अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
खबरनामा
अमरकांत ज्ञानपीठ से सम्मानित
 

वरिष्ठ कथाकार अमरकांत १३ मार्च को ४५वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किए गए। इलाहाबाद के ब्रजमोहन सभागार में भारतीय ज्ञानपीठ की तरपफ से प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने अमरकांत को पुरस्कार सौंपा। पुरस्कार स्वरूप उन्हें शॉल, श्रीपफल, वाग्देवी की प्रतिमा, प्रशस्ति-पत्रा और पाँच लाख की सम्मान राशि भेंट की गयी। इस मौके पर अमरकांत ने कहा-ज्ञानपीठ साहित्य का प्रतिष्ठित पुरस्कार है। इसे पाकर

   
मैं प्रसन्न हूँ। लेकिन यह मेरे संतोष की मंजिल नहीं, बल्कि चुनौती का नया द्वार है। इस चुनौती को मैं स्वीकार करता हूँ ओर वादा करता हूँ कि कुछ नया और बेहतर करने की कोशिश करूँगा। मुख्य अतिथि नामवर सिंह ने कहा कि आज की द्घटना ऐतिहासक है। पहली बार भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली के तख्त से उतरकर इलाहाबाद आया है लेखक को सम्मानित करने के लिए। उन्होंने कहा- मैं कई बार यहाँ आया हूँ। अमरकांत को पुरस्कृत होते देख मुझे सुख मिल रहा है क्योंकि इलाहाबाद की समृ( तिकड़ी अमरकांत, शेखर जोशी और मार्कण्डेय को कभी भी अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। मार्कण्डेय तो खैर नहीं रहे लेकिन अब तमन्ना है कि शेखर जोशी भी इसी तरह सम्मानित हों।
 
राजेन्द्र यादव का लोक सम्मान
 
'हंस' के संपादक राजेन्द्र यादव को दिया गया। लोक सम्मान से नवाजा गया। लीक से हटकर यह लेखकों और पत्राकारों की ओर से दिया गया। वरिष्ठ कथाकार कृष्णा सोबती और प्रसि( आलोचक नामवर सिंह ने शॉल ओढ़ाकर उन्हें सम्मानित किया। सम्मान स्वरूप लेखकों और पत्राकारों की ओर से एकत्रा की गयी एक लाख रुपये की राशि हंसाक्षर ट्रस्ट में जमा की जाएगी। राजेन्द्र यादव के स्वास्थ्य को देखते हुए सम्मान उनके द्घर के बाहर खुले प्रांगण में किया गया।
कृष्णा सोबती ने अपने संबोधन में कहा कि 'हंस' के जरिए राजेन्द्र यादव ने बहुत बड़ी दुनिया बनाई है। वह अगले पचास साल तक चलने वाली है। उन्होंने कहा कि राजेन्द्र यादव ने हिन्दी समाज के लिए जितना किया और लेखकों तथा पाठकों को जो दिया वह काबिले तारीपफ हे। वहीं नामवर सिंह ने कहा कि जिंदगी जिंदादिली का नाम है और जिंदादिली राजेन्द्र यादव का नाम है। यादव के साथ १९५२ में कोलकाता में प्रगतिशील लेखक संद्घ के सम्मेलन में पहली मुलाकात का उल्लेख करते हुए कहा कि उसके बाद उनसे मुलाकातों का सिलसिला चलता रहा। उन्हें इतने दिनों तक जिंदा रहने की ताकत राजेन्द्र यादव से मिली है। कार्यक्रम का संचालन कर रहे कथाकार संजीव ने बताया कि लोक सम्मान की यह योजना छह-सात महीने पहले बनी थी। सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज ने अपनी ओर से ३१ हजार रुपए की राशि हंसाक्षर ट्रस्ट में जमा करने की द्घोषणा की। पत्राकार मुकेश कुमार, अजीत मंजुम तथा साधना अग्रवाल, ज्योति कुमारी आदि इस मौके पर उपस्थित थे।
 
अज्ञेय की कविताओं का नाट्यपाठ
 
नटरंग प्रतिष्ठान ने हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार अज्ञेय की जन्मशती के अवसर पर उनकी कुछ कविताओं का नाट्यपाठ दिनेश खन्ना के निर्देशन में किया। आयोजन २१ मार्च को शाम ६ः३० बजे लिटिल थियेटर ग्रुप सभागार नयी दिल्ली में हुआ। अज्ञेय की कई प्रसि( और अपेक्षाकृत अलक्षित कविताएँ शामिल की गईं और उनके श्रेष्ठ उपन्यास 'शेखर : एक जीवनी' के दो प्रमुख चरित्राों के इर्दगिर्द इस प्रस्तुति में कविता कथा बुनी गयी। नाट्य प्रस्तुति के पहले अज्ञेय पर उनके जीवन काल में ही बनायी गयी एक पिफल्म का एक छोटा सा अंश दिखाया गया।
 
देवीशंकर अवस्थी सम्मान जितेन्द्र श्रीवास्तव को
 
समकालीन हिन्दी आलोचना के क्षेत्रा में दिया जाने वाला यह प्रतिष्ठित सम्मान इस बार डॉ. जितेन्द्र श्रीवास्तव को उनकी पुस्तक 'आलोचना का मानुष-मर्म' पर दिया जा रहा है। यह निर्णय पाँच सदस्यीय निर्णायक समिति की बैठक में वरिष्ठ कवि अजित कुमार, प्रो. नित्यानंद तिवारी, अशोक वाजपेयी, और प्रो. अर्चना वर्मा द्वारा सर्वसम्मति से लिया गया। राजेन्द्र यादव अस्वस्थ होने के कारण उपस्थित नहीं हो सके। यह सम्मान हिन्दी के प्रख्यात आलोचक स्वर्गीय डॉ. देवीशंकर अवस्थी की स्मृति में उनके परिवार द्वारा वर्ष १९९५ में स्थापित किया गया है। अब तक सह सम्मान क्रमशः मदन सोनी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, विजय कुमार, सुरेश शर्मा, शंभुनाथ, वीरेन्द्र यादव, अजय तिवारी, पंकज चतुर्वेदी, अरविन्द त्रिापाठी, कृष्णमोहन, अनिल त्रिापाठी, ज्योतिष जोशी, प्रणयकृष्ण, प्रमिला के.पी. और संजीव कुमार को मिल चुका है। जितेन्द्र ने इस पुस्तक में अपने समय के साहित्य को समझने की कोशिश की है। उनके लिए आलोचना लिखना जितना सुखद है उतना ही मुश्किल भी। पिफर भी अपने समय के कतिपय साहित्यकारों की उन्होंने चर्चा करते हुए कविता, कहानी, आलोचना और संवाद जैसी विधाओं पर विचार किया है। प्रेमचन्द को वे भारतीय समाज की आँखें खोलने वाला साहित्यकार बताते हैं।
 
'उद्भ्रांत में एक आग है'
 
 
हिन्दी का कोई भी रचनाकार उपेक्षित न हो जाये इसके लिए आवश्यक है कि साहित्यिक संस्थाएँ आगे बढ़कर अपनी सक्रिय भूमिका अदा करें। यह बात विख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने वरिष्ठ कवि एवं लेखक उद्भ्रांत की तीन नई पुस्तकों, सृजन की भूमि, ;संस्मरणात्मक निबंधद्ध, आलोचना का वाचिक ;वाचिक आलोचनाद्ध, ब्लैकहोल ;काव्य नाटकद्ध तथा कवि उद्भ्रांत के चर्चित महाकाव्य 'त्रोता' पर दलित दृष्टि से लिखे गये जानेमाने दलित चिंतक कंवल भारती के आलोचना ग्रंथ 'त्रोता-विमर्श और दलित-चिंतन' का लोकार्पण करते हुए कहीं। इसी अवसर पर गत २२ पफरवरी, २०१२ को नई दिल्ली में 'लोकार्पण की भूमिका और मिथकीय काव्य और नाटक का दलित विमर्श' विषय पर अपना अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए श्री सिंह ने कहा कि उद्भ्रांत के भीतर एक आग है जिसे वे निरंतर अपनी रचनात्मक प्रतिभा से साबित करते रहते हैं। प्रो. बली सिंह ने कहा कि लोकार्पण में शामिल पुस्तकों की समग्रता को ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उद्भ्रांत का व्यक्तित्व बहुआयामी है। इसके मूल में उनके चिंतन का पफैलाव है जो 'त्रोता' से शुरू होकर 'सृजन की भूमि' तक अपना विस्तार लिए हुए है। प्रो. हेमलता महिश्वर ने कंवल भारती की पुस्तक 'त्रोता-विमर्श और दलित चिंतन' के शीर्षक को औचित्यहीन तथा अप्रासंगिक बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया। उनका स्पष्ट मानना था कि त्रोता के मिथकीय संदर्भों को दलित चिंतन से कैसे जोड़ा जा सकता है?
प्रो. अभय मौर्य ने डॉ. हेमलता महिश्वर के दलित चिंतन विषय की स्थापना से अपनी असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि किसी भी महाकाव्य के मूलस्वरूप के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ उचित नहीं है। डॉ. हेमंत जोशी ने कहा कि 'आलोचना का वाचिक' विगत १५ वर्ष की अवधि में विभिन्न गोष्ठियों में हिन्दी के शीर्ष विद्वानों के मौखिक विचारों का प्रथम महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जबकि 'सृजन की भूमि' किसी भी रचनाकार की भूमिकाओं का पहला ऐसा संकलन है जिसमें लेखक ने साहित्य, समाज और जीवन को केन्द्र में रखकर अपनी बात रखी है। 'यु(रत आम आदमी' त्रौमासिक पत्रिाका की संपादक सुश्री रमणिका गुप्ता और जानेमाने आलोचक डॉ. कर्ण सिंह चौहान ने भी इस अवसर पर अपने विचार रखे।
 
प्रतिरोध की जनधर्मी चेतना
 
 
विनय मिश्र की ग़ज़लों में हिन्दी ग़८ालों की आधुनिक संवेदना का स्वर है, प्रतिरोध की जनधर्मी चेतना है और इस संग्रह की ग़८ालें अपने समय के दुख और बेचैनी को गहराई से दर्ज करती है। अलवर ;राज.द्ध की साहित्यिक संस्था 'नया आयाम' द्वारा आयोजित पुस्तक लोकार्पण समारोह व विमर्श सत्रा की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि, जनधर्मी आलोचक व अलाव पत्रिाका के संपादक रामकुमार कृषक ने ये विचार व्यक्त किये। मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद ख्यातिलब्ध कथाकार, कवि और आलोचक ज्ञानप्रकाश विवेक ने कहा कि विनय मिश्र की ग़८ालों में अपने समय से टकराने की गूंज सुनायी देती है। वरिष्ठ कवि व आकाशवाणी दिल्ली के निदेशक लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने कहा कि विनय मिश्र की ग़८ालें जिंदगी में जूझने का हौसला देती हैं। इस अवसर पर ख्यातिलब्ध कवि देवेन्द्र आर्य, वरिष्ठ ग़८ालकार जहीर कुरेशी वरिष्ठ समीक्षक जीवन सिंह आदि उपस्थित थे।
 
हरिसुमन बिष्ट को शैलेश मटियानी स्मृति कथा पुरस्कार
 
कथाकार, उपन्यासकार हरिसुमन बिष्ट को शैलेश मटियानी स्मृति चित्राा कुमार कथा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष २०११ का यह सम्मान मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सौजन्य से दिया गया। श्री बिष्ट को सम्मानस्वरूप शॉल, श्रीपफल, प्रशस्ति पत्रा और ११ हजार रुपये की राशि भेंट की जाएगी। उनके अब तक 'ममता', 'आसमान झुक रहा है', 'होना पहाड़', 'मछरेगा', बिजुका आदि कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। नोएडा के निठारी कांड की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उनका उपन्यास 'बसेरा' पिछले साल प्रकाशित हुआ है।
 
 
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