भांति ही अपने भाइयों, भतीजों, पुत्राों, बहुओं के व्यवहार का गिला-शिकवा करते हैं। तब वह अपनी इन बातों के बीच में भगवान को नहीं लाते। मैं उनके सामने हाथ जोड़कर उन्हें चुप कराता हूँ। परंतु उनका गुस्सा 'सभी' को खरी-खोटी सुना कर ही ठंडा होता है। सुने भी जाता हूँ और मुस्कुराए भी जाता। और क्या करूँ?
वास्तव में मेरी मुश्किल यह है कि पिछले तीस वर्षों में मैं लगभग डेढ़-दो ह८ाार पुस्तकें पढ़ चुका हूँ। इन पुस्तकों को पढ़कर मुझे अधिकांश सामाजिक समस्याओं के कारण और उनके बारे में कितनी ही और उलझनों के भेद समझ आ गए हैं। वैज्ञानिक पुस्तकों से यह भी पता चल चुका है कि यह संसार क्या है। जीव कैसे पैदा हुए। मनुष्य कैसे अस्तित्व में आया। इसने अपने समाज की सृजना कैसे की और पिफर कौन-कौन से ऐतिहासिक पड़ावों से गुजरता हुआ यहाँ तक पहुँचा। राज करने वाले कौन होते हैं। जिनके ऊपर राज किया जाता है उनके साथ उनका व्यवहार कैसा होता है। किसकी 'किस्मत' का आधार क्या है-तथा और सैकड़ों 'भेद की बातें' मैं जान तो गया हूँ परंतु उनके बारे में यह भी नहीं कह सकता कि सत्य क्या है। ऐसा भी कैसे कहूँ कि महान विद्वानों से जो जाना/समझा वह सत्य नहीं। इसी कारण भगत जी, मेरी पत्नी और मेरे साथी अध्यापक जब बच्चों की सी बातें करते हैं तो हँसी आती है। और क्या करूँ?
दोष शायद हममें से किसी का भी नहीं है। हम सभी ऐसे अंधे हैं जो हाथी के गिर्द एकत्रा हुए हैं और उसे स्पर्श करके ही विश्वास किए जा रहे हैं कि यह कैसा है। अंतर थोड़ा ही है। मेरी आँखों पर चढ़ा अंधविश्वास का सपफेद-मोतिया, ज्ञानवानों व विद्वानों ने अपने विचारों के नश्तर से काट डाला है। अब मुझे हाथी को स्पर्श करके देखने की आवश्यकता नहीं है, देखकर ही बता सकता हूँ कि यह कैसा है। परंतु पिफर भी मानता हूँ, कि एक समय मुझे हाथी एक तरपफ से ही दिखाई देता है। कितनी भी दूर या नजदीक होकर देखूँ वह चारों ओर से तो दिखाई नहीं दे सकता। उसके आकार में बड़ा होने के कारण ही ऐसी समस्या आती है। इस तरह भगत जी, मेरी पत्नी, मेरे सहकर्मी, आस-पास के लोग और मैं-सभी एक-दूसरे से थोड़े बहुत दूर खड़े हुए हैं। हमें तो एक-दूसरे की शक्ल भी अच्छी तरह दिखाई नहीं देती। आवा८ा भी ठीक नहीं सुनाई देती। इस तरह हाथी के आकार, शक्ल, उसकी शक्ति, लाभ और हानि के बारे में हमारा झगड़ा तो रहेगा ही। इसलिए मैंने इसको अपनी 'नियति' मान लिया है। और कोई चारा भी तो नहीं।
भगत जी खुश हैं। कल कहने लगे, 'आखिर आ गए न उसी स्थान पर!... चलो यह भी भगवान की कृपा ही समझो! यदि सुबह का भूला शाम को द्घर वापिस लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते।'
भगत जी की ऐसी बातों पर बस मुस्कुरा ही सकता हूँ! और उन्हें क्या कहूँ?
एक दिन मैंने कहा, ''भगत जी! यदि भगवान सर्व-शक्तिमान हैं तो क्या वे आपके द्घर के झगड़ों को नहीं सुलझा सकते? आपके बेटों, बहुओं की बु(ि बदल देना, उन्हें ज्ञान देना तो उनके लिए बहुत मामूली बात है। पिफर वह मामूली सी तकलीपफ उठा कर आप जैसे भक्तों को सुख शांति नहीं दे सकते?' वह मुस्कुरा दिए। कहने लगे, 'वह अपने भक्तों की परीक्षा लेता है कि यह कितने समय तक स्थिर-चित रह सकते हैं। डोलते हैं या नहीं। यह तो उसकी कृपा है और माया भी।'
'परंतु प्रत्येक परीक्षा की सपफलता के पश्चात परीक्षार्थी को कोई न कोई इनाम तो मिलना ही चाहिए या नहीं? आपकी तो सारी उम्र परीक्षा में ही बीत गई। ऐसा क्यों?'
'यह सब उसके हाथ में है। वह जाने, उसका काम जाने। हमने तो कर्म करना है, पफल की इच्छा नहीं रखनी। गीता में यही कहा है बंसी वाले ने। नहीं कहा?'
मैं हार मान लेता हूँ। वह ऐसे चिकने द्घड़े हैं जिनके ऊपर किसी भी तर्क का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कई बार सोचता हूँ कि उनके साथ मेल-मिलाप का कोई लाभ नहीं। परंतु उनके विनम्र स्वभाव और दूसरे के लिए मन में सदभावना के कारण उनसे दूरी संभव नहीं। वह तो द्घर आकर पूछते रहते हैं, 'मास्टर जी अभी लौटे नहीं? कब तक लौटेंगे?' मेरी पत्नी भी कहती है, 'भगत जी ठीक कहते हैं। भला आदमी के वश में क्या है?... आपके वश में होता तो तुम न अपने बेटे को बड़ा अपफसर बना देते?'
उन्हें समझाते हुए तीस वर्ष हो गए हैं कि बड़े-छोटे अपफसर की नौकरियाँ या अमीरी-गरीबी किसी भगवान की कृपा या प्रकोप के कारण नहीं सामाजिक व्यवस्था की 'मेहरबानी' के कारण हैं। जब तक सामाजिक प्रबंध अमीरों के हाथ में है, यह गरीबी नहीं मिट सकती। परंतु वह ऐसे अवसर पर पफट से प्रश्न कर देती हैं, 'पिफर रामुआणे वाले दुकानदार भूखों मरते करोड़पति कैसे बन गए?'
'ऐसा सब सामाजिक व्यवस्था के कारण ही होता है। कुछ लोगों को अचानक लूटने का अवसर मिल जाता है। परंतु ऐसा ह८ाारों में एकाध ही होता है। शेष गरीब ही रहते हैं। अधिकांश तो और भी गरीब हो जाते हैं।' परंतु वह भी भगत जी की भांति मेरी किसी दलील को नहीं मानतीं। उनका ऐसी बातें सुनने को मन ही नहीं करता जो किसी 'चमत्कार' से संबंध न रखती हों। उनके विनम्र स्वभाव के कारण आस-पड़ोस की महिलाएँ, खाली समय गु८ाारने के लिए उनके पास आकर बैठी रहती हैं। इनकी बातें या तो ब्याह-शादी के लेने देने की होती हैं या पिफर मोहल्ले के नए अमीर हुए दो परिवारों के बारे में। तीसरी किस्म की बातें द्घरेलू समस्याओं के बारे में भी होती हैं, जिनमें बच्चों के लड़ाई-झगड़ों से लेकर सास-बहू, देवरानी-जेठानी, पड़ोसनों के कलह-कलेश का ८िाक्र होता है। मेरी पत्नी अक्सर यही बातें दोहराने लगती हैं। उनकी बात को जब ध्यान से नहीं सुनता तो वे खीझ जाती हैं। भड़क कर कहती हैं कि, 'तुम तो स्वयं भगवान बने पिफरते हो। मुझे यह भी पता है वह भी पता है! सब कुछ आपको ही ज्ञात है, शेष तो सब गंवार ही हैं बस! ...अधिक पते वालों ने सारी उम्र बनाया ही क्या है? तीस सालों तक नौकरी करने के बाद भी एक नया कमरा नहीं बना पाए। यदि यह चार ईंटें बुजुर्गों ने न लगाई होतीं तो पिफर देखती तुम कहाँ सिर छिपाते। तभी पता चलता कि भगवान कहाँ रहते, बसते हैं, क्या करते हैं।'
अब आप ही बताएँ कि मेरा ज्ञान,
वैज्ञानिक सूझ-समझ क्या करेगी! यदि 'नियति' न मानूं तो कहाँ जाऊँ? परंतु यदि मानूं तो तीस साल तक प्राप्त ज्ञान को कहाँ छिपाऊँ? अंतः हार न मानूँ तो क्या सिर पफोड़ूँ? सोचता हूँ शायद हमारे धर्म ग्रंथों की बात ही ठीक हो कि 'ज्ञान पाप होता है!' क्या कहूँ! आप कुछ बता पाएँ तो आभारी होऊँगा।
 
 
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