अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कविता
 
 
उमा शंकर चौधरी
 

जन्म : १ मार्च १९७८

कविता और कहानी के क्षेत्रा में समान रूप से लेखन। कविता के लिए 'अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार', भारतीय ज्ञानपीठ के 'नवलेखन पुरस्कार' से सम्मानित। 'कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे' पहला कविता-संग्रह ज्ञानपीठ से
प्रकाशित। कहानी के लिए 'रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार'।
द्वारा- ज्योति चावला, स्कूल ऑपफ ट्रांसलेशन स्टडीज एण्ड ट्रेनिंग, जी ब्लॉक, अकादमिक कॉम्पलेक्स, इग्नू, मैदानगढ़ी, नई दिल्ली-११००६८
मो.-९८१०२२९१११

 
गाँव में पिता बहादुर शाह जपफ़र थे
 

वह मेरे गाँव की आखिरी असपफल क्रांति थी
जिसमें मेरे पिता की मौत हुई
इसे आप मौत कहें या एक दर्दनाक हत्या।

मृत पिता का चेहरा आज भी
मेरी आँखों में जस-का-तस बसा है
वही पथरायी आँखें
वही सपफेद चेहरा
चेहरे पर खून का कोई धब्बा नहीं है
किसी अंग की विकृति के कोई निशान नहीं
मेरी आँखों में मक्खियां भिनभिनाता
पिता का चेहरा आज भी ठीक उसी तरह दर्र्ज है।

मेरा गाँव, जहाँ थाना नहीं
सड़क नहीं, कोई अस्पताल नहीं, कोई सरकारी दफ्रतर नहीं
वहां एक क्रांति हुई
सोचना बहुत अजीब लगता है
लेकिन वह भीड़, वह हुजूम, वह जनसैलाब
आज सोचता हूँ तो लगता है कितना सुकून मिला होगा
पिता को आखिरी साँस लेने में

मेरे गाँव में अस्पताल नहीं था और लोग जीवित थे
पूरे गाँव में एक धनीराम ही था
जो सुई देता था
चाहे वह गाय-भैंस-बकरी हों या आदमी
लेकिन उस गाँव में बच्चे पैदा होते थे
और किलकारियां भी भरते थे
यह सब जिस तरह का विरोधाभास है
उसी तरह मेरे पिता भी अजीब थे

मेरे पिता खेतिहर थे और इतिहास के बड़े जानकार थे
मैंने बचपन से ही उनकी अलमारी के खानों में
उनकी जवानी के दिनों की
इतिहास की

 

 

मोटी-मोटी किताबों को देखा था
पिता सुबह-सुबह हनुमान चालीसा पढ़ते
और मैं गोद में ऊंद्घता रहता था
रात में पिता इतिहास में गोते लगाते और
हम सब भाई-बहन पिता के साथ
१८५७ की क्रांति की तफ्रतीश करने निकल जाते
और पिफर उस क्रांति की असपफलता का अवसाद
इन वर्षों को लांद्घ कर
पिता के चेहरे पर उतर आता
पिता गमगीन हो जाते
और पिता की आँखों से आँसू झरने लगते थे

उस गाँव में हवाएँ तेज थीं
लेकिन ज़िन्दगी बहुत ठहरी हुई थी
गाँव में बिजली नहीं थी और मैं
पिता को अपने कान में पिफलिप्स का रेडियो लगाये
हर रोज देखा करता था
उस रेडियो पर पिता ने चमड़े का एक कवर चढ़ा रखा था
जिसे वे बंडी कहते थे

उसी रेडियो पर पिता ने
इंदिरा गाँधी की हत्या की खबर सुनी थी
उसी रेडियो पर पिता ने
राजीव गाँधी की हत्या की भी खबर सुनी थी
आज पिता जीवित होते तो देश से जुड़ने का सहारा
आज भी उनके पास रेडियो ही होता
वह रेडियो आज भी हमारे पास है
और आज भी द्घुप्प अंधेरे में बैठकर हम
उसी रेडियो के सहारे
इस दुनिया को भेदने की कोशिश करते हैं

पिता के साथ मैं खेत जाता
और वहाँ मेरा कई देशी उपचारों से साबका पड़ता
पिता का पैर कटते और मिट्टी से
उसे ठीक होते मैंने देखा था
गहरे से गहरे द्घाव को मैंने वहाँ
द्घास की कुछ खास प्रजाति के रस की
चंद बूंदों से ठीक होते देखा था
दूब का हरा रस टह-टह लाल द्घाव को कुछ ही दिनों में
ऐसे गायब कर देता जैसे कुछ हुआ ही नहीं था

वह हमारा गाँव ही था जहां
बच्चों के जन्म के बाद उसकी नाल
हसुए को गर्म कर उससे काटी जाती थी

पिता जब तक जीवित रहे माँ बच्चा जनती रही
माँ ने ग्यारह बच्चे पैदा किए थे
जिनमें हम तीन जीवित थे
आठ बच्चों को पिता ने अपने हाथों से दपफनाया था
और पिता क्या उस गाँव का कौन ऐसा आदमी था
जिसने अपने हाथों से
अपने बच्चों को दपफनाया नहीं था।

हमारा गाँव कोसी नदी से द्घिरा था
और पिता के दुख का सबसे बड़ा कारण भी यही था
पिता १८५७ की जिस क्रांति के असपफल होने पर
जार-जार आँसू बहाते थे
उन्हीं आँसुओं से उस गाँव में हर साल बाढ़ आती थी
कोसी नदी का प्रलय हमने करीब से देखा था
उस नदी के सहारे आये विषैले साँप
पानी के लौटते-लौटते दो-तीन लोगों को तो
अपने साथ ले ही जाते थे हर साल।

वह कोसी नदी मेरे पिता को
अपने खेत पर मेहनत करने से रोकती थी
एक पफसल कटने के बाद मेरे पिता
बस उस खेत पर कोसी नदी के मटमैले
पानी का इंतजार करते थे
पिता अपने खेत की आड़ पर बैठे रहते थे
और कोसी नदी का पानी
धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ता था
पहले एक पतली धार से पानी धीरे-धीरे द्घुसता था
और पिफर एक दहाड़ के साथ।

उसी कोसी नदी के किनारे जो जगह थी
और जहां बहुत दिनों तक सूखा रहता था
मेरे पिता ने अपने आठों बच्चों को वहीं दपफनाया था
और पिता ही क्या गाँव के हर आदमी ने अपने बच्चों को
वहीं दपफनाया था
कहते थे अंधेरी रात में वहाँ एक औरत दिखती थी
एकदम ममतामयी
एक-एक कब्र से बच्चों को निकालकर दूध पिलानेवाली
अपनी पायलों की रुनझुन रुनझुन की आवाज़ के साथ

हमारे गाँव के सारे बच्चे तब तक
उस कब्र में सोते रहते थे और उस ममतामयी माँ के
आँचल से दूध पीते रहते थे
जब तक कोसी नदी अपने साथ उन बच्चों को
वापस नहीं ले जाती थी
कोसी नदी की बाढ़
उस जगह को खाली करती
और पिफर कुदाल चलाने पर वहाँ कभी भी
बच्चे के खच्च से कटने की आवाज़ नहीं आती।

मेरे पिता जो इतिहास के जानकार थे
और जिनकी आँखों से १८५७ की असपफल क्रांति को याद कर
झरते थे झर-झर आँसू
इस ठेठ गाँव में चाहते थे एक क्रांति
ठाकुर रणविजय सिंह के खिलापफ
जिनके नाम से इस कोसी नदी के विनाश को रोकने के लिए
बहुत पहले निकला था टेंडर
जिनके नाम से सरकारी खजाने से निकला था
सरकारी अस्पताल बनने का पैसा।

वह खुला मैदान हटिया की जगह थी
जहां मेरे पिता हर वृहस्पतिवार को तरकारी के नाम पर
खरीदा करते थे झींगा और रमतोरई
लेकिन पिता ने तब कभी सोचा नहीं था कि
ठीक उसी जगह पर एक दिन गिरेगी उनकी लाश
उनकी वह पथरायी लाश जो मुझे आज भी याद है
जस की तस।

पिता उस हटिया में हर गुरुवार को सब्जी खरीदते थे
और अन्य दिनों लोगों को करते थे इकट्ठा
वे कहते थे हमारी हल्की आवाज़
एक दिन गूंज में तब्दील हो जायेगी
पिता कहते थे, उस विषैले साँप के डसने से पहले
हमें ही खूंखार बनना होगा
उसी हटिया वाले मैदान के बगल वाले कुंए की
जगत पर बैठकर
पिता हुंकार भरते थे
पिता का चेहरा लाल हो जाता था
और उनकी लाली से उस कुंए का पानी भी
लाल हो जाता था
पिता कहते थे हमें कम से कम ज़िंदा रहने का हक तो है ही
तब कुंए का पानी भी उनके साथ होता था
और वह भी उनकी आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाकर
बाहर पफेंकता था
पहली बार जब पिता नहीं जानते थे
तब इस दूसरी आवाज़ पर अन्य लोगों के साथ
पिता भी चौंके थे।

पिता की हिम्मत बढ़ती गई थी
उनके साथ कुछ आवाजें़ थीं
कुछ इच्छाएँ और कुंए के पानी का साथ
तब पिता बहादुर शाह ज़पफ़़ऱ बन गए थे
एक क्रांति का अगुवा
लेकिन पिता बहादुर शाह जपफ़र जितने बूढ़े नहीं थे
न ही बहादुर शाह ज़पफर के जैसी उनकी दाढ़ी ही थी।

जिस दिन पिता अपनी सेना के साथ
ठाकुर रणविजय सिंह की हवेली पर
अपने सवाल का उत्तर मांगने जाने वाले थे उसी दिन
पुलिस आयी थी
हमने पहली बार उसी दिन अपनी आँखों के सामने
नंगी पिस्तौल उस दारोगा के हाथ में देखी थी
वह पिस्तौल एक खाकी रस्सी से
उसकी वर्दी से गुंथी थी
और पिफर पिता को गोली दाग दी गयी थी

गोली एक हल्की कर्र की आवाज़ के साथ
पिता के पफेपफड़े की हड्डी को तोड़कर द्घुसी होगी
और पिता एक गोली में ही मर गये
उसी हटिया में जहाँ वे तरकारी खरीदते थे
दारोगा की उस एक गोली ने पिता की ही नहीं
उस गाँव की उम्मीदों की भी मार दिया था

पिता का चेहरा विकृत नहीं हुआ था
लेकिन उस पर बहुत देर तक मक्खियाँ भिनभिनाती रही थीं

हमें पिता की लाश के पास आने नहीं दिया गया था
और पिफर उस लाश को कहीं गायब कर दिया गया था

वह दारोगा जो इस गाँव के इतिहास में
सदा याद रखा जायेगा
को यह मालूम नहीं है कि उसने उस दिन मेरे पिता को नहीं
बहादुर शाह ज़पफ़र को मार दिया था।

मेरे पिता की लाश का क्या हुआ
कुछ पता नहीं चला
उन्हें जलाया गया, दपफनाया गया
कोसी नदी में पफेंक दिया गया
या पिफर चील कौओं ने उनकी बोटी-बोटी नोच ली
हम द्घरवालों के साथ-साथ
हमारे गाँव वालों को भी कुछ मालूम नहीं है

लेकिन दारोगा की उस गोली के बावजूद
मेरे पिता मर नहीं पाये
मेरे पिता मर नहीं पाये लेकिन इसलिए नहीं कि
उन्होंने गाँव की क्रांति के लिए
इस अनुपजाऊ भूमि पर क्रांति का बिगुल पफूंका था
बल्कि इसलिए कि मेरे पिता की मौत ने
सभी के दिलों में एक भयावह डर भर दिया था
सबके कानों में पिता के पफेपफड़े की हड्डियों की
कर्र से टूटने की छोटी सी आवाज़
आज भी जस की तस बजती है

मेरे पिता को मरे वर्षों गुजर गये
लेकिन आज भी सब वैसा ही है
हवाएँ तेज हैं लेकिन गाँव ठंडा है
उस हटिया में जब भी तरकारी लेने जाता हूँ तब हर बार
पिता की लाश से टकराता हूँ
हर बार पिता मुझसे कहते हैं
कम से कम तुम अपनी आवाज़ को ऊंचा करो।

मेरे गाँव में आज भी बिजली, अस्पताल, थाना नहीं है
और न ही कोसी नदी की
विनाशकारी बाढ़ को रोकने का उपाय है
अब मेरे सहित मेरी उम्र के सभी लोगों के बच्चे
पट-पट कर मरना शुरू हो गये हैं
और पिफर वही सब
कोसी नदी के किनारे दपफनाने की प्रक्रिया
रात में दूध पिलाने वाली माँ का आना
और बच्चों का उस ममतामयी माँं का इंतजार करना
और पिफर वही कोसी नदी का अपने लौटते पानी के साथ
बच्चों को अपने साथ ले जाना

मैं अपने रेडियो पर दुनिया की चमक के बारे में सुनता हूँ
और सोचता हूँ इस बाढ़ के मंजर को सुनना और देखना
कितना आनन्द देता होगा उनको

मैं जिस गाँव में हूँ सचमुच इस दुनिया की चमक के सामने
इस गाँव के बारे में सोचना भी बहुत कठिन है
मैं अभी ज़िन्दा हूँ
लेकिन मुझे अपने पिता का मृत चेहरा याद है
इसलिए इस गाँव में कोई क्रांति नहीं होगी।

 
 
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