अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
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कविता
 
 
विमल कुमार
 

जन्म : ९ दिसंबर १९६०

समकालीन कविता के प्रमुख हस्ताक्षर। 'सपने में एक औरत से बातचीत' ;१९९२द्ध 'यह मुखौटा किसका है' ;२००२द्ध 'तुम रोशनी बनकर आओगी आर्या' कविता-संग्रह प्रकाशित। 'चोर-पुराण' और 'रावण को गुस्सा क्यों आता है' व्यंग्य-संग्रह। एक उपन्यास 'चांद/आसमान डॉट कॉम'।
यूनीवार्ता में विशेष संवाददाता।
१३/१६१०, वसुंधरा, गाजियाबाद, उ.प्र.
मो. ९९६८४००४१६

 
एक पिफल्म जो किसी के जीवन में अचानक कुछ कुछ यथार्थ में बदल जाए
 

ज्वैलथीपफ पिफल्म में भी
तुम ही थी
और तुम्हारा नाम वही था
जो उस जमाने की मशहूर अभिनेत्राी वैजयंतीमाला का था
मैं वही विनय था
जो तुमसे मिलता रहा
गाहे-बगाहे, किसी न किसी प्रसंग में
कभी-कभी तो संयोगवश भी
यह जानते हुए
कि तुम मुझसे नहीं किसी अमर से प्यार करती हो
जो था ही नहीं कहीं भी
पर पूरी पिफल्म में यह भ्रम बना रहा
वह है कहीं छिपा हुआ किसी ओट में
और एक दिन प्रकट हो जाएगा
अकस्मात्‌

 

 

 


और तुम मुझे
वही अमर समझती रही
जिसने तुम्हें धोखा दिया था
और तुमने कहा था मुझसे एक दिन
बहुत ही दुख भरे स्वर में
जिससे मैंने प्यार किया
उसने ही मुझे धोखा दिया
मर्द होते ही हैं धोखेबाज
पर मैं धोखेबाज नहीं था
नहीं था हीरों का चोर
पर अखबार वाले यही छापते रहे दिन रात
मैं ही हूँ वह ज्वैलथीपफ
मैं पिटते-पिटते भी बचा था
पर इस तरह की पत्राकारिता से
एक भ्रम जरूर पैदा हुआ था अपने मुल्क में
अपने समय के कई सवालों पर
और शायद यही

 
 

कारण था
तुम मुझ पर भरोसा नहीं कर पायी
करीब पैतांलिस साल बाद
वह पिफल्म एक दिन मेरे जीवन से अचानक
कुछ-कुछ यथार्थ में तब्दील हो गयी
जब तुम्हारी उम्र भी
४५ वर्ष की हो गयी थी शायद
और तुम्हारे दो बच्चे भी हो गये थे
जिनकी परवरिश करना बहुत मुश्किल हो गया था
निजीकरण के दौर में
मैं तुम्हारी उम्र का अनुमान
इसलिए लगा रहा हूँ
तुमने कभी मुझे बताया नहीं
तुम्हारा जन्म किस साल में हुआ था
एक दिन तुमने यूं ही बताया था
१८ मार्च है जन्मदिन
बातों-बातों में
जब मैंने कहा था
उस दिन इसी तारीख में
१९७४ में मेरे शहर में आग लगी थी
और कई लोग पुलिस की गोलियों से छलनी हुए थे
मेरे पिता भी बाल-बाल बचे थे
जब वे सब्जी खरीदकर लौट रहे थे द्घर
तब तुमने बताया था
कि १८ मार्च को मैं हर साल छुट्टी ले लेती हूँ
और अपने बच्चों के साथ ही रहती हूँ
जाती नहीं कहीं
क्योंकि मेरे पति बिस्तर से उठ नहीं सकते
मैंने पिफर बताया था तुम्हें
बिस्तर से मैं भी कहाँ उठ पाता हूँ
१९७४ को १८ मार्च के दिन
आँसू गैस में जब द्घिरा
तो आज तक उससे बाहर नहीं निकल पाया
आँखों के सामने आज भी उसी तरह अंधेरा छाया है
और भागते हुए मेरी चप्पल टूटी
वह आज तक नहीं बन पायी
और वह दिन एक दुःस्वप्न की तरह अंकित है
मेरी स्मृति में
आज भी मुझे याद है वह सब कुछ
पर जिस मकसद से वह आग लगी थी
उसका सिपर्फ असर इतना हुआ
कि दो जन मुख्यमंत्राी बन गए
तब से हर साल किसी न किसी शहर में
कोई आग लग जाती है
गोलियां चलती हैं
और लोग मारे जाते हैं
और लोगों की चप्पलें उसी तरह टूट जाती हैं
भागते हुए धुएँ के गोलों के बीच से
पर अब जब मैं १८ मार्च को याद करता हूँ
तो उस पिफल्म की वह नायिका
याद आती है
जिसका नाम वही है
जो तुम्हारा नाम है
जिसे एक सपना बार-बार रुलाता था
और उसने यह दर्द भरा गाना भी गाया था
मैं आज पिफर एक धुएँ से द्घिर गया हूँ
इस बार आग शहर में नहीं
बल्कि मेरे सीने में लगी है, गोली भी उसमें धंसी है
जैसे विनय के भीतर भी
लग गयी थी आग
अपनी नायिका से मिलते हुए
बार-बार
विनय की आँखों में भी जागा था एक सपना
जो कभी पूरा नहीं होता है
किसी किसी की ८िांदगी में
क्योंकि जिं़दगी की हकीकत पिफल्म से अलग होती है
चाहे पिफल्म कितना भी यथार्थ में बदल जाए
मैं वह गाना आज भी नहीं भूला हूँ
क्योंकि जिस दर्द से गाया गया था
उसी दर्द से तुमने भी एक दिन मेरे सामने गाया था
नहीं भूला हूँ मैं तुम्हारा चेहरा
क्योंकि गाते वक्त वह पीला पड़ गया था
जैसे कोई पत्ता पीला हो जाता है पतझर में टूटने से पहले
या कोई शाम पीली हो जाती है कभी-कभी
चांद निकलने से पहले
पर अब मैं तुम्हें यह भी बताना नहीं चाहता
कि कितने आँसू आते हैं मेरी आँखों में
जब मैं सोचता हूँ
तुम्हारी तरह कई स्त्रिायां पफंसी हैं
अपने समय के जाल में
मछलियों की तरह तड़पफड़ाती
रेत पर छटपटाती
मैं जानता हूँ
तुम मुझे अभी भी अमर ही मानती हो
हीरे चुराने वाला अमर
पर मैं तो विनय हूँ
शुरू से आखिर तक विनय
वैजयंती माला।
एक दिन तुम जब
बूढ़ी हो जाने पर
कांग्रेस के महाधिवेशन में मिली थी
तालकटोरा स्टेडियम में
जब जवाहरलाल नेहरू से बड़ा योगदान
राजीव गाँधी का बताया जा रहा था
तब मैंने सोचा
कि तुम्हें बता दूँ
मैं अमर नहीं हूँ
पर उस दिन चैनल वालों ने
तुम्हारा बाइट लेने के लिए तुम्हें द्घेर लिया बुरी तरह
मैं कह नहीं सका उस दिन भी
उपफ! ये कैमरे वाले भी अजीब प्राणी हैं
जो मक्खियों की तरह टूट पड़ते हैं
भूख आदमी को कभी भेड़िया तो
कभी मक्खी भी बता देती है
पर मैंने उस दिन देखा
तुम्हारे चेहरे की झुर्रियाँ लटक आयी थीं
ढल गया था यौवन तुम्हारा
जो नाम तुम्हारा था
उस पिफल्म में
वही नाम उसका भी है
जिसे मैं बहुत प्यार करता हूँ
मैं तो उसे तुमसे
मिलवाना भी चाहता था
और यह बात बताना चाहता था
जो चरित्रा तुमने अदा किया था
वह दरअसल मेरी प्रेमिका का ही चरित्रा था
कहीं कहीं कुछ-कुछ अलग
पर इतना अंतर तो होता ही है
पिफल्म और जीवन में
आज मैं क्या तुमसे
एक बार गुजारिश कर सकता हूँ
तुम वह पिफल्म एक बार
देख लो
अगर तुमने नहीं देखी हो तो
और अगर देखी हो तो
पिफर से देख लो कि किस तरह तुम उस नायिका में तब्दील
होती जा रही हो धीरे-धीरे
मैंने पिछले १८ मार्च को ही
जी.टी.वी. पर वह पिफल्म देखी थी
दोबारा
तो मेरी आँखों में आँसू आ गए
कैसे तुम अभी भी एक दुष्चक्र में पफंसी हो
एक गिरोह के जाल में
अगर उस पिफल्म को ठीक से देखो
तो तुम्हें यकीन हो जाएगा
मैं विनय ही हूँ
जो द्घटनाओं के अजीब से चक्र में उलझता चला गया
अपनी पहचान को
सही साबित करने के प्रयास में
बार-बार अमर बताया गया अपने इतिहास में
मैं अमर नहीं हूँ
मैं तो विनय हूँ वैजयंती माला।
यह धोखा तुम्हें भी पहली बार नहीं हुआ है
तमाम स्त्रिायाँ इसी तरह धोखा खाती रही हैं
अपने वक़्त से
पर हर मर्द अमर की तरह धोखेबाज नहीं होता
वैजयंती माला!
पर पिफल्म के आखिर में
तुम भी समझ गयी थी
कि सच क्या है
और झूठ क्या है
वाकई, कई बार इस अंतर को हम
मृत्यु तक नहीं समझ पाते हैं
और अपनी पूरी जिं़दगी इसी तरह
झूठ और सच के पर्दे के बीच झूलते हुए
गुजार देते हैं
पर जो पिफल्म
मेरे जीवन का कटु यथार्थ बन गयी है
उसमें मेरी नायिका
कब समझ पाएगी
कि मैं अमर नहीं
विनय हूँ
जो एक डूबते हुए जहाज की तरह
समुद्र के सीने को चीर कर
आगे बढ़ता जा रहा है
अपने किनारे की खोज में
पर यह समुद्र भी कैसा है
जिसका कोई किनारा ही
नहीं है
पर विनय को उम्मीद है
वैजयंती माला!
कि एक दिन उसे किनारा मिल जाएगा
आखिर है आदमी अपनी ज़िंदगी
किसी न किसी उम्मीद के सहारे ही तो जीता है
वैजयंती माला!
तुम भी एक उम्मीद का नाम हो
इस जलते-बुझते अंधेरे में!
मैं जब भी तुम्हें मंच पर
कराहते हुए नृत्य करते देखता हूँ
तो काँप जाता हूँ
एक हँसती हुई नर्तकी के चेहरे के पीछे भी
इतना दुख छिपा होता है।...

 
 
 
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