अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
लम्बी कहानी
दास्तानगो
प्रियंवद

जन्म : २२ दिसंबर १९५२

चार उपन्यास 'वे वहाँ कैद हैं', 'परछाईं नाच', 'छट्टी के दिन का कोरस', 'धर्मस्थल'।
तमाम कहानियां 'आईनाद्घर' के नाम से दो खण्डों में प्रकाशित। इतिहास पर दो पुस्तकें 'भारत विभाजन की अंतःकथा', 'भारतीय राजनीति के दो आख्यान' प्रकाशित। 'अनवर' व 'खरगोश' पर पिफल्में। 'आकार' पत्रिाका का विगत बारह वर्षों से नियमित
प्रकाशन।
१५/२६९ए सिविल लाइन्स, कानपुर-२०८००१
मो-९८३९२१५२३६

अंतिम ांसीसी उपनिवेश के अंतिम अवशेषों पर, पूरे चाँद की रात का पहला पहर था जब यह द्घटना द्घटी। समुद्र की काली और खुरदरी चट्टानों पर चिपके केकड़े किनारे की ओर सरकना शुरू कर चुके थे।
उस रात और भी बहुत कुछ विलक्षण द्घटा था, या यूं कहें, ऐसा कुछ जो अक्सर नहीं होता। मसलन उस रात पेड़ों की शाखों पर उलटा लटकने से पहले चमगादड़ों ने इतना ज्यादा पेशाब किया था, कि सुबह उसके गीलेपन को देखकर किसानों में भय पफैल गया था कि आकाश से अगर इतनी अधिक ओस गिरी तो उनकी पफसलें नष्ट हो जाएँगी। उसी रात तीन जवान लड़कियाँ टमाटर की चटनी में डूब कर मर गयीं। पानी की बूंदें खिड़की के काँच पर गिरने के बाद ऊपर की ओर जाने लगीं और कई चुम्बनों में विस्पफोट हो गए। चमकती चाँदनी के बीच पफंसी हवाओं में ताबीजों से छूटे हुए अनेक अमंगल कामनाओं से मंत्राब( जादू तैर रहे थे जिनकी हत्यारी पफुसपफ़साहटें शास्त्राीय राग में गाती हुयी चिड़ियों की तरह लग रहीं थीं।
पर यह सब कहीं, किसी इतिहास में दर्ज नहीं हुआ, उसी तरह, जिस तरह उस रात उन अवशेषों में द्घटित यह द्घटना भी किसी इतिहास में दर्ज नहीं हुयी।


अगर मछुआरों की छोटी नाव पर किनारे से बहुत दूर खड़े होकर देखा जाए तो पहली नजर में ये अवशेष नहीं दिखते थे। पर सूरज डूबने के बाद जब समुद्र की नमी और नमक से भारी हो चुकी तेज हवाओं के चलने के साथ ही थके सैलानी द्घरों को लौटने लगते... मछलियाँ किनारों की तरपफ आनेलगतीं... केकड़ों और चट्टानों पर सर पटक कर पफेन उगलती लहरों का शोर शुरू हो जाता और चाँद गहरा पीला होने लगता, तब उसकी चाँदनी में खंडहर होती इमारतों का एक ढाँचा दिखता जिसके अंदर कुछ रोशनियाँ भी रहतीं। ये इमारतें उसी तरह रह गयी थीं जिस तरह इन्हें बोरबन राजाओं को उखाड़ पफेंकने वाली ांसीसी क्रांति से बहुत साल पहले, यानी १७३० के आसपास, देश के दक्षिणी हिस्से में उस समय बनाया गया था, जब इनसे बहुत दूर हुगली के किनारे शिवरामपुर में डेनमार्क, चंद्रनगर में ांसीसी और चिनसुरा में हालैंड के व्यापारिक पूंजी द्घराने आ चुके थे, और कलकत्ता नाम का एक नया शहर बस चुका था जिसकी हवा बीमार कर देने वाली, पानी काला और मिट्टी नमी से भरी थी और जिसके पत्थर और चूने से बने पफर्श, और पफर्श से ऊपर तीन पिफट ऊँची दीवारें सीलन से भरी रहती थीं। दक्षिणी समुद्र के इस किनारे पर नमक, काली मिर्च, अपफीम और नील के ांसीसी सौदागरों ने बाजार के साथ इधर-उधर बिखरे राजाओं और नवाबों को अपनी मुट्ठी में करना शुरू कर दिया था। अपने सिपाही, हथियार, सेना तथा सेनानायक रखने शुरू कर दिए थे। समुद्र पर नजर रखने के लिए निगरानी चौकियाँ बना ली थीं। अपने अधिकारियों के द्घर और दफ्रतर बनाए थे। उनके जीवन को पवित्रा और शांत रखने के लिए चर्च और उनकी मृत्यु को स्मृतियों में जीवित रखने के लिए कब्रिस्तान बनाए थे। ये सब अवशेष उन्हीं के थे।
इतिहासकारों को इसका बहुत दुख है कि इस देश में आने वाले ांसीसी सेनानायकों ने यहाँ के बारे में अधिक नहीं लिखा है, सिवाय रे मेडक के, जिसने भी यूं ही कुछ बातें लिख दी हैं। द बोए ांस लौटने के बाद बहुत साल जिंदा रहा पर शेम्बरी के अपने महल में बैठे हुए ग्रान्ट डपफ के साथ गप्पें मारने के अलावा उसने कुछ नहीं किया। जुलाहे के लड़के पेरों को तो कलम छूने से ही नपफरत थी। अलबत्ता इनके हिन्दुस्तानी मुंशियों ने जरूर खजाने की रोकड़, रोजनामचे या दफ्रतरी चिट्ठी पत्राी लिखी हैं जिनको खंगालने पर उस समय की कुछ बूंदें निचोड़ी जा सकती हैं। पर ये सब भी उस सलीके और तरतीब के साथ नहीं लिखी गयी हैं जिस तरह एंडरसन के मुंशी पफकीर खैरुद्दीन ने अपने अमूल्य संस्मरण लिख दिए हैं। इन ांसीसी सेनानायकों ने अगर इस मुल्क में बिताए अपने समय के बारे में स्मृतियों के सहारे ही कुछ लिखा होता, तो इंसानी जिं़दगी के अनेक रंग, अंधेरे उजाले में डूबा काल और उस काल में जीने मरने वाले असंख्य लोगों की दास्तानें हमें मिल जातीं। पिफर भी, उनके मुंशियों ने जो लिखा, जो सरकारी खतो-किताबत होती रही, जो रपटें ांस भेजी जाती रहीं, वहाँ से जो आदेश आते रहे, जो ब्योरे तैयार किए जाते रहे, इंग्लैंड के साथ्ा जो रणनीतियाँ यूरोप में, और उनकी कंपनियों के साथ यहाँ बनती रहीं, मराठों, मुगलों और दक्षिणी नवाबों को जिस तरह धीरे-धीरे निचोड़ा जाता रहा, वे सब, या पिफर, यहाँ के ांसीसी सिपाहियों ने अपने द्घरों को जो खत लिखे और वहाँ से उनके पास जो खत आए और जो बाद में उनकी लाशों की जेबों में, किताबों में या पिफर किसी पत्थर के टुकड़े के नीचे दबे मिले, उन सबको इकट्ठा करके एक बड़ा दस्तावेजी कमरा बनाया गया। देश की आजादी के बाद भी, इस समुद्री किनारे वाले धुर दक्षिणी हिस्से पर कुछ समय के लिए ांसीसी अधिकार बना रह गया। उसी समय इन सारे दस्तावेजों को सिलसिले से इकट्ठा करके, सैकड़ों मजबूत जिल्दों में बाँध कर सुरक्षित रखा गया। ांस में एक संस्था बनायी गयी जिसका मुख्य काम इस देश में ांसीसी साम्राज्य के पाँव जमाने और उसे बढ़ाने वाले महान देश भक्तों का विस्तृत इतिहास लिखना था। ये अवशेष और यह काम इस संस्था की देखरेख में आ गए। इसके लिए उसे ांस से धन मिलता था। भयावह खामोशी, पुराने काग़जों की सीलन की गंध, समुद्र की नमी और नमक से गल चुकी बाहरी दीवारों और लकड़ी की चौखटों वाले इन जर्जर खंडहरों में, इस संस्था का दफ्रतर बनाया गया। इसके उद्देश्य को पूरा करने के लिए ांस से पफारसी भाषा का एक विशेषज्ञ आता रहा।
वह विशेषज्ञ पुरानी पांडुलिपियाँ और दूसरे दस्तावेजों को खंगाल कर ांसीसी साम्राज्य के किसी विशेष कालखंड या किसी द्घटना का एक भव्य और नया इतिहास रचता। वे सारे ांसीसी सेनानायक जो यहाँ के यु(ों में लड़े, वे ांसीसी सिपाही जिनकी कब्रें इस देश में कहीं भी बनीं, वे राजनीतिज्ञ जिन्होंने मराठों, मुगलों और अंग्रेजों के बीच बिछी शतरंज की बाजी को पूरी कुशलता के साथ ांस के हित में खेला और जिन्होंने यहाँ से अकूत धन ांस भेजा या खुद ले गए, उन सबके जीवन-चरित्रा, योगदान और बलिदान को लिपिब( करता। इस व्यक्ति की नियुक्ति संस्था करती। उसे एक तय समय सीमा के अंदर दिए गए विषय पर शोध पूरा करके इतिहास लिखना होता था। यह समय सीमा तीन साल से पाँच साल तक कुछ भी हो सकती थी। इस नियुक्ति पर आने वाला बदलता रहता था और किसी भी देश का हो सकता था। ांसीसी, अंग्रेज, पफारसी का माहिर ईरानी या पिफर कोई हिन्दुस्तानी। इन इमारतों की देखभाल के लिए और इस नियुक्ति पर आने वाले का खाना बनाने और दूसरे काम करने के लिए एक व्यक्ति स्थायी रूप से रहता था। उसके रहने के लिए मुख्य इमारत के पीछे एक छोटा कमरा था।
चार साल के लिए जिस विशेषज्ञ की नियुक्ति इस 'सी शोर' सीमेट्री में दपफन दस तिलंगों की कब्रों और उनके जीवन का इतिहास लिखने के लिए हुयी थी, उसका नाम वामन गुलचीं पुंडरीक था। इसे छोटा करके कभी वाम, कभी गुल, कभी वामगुल और कभी पुंड बना दिया जाता था। उसकी उम्र पचपन के आसपास थी। वह पफारसी और ांसीसी जानता था। तीन सालों से वह यहाँ कब्रों और दस्तावेजों की सीलन और बासी गंध में रह रहा था। उसके पास एक शीशी थी जिसमें वह गहरे काले रंग की पहाड़ी मकड़ी बंद रखता था। उस मकड़ी के जहर में कामोत्तेजना को चार गुना बढ़ाने की शक्ति थी। जब वह गहरी थकान, ऊब और साँसों में बढ़े हुए भारीपन से द्घबरा जाता, तब शीशी में उंगली डालकर इस मकड़ी से अपने को डसवाता। समुद्र के किनारे नीची छत वाले एक जुआद्घर में जुआ खेलता। नीले रंग की खिड़की वाले मकान में रहने वाली और भारी नितम्बों की वजह से विपरीत रति में अलसाकर मैथुन करने वाली एक औरत के साथ रात गुजारता।
उसके सेवक का नाम पाकुड़ था। वह पिछले तैंतीस साल से वहाँ था। उसके पहले उसका पिता वहाँ चालीस साल रहा था। पाकुड़ की उमर तिरपन साल थी। उसके पास ांसीसियों और इस जगह के बारे में पिता से सुने कुछ किस्से थे। पाकुड़ का परिवार वहाँ से आठ मील की दूरी पर रहता था। वह मछली पकड़ता और नमक की खेती करता था। इमारत के एटिक में लगी दूरबीन से पाकुड़ दिन में एक बार अपने द्घर को देख लेता था। वहाँ अपनी बीवी को कपड़े सुखाते, बेटे को खेत में समुद्र का पानी बाँधते और बहू को समुद्री पानी सूखने के बाद बचा हुआ नमक
बटोरते देखता। विशेषज्ञ के न रहने वाले दिनों में वह बिल्कुल अकेला रह जाता। तब उसके पास बहुत समय बचता। इस समय में वह शंख बनाता।
समुद्र से जितने ही पुराने, बिना रीढ़ के द्घोद्घों के कंकाल उनकी देह के बाहर होते थे, यही शंख थे। ये शंख सदियों से उन द्घोद्घों के सुंदर रंग और कान्ति के शानदार स्मारक थे। पानी में डूबी हुयी काली खुरदरी चट्टानों को पानी सापफ करता रहता था। उन पर पहले काई जमती थी पिफर वनस्पति और पिफर छोटे-छोटे द्घोद्घें खाने और शरण के लिए वहाँ द्घर बना लेते थे। इन द्घोद्घों के कंकाल पीठ पर बनना शुरू होते थे जिन्हें पीठ पर लिए वे द्घूमते रहते थे। ये द्घोद्घें इन्हें बाद में कहीं भी त्याग देते थे। कभी मैथुन और कभी यु( में भी ये शंख अलग हो जाते थे। ये समुद्र की तली में पड़े रहते। कभी लहरें इन्हें किनारे पर पफेंक जातीं, कभी ये मछली के पेट में मिलते और कभी मत्स्यकन्याएँ किनारे पर इनसे खेलने के बाद इन्हें भूल जातीं।
पाकुड़ इन शंखों को इकट्ठा करता। उन्हें सापफ करता, तराशता। वह महीनों तक एक शंख पर काम करता। उनके अंदर की सुरंग को संगीत के राग के हिसाब से द्घटाता बढ़ाता। उसके वर्तुलाकार सिर को सुनहरे रंग से रंगता। उस पर धातु की पतली पत्ती चढ़ाता। अंत में उस पर कई शास्त्राीय रागों को बजाकर देखता। वह शंखों की अलग-अलग आकृति से अनेक राग निकाल सकता था। शंख की किस आकृति के साथ, संगीत के किस राग को बजाना चाहिए, इसमें उसे निपुणता हासिल थी। ये शंख पत्थर में जमी पंखुरी की तरह, कान, अंडे, पेंच, तितली, पगड़ी, शेर के पंजे या कंद्घी की आकृतियों के थे। कुछ शंख अमूल्य रत्नों की तरह सुंदर और कान्तिमान थे। उसने सुना था कि किसी बुरे वक्त में इनसे कुछ भी खरीदा जा सकता है। अनाज, जमीन यहाँ तक कि औरत भी। उस बुरे समय की आशंका में वह उन्हें एक पेटी में बंद करके रखे हुए था। उसके बनाए शंख शहर के बाजार की एक बड़ी दुकान से होते हुए देश के
अनेक मंदिरों और शादी के मंडपों में बजाए जाते थे। उसे उन सब शंखों के नाम मालूम थे जो दुनिया के महान यु(ों में बजाए गए थे।
कई बार जब दूरबीन से अपना द्घर देखने पर उसे कोई नहीं दिखता तब वह द्घर के एटिक में खड़े होकर दस किरणों वाले तारे की शक्ल का कत्थई शंख बजाता। यह आवाज उसके द्घर तक पहुँचती। इसे सुनकर वहाँ से उसकी बीवी, असंख्य जुड़े हुए चावलों जैसा सपफेद शंख बजाती जिसकी आवाज से वह उनकी कुशलता जान लेता। उसने अपनी बीवी को शंख बजाने की कला तब सिखायी थी जब वह उसे शादी से पहले मिलने के लिए बुलाता था। नाव पर बैठकर वह सुनहरे मुँह के कछुए जैसे शंख से लहरों के गुजरने की आवाज निकालता। इस आवाज को उसका बहरा बाप और जाल सिलता हुआ उजड्ड भाई लहरों की ही समझते, पर उसकी बीवी, जो तब बिल्कुल जवान थी... भागती हुयी चली जाती। मछलियों, केकड़ों और मत्स्यकन्याओं ने कई बार चट्टानों की आड़ में दोनों को प्रेम करते और कई बार लड़की के न आ पाने पर पाकुड़ को द्घंटों रोते हुए देखा था। पाकुड़ ने लड़की को तभी शंख बजाना सिखाया था, इसलिए कि जब वह न आ सके तो सूखी हुयी हल्दी की शक्ल वाले शंख पर विलाप की लम्बी धुन निकालकर पाकुड़ को बता दे। आज भी जब पाकुड़ अपनी बीवी को शंख की धुन से बुलाता तो वह आठ मील दूर से भागती हुयी आती। अगर नहीं आ पाती तो विलाप की वही धुन शंख पर निकालती। उनके इस प्रेमातुर क्रन्दन और विलाप को अब समुद्र के सारे कड़ी पीठ वाले कछुए, मछलियाँ, मत्स्यकन्याएँ, चट्टानों से चिपके केकड़े, चर्च की ठंडी हो चुकी दीवारें और कब्रों के नीचे की भुरभुरी हड्डियाँ पहचानते थे।
किसी रात जब वह बहुत उदास हो जाता और ऐसा अक्सर पूरे चाँद की रात होता, तब वह अंडे की जर्दी की तरह पीले और बट्टे की आकृति वाले शंख पर गहरी उदासी की धुन बजाकर चाँद में रहने वाली बुढ़िया को सुनाता। धीरे-धीरे बुढ़िया से उसकी दोस्ती हो गयी थी। अब वह उससे बात भी कर लेता था। कई बार बुढ़िया जब चरखा कातते हुए थक जाती तब उससे शंख पर कोई धुन सुनाने को कहती। उस दिन वह ऐसी धुन बजाता कि लहरें उन्माद में चट्टानों को पार कर किनारे पर बनी डूप्ले की नीली मूर्ति को भिगो देतीं। उसकी मुड़ी हुयी ऊँची टोपी की गहराई छोटे केकड़े और सीपियों से भर जाती।


राजाओं, नवाबों, सामंतों के ब्राह्मण मुंशी या दीवान उनकी जागीरों की आमदनी और खर्च का हिसाब किताब भी रखते थे। वे इन जागीरों की देखभाल या तो ठीक से कर नहीं पाते थे या पिफर उसकी आमदनी और हिसाब को जानबूझ कर धुंधला बनाए रखते थे जिससे कि उसका एक बड़ा हिस्सा उनके पास भी आ सके। यह न हो तब भी, रिआया से पैसे की वसूली एक कठिन काम था। इसके लिए क्रूरता, निर्ममता के साथ कुशलता और योग्यता भी चाहिए थी, जो इन निकम्मे और पुराने पड़ चुके मुंशियों के पास नहीं थी। उनके पास वसूली के लिए अपना कोई शक्तिशाली और विकसित प्रशासनिक तंत्रा भी नहीं था। पहले सिपर्फ प्रयोग के तौर पर ही, बाद में नियमित रूप से, वसूली का काम ांसीसी व्यापारियों को दिया जाने लगा। उन्होंने निर्ममता के साथ किसानों, कारीगरों से पैसा वसूलने का काम शुरू किया। इसके लिए उन्होंने अपनी सैनिक टुकड़ियाँ रखनी शुरू कीं। इन्हें तिलंगे कहा जाता था। यह पूरी सैनिक टुकड़ी खरीदी और बेची जा सकती थी। इनकी क्रूरता, इनके आतंक और यु( कौशल पर इनका मूल्य निर्भर करता था। अपने मूल्य और अपनी माँग को बढ़ाने के लिए ये लगान न देने पर या किसी विद्रोह को कुचलने के लिए गाँव के गाँव नष्ट करते थे। एक कत्ल की जगह दस कत्ल करते थे। आधुनिकतम हथियारों से लैस ये तिलंगे सुर्ख वर्दी, ऊँची जरीदार टोपी, मस्त द्घोड़ों की उठान और पत्थर हो चुके चेहरों के साथ ऐसी क्रूरता का प्रतीक बन गए थे, जो उस समय के राजनैतिक षड्यंत्राों, लूट और वर्चस्व की क्षेत्राीय लड़ाइयों में मूर्ख, निकम्मे और एक्षयाश राजाओं, नवाबों, जागीरदारों के बीच उनकी कीमत बढ़ाती चली जाती थी। किसी भी जनविद्रोह को दबाने के लिए इन पर सबसे अधिक विश्वास किया जाता था। जब किसी इलाके के किसान लगान देने से मना कर देते या गुमाश्तों, अमीन या सरकारी कारिन्दों की हत्या कर देते या संगठित होकर खुदमुख्तारी का एलान कर देते, तब ये तिलंगे बुलाए जाते। विद्रोहियों के काटे हुए सरों को भालों पर लटकाए जब वे लय भरी टापों के साथ ठुमकते द्घोड़ों पर लौटते, तो बाजार में उनकी कीमत बहुत बढ़ जाती। समुद्र के इस छोर से लेकर अवध की रियासतों और रजवाड़ों तक तिलंगों की मांग थी। दस्तावेजों में ऐसे बहुत से पत्रा थे जिनमें मराठों, राजपूतों और दोआबा के राजाओं ने यहाँ के रीजेन्ट से तिलंगे की टुकड़ी की कीमत पूछी है या उसकी मुँहमांगी कीमत देने की पेशकश की है। दस्तावेजों में ऐसे कुछ सिपाहियों का जिक्र भी है जिनकी सैनिक योग्यता और आतंक का सिक्का चलता था, खासतौर से उन दस तिलंगों की टुकड़ी का।
एक रात, वामगुल के अंदर नीली खिड़की वाली औरत को देखने की गहरी तड़प उठी। पिछली बार जब वह उसके पास गया था, और उसके द्घर की खिड़की पर खड़े होकर, अपनी उत्तेजना को और बढ़ाने के लिए, नारियल की शराब में दो पफाँकों में कटी हुयी लम्बी मिर्च डाल कर पी रहा था, उसे अचानक अपना द्घर दिख गया था। अगर वहाँ से अपना द्घर देख सकता है तो एटिक की दूरबीन से वह उसका द्घर तो देख ही लेगा, इसी उम्मीद से वह एटिक में आया था।
उस रात चाँद से इस कदर सपफेदी गिर रही थी कि खेतों के नमक, समुद्र के ऊपर उड़ते सपफेद पक्षी और मरियम की मूर्ति की सपफेदी भी उसने सोख ली थी। दूरबीन को कई बार द्घुमाने और पफोकस करने के बाद भी वाम को उसकी खिड़की नहीं दिखी, अलबत्ता दूसरे द्घर जरूर दिखे। उसे लगा शायद लहरों के पफेन से उठी धुंध में वह छुप गयी है। एक क्षण के लिए उसे यह भी लगा कि शायद उस दिन उसे अपना द्घर भी न दिखा हो बल्कि वह शराब में मिर्च डालकर पीने का विकार हो या पिफर अंदर की गहरी ऊब से जन्मी द्घर लौटने की बेचैनी हो। जब वह निराश होकर लौट रहा था, तब एक दीवार में टंगी पेंटिंग की लड़की की नाभि में चाँदनी भरने लगी थी। उस नाभि को देखने के लिए जब वह रुका, तभी उसने पीतल के पुराने हुक्के के नीचे दबे कुछ काग़ज देखे। ये एक कम पढ़े आदमी की लिखावट में थे। उन काग़जों में एक छोटे से गाँव के कुछ लोगों के विद्रोह और तिलंगों द्वारा उसके कुचलने की मुख्तसर कहानी थी। पढ़ने से वाम को मालूम हुआ कि यह पत्रा उस द्घर के छोटे दरवाजे से अंदर आने वाले भंगी ने लिखा था जो सोलह साल तक ांसीसियों का पखाना उठाते रहने के कारण थोड़ी बहुत ांसीसी सीख गया था, और उस सुबह गुसलखाना सापफ करते हुए उसने साथ के कमरे में बैठे रीजेन्ट की बातें सुन ली थीं। बाद में उसने इस पूरी द्घटना को मछलियों के सौदागरों, बावर्ची, हुक्काबरदार, साईस, चोबदार, आइनासाज, रंगरेज, मशालची, पालकी ढोने वाले कहार और दाइयों से भी सुनने के बाद, अपने भाई को पत्रा लिखा था कि अवध की सेना की टुकड़ी में भिश्ती का काम छोड़कर अलीगढ़ में नयी-नयी शुरू की गयी नील की खेती में मजदूरी करने चला जाए। पत्रा में द्घटना की भयावहता, नरसंहार और इसके प्रमाण के रूप में पत्रा के साथ चार काग़जों पर कोयले से बनाए रेखांकन भी नत्थी थे।
पहले रेखांकन में लकड़ी के पटरों से बने एक बहुत छोटे कमरे की दीवारों के बीच तीन मृत शरीर पड़े थे। उनके गठे शरीर, मोटी हथेलियाँ, चौड़े कंधे और मजबूत जाँद्घें बता रही थीं कि वे जवान और मेहनती मजदूर या किसान थे। उनके चेहरे मृत्यु के ठीक पहले के क्षणों में ीज होकर आतंक, यातना, भय और पीड़ा से विकृत हो चुके थे। एक का शरीर पेट के बल पड़ा था। उसकी गर्दन पूरी तरह द्घूमी हुयी थी। एक की नंगी छाती और जाँद्घों के बीच उसका अपना कटा हुआ हाथ पड़ा था। एक की सिपर्फ नंगी पीठ दिख रही थी। उसके टूटे पैर पफैले और मुड़े हुए थे। दूसरे कमरे में जाने वाले दरवाजे की चौखट पर सिपर्फ दो एड़ियाँ पड़ी थीं। वे तीनों शरीर एक दूसरे के पास थे। इस रेखांकन में कहीं रक्त नहीं था। हथियार नहीं था। कोई सिपाही या यो(ा भी नहीं था। वे क्यों मरे, िकसने मारा, यह भी नहीं पता था। सिपर्फ मृत्यु थी। उसके बाद की बची रह गयी भयावहता थी। उन सब चेहरों की सलवटों में भय था... अविश्वास था। प्रश्न थे... विस्मय था।
दूसरे रेखांकन में एक कटे हुए पेड़ के एक तिरछे तने की शाख से बंधी रस्सी में झूलता हुआ आदमी था। उसकी गर्दन लटक कर आगे की ओर झुक गयी थी। नीचे बेहद पतला शरीर था। उस पर एक ढीला कपड़ा था। उसके पाँवों का पायजामा आधा नीचे उतरा हुआ था। उसके बाल द्घने और बिखरे थे। हाथ सीधे खिंचे हुए लटक आए थे। उसके पीछे दो अस्पष्ट तने और कुछ आकृतियाँ थीं। ध्यान से देखने पर वे पफंदों से लटके शरीरों का आभास देती थीं। लटके हुए आदमी के सामने पफौजी वर्दी पहने अपफसर एक स्टूल पर बैठा था। एक बड़े पत्थर पर उसकी कोहनी रखी थी। हथेली पर उसकी गर्दन थी। वह उस लाश को नृत्य नाटिका देखने जैसे आनंद, कौतुक और निश्चिंतता से देख रहा था। उसकी द्घनी मूंछों के पीछे एक मस्सा था जिस पर मक्खी जैसा कुछ बैठा था। उसके सर की लंबी टोपी के नीचे दिखती छोटी आँखों में काम पूरा हो जाने की चमक, संतोष और गर्व था। लटकती हुयी लाश के लिए द्घृणा और अपमान था। उसके बैठने की मुद्रा में भी लाश के लिए गहरी हिकारत थी।
तीसरे रेखांकन में तीन औरतें द्घर छोड़कर भाग रही थीं। उनके पीछे कटे हुए सर पड़े थे। भागती औरतों में सबसे आगे की औरत जवान थी। उसके बाएँ हाथ में छोटा बच्चा लटका हुआ था जिसे वह किसी तरह गिरने से बचाए थी। उसके दाएँ हाथ में दो मुर्गियाँ थीं। मुर्गियों को वह परों से दबोचे थी। उसके पीछे दूसरी औरत अपने कंधों पर थोड़े बड़े बच्चे को बैठाए थी। वह आगे की ओर थोड़ा झुकी हुयी थी। बच्चे को गिरने से बचाने के लिए उसके लटकते पंजों को हथेलियों से पकड़े थी। तीसरी औरत झुककर बिल्कुल दोहरी हो गयी थी। उसकी पीठ पर बड़ी गठरी थी। आगे की दो औरतों के चेहरे सापफ बने थे। उनमें भावविहीन सपाटता थी। बच्चों के चेहरों के नक्श नहीं थे। बस रेखाओं में उकेरी गयी आकृतियाँ थीं।
चौथे रेखांकन में एक छोटे कमरे में तीन सिपाहियों से लड़ती चार औरतें थीं। एक औरत के हाथ में बड़ा सा पत्थर था... दूसरी जमीन पर गिरी हुयी थी और उसकी छाती पर एक भारी बूट गिरने ही वाला था। उसके हाथ में खंजर था। तीसरी औरत एक हाथ से पीठ पर लटके हुए बच्चे को सहारा दिए थी। उसके दूसरे हाथ में बड़ा भाला था जिसे वह एक सिपाही के पेट में द्घुसेड़ चुकी थी। चौथी औरत दो सिपाहियों के बीच द्घिरी थी। उसके एक हाथ में तलवार थी जिसे वह एक सिपाही की छाती में द्घुसेड़ चुकी थी। दूसरे हाथ में एक पेटी थी जिसे वह छाती में चिपकाए थी। उसके चेहरे पर द्घृणा और क्रोध की गहरी रेखाएँ थीं। उस औरत पर बंदूक से निशाना साधता हुआ एक सिपाही था। इस रेखांकन में सिपाहियों की वर्दी, टोपियाँ और बंदूकें सापफ थीं।
इन चारों रेखांकनों में सबसे महत्वपूर्ण मरे हुए लोगों की आँखें थीं। वे उबलती हुयी चेहरे से बाहर निकल रही थीं। भय और अविश्वास से पफट कर वे सामान्य आँखों से बड़ी हो गयी थीं। उनकी पुतलियों के चारों ओर का सपफेद हिस्सा गूदे की तरह निकला था। उन आँखों में जो था वह ज़िंदा इंसान की आँखों में नहीं दिखता। उनमें उस मृत्यु का साक्षात था जो उन पर अचानक झपटी थी। वे भय से पीली हो चुकी काँपती आत्माओं की, या पिफर, मारे जाने के विश्वास से आखरी दम तक लड़ने वालों की आँखें थीं।
एटिक से नीचे आकर वामगुल ने पत्रा और चारों रेखांकनों को महत्वपूर्ण दस्तावेजों की सूची में चढ़ाया और पिफर दस तिलंगों के प्रशस्ति इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय लिखा।
अट्ठारहवीं सदी में, जब पूरी दुनिया में नए ज्ञान की रोशनी पफैल रही थी, जब विज्ञान की महत्वपूर्ण खोजें हो रही थीं, जब मनुष्य को हीन बनाने वाले शारीरिक श्रम से मशीनों द्वारा मुक्त करने का अरस्तू का महत्वाकांक्षी स्वप्न साकार हो रहा था, जब प्रकृति के रहस्यों को वैज्ञानिक तरीकों से समझते हुए उसे मनुष्य जीवन में व्यावहारिक रूप से उपयोगी बनाया जा रहा था, जब दर्शनशास्त्रा में सांसारिक दुखों के कारणों में व्यर्थ के अध्यात्म के स्थान पर सामाजिक ढांचे के आधार को समझने के लिए तर्क की खोज शुरू हो चुकी थी, धर्म को अंधविश्वास, कट्टरपन और असहिष्णुता से मुक्त करने के प्रयास शुरू हो रहे थे, जब समुद्रों की छाती चीर कर देशों की सीमाओं से बाहर होने वाले पूंजी व्यापार जगत दुनिया को छोटा करते जा रहे थे, जब बाख और मोजार्ट संगीत कला को नया अर्थ दे रहे थे, जब वाल्तेयर की बौ(किता और रूसो के भावनात्मक अधिकारों के बीच की बहस में ांस उलझा हुआ था, तब दुनिया के इस नामालूम मुल्क के, नामालूम कोने की एक बस्ती में कबीलाई संस्कृति जीने वाले कुछ सरदारों ने, मूर्ख और अंधविश्वासी लोगों को ांसीसी व्यापारियों के विरु( भड़काना शुरू किया। वे लोग अपनी कुरीतियों, अविकसित सामाजिक संरचनाओं और धार्मिक जड़ता को उस समय भी विश्व में अतुलनीय समझते थे। मनुष्यों की बलि देते थे, पशुओं का मूत्रा पीते थे, उन्हें पूजते थे। औरतों को जिं़दा जलाते थे। धरती पर उगते हुए नए सूरज की नयी रोशनी की तरपफ पीठ करके जीते रहने को ही मोक्ष मानते थे। ये उस समय भी एक दूसरे का छुआ नहीं खाते थे। उनके पास ज्ञान की कोई किताब नहीं थी। कानून की कोई किताब नहीं थी। उनके पास सैकड़ों धर्म और हजारों ईश्वर थे। उनके देवता जानवरों की शक्लों के थे जो हमेशा भूखे रहते थे। ये धरती के सबसे अशिक्षित, निकम्मे, भूखे और अंधविश्वासी लोग थे। अपनी इन्हीं अंधेरी गुपफाओं को सृष्टि की अंतिम सीमा और इसकी संपूर्ण परिधि मानते हुए वे इन्हीं में रहना चाहते थे। अपने धर्म, परंपरा और समाज की दुहाई देकर उन्होंने ांसीसियों के शासन और व्यापार को, उनकी बनायी नयी भूमि व्यवस्था को, संगठित कर ढाँचे को, न्याय प्रणाली और नयी भाषा की शिक्षा को स्वीकार नहीं किया। लोगों को इकट्ठा करके, भड़का कर ांसीसी व्यापारियों पर हमले शुरू किए। नील और काली मिर्च के व्यापार को नष्ट करने लगे। उनके कारिन्दों, गुमाश्तों की हत्या करने लगे। देखने में यह छोटी बात थी पर पूरे यूरोप को अपनी भाषा, दार्शनिकों, चित्राकला, साहित्य और संस्कृति से सम्मोहित और जाग्रत करने वाले ांस की राजनीति पर, उसके व्यापार, उसकी साख और उसके दूसरे उपनिवेशों पर इसका बुरा असर पड़ रहा था। ांसीसी गवर्नर के लिए उनको कुचलना और उनसे सहानुभूति रखने वाले दूसरों को सबक सिखाना जरूरी हो गया था। शौर्य और वीरता से भरा यह महान काम तिलंगों ने किया।
संलग्न पत्रा से तिलंगों की रणनीति और काम की दिशा का पूरा ब्यौरा मिलता है। इस पर विश्वास किया जाना चाहिए, क्योंकि यह अनेक चश्मदीदों से बात करके और खुद ांसीसी रीजेन्ट की बातें सुनने के बाद लिखा गया है। इसके साथ के रेखांकन इसकी पुष्टि करते हैं। इन रेखांकनों में तिलंगों की शक्लों में एक महान उद्देश्य को प्राप्त करने की चमक और शांति है। उनमें गहरी निर्लिप्ता और आनंद है। उनके चेहरों पर द्घृणा या क्रोध या लोभ या बर्बरता नहीं है। पफसल को बचाने के लिए झाड़ झंखाड़ सापफ किए जाने वाले का सुख है। इस पत्रा से मालूम पड़ता है कि तिलंगों ने उनकी औरतों की छातियाँ काटीं, उनकी अपवित्रा योनि को पत्थरों के टुकड़ों से भर दिया, लोगों के सर काटकर सूखे तालाबों में डाल दिए, कुओं को लाशों से पाटकर हमेशा के लिए बेकार कर दिया, उनके पाँच बड़े बागियों के आधे हाथ उड़ा दिए, हर जवान औरत से बलात्कार किया, तीन सौ द्घरों को आग लगायी, पेड़ों पर लाशें लटका कर उनके सामने नृत्य किया, उनका धन लूटा और पिफर द्घोड़ों की टापों के साथ हुमकते हुए लौट आए। इसी समय होने वाली ांसीसी क्रांति जब मनुष्यों को हमेशा के लिए गहरे दुखों और झूठे स्वप्नों में भटकाने वाले तीन विरोधी व अर्थहीन शब्द दे रही थी, ये दस तिलंगे यहाँ द्घोड़ों के खुरों के साथ आदिम सच्चाइयों का उद्द्घोष कर रहे थे। मनुष्य उपकार नहीं अपमान याद रखता है। जय नहीं पराजय याद रखता है। प्रेम नहीं द्घृणा याद रखता है। यही उसकी आत्मा का सच है। यही उसके समाज और राज्य का सच है। बदला लेने का न्याय दुनिया का सबसे पुराना और अंतिम न्याय है। यही मनुष्य को और उसकी समस्त संरचनाओं को वास्तविक सुख और शांति देता है।
अगर तिलंगों के इस काम को इससे भी बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो इसके पीछे विश्व में चल रहे पुनर्जागरण की चेतना और राज्यसत्ता के मूलभूत सि(ांतों की रक्षा की भावना थी। विश्व के पुनर्जागरण को छोड़ भी दें, तो भी राज्यसत्ता के अपने कुछ नैतिक सि(ांत और नियम होते हैं जिनके अनुरूप आचरण करना हर शासक का कर्तव्य होता है। इनमें भी किसी भी विद्रोह को दबाना सबसे बड़ा कर्तव्य है क्योंकि यह स्वयं राज्यसत्ता के अस्तित्व पर आद्घात करता है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य ने अपना सबकुछ सौंपकर राज्यसत्ता को जन्म दिया है। उसके हर क्षण, हर गति, हर विचार पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष राज्यसत्ता का अधिकार है। इसलिए हर राज्यसत्ता का सर्वोच्च धर्म है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके और मनुष्यों के बीच हुए इस अनुबंध के महान आदर्शों से कभी कोई विचलन न हो। विचलन चाहने वाले किसी व्यक्ति या समूह की विकृत
मानसिकता, राज्यसत्ता के स्थायित्व, प्रभुता व जीवन पर आद्घात न कर सके। ऐसा हो, तो राज्य को पूरा नैतिक अधिकार है कि उसकी भर्त्सना करे। उसे हर संभव तरीके से कुचल कर नेस्तनाबूद करे। अपनी रक्षा के लिए क्रूरतम कदम उठाए। यही प्राचीन शास्त्राों में लिखा है। यही परंपरा रही है। यही महान साम्राज्यों की नींव और मनुष्य के विकास का आधार है। मनुष्य की रक्षा के लिए मनुष्य की हत्या, शांति बनाए रखने के लिए यु( और श्रेष्ठ मनुष्यों की स्वतंत्राता के लिए हीन मनुष्यों को गुलाम बनाना ही वह नीति और विवेक है, जो किसी भी राज्यसत्ता का प्राण तत्व होता है।
विद्रोह से सतर्क और शक्तिशाली राजा कभी नहीं डरता क्योंकि वह जानता है कि सैकड़ों लोग एक ही स्वप्न देखें, एक ही तरह से सोचें, एक ही आवाज में बोलें, यह कभी संभव नहीं होता। वह जानता है कि प्रजा सदैव उस राजा को चाहती है जो भय पैदा कर सकता है, दंड दे सकता है और जो उनकी तरह कायर नहीं होता। वह जानता है कि अविवेकी, लालची और अशिक्षित लोगों का संगठन अंततः इधर-उधर भागती भीड़ में बदल जाता है। इस भीड़ को पुनः नियंत्रिात और अनुशासित करके एक संगठित व
प्रगतिकामी समाज में बदलना उसका सबसे महान काम और सबसे बड़ा राजधर्म है।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि जय- पराजय हमेशा एक साथ रहते हैं। यह ईश्वर की अनुकम्पा है कि वह किस क्षण किसे क्या देता है। इस द्घटना के बाद तिलंगों की टुकड़ी एक बार पिफर एक
जनविद्रोह को दबाने गयी थी। पर इस बार विद्रोही तैयारी के साथ थे, इसलिए
ताकतवर थे। उन्होंने जमकर मुकाबला किया। कभी किसी चट्टान के पीछे से, कभी गुपफा से, कभी ऊँचे पेड़ों पर बनी मचानों से, कभी जंगल, कभी द्घाटियों से निकलते और तिलंगों पर टूट पड़ते। जब तक ये तिलंगे कुछ समझते वे गायब हो जाते। धीरे-धीरे तिलंगों की टुकड़ी कमजोर पड़ने लगी। ऐसी लड़ाई की उन्हें आदत नहीं थी। विद्रोही बिखरे रहते थे। बस्तियों में कहाँ कौन उनसे मिला है, कौन खुद विद्रोही है, कौन रसद देता है, कौन भेदिया है, कौन भट्ठी में हल की पफाल के साथ तलवारें भी ढालता है, पता नहीं चलता था। एक बार द्घने जंगल में तिलंगों की टुकड़ी से चौदह सिपाही अलग होकर भटक गए। भूखे और थके हुए एक नदी के किनारे जब वे नहा रहे थे, खाना बना रहे थे और सो रहे थे, विद्रोहियों ने हमला कर दिया। उनमें चार मारे गए। बाकी दस को उन्होंने जिंदा पकड़ लिया। वे उन्हें द्घसीटते हुए जंगल के बीच एक बस्ती में ले गए। वहाँ वे लोग भी थे जो तिलंगों के पहले हमले में किसी तरह बच गए थे। उन्होंने उस हमले में शामिल इन दसों को पहचान लिया। एक औरत ने बताया कि उनमें से दो ने तीन दिन तक उसके साथ बलात्कार किया पिफर उसे सूखे तालाब में पड़े सरों को उठाने का काम सौंप दिया। उन सरों को उठाते समय उसे अपने पति और दो छोटे लड़कों के सर मिले जिन्हें वह उसी छोटी गाड़ी में उठाकर दूर ले गयी। वहाँ उसने उन्हें आग दी। एक कटे हुए हाथ वाले अधेड़ ने बताया कि इनमें से एक को उसने तीन लोगों की आँखों में संगीन भोंकते देखा था क्योंकि वे आँख पफाड़कर देख रहे थे। और पूरी द्घटना के चश्मदीद गवाह थे। इसे वे दूसरे विद्रोहियों के बीच बयान कर सकते थे। एक औरत ने तीन को पहचाना जिसने मुर्गी और अनाज लेकर भागती औरतों पर द्घोड़े दौड़ा कर उन्हें टापों से कुचल दिया था। सबने एक मत से पफैसला दिया। इन दसों तिलंगों को जिंदा जला दिया गया। बाद में इनकी राख अधजले शरीर, हड्डियाँ, मैडल, जूते, जेबों का बचा अधजला सामान आठ बोरों में भरकर, एक बैलगाड़ी में यहाँ भेज दिया गया। उसी राख को दस हिस्सों में बांटकर इस सीशोर सीमेट्री में दस कब्रों में दपफन कर दिया गया।
इन दस तिलंगों को स्पार्टा के तीन सौ रणबाँकुरों के समकक्ष रखा जा सकता है। ये मैकयावली और नीत्शे के स्वप्नों के उस महानायक को प्रतिबिम्बित करते हैं जो हीन... लोभी... दुर्गंधयुक्त भीड़ का विनाश करके समर्थ मनुष्यों के लिए लौकिक और सुखी जगत रचने की क्षमता रखता है। हमें याद रखना चाहिए कि यु( ही मनुष्य की प्रगति का मूल मंत्रा है। सिकन्दर, हैनिबल, तैमूर, चंगेज, नेपोलियन मनुष्यता के लिए सदैव बु(, ईसा या दूसरे संतों से अधिक उपयोगी और श्रेयस्कर सि( हुए हैं।
लिखने के बाद वामगुल ने बंद मकड़ी की शीशी में तीन उंगलियाँ एक-एक करके डालीं... नारियल की बनी शराब में मिर्च डालकर पी और उस चाँदनी रात की रोशनी में पगडंडियों पर चलता हुआ, रात के तीसरे पहर नीली खिड़की वाली औरत के द्घर पहुँचा। बची हुयी रात में उसने उसके साथ अप्राकृतिक संभोग किया... लौटते समय एक खारिशजदा कुत्ते के साथ लिपट कर रोया और सुबह तक तीन बार वमन करने के बाद सो गया।


जब दरवाजे पर दस्तक हुयी शाम का धुंधलका शुरू हो गया था। द्घर इतना बड़ा और खुला हुआ था कि दरवाजे की दस्तक पत्तियों के गिरने या लहरों के शोर में खो जाती थी। आने वाला किसी और तरह से उन्हें बुला सके, इस पर उन दोनों ने कभी नहीं सोचा, क्योंकि वहाँ कोई आता भी नहीं था। पाकुड़ की बीवी आती, तो पीछे के कच्चे रास्ते से सीधे उसके कमरे में चली जाती थी।
दस्तक का शक पहले वामगुल को हुआ-
'तुमने सुना?' उसने पाकुड़ से पूछा। वाम एक कुर्सी पर बैठा था। सामने
नक्काशीदार आबनूस की छोटी मेज पर उसके पैर पफैले थे। मेज के दूसरी तरपफ एक चौकी पर पाकुड़ बैठा था। वह वाम के पंजों में जैतून के तेल की मालिश कर रहा था जो शहर के एक दुकानदार ने अपने बेटे की शादी में बजाए जाने वाले शंख के बदले उसे दिया था।
'क्या?'
'किसी ने दस्तक दी है'
पाकुड़ ने वामगुल के बाएँ पाँव की उंगलियों के बीच की सपफेद और सूख कर पफटी हुयी खाल पर तेल रगड़ते हुए अविश्वास से उसकी ओर देखा
'आज हवा तेज है। उड़ते हुए पत्ते होंगे... या किसी भूखे कौए ने चोंच मारी होगी।' दस्तक पिफर हुयी। इस बार किसी की आवाज भी थी।
'देखो' वाम ने मेज से अपने पैर खींच लिए। पाकुड़ मेज का सहारा लेकर उठा। तेल से भीगी हथेलियाँ सर पर रगड़ते हुए बाहर बरामदे में और पिफर दो सीढ़ियाँ उतर कर कच्ची, खुली जगह पर आया। सूखे हुए पफव्वारे के पास के छोटे कच्चे रास्ते से होता हुआ दरवाजे पर आया। उसके नथुनों में एक तेज गंध द्घुसी। यह गंध वहाँ की नहीं थी। न मत्स्यकन्याओं की देह की थी, न सड़ते हुए नारियल की, न सुखायी जा चुकी मछलियों की, और न भूखे कौओं की बीट की। दरवाजे पर कोई था।
लकड़ी के ऊँचे और बड़े दरवाजे के एक पल्ले के बीच में बनी छोटी खिड़की को उसने खोला। वह झुका और खिड़की से उसने आधा धड़ बाहर किया। उधर से भी कोई झुका। अब पाकुड़ के सामने एक लड़की का चेहरा था।
'मैं अंदर आऊँ?' उसने पूछा
सर हिलाकर पाकुड़ ने अपना धड़ वापस अंदर खींचा और एक ओर हट गया। लड़की झुककर खिड़की से अंदर आ गयी। अंदर आकर वह सीधी हुयी। कुछ क्षण पाकुड़ उसे और वह पाकुड़ को देखती रही। उसने पाकुड़ की उभरी पीठ, सपफेद बाल, छोटा कद, भारी चेहरे के मोटे होठ, थकी हुयी अधखुली आँखें देखीं। पाकुड़ ने लड़की की समुद्र की सतह पर न आने वाली सुनहरी मछली जैसी चिकनी खाल, आँखों में भरा पूरा समुद्र, शंख की तरह एक के ऊपर दूसरा होठ और छोटी नावों की पतवार जैसी गोल बाँहें देखीं।
'तुम्हें पता है?' उसने पाकुड़ से पूछा। पाकुड़ ने हैरानी से चारों ओर देखा।
'क्या?'
'पुल पर चावल के बोरों से लदी एक द्घोड़ा गाड़ी पलट गयी है।' लड़की पफुसपफुसा रही थी 'मेरे सामने दोनों द्घोड़े हवा में उठे पिफर वहीं लटक गए। पूरी गाड़ी पीछे झुक गयी थी। उनके पैर हवा में हिल रहे थे। वे चीख रहे थे। पफेन बहा रहे थे। नीचे की ओर आने के लिए पूरी ताकत लगा रहे थे। उनकी आँखें बाहर निकलने लगी थीं। गाड़ी पर बैठा लड़का पीछे से कूदकर आगे आया। उसने पहले एक ओर से गाड़ी को पूरी ताकत से दबाया। गाड़ी नीचे नहीं आयी। वह पिफर पीछे लौटा। गाड़ी पर चढ़कर उसने बोरों को गिराना शुरू किया। कई बोरे उसने पुल पर पफेंक दिए। वह पिफर बाहर कूदकर आगे आया। पिफर गाड़ी को नीचे खींचने लगा। पिफर चढ़ा। पिफर बोरे पफेंके। पिफर गाड़ी खींची। वह रो रहा था... हाँपफ रहा था... पूरी ताकत लगा रहा था। पिफर गाड़ी एक झटके से नीचे आ गयी। पर तब तक देर हो चुकी थी। दोनों द्घोड़े, मुड़े द्घुटनों के साथ गिर पड़े। लड़का भी लड़खड़ा गया। वह भी गिरा और द्घोड़ों के नीचे दब गया। द्घोड़े शायद मर चुके हैं। लड़का उनके नीचे दबा है। पफेंके हुए बोरे पफट गए थे। उनका चावल पफैल गया है।' लड़की चुप हो गयी। एक गहरी सांस ली उसने।
पाकुड़ आश्चर्य से उसकी आवाज सुन रहा था। उसमें वैसा ही गाढ़ापन था जैसा समुद्र के बहुत अंदर रहने वाली भंवर में होता है। पाकुड़ को लगा कि अगर उसे दस पंखुरियों वाले पफूल की शक्ल का काला शंख मिल जाए तो वह उससे
बिल्कुल ऐसी ही आवाज निकाल सकता है।
दरवाजे की छोटी खिड़की अभी खुली हुयी थी। पाकुड़ ने पिफर आधा धड़ बाहर निकाला। बाहर लाल रंग की एक कार खड़ी थी। धूल से सनी हुयी। पाकुड़ ने धड़ वापस अंदर खींच लिया। इस बार उसने खिड़की बंद कर दी।
'अब क्या होगा?' लड़की द्घबरायी हुयी थी 'पुल पहले भी बंद होता होगा। क्या होता है तब? कितनी देर लगती है पुल खुलने में?'
'पता नहीं... ऐसा पहली बार हुआ है'
'क्या?'
'पुल पर द्घोड़ों का मरना। क्या वे सचमुच मर गए थे?'
'हाँ... वे जिस तरह गिरे उस तरह मरे हुए ही गिरते हैं'
'पर वह लड़का पुल से क्यों आया? तुम भी क्यों आयीं?'
'क्यों?'
'यह पुल सिपर्फ पैदल चलने वालों के लिए बना है।' लड़की कुछ नहीं बोली। उसने अब चारों ओर देखा
'यह किसका द्घर है?'
'पता नहीं' पाकुड़ ने सर हिलाया। लड़की ने हैरानी से पाकुड़ को देखा। उसे लगा पाकुड़ बताना नहीं चाहता, शायद इसलिए कि वह उसे अपनी बात अच्छी तरह समझा नहीं पायी है या वह उस पर विश्वास नहीं कर रहा है। उसने पिफर
कोशिश की। इस बार वह शब्दों को रोकते हुए बोल रही थी। हाथों के इशारे से भी समझा रही थी।
'मैं मिट्टी में दबा शहर देखकर लौट रही थी। मुझे देर हो चुकी थी। मैं अगर बड़े रास्ते से जाती तो तीन द्घंटे ज्यादा लगते। मैं शायद चली भी जाती, पर एक मस्जिद की सीढ़ियों पर सूरज, चाँद और दूसरे बहुत से नक्षत्रा बिछाकर, उनसे बातें करते हुए एक नजूमी ने बताया, कि उस रास्ते पर हथियार बनाने वाले तीन कारखानों की छुट्टी होती है। हजारों लोग एक साथ निकलते हैं इसलिए गाड़ियों के लिए वह रास्ता दो द्घंटों के लिए बंद हो जाता है। उसी ने इस रास्ते के बारे में बताया कि यह छोटा और खुला है। इससे कोई नहीं जाता। मैं चली आयी। अब वापस भी नहीं लौट सकती। पूरे छह द्घंटे लगेंगे। इतना पेट्रोल भी नहीं है। पुल खुला होता तो मैं डेढ़ द्घंटे में पहुँच जाती। मेरा यकीन करो। मैंने सब अपनी आँखों से देखा है। पुल से ही मैंने इस चर्च को देखा, जंजीर से लटके द्घंटे और मरियम की मूर्ति को देखा। इस इमारत को भी देखा। मुझे लगा यहाँ कोई होगा ही। मैं अब कैसे जाऊँगी? क्या पुल खुल जाएगा?''
डूब चुके दिन के आखरी धुंधलके में पाकुड़ ने देखा... उत्तेजना, संशय और लगातार बोलने से लड़की के चेहरे की खाल सुर्ख हो गयी थी। उस सुर्खी में उसके गले की नीली नसें उभर आयी थीं। उनके उभरने से उसकी आवाज का गाढ़ापन और उदासी बढ़ गयी थी। पाकुड़ ने सोचा कि अगर वह काला शंख बनाएगा तो उस पर सुनहरे रंग की ऐसी धारियाँ भी डाल देगा जिससे लगे कि शंख के भी नसें हैं और आवाज इन्हीं नसों से पफूट रही है। उदासी के लिए वह शंख पर राग मारवा बजाया करेगा।
'तुम कौन हो?' लड़की ने अचानक पूछा।
पाकुड़ ने इस पर कभी नहीं सोचा था। कुछ देर वह अवाक्‌ लड़की को देखता रहा पिफर उसने सर ऊपर उठाया। अब तक एटिक चाँद की विलक्षण सपफेदी में डूब गया था।
'क्या आज पूरा चांद है?' पाकुड़ धीरे से बड़बड़ाया।
'आज चांद धरती के सबसे पास है। इतना पास कि चांद में बैठी बुढ़िया को धरती पर सब कुछ बहुत सापफ दिखायी देता है। पूरी रात वह खुशी से हँसती है। तुमने देखा है उसे हँसते हुए कभी?' लड़की अवाक्‌ पाकुड़ के नीचे वाले थोड़े ज्यादा भारी होठ को देख रही थी जो गाय के थन की तरह लटका था।
'अब क्या करोगी?' पाकुड़ ने पूछा
'मुझे क्या पता?'
'पिफर?'
'पुल कैसे खुलेगा?'
'पता नहीं।'
'पुलिस कहाँ मिलेगी?'
'मछुआरों वाली बस्ती की उस चौकी में जहाँ से मछलियाँ जाती हैं।''
'क्या वह दूर है?'
'बहुत'
'अगर उन्हें पता चल जाए तो वे पुल खोल देंगे।'
पाकुड़ कुछ देर सोचता रहा पिफर बोला-
'कभी कभी यूं ही गश्त के बहाने वे इधर आ जाते हैं। उन्हें मालूम है कभी-कभी यहाँ ांस की अलूचे के रस में डूबे हुए अंगूरों की शराब मिल जाती है।'
लड़की ने निराशा में सर हिलाया
'कहीं पफोन है?'
'नहीं।'
'क्या करते हो जब कुछ होता है?'
'क्या होता है?'
'अगर मैं तुम्हें अभी कत्ल कर दूँ तो क्या होगा? पुलिस को कैसे पता लगेगा?' लड़की ने दाँत पीसे पाकुड़ ने आँखें
सिकोड़ कर लड़की की आँखों में देखा। उसमें अपने कत्ल किए जाने की संभावना को टटोला पिफर लापरवाही से कंधे हिलाए 'कोई भी राहगीर बता देगा। शंख बजाकर मेरी बीवी बता देगी। हो सकता है यहाँ से गुजरने वाली हवाएँ बता दें। वर्ना चाँद की बुढ़िया तो बता ही देगी।'
लड़की ने झुंझला कर सर झटका
'चलो... इसी तरह सही... पुलिस को बताओ कि पुल पर द्घोड़े मरे पड़े हैं।'
पाकुड़ ने एक क्षण लड़की को देखा पिफर चाँद की तरपफ सर उठाकर कुछ बुदबुदाया
'यह क्या था?' लड़की ने द्घूरा उसे
'मैंने बुढ़िया से कह दिया है। वह बता देगी उन्हें।'
'मैंने कुछ नहीं सुना।'
'मैंने तुमसे कुछ कहा भी नहीं। उसने सुन लिया है। हम ऐसे ही बातें करते हैं।'
'क्या वह उसे भी बता सकती है?'
'किसे?'
'मेरे पति को'
'क्या?'
'यही... कि पुल पर द्घोड़े मर गए हैं और मैं यहाँ पफंस गयी हूँ। हो सकता है रात को द्घर न आ पाऊँ' 'हो सकता है नहीं... यकीनन ही'
'वह मुझे मार डालेगा' लड़की बड़बड़ायी 'वह इस बात पर कभी विश्वास ही नहीं करेगा। वह सोचेगा मैं किसी आदमी के साथ रात भर एक्षयाशी करने के लिए मक्कारी भरा झूठ बोल रही हूँ।'
'क्या पफोन करने से उसे यकीन हो जाता कि तुम सच बोल रही हो।'
लड़की ने हैरानी से पाकुड़ को देखा। कुछ देर चुप रही पिफर बोली
'तुम ठीक कहते हो। उससे भी क्या होता? तब भी वह यही सोचता।'
'छोड़ो पिफर... पुलिस वाले आएँगे तो उसे बता देंगे। उनके पास अपना पफोन होता है। पुलिस के बताने से उसे यकीन भी आ जाएगा।'
'और तुम्हें यकीन है कि बुढ़िया पुलिस को बता देगी'
'हाँ'
लड़की ने एक गहरी साँस ली। हाथ हिलाकर गहरी बेचारगी में उसने दोनों कंधे झटके।
'यहाँ कोई जगह है जहाँ रात को रुका जा सकता है।'
'यहाँ सिपर्फ यही जगह है। क्या तुम यहाँ रुकने के लिए सोच रही हो?'
'इसमें सोचना क्या है? मैं और कर भी क्या सकती हूँ... या पिफर बाहर गाड़ी में रात भर बैठी रहूँ।'
'मुझे पूछना पड़ेगा'
'किससे?'
'जो यहाँ रहता है। वैसे हमारे पास कमरा है और हमने अभी खाना भी नहीं खाया है। पर अगर उसने मकड़ी वाली शीशी में उंगली डाल ली होगी तब मत रुकना।'
'क्यों?'
'तब उसे किसी औरत की बहुत सख्त जरूरत पड़ती है। पहले मुझे देख लेने दो' पाकुड़ बोला।
पाकुड़ लौटा नहीं था। उसे देखने वामगुल बरामदे में आ गया। उसने लड़की को कुछ अंधेरे, कुछ उजाले में देखा। वह उसे जितनी उजाले में दिखी उसमें उसके सीने के उभार, खुले बाल, सापफ और मुलायम खाल वाली गर्दन और पफूली नसों वाला चेहरा दिखा। उसे अंधेरे में जो दिखी, उसमें उसकी मजबूत और एक दूसरे से सटी हुयी गोल जाँद्घें, पतली कमर और बड़े नितम्ब दिखे।
पाकुड़ कच्चा रास्ता पार करके वामगुल के पास आया। कुछ देर उसके साथ बातें करने के बाद पिफर लड़की के पास आ गया।
'तुम्हारा सामान कहाँ है?'
'गाड़ी में'
'चलो... निकाल लेते हैं'
लड़की कुछ क्षण खड़ी रही। सर द्घुमाकर उसने बरामदे के अंधेरे में खड़े वामगुल को देखा पिफर धीरे से पफुसपफुसायी
'क्या वह मकड़ी की शीशी में उंगली डाल चुका है?'
बाहर की तरपफ चलते हुए पाकुड़ रुक गया। उसने लड़की को देखा पिफर मुस्कराया-
'नहीं... तुम्हारी किस्मत अच्छी है।'

वामगुल वापस कमरे में चला गया था।
पाकुड़ ने लड़की का छोटा बैग और पानी की बोतल कार से निकाल कर छोटे कमरे में रख दी। कमरे की बत्ती जला दी। लड़की ने चारों ओर देखा। कमरे के एक तरपफ दो बड़े सोपफे पड़े थे। दीवार से लगी सैटी थी। दोनों सोपफों के बीच गोल मेज थी जिसके पैर भी गोल थे। कमरे के दूसरी तरपफ खाने की गोल मेज थी... उसके चारों ओर चार कुर्सियाँ थीं। पूरे कमरे की लम्बाई में एक दीवार थी। इसमें काँच के पल्लों वाली तीन खिड़कियाँ बनी थीं। ये खिड़कियाँ ऊँची और चौड़ी थीं। दो खिड़कियों के पल्ले बंद थे। एक का खुला था। कमरे में एक और छोटा दरवाजा था जो बाहर खुले में निकलता था। उसके पार पाकुड़ का कमरा था।
'तुम यहाँ सो सकती हो' पाकुड़ ने सैटी की ओर इशारा किया 'अभी पफौरन कुछ खाओगी या कुछ पीना चाहोगी?'
'मैं सबसे पहले नहाऊँगी, पिफर अगर तुम मुझे ज्यादा सी गर्म काली कापफी पिला सको।'
पाकुड़ ने साथ के बाथरूम की ओर इशारा किया 'तुम्हारे पास तौलिया नहीं
होगा।'
लड़की ने झुककर बैग से एक तौलिया निकाला। कुछ कपड़े भी, जो पहली नजर में ही सोने वाले दिखते थे।
'सिपर्फ तुम दो लोग हो?' उसने पूछा
'हाँ'
'वह यहाँ क्या करता है?'
'किताबें पढ़ता है... पुराने काग़ज पलटता है। उन दस कब्रों के बारे में लिखने के लिए रखा गया है' पाकुड़ ने खिड़की के बाहर सीमेट्री की ओर इशारा किया 'मैं कापफी बनाता हूँ' छोटे दरवाजे से वह बाहर निकल गया।
लड़की उस खिड़की पर आयी जिधर पाकुड़ ने इशारा किया था। वह बंद थी। काँच के बाहर पूरी सीमेट्री दिख रही थी। एक ओर ऊँचे, बड़े और मजबूत पत्थरों से बने मकबरों वाली कब्रें थीं। उनसे थोड़ी दूर उखड़े या समतल पत्थरों वाली एक दूसरे से सटती हुयी छोटी कब्रें थीं। लड़की ने गिनीं। वे दस थीं। वे पुरानी होकर टूट चुकी थीं। उनके पत्थरों के बीच में द्घास उग आयी थी। उन पर शाम की तेज हवा में टूटते पत्ते गिर रहे थे। उन पर समुद्र किनारे की उठायी हुयी बोटी लेकर भागे हुए कौए लड़ रहे थे। उन पर खुदे नामों में नमक जमा हो चुका था। वे धुंधले होकर न पढ़े जा सकने वाले हो गए थे।
'क्या द्घोड़े मर गए थे?' लड़की ने सुना। उसे लगा किसी कब्र के अंदर से कोई बोला। वह उस कब्र को पहचानने की कोशिश करने लगी। पिफर पूछा किसी ने। अब द्घूम कर देखा उसने। दरवाजे पर वामगुल खड़ा था। खिड़की छोड़कर दरवाजे तक आयी वह। अब वह उसे ठीक से देख सकती थी।
'पता नहीं... शायद मर ही गए होंगे।'
'वह लड़का?'
'वह जिं़दा था... पर एक द्घोड़े के नीचे दब गया था।'
'पुल पूरी तरह बंद हो गया था?'
'हाँ... बहुत सा चावल पुल पर पफैल गया था', लड़की ने वामगुल की उंगलियाँ देखीं। उसने उस उंगली को पहचानने की कोशिश की जिसे वह शीशी में डालता
होगा।
'तुम यहाँ इत्मिनान से रुक सकती हो' वामगुल अभी दरवाजे पर ही था।
'वह कॉपफी ला रहा है' लड़की एक ओर हट गयी। वामगुल अंदर आ गया।
'मैं नहा लूँ तब तक?' लड़की ने विनम्रता से पूछा।
'मैं बाहर हूँ' वामगुल कमरे से बाहर निकलने लगा।
'नहीं... आप रुकिए। बस मैं अभी आयी' लड़की तौलिया और कपड़े लेकर बाथरूम में चली गयी। वह लौटी तो उसके कपड़े बदले हुए थे। वह ढीले कपड़ों में थी। इसकी कमीज में कई जेबें थीं। उसकी तरपफ वामगुल की पीठ थी। वह खिड़की पर खड़ा चर्च और सीमेट्री की दीवार के पास लगे तीन बेहद द्घने पेड़ों पर चीखते हुए परिन्दों को देख रहा था। वह भी पास आकर परिन्दों को देखने लगी। वे पेड़ों के ऊपर खुले नीले आकाश में ऊपर तक जाते पिफर नीचे आते। उनकी आवाजों से ज्यादा शोर उनके पंखों के पफड़पफड़ाने का था।
कॉपफी की तेज महक के साथ पाकुड़ अंदर आया। उसके हाथ में ट्रे थी। उस पर दो बड़े मग रखे थे। उनसे धुंआ उठ रहा था। उसने ट्रे बीच की गोल मेज पर रख दी। वे दोनों खिड़की से हटकर आमने सामने सोपफे पर बैठ गए। पाकुड़ ने दोनों बंद खिड़कियों के पल्ले भी खोल दिए। तेज और ठंडी हवा का झोंका अंदर आया।
'वही हुआ जो तुम कह रही थीं' पाकुड़ ने एक मग उठाया और लड़की को पकड़ा दिया। लड़की ने हैरानी से देखा उसे। पाकुड़ ने दूसरा मग वामगुल को दिया। कोने में रखे दो छोटे स्टूल उठाकर उनके सामने रख दिए पिफर झुककर लड़की के कान में पफुसपफुसाते हुए बोला 'सुनते ही वह चीखने लगा। देर तक गंदी गालियाँ देता रहा। छिनार है वह... झूठ बोलती है... उसे अब रोज नए मर्दों की जरूरत है। आएगी तो जिं़दा नहीं छोड़ूँगा'। पाकुड़ सीधा हो गया 'तुम चाहती थीं इसलिए मैंने चाँद की बुढ़िया से यह भी कह दिया था। उसी ने अभी मुझे यह सब बताया।'
लड़की के होठ काँपे। आँखों में पानी आ गया। उसने अपना चेहरा मग में द्घुसा दिया। कमरे में गहरी खामोशी छा गयी।
'हो सकता है द्घोड़े हट गए हों' सन्नाटे में उछलती हुयी गहरी साँसों से द्घबरा कर पाकुड़ बुदबुदाया 'हम दूरबीन से देख सकते हैं। हमें देखना चाहिए।'
लड़की दूरबीन के बारे में नहीं जानती थी। उसने वामगुल को देखा।
'ऐसा हो सकता है' वामगुल ने कापफी के द्घूंट लिए। कमरे में पिफर खामोशी हो गयी।
'खाने में क्या बनाऊँ?' पाकुड़ ने पिफर द्घबरा कर पूछा। किसी ने जवाब नहीं दिया।
'सिपर्फ इसी समुद्र में मिलने वाले खास झींगे भूनता हूं। नारियल की चटनी और साबूदाने की खिचड़ी भी बनाता हूँ।'
दोनों में कोई नहीं बोला।
'मैं अपनी औरत को भी बुला लेता हूँ' उसने वामगुल को देखा, 'भुने हुए झींगे उसे बहुत पसंद हैं। पिफर उसे मेरे बनाए शंख भी ले जाने हैं', सर हिलाता हुआ पाकुड़ छोटे दरवाजे से बाहर चला गया। कुछ देर में शंख की आवाज आयी जो तैरती हुयी दूर तक चली गयी।
'क्या वह सच कह रहा था?' लड़की ने पूछा 'हम देख सकते हैं?'
'हाँ... कापफी खत्म करके चलते हैं'
कुछ ही देर में वामगुल ने कापफी खत्म कर दी। लड़की ने भी जल्दी जल्दी कुछ द्घूंट लिए पिफर मग स्टूल पर रखकर उठ गयी। वामगुल भी उठ गया। वह कमरे से बाहर आया। बरामदे की दो सीढ़ियाँ उतर कर कच्चे रास्ते से होता हुआ एटिक की सीढ़ियों तक आ गया। द्घूमकर देखा उसने। लड़की पीछे थी। वह कुछ क्षण रुका रहा, अगर सीढ़ियों पर वह साथ चढ़ना चाहे। लड़की पीछे ही खड़ी रही। वामगुल सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। उसके पीछे लड़की भी सीढ़ियों पर आ गयी।
सीढ़ियाँ गोलाई में द्घूमती हुयी ऊपर चली गयी थीं। उन पर लगे पत्थर कई जगह उखड़ गए थे। जहाँ पत्थर उखड़े हुए थे वहाँ भुरभुरी मिट्टी और छोटे कंकर थे। दीवारों को नमक ने कई जगह गला कर खुरदुरा कर दिया था। वे एक छोटे कमरे में जाती हुयी दिख रही थीं।
वामगुल एटिक में आकर एक ओर खड़ा हो गया। लड़की पीछे आयी। वह भी एक ओर खड़ी हो गयी। उसने चारों ओर निगाह दौड़ायी। कमरे की सामने वाली बड़ी खिड़की से चाँदनी अंदर गिर रही थी। उसकी रोशनी में कमरे का पुरानापन दिख रहा था। दीवारों के कोनों पर जाले लगे थे। पुराने काग़जों की गंध थी। पफर्श पर बिखरी धूल और हवाओं का छोर नमक था। कुछ खाली डिब्बे, बिजली के तारों के टुकड़े, पुराने पफोटो ेम, पीतल का बड़ा हुक्का, टूटी कुर्सियाँ आदि पड़े थे। कमरे में दो खिड़कियाँ थीं। एक सामने और एक पीछे जो बंद थी। सामने खिड़की के पास स्टैन्ड पर एक लम्बी दूरबीन रखी थी। स्टैन्ड में पहिए थे। उसे कहीं भी ले जाया जा सकता था। दूरबीन से देखने के लिए स्टैन्ड के पास एक स्टूल रखा था।
वामगुल स्टूल पर बैठ गया। उसे लगा कि लड़की पहले द्घोड़े और पुल देखना चाहेगी।
'मैं समुद्र देखूँगी' लड़की ने कहा।
वामगुल स्टूल से उठ गया। लड़की स्टूल पर बैठ गयी
अनाड़ी की तरह उसने अपनी दोनों आँखें दूरबीन के लेन्स से चिपकायीं पिफर एक झटके से अपना सर पीछे खींच लिया। हरहराता हुआ समुद्र उसकी आँखों में द्घुस गया था।
'पहली बार ऐसा ही होता है। हम होते नहीं... पर हमें लगता है हम समुद्र के अंदर हैं... बिल्कुल उसी तरह जिस तरह हमें पहली बार अपने समय को देखने पर लगता है।' वाम ने दूरबीन पर लगी एक छोटी गोल चरखी द्घुमायी। लड़की ने सर पिफर दूरबीन से सटा दिया। वाम चरखी द्घुमा रहा था। एक जगह लड़की ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। अब वह समुद्र को थोड़ा दूर से देख पा रही थी, जैसे उसे देखा जाता है। लड़की ने अब धीरे-धीरे दूरबीन को द्घुमाना शुरू किया। एक जगह उसने दूरबीन रोक दी। उसे पानी में लकड़ी के कुछ खम्भे दिखे। वाम समझ गया वह क्या देख रही है।
'यह पुराना बंदरगाह था जब यहाँ सिपर्फ यह इमारत थी। जहाज यहां रुकते थे। यह लकड़ी अभी तक खराब नहीं हुयी है।'
लड़की को लहरों पर उछलती तीन नावें दिखीं। चट्टानों पर बैठे केकड़े दिखे। बहुत बड़े सितारों से भरा हुआ नीला
आकाश दिखा।
लड़की ने दूरबीन को थोड़ा बाएँ द्घुमाया तो उसे बस्ती दिखने लगी। उल्टी पड़ी रंगीन तलों वाली नावें... पफैले हुए जाल... मछलियों के ढेर पर सोते हुए आदमी दिखे। वाम ने दूरबीन को थोड़ा और पफोकस किया। लड़की को किनारे की चौड़ी सड़क... डूप्ले की मूर्ति... द्घरों की छतें... खिड़कियाँ दिखने लगीं। खिड़कियों के अंदर रोशनियों में चलते पिफरते लोग दिखने लगे।
'तुम्हें नीले रंग की कोई खिड़की दिखे तो बताना' वाम ने कहा। लड़की ने दूरबीन को द्घरों के चारों तरपफ द्घुमाकर देखा। दूसरे रंग थे... नीला नहीं था।
'शायद रंग बदल गया हो' लड़की ने कहा।
वाम कुछ नहीं बोला। वह दूसरी तरपफ की बंद खिड़की पर आया। इस खिड़की से पुल दिखता था। खिड़की के पल्ले बंद थे। उन पर जमी धूल बता रही थी कि खिड़की को सालों से खोला नहीं गया है।
वाम ने की। पफर्श पर पड़ी कपड़े की कतरनों को उठाकर धूल सापफ धूल सापफ करने के बाद वह खिड़की के पल्लों को खींच कर खोलने की कोशिश करने लगा। लड़की द्घोड़ों को भूल चुकी थी। वह दूरबीन से पूरी सृष्टि देख रही थी। उसने खेतों में पड़ा नमक देखा, चर्च की मीनारों के पार सात आँषियों को तारों में देखा, चाँद को देखा। उसे चाँद में रहने वाली बुढ़िया बहुत सापफ दिखायी दी। वह सचमुच हँस रही थी। उसने उसके दो दाँत भी देखे। उसने देखा बुढ़िया उसे इशारे से चाँद पर बुला रही थी। लड़की की साँस पफूलने लगी। उसे लगा उसने कुछ देर और बुढ़िया को देखा तो वह खिड़की से कूद जाएगी। द्घबराकर वह स्टूल से उठ गयी।
तेज आवाज के साथ खिड़की के पल्ले खुल गए। हवा का एक झोंका अंदर आया। कुछ देर खिड़की से छूटी धूल हवा में उड़ी पिफर धीरे-धीरे पफर्श की धूल में चली गयी। लड़की वाम के पास आ गयी। वामगुल ने स्टैन्ड खींचकर दूरबीन को इस खिड़की के पास रख दिया। स्टूल भी उठाकर रखा। स्टूल पर बैठकर उसने आँखें लेन्स से चिपका दीं। चरखी द्घुमाते हुए उसने दूरबीन को पफोकस किया। कुछ देर दूरबीन से देखता रहा पिफर सर उठाया उसने।
'वे सचमुच मर गए हैं। उनके नथुनों से खून बहता दिख रहा है। लड़का अभी तक द्घोड़े के नीचे दबा है' वाम स्टूल से उठ गया 'तुम चाहो तो देख लो।'
लड़की की दिलचस्पी पुल में खत्म हो गयी थी। वह वहाँ से हटकर उस दीवार से चिपक कर खड़ी हो गयी जिस पर पेंटिंग लटक रही थी।
चाँद अब और ऊपर आ गया था। उसकी रोशनी पूरे एटिक में भर चुकी थी। लड़की इस रोशनी को देख रही थी। पेंटिंग की लड़की उसके सर के ठीक ऊपर थी। उसकी गर्दन एक ओर जरा सी झुकी थी। इस तरह, कि वह सीधे वाम को देख रही थी। दीवार में चिपकी लड़की की गर्दन एक ओर झुकी थी। वह भी वाम को देख रही थी। वाम ने एक क्षण में पहचान लिया। यह वही थी। बिल्कुल वही। एक क्षण के लिए वाम का चेहरा सपफेद हो गया। वह थोड़ा आगे बढ़ा। दीवार से चिपकी और रोशनी में डूबी हुयी लड़की को लगा वाम उसके पास आना चाहता है। वाम ने दीवार पर दोनों हथेलियाँ रखकर हाथ पूरे खींच लिए। लड़की अब वाम के हाथों के नीचे थी। उदास आँखों से वाम पेंटिंग की लड़की को देखने लगा। पलंग पर वह निर्वसन थी। उसकी पूरी देह मांसल थी। मजबूत चिकनी और चमकती हुयी। हल्के पीले रंग की सिल्क की चादर पर कत्थई रंग के दो ऊँचे तकियों के सहारे वह लेटी थी। उसके द्घुंद्घराले बाल सर के दोनों ओर पड़े थे। उसका गोल और मांस से भरा दांया हाथ सर के पीछे था। इस तरह हाथ उठ जाने से उसके कंधे के नीचे का हिस्सा दिख रहा था। वह सपाट, सापफ और बिना सलवटों का था। उसके दो नन्हें स्तन ऊपर की ओर उठे और दोनों ओर थोड़ा सा झुके थे। उसका बांया हाथ पैरों के बीच था। इस हाथ की उंगलियाँ मुड़ी थीं। अंगूठा उससे अलग था। पफैला हुआ दांया पैर द्घुटने से अंदर की ओर थोड़ा मुड़ा था। इस द्घुटने के ऊपर पूरा बांया पैर रखा हुआ था। उसकी जांद्घें मोटी और केले के तने की तरह गोल और चिकनी थीं। उसके हल्के रोएं चमक रहे थे। उसका बांया पंजा दिख रहा था। तलुए की गद्दी अंदर धंसी हुयी थी। उसकी नाभि तालाब की तरह गहरी थी। स्तनों और नाभि के बीच भी एक गड्ढा था। उस पर एक चमक ठहरी हुयी थी। उसके सामने की दीवार पर एक लैंडस्केप लगा था। कत्थई, हल्के हरे और नीले रंग का। उसमें कुछ कच्चे मकान... धूल भरी कच्ची सड़क... तीन पेड़... थोड़ा सा पानी और उसके बाद द्घास के मैदान थे। लड़की के नन्हें और गोल चेहरे पर निर्वस्त्रा होने की कोई लज्जा नहीं थी। वहाँ एक ठंडा दर्प था। अपने सौंदर्य, अपनी तराशी हुयी देह की शक्ति का बोध और आश्वस्ति थी। उसमें विजय और अभिमान का अहंकार था। वह चित्राकार को एक साम्राज्ञी की तरह कृतज्ञ करने के भाव से देख रही थी। उसकी जांद्घों के मोड़ और होंठ की मुस्कराहट चित्राकार की उपस्थिति को नगण्य बता रही थी। उसकी रोशनी पफेंकती देह बता रही थी कि वह यह जानती है कि उसका जीवन अपने पवित्रातम, अपने श्रेष्ठतम रूप में उसकी देह में ही है। इसीलिए उसकी आँखों में प्रेम नहीं था... उत्सुकता... शांति... वीतराग नहीं था। मैथुन के पहले की उत्तेजना या बाद की
शिथिलता भी नहीं थी। उसके चेहरे पर जीवन को समझ लेने की सतर्क चेतना थी। देह में उस आदिमराग का निरंकुश नर्तन था जहाँ सब कुछ देहातीत हो जाता था।
वाम ने न८ार झुका कर दीवार से चिपकी लड़की को देखा। वाम के अंदर उसके लिए गहरी करुणा जागी। लड़की को पता नहीं था कि दो सौ साल पहले उसकी देह बनायी जा चुकी है।
'तुमने कभी प्रेम किया है?' वाम पफुसपफुसाया
'नहीं'... लड़की ने कहा 'मुझे प्रेम से द्घृणा है।'
वाम उदास हो गया
'तुमको दो सौ साल पहले भी प्रेम से द्घृणा थी' वाम पिफर पफुसपफुसाया। इस बार उसकी पफुसपफुसाहट, उसकी भारी साँसों, गहरी उदासी और उन दोनों के बीच पसरे चाँदनी के दलदल को पार नहीं कर पायी। लड़की ने सुना नहीं। वामगुल धीमी और रुकी हुयी आवाज में बोल रहा था।
'हम सब, हर समय में होते हैं... पर हमें यह सच पता नहीं होता। बहुत पहले बीत चुके किसी समय को हम हमेशा एक अजनबी की तरह देखते हैं, हालांकि हम उसमें जी चुके होते हैं... बिल्कुल उसी तरह, जैसे इस समय में जी रहे होते हैं। सब कुछ हमेशा वैसा ही होता है जैसा होता आया था। कहीं कुछ नहीं बदलता। हम हर समय का सबसे बड़ा सच होते हैं, पिफर भी कोई समय हमारा या हमारे लिए नहीं होता। हमसे नहीं पहचाना जाता, उसी तरह, जैसे समुद्र लहरों से होता है, पर किसी लहर से नहीं पहचाना जाता। हजारों सालों से हर लहर बार-बार उसी समुद्र में, उसी तरह लौटती है, पर वह समुद्र नहीं है। इसी तरह हम हर समय में बार-बार लौटते हैं, पर कोई समय नहीं हैं।''
लड़की ने वामगुल के मुँह से समुद्र सुना। लड़की ने दूरबीन से समुद्र देखा था। लड़की समुद्र का हरहराता शोर सुन रही थी।
वामगुल के पार नीला आकाश था। उसमें भूने जाते झींगों का धुंआ था... मसालों की गंध थी... शंख से छूटी प्रेम की गुहार थी और मटमैले चर्च की निस्पन्द दीवारों से ऊबा हुआ ईश्वर था।
'मुझे प्रेम से द्घृणा है' लड़की ने
दोहराया 'मैंने अपनी माँ को प्रेम में नष्ट होते देखा है। उस नष्ट होने में भी उसे खुशी और गर्व महसूस करते देखा है। कितना कुशल हत्यारा होता है महान प्रेम, जो उसको भी मरने का सुख देता है, जिसकी वह हत्या कर रहा होता है। ऐसा महान प्रेम सिपर्फ मनोरोगी कर सकता है। मेरी माँ मनोरोगी थी। उसने महान प्रेम किया था। उसका चिकित्सक मनोरोगी था। वही अब मेरा पति है। वह भी मुझसे एक महान प्रेम करता है।'
लड़की दीवार से चिपक कर सरकती हुयी पफर्श पर बैठ गयी। उसने अपने द्घुटने मोड़ लिए। चेहरा द्घुटनों पर टिका दिया। उसकी आँखों का पानी सतह पर आ गया था। दीवार से हटकर वाम स्टूल पर बैठ गया। लड़की कुछ देर आँखों के पानी के साथ उसे देखती रही पिफर बोलने लगी।
'तीसरी ही रात मेरे होठ चूमने के बाद अचानक वह मेरे सामने द्घुटनों के बल बैठ गया। वह गिड़गिड़ा रहा था 'तुम्हारे होठ चूमने के बाद मुझे विश्वास हो गया कि मैं अपने मरीजों की बीमार, पीली और दुर्गंध भरी आत्माओं से भी ज्यादा प्रेम तुमसे करता हूँ। बिल्कुल अभी, जब मैंने तुम्हारे होठ अपने होठों में दबाए, तो मुझे समझ में आया कि जीवन तो बस यही है। इसी तरह मैं तुम्हारे होठ चूमता लेटा रहूँ। कितना रस है इनमें। तुम्हारा कितना दुर्भाग्य है कि तुम्हें अपने ही होठों का स्वाद नहीं पता। जैसे एक ताजा आड़ू या पिफर शराब में भीगा हुआ सख्त केक का टुकड़ा। मैं कभी कभी कितना लाचार महसूस करता हूँ। जैसे इस समय। काश मैं इन्हें काटकर तुम्हारे मुँह में दे सकता। और पिफर होंठ ही क्यों? तुम्हारी छातियाँ... जांद्घ... पंजे।' वह उसी तरह काँपते हुए गिड़गिड़ा रहा था। मैंने उसके बाल छुए। वह एक कुत्ते के पिल्ले की तरह चुपचाप उठ गया। उसका नीचे का होंठ लटक गया था। थूक की एक धार उसके लटके होंठ से गिर रही थी।' लड़की की आँखों से बूंदें गिरीं। लड़की हाँपफने लगी। उसने तेज गहरी साँसें लीं। अपना सर द्घुटनों से हटाकर उसने दीवार से टिका दिया। कुछ देर वह चुप रही। अपनी कमीज की बड़ी जेब में हाथ डालकर एक चाकलेट
निकाली। उसका काग़ज उतारकर उसका बड़ा हिस्सा मुँह में रख लिया। उसने अपना चेहरा पोछा पिफर थकी और धीमी आवाज में बोली। 'उसका महान प्रेम लार के साथ बह रहा था। प्रेम उसकी हत्या कर चुका था। प्रेम सिपर्फ हत्या करता है।'
'प्रेम आत्महत्या भी करता है... बल्कि अक्सर अचानक मर भी जाता है। क्यों, यह पता नहीं होता। और जब ऐसा होता है तब कुछ भी नहीं बचता, सिवाय अपने ही जीवन के प्रति एक गहरे अविश्वास के।' वामगुल स्टूल से उतर कर पफर्श पर बैठ गया। उसने अपने दोनों पैर पफैला लिए। एक बाँह स्टूल पर रख ली। उसकी दूसरी हथेली पफर्श पर थी।
'इसलिए तुम मकड़ी से उंगली डसवाते हो।... दस सिपाहियों का प्रशस्ति इतिहास लिखते हो। समय के आर-पार देख लेते हो।' लड़की ने वाम के पफैले पैर के पंजे छुए। उसकी उंगलियों पर चिपकी चाकलेट का कत्थई रंग वाम के पंजों पर लग गया।
'मुझे बताओ क्या हुआ था?' अब वह काया और माया के संधिस्थल से बोल रही थी।
वाम ने कुछ क्षण के लिए आँखें बंद कीं पिफर खोल ली।
'उस शाम हवन के धुंए और द्घी की गिरती हुयी धार के पीछे मुझे उसकी आँखें दिख रही थीं। उनमें मृत्यु की छूटी हुयी उदासी बाकी थी। उसे पता था कि मैं कुंड में हव्य डालने इसलिए बैठा हूँ कि उसे देख सकूँ। बीच में क्षण भर के लिए कभी उसकी आँखें मुझ पर रुकतीं पिफर कुंड की अग्नि देखने लगतीं। धीरे-धीरे उसकी आँखों के चारों ओर पसीने की बूंदें आ गयीं। उसकी खाल लाल होने लगी। जहाँ वह बैठी थी उसके पीछे सीढ़ियाँ ऊपर एक कमरे में जा रही थीं। हवन से पहले मैंने उसी कमरे में उससे कहा था। 'मुझे अपना स्तन देखने दो।' वह एक बड़ी चादर लपेटे थी और नहाने जा रही थी। मैं अपलक उसकी आँखों में देख रहा था। उसने कुछ क्षण मुझे देखा पिफर कंधे के एक ओर की चादर सरका दी। हल्के उजाले में देखा मैंने। वह नन्हा स्तन चन्दन लेपित था। उससे एक आभा पफूट रही थी। एक अप्रतिम आलोक। 'तेरा यह स्तन किसी ने नहीं पाया इसलिए यह सुप्त है। यस्ते स्तनः शशयो... जो किसी को नहीं मिला मुझे लेने दे।' बुदबुदाते हुए मैं थोड़ा झुका। मैंने उसके स्तन पर अपने होंठ कुछ देर रखे। रखे रहा, पिफर हटा लिए। मैंने सर उठाकर देखा। उसकी आँखें भीग गयी थीं। उनमें उदासी थी... करुणा थी... ममता थी... वैसी ही जैसी हवन के धुंए के पीछे दिखती उसकी आँखों में थी' वामगुल ने एक साँस ली। 'हवन के बाद मैं छत पर चला आया। सूनी आँखों से मैं सामने पफैली, खाली बियाबान छतों को देख रहा था। उन पर सदियों से कोई नहीं गुजरा था। उस पर कुछ नहीं था, सिवाय पक्षियों के टूटे पंख, कुछ टूटे नक्षत्रा, न सुनी गयी प्रार्थनाएँ, न दिए गए पत्रा और मृत्यु के विलम्बित राग के। हवन खत्म होने के बाद मुझे ढूंढ़ते हुए वह ऊपर आयी। मेरे पास ही छत की मुंडेर पर कोहनियाँ टेक कर खड़ी हो गयी।
'सब गए?' मैंने पूछा
'हाँ'
'तुम रुकोगे?' उसने मेरी तरपफ देखा। वह भी मुंडेर से हट गयी। हवन के धुंए और हवा की गंध उसकी देह में भरी थी। वह थक चुकी थी। गहरे दुख में थी। मेरे अंदर अचानक ऐसी देह के लिए गहरी लालसा जागी। वह कुछ देर मेरी आँखों में देखती रही।
'तुम जाओ अब' उसने कहा। मैंने सर हिला दिया। हम नीचे उतर आए। पर मुझे बाहर तक छोड़ने आयी। दरवाजे के हरसिंगार की शाखों के नीचे उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। मेरे होठों पर अपने होठ रखे पिफर हटा लिए।
'अब जीवन में मुझसे कभी मत मिलना' वह पफुसपफुसायी और चली गयी। उसने हवन के बाद सबको कुछ दिया था। यह मेरा दाय था।
'पूरी रात मैं सड़कों पर द्घूमता रहा। नगण्य... अस्तित्वहीन... निरर्थक। जागृति और स्वप्न... स्मृति और विस्मरण... आत्म और अनात्म के बीच। जीवन पर, उस सब पर विश्वास करने की कोशिश में जो हुआ था।
वामगुल ने एक सांस ली। 'मैं उससे पिफर कभी नहीं मिला' उसने सूखे होठों पर जीभ पफेरी। अपनी बाँह स्टूल से हटाकर जमीन पर रखी। अब उसकी दोनों हथेलियाँ पफर्श पर थीं। चौपाए जानवर की तरह द्घुटनों के बल चलते हुए वह लड़की के बिल्कुल पास आ गया। उसकी कमीज के ऊपर के दो बटन खोले उसने। सर झुका कर लड़की का स्तन चूमा 'बिल्कुल ऐसा ही था वह' वह बुदबुदाया।
द्घोड़ों के हिनहिनाने की आवाज छायी।
'वे ज़िंदा हैं' लड़की झुके हुए वाम के कान में धीरे से बोली। उसकी गर्म साँस के साथ दो गर्म बूंदें भी वाम की गर्दन पर गिरीं। वाम ने सर उठाया। लड़की से अलग होकर उसी तरह द्घुटनों के बल चलता हुआ वापस लौट आया।
सीढ़ियों पर तेजी से चढ़ने की आवाज आयी। दौड़ता हुआ पाकुड़ एटिक के दरवाजे पर रुक गया। बुरी तरह हॉपफ रहा था वह।
'बुढ़िया ने उनसे कह दिया। वे आ गए हैं।'


दरवाजे पर तेज दस्तक हुयी।
यह लड़की की दस्तक से अलग थी। इसमें संकोच और विनम्रता नहीं थी। यह कई हाथों की धमक से भरी थी। द्घोड़ों की हिनहिनाहट, खुरों के पटकने की, लगाम पफटकारने की आवाजें भी थीं।
वे दोनों अपने कमरे में आ गए थे। पाकुड़ कच्चा रास्ता पार करके आया। उसने दरवाजे की खिड़की खोली। अंदर पहले एक सिपाही आया, पिफर दूसरा। अंदर आकर वे दोनों एक ओर तन कर खड़े हो गए। कुछ देर बाद तीसरा आदमी अंदर आया। यह बड़ा अपफसर था। वर्दी में था। उसके कंधों पर पीतल के चमकते हुए बिल्ले लगे थे। सर की टोपी पर अशोक की लाट बनी थी। कमर की पेटी पर सुनहरा बकल लगा था। पैरों में पिंडली तक चिपके हुए मिट्टी से सने जूते थे। उसका चेहरा भारी, बदन दोहरा पर कसरती था। वह लम्बा और मजबूत था। उसके चेहरे पर मूंछें इतनी द्घनी थीं कि उसके होठ अंदर छिप गए थे। आँखों में एक वीरानी थी।
उसके अंदर आते ही द्घोड़ों का हिनहिनाना बंद हो गया।
पाकुड़ ने हथेली माथे पर ले जाकर सलाम किया। पाकुड़ की मुद्रा से जाहिर था कि अपफसर पहले भी आता रहा है। उसने अपने नथुनों को दो बार सिकोड़ कर साँस अंदर खींची।
'कैसी महक है?'
'झींगों की'
'ओह' वह हँसा 'तो आज झींगे बना रहे हो। बाहर किसकी गाड़ी खड़ी है?' कमरे की देहरी पर तब तक वामगुल आ गया था। साथ में लड़की भी थी। वाम उसको देखकर मुस्कराया। कच्चे रास्ते से होता हुआ दो सीढ़ियाँ चढ़कर वह बरामदे में आ गया। उसने वाम से हाथ मिलाया पिफर आँखें सिकोड़ कर लड़की को देखा।
'आज आप खुद गश्त पर निकले हैं?' वाम ने पूछा।
'गश्त भी... और कुछ तैयारियाँ भी। क्या चम्पगने आयी है?'
'हाँ', वाम एक ओर हट गया 'आप गश्त से पहले ले सकते हैं।'
'मापफ करिएगा' उसने लड़की को देखा 'मैं अनपढ़ नहीं हूँ पर शैम्पेन को चम्पगने ही कहता हूँ। यह भारी भरकम, मर्दों ऐसा नाम है। शैम्पेन किसी जलपरी की तरह लगता है। मुझे चम्पगने बोलते ही पहली किक मिल जाती है।'
लड़की मुस्करा कर एक ओर हट गयी। वह अंदर आ गया।
'अगर मैं गलत नहीं हूँ तो बाहर खड़ी गाड़ी आपकी है। उस पर जमी धूल बता रही है कि आप बहुत दूर से आयी हैं और कुछ देर पहले ही आयी हैं। शायद इन काग़जों में छुपा कोई खजाना ढूंढ़ने?'
लड़की ने वाम को देखा
'हाँ', वाम ने अपफसर को बैठने का इशारा किया 'यह अभी कुछ दिन रुकेंगी भी।'
'मुझे विश्वास है मैं गलत समय पर नहीं आया' वह सोपफे पर बैठ गया। उसके सामने वाले सोपफे पर वाम और लड़की भी।
'मैं ज्यादा देर नहीं बैठूंगा' उसने पाकुड़ को देखा। उनके पीछे वह भी कमरे में आ गया था। 'हालांकि झींगे मुझे बहुत पसंद हैं। इतने कि अभी कुछ दिन पहले मैंने चेकपोस्ट पर झीगों से भरी एक गाड़ी पकड़ी तो रात को उन्हीं पर सोया। यह महक भी मुझे उकसा रही है... पिफर भी मैं ज्यादा रुकूँगा नहीं'
वामगुल ने इशारा किया। पाकुड़ छोटे दरवाजे से बाहर चला गया।
पाकुड़ लौटा तो उसके हाथ में ट्रे थी। उस पर शैम्पेन की बोतल थी। बांसुरी ऐसे संकरे तीन गिलास थे। सोपफों के बीच की मेज पर ट्रे रखकर उसने वाम को देखा
'मैं जाऊँ... झींगे बुला रहे हैं'
अपफसर पिफर हँसा। 'मेरी तरपफ से भुनते हुए झींगों से मापफी मांग लेना।'
पाकुड़ उसी दरवाजे से चला गया। वामगुल उठा उसने कार्क खोला। तेज आवाज के साथ थोड़ी शैम्पेन बाहर छलकी। वाम ने तीनों गिलासों को भर दिया। खाली बोतल वापस ट्रे में लिटा दी।
पहला गिलास उसने अपफसर को दिया। दूसरा लड़की को।
'क्या हम किसी शुभेच्छा के लिए गिलास टकराएँ?' अपना गिलास उठाकर उसने अपफसर से पूछा।
'जरूर... महामहिम की कल की यात्राा सकुशल खत्म हो'' अपफसर पिफर हँसा।
तीनों ने अपने गिलास टकराए। वाम वापस सोपफे पर बैठ गया।
'सब कुछ अचानक ही हुआ' अपफसर ने कुछ द्घूंट लिए। 'अभी कुछ द्घंटे पहले पता चला कि महामहिम कल सुबह पीछे वाले पुल की जगह नए बनने वाले पुल का शिलान्यास करने आ रहे हैं। तुम जानते ही हो कि इस इलाके में कितनी गरीबी... भुखमरी... पिछड़ापन है। कुछ महीनों पहले बहुत ऊपर यह तय हुआ कि दोनों शहरों को जोड़ने वाले इस संकरे और कम इस्तेमाल के रास्ते को एक चौड़े राजमार्ग में बदल दिया जाए' उसने कुछ द्घूंट और लिए 'यही नहीं... इस राजमार्ग के दोनों तरपफ बड़े-बड़े मकान... शॉपिंग काम्पलेक्स, अस्पताल... यूनिवर्सिटी... क्लब और न जाने क्या-क्या बनेगा। इसके कई पफायदे होंगे। पुराने रास्ते के मुकाबले यह दूरी आधी रह जाएगी। दुनिया में सबसे पिछड़े हुए इस इलाके के लोगों को रोजगार मिलेगा। जिनके पास खाली, ऊसर जमीन बेकार पड़ी है उन्हें उसकी कीमत मिलेगी। जो कुछ बनेगा उसमें काम मिलेगा। वे सब, जो आज भी उसी तरह रह रहे हैं जैसे सैकड़ों साल पहले रहते थे, एक झटके के साथ इस नई तरक्की में शामिल हो जाएंगे। उनकी पूरी जिं़दगी ही बदल जाएगी। पर इसे शुरू करने में सबसे बड़ी समस्या यह पुल है। इस पुल से एक ट्रक भी नहीं गुज़र सकता। इसलिए सबसे पहले इसे तोड़कर नया और बड़ा पुल बनेगा। इस बनने वाले पुल का पहला पत्थर रखने ही महामहिम आ रहे हैं', उसके गिलास के ऊपर ठंडक से जमी बूंदें खत्म हो गयी थीं। उसने कुछ और द्घूंट लेकर गिलास खाली कर दिया 'महामहिम आ रहे हैं तो उनकी सुरक्षा के लिए पहले तो एक लम्बी गश्त करनी है, पिफर दूसरे इंतजाम भी करने हैं। कल बहुत मजमा होगा। बड़े अखबार, बड़े मंत्राी, बड़े अपफसर और विदेशों के कुछ लोग भी होंगे। द्घुड़सवारों को सलामी देने का अभ्यास भी कराना है।'
वाम और लड़की के गिलासों में अभी शैम्पेन थी। वह बेचैनी से उसके खत्म होने का इंतजार कर रहा था। बाहर द्घोड़े हिनहिनाने लगे। खुर पटकने लगे।
'बहुत दिन बाद निकले हैं इसलिए बेचैन हैं' वह हँसा। उसके अंदर सुरूर की पहली लहर उठने लगी थी। 'तुम कब तक रुकोगी?' उसने लड़की से पूछा
'अभी तय नहीं किया है।'
'वैसे तो मुझे तुम्हारे बारे में पूरी जानकारी लेनी चाहिए क्योंकि तुम अचानक और आज ही बाहर से आयी हो... बल्कि तुम्हारे सामान की... गाड़ी की तलाशी भी लेनी चाहिए' उसने लड़की को देखा 'पर मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं तुम्हारी तलाशी लूँगा तो यह बुरा मान जाएगा। मुझे चम्पगने पिलाना बंद कर देगा' वह पिफर हँसा।
'मैं जानता हूँ तलाशी में कुछ मिलने वाला नहीं है। इस इमारत में सिपर्फ पूरी दुनिया से और खुद से भी नाराज और ऊबे हुए लोग आते हैं। उनका बस चले तो सूरज के उगने और बच्चों के जन्म लेने को भी गलत सि( करके रोक दें,' उसकी बेचैनी बढ़ गयी। उसने वाम के गिलास की ओर इशारा किया 'शुरुआत हमेशा तेज करनी चाहिए।'
वाम ने गिलास खत्म करके मेज पर रख दिया। इस बार वह खुद उठा। छोटे दरवाजे से बाहर गया और शैम्पेन की दूसरी बोतल ले आया। उसी तरह सब करने के बाद उसने तीनों गिलास पिफर भर दिए। गिलास उठाकर अपफसर पीछे की तरपफ लुढ़क कर बैठ गया। माँसपेशियों को उसने ढीला छोड़ दिया। आराम के लिए और सुरूर के लिए भी। अब वह सहज और मुक्त दिख रहा था।
'सब कहते हैं शराब पीने के बाद मैं दूसरी कोटि में गिर जाता हूँ और बहुत बकबक करता हूँ... उस पर भी तुर्रा यह कि अपने ही बारे में बोलता हूँ। मैं जानता हूँ यह सब बहुत द्घटिया और उबाऊ होता है... पिफर भी... मेरी बकबक को कुछ देर बर्दाश्त कर लेना' उसने लड़की से कहा। 'वैसे मैं चुपचाप सुन भी सकता हूँ अगर तुममें से कोई बकबक करे' वह पिफर हँसा 'पर मुझे पता है तुम लिखने पढ़ने वाले लोग बहुत कम बोलते हो। सोचते ज्यादा हो... करते ज्यादा हो। खासतौर से ऐसे काम जो हमें परेशान करते हैं... इसलिए मैं ही बोलूँगा। वैसे चाहें तो हम तीनों ही चुप रह कर द्घोड़ों का हिनहिनाना सुन सकते हैं। पर यह इस शानदार चम्पगने का अपमान है जो हमें नहीं करना चाहिए। अब देखो मैंने बकबक शुरू भी कर दी' उसने दो बड़े द्घूंट लिए। उसके चेहरे की माँसपेशियाँ तन गयी थीं। वह सूजा हुआ लग रहा था। उसकी नसों में ठंडी शैम्पेन उतरने लगी थी।
'क्या तुम अपने बारे में बताना
चाहोगी?' उसने लड़की से पूछा।
'नहीं... आप हम लोगों के बारे में ठीक सोचते हैं' वह हँसी 'हमारे पास बोलने के लिए कुछ नहीं होता और होता भी है तो दूसरों के लिए गहरी नापसंदगी या पिफर उन्हें न समझ पाते हुए भी समझने का अभिनय।'
'इस सबसे मुझे द्घृणा है। बात और ज़िंदगी, दोनों इतनी सापफ और सीधी होनी चाहिए, जैसे आँतों में छुरी उतरती चली जाती है। बेहतर है तुम लोग चुप ही रहो' उसके चेहरे पर हल्की सी विरक्ति और द्घृणा की छाँह आयी जो तत्काल चली भी गयी।
'पर तुम पहले अपने कपड़े के ऊपर के दोनों बटन बंद करो। मुझे उसके अंदर कैद दोनों लाल कबूतर परेशान करने लगेंगे' वह पिफर हँसा 'लाल कबूतर... मैंने जब पहली बार सुना तो मैं पूरे दिन गरमाया हुआ द्घूमता रहा था। तुम्हें पता है मैंने कहाँ सुना था?'
लड़की ने कमीज के बटन बंद कर गिलास में चेहरा धंसा दिया।
'तुम्हें विश्वास नहीं होगा। एक जगह कुछ मजदूर रस्सों से बड़ा पत्थर ऊपर उठा रहे थे। उनका तरीका होता है कि एक आदमी गाते हुए उन्हें हुलसाता है। बाकी सब जवाब देते हैं... होइसा। मैं तब छोटा था। खड़ा होकर सुनने लगा। एक आदमी उन्हें हुलसा रहा था। वे उसे जवाब देते हुए पत्थर को उठाते जा रहे थे। हाथों को नचाते हुए वह आदमी लय में बोल रहा था। वे 'होइसा' कहकर जवाब दे रहे थे।
गाँव की गोरी
होइसा
पहने चोली
होइसा
चोली के भीतर
होइसा
लाल कबूतर
होइसा
दुई कबूतर
होइसा
जो कोई खींचे
होइसा
वही दबोचे
होइसा
शंकर खींचे
होइसा
रहमत खींचे
होइसा
झगड़ू खींचे
होइसा
बाबू खींचे
होइसा
दुई कबूतर
होइसा
उड़ न पाएँ
होइसा
पफड़पफड़ करते
होइसा
रहो दबोचे
होइसा
वह कुर्सी से उठ गया। धीरे-धीरे गोले में द्घूमते हुए गाने लगा। उसके गिलास से कुछ शैम्पेन छलक गयी। दो चक्कर द्घूमने के बाद वह रुक गया। कुछ क्षण खड़े होकर उसने साँस ली पिफर बैठ गया।
'मापफ करना... मैंने कहा था मैं पूरा दिन गरमाया रहा था। वही पिफर हुआ' उसने आँखें बंद कर लीं। कुछ द्घूंट पिफर लिए। वह बिल्कुल निश्चल हो गया। धीरे-धीरे उसने अपने को संयत किया। कुछ ही क्षणों में वह उसी तरह हो गया जैसा दरवाजे के अंदर द्घुसते हुए था। सख्त, कठोर चेहरा... भावविहीन आँखें।
द्घोड़ों के हिनहिनाने की तेज आवाज पिफर आयी। वे खुर पटक रहे थे। उनके सवार उनको गालियाँ दे रहे थे पर वे ऊपर मुँह उठाकर नथुनों को सिकोड़ते पफैलाते बेचैनी से मुँह से झाग उगल रहे थे।
'इन्हें क्या हो गया है' वह रुक गया 'ऐ...' उसने किसी अदृश्य आदमी को आवाज दी 'देखो इन मरदूदों को... उनसे कहो कि कुछ देर बाद उनकी लगामें पफटकारते हुए उन्हें चारों ओर दौड़ाया जाएगा। बेचैन न हों।'
द्घोड़े चुप हो गए। वह पिफर सोपफे पर आकर बैठ गया।
'यह बेचैनी बुरी चीज है। मैं भी कितना बेचैन हो गया था अभी' उसने लड़की को देखा 'आदमी को हमेशा पता होना चाहिए कि क्या चीज उसे इस तरह बेचैन कर सकती है। उसे उससे बचना चाहिए। जैसे मैंने किया। मैंने इसीलिए तुमसे बटन बंद करने को कहा था। मुझे अपनी इस बेचैनी के बारे में पता था' उसने गिलास मेज पर रख दिया।
'तुम यह मत समझना कि यह नशे का असर था' उसने वाम से कहा 'इसके लिए तो मैं तुम्हें चुनौती दे सकता हूँ... खैर। मैं इस खुशनुमा शाम के बदले तुम्हें एक दोस्ताना सलाह देता हूँ। तुम इस सड़क के किनारे बनने वाले आलीशान मकानों में एक पैन्ट हाउस बुक करवा लो। अभी वे इसे कौड़ियों के भाव दे रहे हैं। पर आने वाले समय में इनकी कीमत बहुत होगी। मैं तीन पैन्ट हाउस बुक करवाऊँगा। तुम चाहो तो उस दलाल को तुम्हारे पास भेज दूँ...' उसने वाम को देखा। उसकी मूंछें इतनी बड़ी और द्घनी थीं कि उसकी द्घृणा, मुस्कान या ऊब पता नहीं चलती थी। 'वे तुम्हें पैसे भी कर्ज पर देंगे। तुम चाहो तो मैं तुम्हारी जमानत ले सकता हूँ।'
'नहीं' वाम ने कहा 'बस कुछ ही दिनों बाद मेरा काम खत्म हो जाएगा। मैं चला जाऊँगा। पिफर भी... शुक्रिया'
'छोड़ो... तीसरी और आखरी चम्पगने खोलने से पहले अब काम की बात कर लें। जाहिर है यहाँ कोई हथियार तो होगा नहीं'
'है'
उसने आँखें सिकोड़कर वामगुल को देखा।
'अंदर कमरे में पीतल के दो द्वारपाल खड़े हैं... उनके हाथों में भाले हैं।'
'और?'
'बस'
'तुम्हारा ड्राइविंग लाइसेंस?' उसने लड़की से पूछा।
'गाड़ी में है'
'छोड़ो... सब ठीक ही होगा। अच्छा होगा कि कल सुबह, जब तक महामहिम नए पुल का पत्थर लगाकर न चले जाएँ, तुम लोग बाहर मत निकलो। हम नहीं चाहते कि उनकी सुरक्षा को कोई भी खतरा हो। इसका सबसे आसान तरीका यही है कि किसी को भी द्घर से बाहर निकलने न दिया जाए। थोड़ी ही देर की बात होगी। इस पुल के साथ अरबों रुपए का मामला जुड़ गया है इसलिए सब कुछ बहुत बड़ा होगा। कल मत निकलना। मेरा उस्ताद कहता था कि जब हाथी चले तो चींटियों को रास्ते पर नहीं निकलना चाहिए।'
'तुम्हारा उस्ताद मूर्ख था', लड़की का एक होठ द्घृणा से टेढ़ा हो गया। उसकी आँखों की लाली बढ़ गयी थी।
'नहीं... वह मूर्ख नहीं था।' उसने लड़की की बात का बुरा नहीं माना 'वह इस जगत के हर खेल को समझता था। मैंने सब कुछ उसी से सीखा है। यहाँ तक कि ऐसी मूंछें रखना भी। वह कहता था कि होठ इंसान की भावनाओं के सबसे बड़े इश्तहार होते हैं और एक अपफसर की भावनाएँ हमेशा छुपी रहनी चाहिए। न समझे जाने से ही वह भय पैदा करता है। इसलिए भावनाओं को झपटने वाले तेंदुए की तरह मूंछों की झाड़ी में छुपाए रहो...। तुम लोग किसी के अंदर डर पैदा नहीं कर सकते क्योंकि तुम्हारे होंठ बता देते हैं तुम क्या सोच रहे हो। क्या करने वाले हो। पर मेरे साथ ऐसा नहीं है। मैं क्या सोच रहा हूँ और अगले ही क्षण क्या करने वाला हूँ कोई नहीं समझ सकता। यहाँ तक कि वह भी नहीं, जिसकी हत्या ठीक अगले ही क्षण मैं कर देता हूँ। मेरे उस्ताद ने ही यह हुनर मुझे सिखाया है। वह मूर्ख नहीं था 'वह रुका पिफर बोलने लगा 'मेरे उस्ताद की मूंछों के पीछे एक मस्सा था जो दिखता नहीं था। उस पर कभी मक्खी बैठ जाती तो वह बहुत बेचैन हो जाता... जैसे अभी मैं हो गया था। मक्खी तभी बैठती थी जब उसके मस्से से एक खास तरह की गंध निकलने लगती थी, और यह गंध तब निकलती थी जब उसके अंदर हत्या करने की गहरी तड़प जागती थी। बाद के दिनों में मैंने उसके मस्से पर हमेशा मक्खी को बैठे देखा। वह जल्लादों के खानदान का था। वह अपनी कई पीढ़ियों के बारे में जानता था। उसके पुरखों ने जितनों को पफांसी दी, उसे उनके नाम जबानी याद थे। उन पफांसियों से जुड़े सारे किस्से भी याद थे। उन्हें सुनाकर वह कभी-कभी पूरी रात हँसता था। किस्से भी क्या थे... कभी गलत पफंदा लग जाने के... कभी प्राण न निकलने पर छटपटाने के... कभी गिड़गिड़ाने के... कभी कैदियों का पेशाब निकल जाने के... और कभी पफंदे से पहले ही डर कर मर जाने वालों के थे। उसे पफांसी देने के बहुत से तरीके पता थे। उसे पफंदे की बहुत सी गांठें मालूम थीं। उन्हें वह उसी प्यार और मुग्धता से लगाता था जैसे जवान होती लड़कियाँ अपनी लटों में लगाती हैं। वह पूरी रात पफांसियों पर बात कर सकता था। अब उस्ताद की याद मुझे रुला देगी। इसलिए भी कि मैंने उसे निराश किया... उसे धोखा दिया। इसके पहले कि मैं रोने लगूँ बेहतर है तुम तीसरी चम्पगने खोल लो। पिफर मैं यहाँ से जाऊँ और कल की तैयारी करूँ।'
वामगुल उठ गया। अभी उसके सुरूर में कमी थी। लड़की की आँखों से सुरूर पता चल रहा था। वामगुल तीसरी शैम्पेन ले आया।
'मेरा वायदा है कि यह आखरी गिलास है। वैसे भी इससे ज्यादा पिऊँगा तो मैं भी इन मरदूदों की तरह हिनहिनाने और खुर पटकने लगूँगा।'
वामगुल ने पिफर तीनों गिलासों को भर दिया।
'क्या धोखा दिया?' लड़की ने पूछा।
'उसने मुझे सिखाया था कि किसी की भी हत्या करते समय अपने अंदर द्घृणा की भावना मत रखना। क्रोध की भी नहीं। बदले की भी नहीं। बल्कि कोई भावना ही मत रखना। शांत... निर्लिप्त... जैसे समाधि में होता है कोई। जैसे कसाई करता है। अपना धर्म... अपनी रोजी... अपना ईमान समझकर। हत्या करते समय भी तुम्हारे अंदर करुणा होनी चाहिए। मौत की आहट मौत से भयानक होती है। तुम किसी हँसते... खिलखिलाते आदमी को अचानक मार दो तो तुम सचमुच उदार हो... दयालु हो। तुम्हारे अंदर अभी गहरी करुणा बची हुयी है। गरुड़ को देखो कभी। कोई भी हो। कितनी खामोशी से हवाओं में तैरता हुआ वह ऊपर से शिकार पर झपटता है। शाखों में दुबका बंदर का बच्चा, चट्टानों की दरार से झाँकता साँप... लहर के नीचे नाचती मछली... झाड़ी में सोया खरगोश... किसी को पता नहीं चलता कि अगले ही क्षण मृत्यु है। मृत्यु का आतंक, आहट कुछ नहीं। और पिफर कितनी खामोशी और धैर्य से वह उसे पंजों में दबोच कर हवाओं में ले जाता है... उसकी गर्दन मरोड़ता है। गरुड़ की करुणा किसी भी हत्यारे के धर्मग्रंथ का पहला पाठ होना चाहिए।' उसने साँस ली, कुछ द्घूंट लिए।
'पर मैंने उसे धोखा दिया। मैं ऐसा नहीं कर पाया। मुझे हत्याओं में सुख मिलने लगा। मैं हत्या करने के बहाने ढूंढ़ने लगा। एक बार मैंने एक आदमी को सिपर्फ इसलिए पफांसी दी क्योंकि उसने सपना देखा था कि वह मेरा गला उतार रहा है। मैंने उसे जब इस जुर्म में पकड़ा तो वह पफटी आँखों मुझे देख रहा था। उसके सर के बाल खड़े हो गए थे। वह पिल्ले की तरह कांप रहा था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि सपने में किसी का कत्ल करना भी कोई जुर्म है। मैं उसे जब उसका जुर्म समझा रहा था तो मुझे उसमें भी मजा आ रहा था... किसी को जिबह करने से पहले चाकू तेज करने का मजा। वह द्घुटनों के बल जमीन पर बैठा दोनों हाथ जोड़े सुन रहा था। मैं उसके मन से और अपने भी, यह निकाल देना चाहता था कि मैं कोई अन्याय कर रहा हूँ। मैंने उसे बताया कि अगर तुम मेरी हत्या करने की इच्छा रखते हो, ऐसा सोचते हो, तो तुम उतने ही दोषी हो जितना मेरी हत्या करने वाला
होगा। हमारे खिलापफ सोचना भी अपराध है। तुम्हारी आत्मा... मस्तिष्क सब हमारे गुलाम होने चाहिए। इसलिए तुम्हारे सपने भी। तुम्हारा सपना अगर हमारे खिलापफ बगावत करता है, तो इसके जिम्मेदार तुम हो कि तुमने अपने सपने को इतनी
आजादी दी। उसमें इतना साहस पैदा होने दिया। तुम तो उससे भी बड़े गुनहगार हो जो मेरी हत्या करता, इसलिए कि वह तो सिपर्फ एक बार मेरी हत्या करता... पर तुम अपना सपना दूसरों को बताकर, उसे बांट कर, उनके अंदर भी वैसे ही सपनों को जन्म देते हो। मेरी हत्या अनेक जगह करते हो... उसके निशान छोड़ते हो। तुम्हारी मौत ऐसी होनी चाहिए जिसमें तुम्हारे शरीर के साथ तुम्हारे सपने की मौत भी दिखे। तुम्हारी पफटी और उबल कर निकली हुयी आँखों के बाहर वह सपना दम तोड़ता दिखे। डरो मत। मैं न्याय करूँगा। मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूँगा जो एक दयालु... नेक और न्यायप्रिय हत्यारे को नहीं करना चाहिए। मैं तुम्हें नहीं... तुम्हारे सपने को पफांसी दूँगा। मैं मजबूर हूँ। तुम्हारा सपना अगर सिपर्फ तुम्हारी आँखों के अंदर ही रहता, तो मैं उनमें गर्म सूजा भौंक देता या उन्हें हमेशा के लिए सिलवा देता। पर ऐसा नहीं है। जो सपने सिपर्फ तुम्हारी आँखों के अंदर ही होते हैं वे आँख खुलते ही मर जाते हैं। कोई उन्हें दूसरों को नहीं बताता। पर जो आत्मा के अंदर पलने लगते हैं... नसों में खून के साथ दौड़ने लगते हैं, उन्हें आदमी हमेशा दूसरों के अंदर भी उतारता चलता है। अब यह तुम्हारा दुर्भाग्य और मेरी मजबूरी है कि इसके लिए मुझे तुमको पफांसी देनी होगी। इस तरह, कि मैं अपनी आँखों से देखूँ कि तुम्हारी आँखों में तुम्हारी आत्मा दम तोड़ रही है... यानी तुम्हारा सपना सचमुच मर रहा है। यही हुआ भी। बाद में उसकी आँखें पफटकर बाहर निकल पड़ी थीं। पर मैंने अपने उस्ताद को धोखा दिया। मैंने उसे अचानक झपटती हुयी मौत नहीं दी। मैंने कसाई की तरह निर्लिप्तता नहीं दिखायी। मैं उस समय उदार और करुण नहीं था। मैंने उसे पूरी तरह मरते देखा। उसके सामने पत्थर पर कुहनी
टिकाकर... हथेली पर सर रख कर। उसकी तड़पती देह को उसी तरह देखा। जैसे कोई नृत्य नाटिका देखता है। उसके हाथ पैर लटक गए थे। उसके हर रन्ध्र से चीत्कार निकल रही थी। आनन्द... और विजय के अहंकार से लबालब मैं गहरी द्घृणा के साथ उसे देख रहा था। मैंने धोखा दिया' वह सुबकने लगा। कुछ देर बाद उसने बाँह से अपना गीला चेहरा पोछा।
'मुझे पता था ऐसा ही होगा। चम्पगने का तीसरा गिलास... उस्ताद की यादें... मेरा पाप और हत्याओं की तिलस्मी दुनिया। मेरे साथ हर बार ऐसा ही होता है। इसलिए कि मैं झूठा और बुरा इंसान नहीं हूँ। बल्कि सच्चा और ईमानदार हूँ। जैसा हूँ वैसा बता देता हूँ। दूसरे लोग यह नहीं करते। वे जैसे होते हैं वैसे दिखना नहीं चाहते। अब मेरे गिलास में कुछ ही चम्पगने बची है इसलिए मुझे थोड़ा दार्शनिक होने का भी अधिकार है। मुझे टोकना मत... बस मेरी कुछ बकबक और सुन लो। उदारता या क्रूरता... पाप या पुण्य... नैतिक या
अनैतिक, हम नहीं हमारा समय तय करता है... या पिफर वह सब जो सदियों पहले तुम्हारी इन बदबूदार किताबों में तय करके लिख दिया गया है। वैसे देखो तो यह ठीक भी है। हमें ही यह सब तय करने की छूट मिल जाए तो कभी न रुकने वाली चीख पुकार के अलावा कुछ नहीं बचेगा। हमें उनका आँणी होना चाहिए जो सारी महान बातें, अलग-अलग पुड़ियाओं में बांधकर हमें दे चुके हैं, और जिन्हें वक्त-बेवक्त हम गोली की तरह चुपचाप गटकते रहते हैं। वैसे भी... हम हैं क्या? हम कभी, किसी समय में नहीं होते... अगर होते भी हैं तो बस समय की जेब में द्घिसे हुए सिक्कों की तरह पड़े रहते हैं जिनकी सारी चमक उतर गयी है। कीमत खत्म हो चुकी है। केवल खनकते रहते हैं। समय में वे होते हैं जिन्हें उस समय में दर्ज कर दिया जाता है। और यह काम तुम लोग यहाँ ढहते हुए खंडहरों के सन्नाटों में चुपचाप करते रहते हो। भांडों वाले चमकीले लिबास पहनकर, अत्यंत गंभीर मुद्राओं में सत्य की खोज का स्वांग करते हुए... ईश्वर की असली और इकलौती औलाद होने का दावा करते हुए।'
आखरी द्घूंट लेने के लिए उसने पूरा गिलास मूंछों के अंदर पलट दिया। रोने से निकले आँसू और ज्यादा बोलने से बनी लार आखरी द्घूंट के साथ अंदर चली गयी। खाली गिलास उलटा कर उसने दोनों हथेलियों से चेहरे को पोछा। सर को दो झटके दिए।
'मुझे सचमुच देर हो गयी। लम्बी गश्त करनी है... पर हो जाएगा। ये द्घोड़े बहुत तेज हैं। मजबूत मांसपेशियों और हल्के खुरों वाले। पर सुनो...' वह एक दम से स्थिर हो गया। उसका हथेलियों का चेहरे पर द्घिसना... शरीर का हिलना सब बंद हो गया। एक क्षण बाद वह हँसा।
'यह कमाल चम्पगने ही कर सकती है। मेरा काम तो बहुत आसान हो गया... ऐ...' वह खुशी से चीखा। बाहर खड़े सिपाहियों में एक भागता हुआ अंदर आया।
'ऊपर की दूरबीन से देखो चारों ओर। हालांकि इस रात में सुर्ख केकड़ों के अलावा कौन निकलेगा'।
वह सिपाही बाहर निकल गया। सीढ़ियों पर उसके चढ़ने की आवाज आयी पिफर खामोशी छा गयी।
'सचमुच शुक्रिया। मुझे विश्वास है मैंने तुम लोगों को उबाया नहीं है। अगर मैं पिफर आया तो मुझे यही शानदार चम्पगने पिलाओगे।'

वामगुल हँसा।
'जरूर... अगर मैं ज्यादा दिन रुका।'
'नहीं... तुम रुको... जब तक चाहो बादशाहों की तरह रुको... मैं हूँ... और तुम...'
उसने लड़की को देखा, 'मुझे मापफ करना... पर मैं क्या करूँ।'
सीढ़ियों पर बहुत तेज आवाज आयी। हाँपफता हुआ सिपाही अंदर द्घुसा। उसका चेहरा पीला पड़ गया था।
'पुल पर दो द्घोड़े मरे पड़े हैं। चावल के बोरों की गाड़ी पलट गयी है। वे सब चावल बटोर रहे हैं। वे अनगिनत हैं वे आते जा रहे हैं झाड़ियों से... पुल के नीचे से... सड़क से। वे चावल के लिए लड़ रहे हैं। अपने कपड़ों में चावल भरकर द्घरों की तरपफ भाग रहे हैं।'
वह चुपचाप सिपाही को देखता रहा। उसका चेहरा पत्थर होना शुरू हो गया। वह उठ गया।
'विदा दोस्तों' उसने हथेली अपने माथे से छुआयी पिफर सिपाही की तरपफ मुड़ा 'द्घोड़े छोड़ दो'।


हिनहिनाहट, कार के इंजन, आदमियों की चीखें, लगाम पफटकारने और तराशे हुए खुरों के पटकने की आवाजें खत्म हो जाने के बाद पाकुड़ ने बाहर के दरवाजे की छोटी खिड़की बंद की पिफर कमरे में आया। उसने मेज पर रखे खाली गिलास उठा लिए। पफर्श पर शैम्पेन की खाली
बोतलें पड़ी थीं। उन्हें बाहर रखकर वह आया और चुपचाप एक ओर खड़ा हो गया। सब खामेश थे।
कुछ क्षण बाद वाम कुर्सी से उठ गया। खिड़की के बाहर उसकी नजर पड़ी। पगडंडी पर पाकुड़ की बीवी आती दिखायी दी। पीठ पर एक बच्चा बांधे थी। एक हाथ में दो मुर्गियाँ लटकाए थी। दूसरे हाथ में पोटली थी। सर पर एक गठरी थी।
'क्या मैं ऊपर देखूँ एक बार?' पाकुड़ ने पूछा
'हाँ' वाम ने द्घूम कर कहा। पाकुड़ चला गया। लड़की भी उठ गयी।
'पुल अब खुल जाएगा। पर क्या मैं सुबह भी जा पाऊँगी?'
'नहीं'
'क्या तुम्हें पहले यह पता था?'
'क्या'
'राजमार्ग या नए पुल के बारे में'
'नहीं'
'उसे पता है कि हम दूरबीन से सब देख सकते हैं। क्या वह यह भूल जाएगा?'
'क्या पफर्क पड़ता है' वाम ने लड़की को देखा 'तुम खाना खाकर सो जाओ। सुबह देखेंगे क्या हो सकता है।'
लड़की को अचानक लगा कि वह बुरी तरह थक गयी है। उसने खिड़की के बाहर देखा। चाँद आसमान का तीन हिस्सा पार कर चुका था। सीढ़ियों पर पाकुड़ के उतरने की आवाज आयी। उसी आवाज के साथ बरामदा पार करके वह कमरे में आ गया। उसकी आँखें पफैली हुयी थीं। वह हाँपफ रहा था।
'वे बहुत सारे हैं। मैंने कभी एक साथ इतने आदमी नहीं देखे। वे चावल लूट रहे हैं। लड़ रहे हैं। द्घोड़ों की लाशों के ऊपर कूद रहे हैं। लगता है वे द्घोड़ों को भी काटकर उनकी बोटियां ले जाएंगे। चावल मुट्ठी में भरते ही वे खुशी से चीखने लगते हैं। कुछ द्घोड़ों का मांस मिलने की उम्मीद में नाच रहे हैं। उनके नंगे बदन की हड्डियाँ भी नाचती हुयी दिख रही हैं। उनकी मुरझाई हुयी पीली आँखों में द्घोड़ों के मांस और उबले चावल की उम्मीदें हैं। उनके बच्चे, औरतें चावल बटोरने में उनकी मदद कर रहे हैं। मैंने उन्हें पुल के नीचे से लम्बा चाकू लेकर आते देखा है। कुछ ही देर में वे द्घोड़ों को काटकर गायब कर देंगे। पुल के नीचे से ...पेड़ों के पीछे से...पानी पर तैरती नावों से वे आ रहे हैं। वे जंगलों से...खानों से...खेतों से...श्मशानों से आ रहे हैं'.....
'वह लड़का?'
'उसे उन्होंने अलग कर दिया है। टूटा पैर लिए वह पुल की दीवार से चिपका हुआ लेटा है।'
'और ये सब?'
'अभी नहीं पहुँचे। पर पहुँचने वाले हैं। सबसे आगे अपफसर की गाड़ी है। उसके पीछे उनके द्घोड़े कच्चे रास्ते पर धूल उड़ाते चौकड़ी भर रहे हैं। उनके बदन हवा में उड़ रहे हैं। सिपाहियों के हाथों में
बन्दूकें हैं। द्घोड़ों के पुट्ठों को थपथपाते हुए वे उन्हें उकसा रहे हैं।' पाकुड़ वाम के बिल्कुल पास आ गया। उसका चेहरा सपफेद था। वाम की आँखों में देखते हुए वह टूटी आवाज में पफुसपफुसाया-
'मैंने गिना। वे दस हैं।'
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। बच्चे के रोने की आवाज आयी।
'लगता है वह आ गयी' पाकुड़ ने कहा, 'क्या खाना लगा दूँ?'
वाम ने लड़की को देखा
'मैं अभी नहीं खाऊँगी'
'रख दो' वाम ने कहा। पाकुड़ छोटे दरवाजे से बाहर चला गया।
'अब क्या होगा?' लड़की वाम के पास आयी।
'पता नहीं'
'तुम्हें पता है। तुम सब जानते हो।' लड़की ने वाम की कमीज पकड़ ली।
'तुम्हें पता था वे आने वाले हैं। तुमने शैम्पेन तैयार करके रखी थी। उसे लगातार बकबक करने दिया। उसकी किसी बात को नहीं काटा...किसी बात के लिए नहीं रोका। उसे दूरबीन से पुल देखने दिया। तुम जानते थे कि वह पुल पर मरे हुए द्घोड़े देख लेगा। तुम चाहते तो उसे दरवाजे से लौटा सकते थे। तुमने कुछ नहीं किया। सब कुछ वैसे ही होने दिया जैसे हुआ।' वह रुआंसी हो गयी। वामगुल उदासी से उसे देखता रहा। उसने वामगुल की कमीज छोड़ दी।
'तुम्हें पता था?' वाम आगे झुककर उसके बाएं कान में पफुसपफुसाया।
'क्या?'
'अपने होठों का स्वाद?'
लड़की ने सर पीछे खींच कर वाम को देखा। उसकी उदासी में गहरा वीतराग था। शैम्पेन की बूदों की नमी लड़की के होठों पर थी। लड़की कुछ देर उसे देखती रही पिफर उसने अपने गीले होठ वाम के होठों पर रख दिए। वाम के होठों में शैम्पेन से भीगी चाकलेट का स्वाद भर गया।
'तुम सो जाओ मैं देखता हूँ' वाम ने बहुत धीरे से टूटे शब्दों में कहा।
लड़की ने सर हिलाया। वामगुल कमरे से बाहर निकल गया।


एटिक में अब अंधेरा था। बुढ़िया ने चरखे पर काता हुआ सूत समेटना शुरू कर दिया था।
अंधेरे में ही वामगुल स्टूल पर बैठ गया। पुल अभी बची हुयी चांदनी में था। दूरबीन से देखा उसने। सिपाहियों के द्घोड़े़ पहुंच चुके थे। द्घोड़ों के खुरों के नीचे इंसानी शरीर थे। चीखते हुए वे इधर-उधर भाग रहे थे। भागते हुए भी रुककर चावल बटोर रहे थे। सवारों ने कमर में पफंसे चाबुक निकालकर पफटकारना शुरू कर दिया था। हर चाबुक उनकी नंगी पीठों पर खून की एक लकीर छोड़ रहा था। पुल के नीचे से कुछ आदमी ऊपर चढ़ आए। उनमें से एक के हाथ में लम्बा चाकू था। उसने चाकू तानकर सिपाही पर पफेंका। चाकू की मूठ सिपाही के चेहरे पर लगी। उसने बन्दूक की नली द्घुमा कर गोली चला दी। चाकू पफेंकने वाला हवा में उछला पिफर तड़पता हुआ गिर पड़ा। उसके गिरते ही वे सब भागने लगे। मरे हुए द्घोड़ों की लाशों को छलांगों में पार करते हुए वे चारों ओर भाग रहे थे। सिपाही पुल के एक सिरे से दूसरे सिरे तक द्घोड़े दौड़ा रहे थे। वे लोग भाग कर पुल के बाहर एक ओर खड़े हो जाते... पिफर झुंड में लौटते... पिफर भागते। थोड़ी दूर जाकर उन्होंने सिपाहियों पर पत्थर पफेंकने शुरू कर दिए। कुछ पिफर आधे पुल तक आ गए। एक ने उछल कर द्घोड़े से सिपाही को खींच लिया। वे उसे द्घसीट कर पुल के बाहर झाड़ी के पीछे ले गए। उस सिपाही के द्घसीटे जाते ही वे सब पूरी ताकत से सिपाहियों पर टूट पड़े। आगे के तीन आदमी गोलियाँ खाकर गिर पड़े। पर बाकी दूसरे द्घोड़ों तक पहुँच गए थे। उन्होंने गर्दन पकड़ कर द्घोड़ों को बैठा दिया। वे सिपाही को भी खींचने लगे। अब अपफसर आगे आया। उसने हाथ ऊपर उठाया। सारे सिपाहियों ने बन्दूकों की नली खोल दी। दो लड़के और हवा में उछले पिफर गिर पड़े। वे सब भागने लगे। इस बार सिपाहियों ने पुल की दोनों दिशाओं में द्घोड़े दौड़ा दिए। उनके चाबुक हवा में लहरा रहे थे। पीछे के सिपाही हवा में या पिफर उनके पैरों पर गोली चला रहे थे। वे सब चीखते हुए पुल से नीचे कूदने लगे। पेड़ों के पीछे भाग गए। उनकी चीखें धीमी होती हुयी चिड़ियों की आवाजों की तरह रह गयीं। कुछ ही देर में पुल उनसे खाली हो गया।
अब पुल पर मरे हुए दोनों द्घोड़े पड़े थे। पांच आदमियों की लाशें भी थीं। उनका बहता खून था। चावल के दाने थे। बेहोश पड़ा गाड़ी वाला लड़का था। लाशों को ललचायी आँखों से देखते और खुशी से चीखते हुए, पुल की टूटी मुँडेरों पर बैठते परिन्दे थे। खत्म हो रही चाँदनी थी...बारूद की गंध् थी।
वाम ने देखा। मुँडेर पर कोहनियाँ टिकाए अपफसर पुल को देख रहा था। वाम की तरपफ उसकी पीठ थी। कुछ देर बाद कोहनियाँ हटा कर वह सीधा खड़ा हो गया। उसने चारों ओर देखा, पिफर द्घूमा और सर उठा कर सीधे एटिक की तरपफ देखा। दूरबीन में वाम ने उसकी आँखें देखीं। वे बहुत पास थीं बेहद ठंडी और भावविहीन होकर वामगुल को देख रही थीं।
वामगुल दूरबीन से उठ गया। एक टूटी कुर्सी को उसने सीधा किया। मेज की धूल को बाँह से पोछकर उसकी दराज से कुछ पुराने कागज निकाले। कुर्सी पर बैठकर उसने दराज से ही एक कलम निकाली और कागजों पर झुक गया।

लिखने के बाद वामगुल जब उठा तब तक भोर की पहली रोशनी आकाश के एक कोने में दिखने लगी थी। समुद्र में छोटी नावें निकल गयी थीं। उसने सब कागज समेटे और हुक्के के नीचे दबाकर रख दिए। वापस दूरबीन पर आया वह। स्टूल पर बैठकर उसने आँखें दूरबीन पर चिपका दीं। पुल पर अब कुछ नहीं था। चमकदार सुबह के नीचे शान्त, खाली और स्वच्छ पुल दिख रहा था। उसके दोनों सिरों पर एक सिपाही खड़ा था। पुल के ऊपर से दो बकरियाँ और एक बूढ़ा गुजर रहे थे।
वाम स्टूल से उठ गया। उसने दूरबीन खींच कर दूसरी खिड़की पर रखी। झुककर दूरबीन में देखा। डूप्ले की मूर्ति पर रोशनी की पहली किरण आ गयी थी। उसके आगे चौड़ी सड़क पर समुद्र में उगता सूरज देखने के लिए, नए शादीशुदा जोड़े चट्टानों की आड़ में बैठे एक दूसरे को चूम रहे थे। चट्टानों से चिपके केकड़े वापस समुद्र में लौट चुके थे। सड़क पर गाड़ियां दिखने लगी थीं। वाम ने दूरबीन को द्घरों की ओर द्घुमाया। उसे नीले रंग वाली खिड़की दिखायी दी। वह औरत खिड़की पर झुकी अपने नाखून रंग रही थी।
वाम उठ गया। एटिक की सीढ़ियाँ उतर कर नीचे आया। पहले लड़की के कमरे में आया। मेज पर झींगे पड़े थे। वह बेसुध सो रही थी। उसके द्घुंद्घराले बाल तकिये पर बिखरे थे। बिना कोई आवाज किए छोटे दरवाजे को पार करके वह पाकुड़ के कमरे में आया। पाकुड़ भी सो रहा था। उसकी औरत सो रही थी। दोनों के बीच में एक छोटा बच्चा लेटा था। दो मुर्गियाँ टोकरी के अन्दर दुबकी थीं। सिरहाने स्टूल पर उसके अमूल्य शंखों वाली पेटी रखी थी।
वामगुल बाहर निकल आया। वह बड़े दस्तावेजी कमरे में आया। दोनों द्वारपालों के हाथ से उसने भाले निकाल लिए। एक भाला सोती हुयी लड़की के सिरहाने रख दिया। दूसरा पाकुड़ की सोती हुयी बीवी के पास। कमरे से बाहर बरामदे में आया वह। एक बार सर उठाकर उसने एटिक को देखा पिफर दरवाजे में बनी छोटी खिड़की खोल कर, बरामदे की सीढ़ियों पर बैठ गया।

 

तीसरे रेखांकन में तीन औरतें द्घर छोड़कर भाग रही थीं। उनके पीछे कटे हुए सर पड़े थे। भागती औरतों में सबसे आगे की औरत जवान थी। उसके बाएँ हाथ में छोटा बच्चा लटका हुआ था जिसे वह किसी तरह गिरने से बचाए थी। उसके दाएँ हाथ में दो मुर्गियाँ थीं। मुर्गियों को वह परों से दबोचे थी। उसके पीछे दूसरी औरत अपने कंधों पर थोड़े बड़े बच्चे को बैठाए थी। वह आगे की ओर थोड़ा झुकी हुयी थी। बच्चे को गिरने से बचाने के लिए उसके लटकते पंजों को हथेलियों से पकड़े थी। तीसरी औरत झुककर बिल्कुल दोहरी हो गयी थी। उसकी पीठ पर बड़ी गठरी थी। आगे की दो औरतों के चेहरे सापफ बने थे। उनमें भावविहीन सपाटता थी। बच्चों के चेहरों के नक्श नहीं थे। बस रेखाओं में उकेरी गयी आकृतियाँ थीं

 
 
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