अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कविता
 
 
मनोज कुमार झा
 

जन्म : १९७६

युवा कवि, स्वतंत्रा लेखन। समकालीन चिंतकों 'टेरी ईग्लटन', 'ेडरिक जेम्सन', 'नोम चॉम्स्की', 'मिशेल पफूको' इत्यादि के आलेखों का हिन्दी अनुवाद।घ्कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार।घ्'तथापि जीवन' कविता-संग्रह शीद्घ्र प्रकाश्य।
मापर्फत- श्री सुरेश मिश्र
दिवानी तकिया, कटहलवाड़ी, दरभंगा - ८४६००४
मो.- ०९९७३४१०५४८

 
ज्ञान
 

ऐसे ही द्घूमते रहोगे रौद्र धूप भीषण बारिश में
दरवाजे खटखटाते रहोगे
सब सोए होंगे तुम्हारी दस्तक निष्पफल जाएगी
कोई छड़ी लेकर निकलेगा कुत्ते की आशंका में
तुम्हें देखकर इतना तक नहीं कहेगा
कि मेरी आशंका निर्मूल थी
जहाँ बिल्कुल आशंका नहीं वहाँ भी अपमानित होओगे
इसलिए नहीं कि तुम बड़े कुशाग्र हो या बड़े मूर्ख
या बड़े नेक हो या बड़े पाखंडी
बस इसलिए कि तुम्हें अन्न से प्रेम है
जल से और धरती से
और मनुष्य के प्रेम से
बल्कि सचमुच सोच सको तो प्रेम भी नहीं
तुम्हें इनकी जरूरत है
तुम चाहोगे कि जरूरत को प्रेम की तरपफ झुका दो
मगर लोग तुम्हारे प्रेम को जरूरतों की तरपफ झुका देगें
भटकते पिफरोगे
इसलिए नहीं कि मणि के खींच लेने के बाद का
द्घाव है तुम्हारे माथे पर
बल्कि इसलिए कि यह पृथ्वी बड़ी सुंदर है
और तुम जानते हो कि यह पृथ्वी बड़ी सुंदर है।

 
दूसरा कोना
 

जिस भाषा में मेरे नाम का मतलब कुत्ता है
वो भाषा भी सीखूँगा
हो सकता है उस भाषा में
मेरे दोस्त के नाम का मतलब हंस हो
न भी हो तो
हंस के लिए कोई तो शब्द होगा ही
कोई शब्द होगा सुंदर के लिए
कोई शब्द रोटी के लिए
प्यार के लिए और पृथ्वी के लिए
क्यों न करूँ परिक्रमा जीवन के एक अन्य रथ पर हो सवार।

 
उत्तर जीवन
 

खाँसना भी न आया था जब पानी चढ़ गया था ओसारे पर
सब भाग कर एकत्रा गाँव में एक ही थी ऊँची परती
बाँस-काठ पत्ता-पन्नी कुछ जुटे हुए
कुछ कच्चे-अधकच्चे खोह
जिसमें कुछ मनुष्य-सा रहे हम,
पाँच बच्चे थे हमारे आस-पास की उमर के जिन्हें
पाँच-पाँच माँओं के दूध का सुख हुआ, पेड़ों के भी दूध
चखे हमने, एक गूलर है स्मृति में उपरान्त-कथाओं से झाँकता

अब इतना खाँसता कि कोई कमरा नहीं देता किराए पर
बार-बार हाथ से छूट जाता है भरा हुआ लोटा
ठंड सहने की भी जुगत नहीं गर्मी की भी नहीं
पहली बार ए. सी. देखा
शवगृह से लाते वक्त चाचा का पीला शरीर
टूटता गया साही का एक-एक काँटा
कब तक छुछुआये भादों की रात में
साही जिनके सारे काँटे झड़ गए
एक मन हुआ था कि सिमरिया-पुल से दे दूँ
देह को गंगा में पलटी
आस लगाए मल्लाह के जाल में
बाहर आएगा चवन्नी, अठन्नी के साथ नरपिंजर
कि देखो क्या हाल है मनुष्य का गंगा के कछार में
मगर बार-बार बांध लेती है ब्रह्माण्ड की यह
हरी पुतली जिसमें हहाता जल अछोर नीला
बार-बार पाँव लग जाते हैं खाट के नीचे रखे लोटे में
पूरी मिट्टी पिचपिचा जाती है
कि तभी अंधियाला बिखेर जाता है नाभि की कस्तूरी
खाँसता हूँ तो चतुर्दिक्‌ हवाओं से
धुना धूप का कपास पफेपफड़ा सहलाता है

मलिन मन उतरा जल में कि पफाल्गुन बीता विवर्ण
लाल-लाल हो उठता है अंग-अंग अकस्मात्‌
कौन रख चला गया सोए में केशों के बीच रंग का चूर।

अकेला
 
मैं साही की देह का काँटा
झमकता झनझनाता तोड़ता सन्नाटे का पत्थर
एक दिन गिर पड़ा
जब रात की पंखुड़ियाँ ओस से तर थीं
न हवा तेज थी और साही की गति भी म(म
अब इस खेत में पड़ा हूँ ऊपर पड़ा ढेला
पता नहीं कहाँ जाऊँगा
बाढ़ आने का समय हो गया है
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
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