अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
लद्घु कथा
 
द्घुड़ चढ़ी
के.एस.तूपफ़ान
 

बात पुराने ८ामाने की, अंग्रेजी राज के समय की है। उस समय हल्के काम की सारे दिन की म८ादूरी लगभग १०-१२ आने तथा भारी काम की एक रुपया हुआ करती थी। नत्थू, पत्नी तथा एक पुत्रा के साथ मेहनत म८ादूरी कर, अपना जीवन ठीक-ठाक सा बिता रहा था। किंतु लोगों को द्घोड़ी पर बैठा देखकर उसके दिल में एक हूक सी उठती थी कि काश, वह भी द्घोड़ी की सवारी करता। दो-दो, चार-चार पैसे बचाकर नत्थू ने एक वर्ष में लगभग पच्चीस रुपये जमा कर लिए। उसने अपने मन में सोचा कि अब उसकी तमन्ना पूरी हो जाएगी। अतः वह रुपये लेकर द्घोड़ी खरीदने को द्घर से चल दिया। उधर क्षेत्रा भ्रमण पर द्घोड़ी से आए थानेदार की द्घोड़ी, रास्ते में बिहाली। द्घोड़ी का नवजात शिशु इतना कम८ाोर था कि उससे उठा/चला नहीं जा रहा था। बच्चे के प्यार की कशिश के कारण द्घोड़ी भी वहीं अड़कर खड़ी हो गई थी। इस अचानक आई मुसीबत के कारण थानेदार व दोनों पुलिस कांस्टेबल आपफ़त में पफंस गये थे। अब वे थाने लौटें तो कैसे? यों द्घोड़ी के बच्चे को बैठाने के लिए उन्होंने एक टोकरी का प्रबंध कर लिया था। मगर टोकरी को सिर पर उठाकर चले कौन?
तभी वहाँ नत्थू पहुँच गया। बीच रास्ते में पुलिस को खड़ा देख वह पहले ही द्घबरा गया था कि कहीं किसी मुसीबत में न पफंस जाये। लेकिन वहाँ से बचने का कोई अन्य रास्ता भी नहीं था। सामने मैले- कुचैले कपड़ों में एक आदमी को देखकर एक कांस्टेबल ने रौब से पूछा ''कौन है बे? क्या नाम और क्या जाति है तेरी, कहाँ का रहने वाला है?'' नत्थू ने हाथ जोड़कर मिमियाती आवा८ा में सब कुछ बता दिया। यह पता चलते ही कि नत्थू दलित है, कांस्टेबल ने कड़क कर कहा ''अबे चल, यह टोकरी सिर पर उठाले, और इस द्घोड़ी के बच्चे को थाने में छोड़कर, तब आगे जाना।''

नत्थू के सामने दूसरा कोई चारा नहीं था। उसने द्घोड़ी के बच्चे से लदी टोकरी उठाकर सिर पर रख ली। चलते-चलते उसने मन ही मन भगवान से शिकायत की ''तू भी खूब तमाशे दिखलाता है नीली छतरी वाले। द्घोड़ी मांगी थी चढ़न को, दे दी सिर धरने को।''
 

भनेड़ा- २४६७३१, जिला बिजनौर ;उ.प्र.द्ध
मो. ९४५६२४७६७७

 
 
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