अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
लेख
उपन्यास और लोकतंत्रा का पतन
विजेन्द्र नारायण सिंह
 

विभूति नारायण राय के तीन उपन्यास-'शहर में कफ्रर्यू', 'किस्सा लोकतंत्रा' और 'तबादला' स्वाधीनता के बाद भारतीय लोकतंत्रा के पतन का क्रमिक ग्रापफ प्रस्तुत करते हैं। ये उपन्यास लोकतंत्रा की विडंबना प्रस्तुत करते हैं। भ्रष्ट मूल्यों के संसार में नायक या तो अपराधी होता है या सनकी। राय के नायक अपराधी तथा भ्रष्ट नेता और अपफसर हैं। 'किस्सा लोकतंत्रा' में ही नहीं वरन्‌ 'तबादला' में भी ये इंजीनियर द्घूसखोर अपराधी ही हैं-एक सपफेदपोश अपराधी। उपन्यास विधा की यही परिणति इसे महाकाव्य से नीचे ढकेल देती है। पूंजीवाद से व्युत्पन्न व्यक्तिवाद की यह अनिवार्य परिणति है। राय के इन उपन्यासों में बुर्जुआ संसार और उसकी राजनीतिक परिणति लोकतंत्रा, भ्रष्ट और विकृत मूल्यों से रच गये हैं। शहर में कफ्रर्यू', 'किस्सा लोकतंत्रा' और 'तबादला'-ये तीनों किस्सा लोकतंत्रा ही है। ये तीनों लोकतंत्रा के ही अलग-अलग आयाम हैं। 'शहर में कफ्रर्यू' लोकतंत्रा में सांप्रदायिकता की कथा है। 'किस्सा लोकतंत्रा' अपराधीकरण के द्वारा सामंतवाद की वापसी और 'तबादला' नौकरशाह और नेता की जुगलबंदी में भ्रष्ट लोकतंत्रा के भयानक भ्रष्टाचार की कथा।

 
कोई भी उपन्यासकार अपने उपन्यास के झरोखे और महराब जिन उपादानों से बनाए उसकी अंतर्वस्तु ;ज्ीमउमद्ध उसके अपने समय की कोई महत्वपूर्ण समस्या रहती है। महत्वपूर्ण समस्या दो प्रकार की हो सकती है-एक तो संस्कृति और शील के स्तर की और दूसरे सामाजिक और राजनीतिक स्तर की। थोड़े से बहुत बड़े लेखक होते हैं जो इन दोनों स्तरों को एक साथ समेट लेते हैं और वे महाकाव्यात्मक उपन्यासों की रचना करते
 
हैं जैसे कि ांस में बाल्८ाक और रूस में ताल्सतॉय। पर इतनी बड़ी प्रतिभा जैसे कविता में दुर्लभ है वैसे ही उपन्यास में भी। हमारे साहित्य में संस्कृति और शील के स्तर के उपन्यासकार जैनेन्द्र और अज्ञेय हैं तथा सामाजिक और राजनीतिक स्तर के उपन्यासकार प्रेमचंद, यशपाल और
पफणीश्वरनाथ रेणु हैं। विभूतिनारायण राय इसी दूसरी कोटि के उपन्यासकार हैं। हालांकि उनका पाँचवां उपन्यास 'प्रेम की भूतकथा' एक अन्य प्रजाति की औपन्यासिक रचना है। तब भी राय कथाकार सामाजिक और राजनीतिक प्रजाति के ही हैं। राय ने लोकतंत्रा का क्षय करने वाले तीन तत्वों को रेखांकित किया है-सांप्रदायिकता, अपराधीकरण, भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार के दो रूप हैं-आर्थिक भ्रष्टाचार और सेक्स। आर्थिक भ्रष्टाचार और सेक्स का उपयोग सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर प्रोन्नति के लिए किया जाता है। इस प्रकार लोकतंत्रा जो सि(ांत रूप में प्रतिभातंत्रा है वह द्घूसतंत्रा अपराधतंत्रा और सेक्सतंत्रा में रूपांतरित होकर अपनी ही विडंबना बन जाता है। ये सभी आत्मानुशासन को ध्वस्त कर अधिक विरूप नव्य सामंतवाद की रचना करते हैं। साहित्य के समाजशास्त्रा के एक महत्वपूर्ण विचारक लूसिएं गोल्डमान के अनुसार उपन्यास एक विकृत या भ्रष्ट खोज का किस्सा हैऋ एक विकृत या भ्रष्ट संसार में यह विश्वसनीय, प्रामाणिक मूल्यों की खोज है।१ ये विश्वसनीय मूल्य उस समय के संसार में सामाजिक अभियोजन के सर्वस्वीकृत प्रतिमान होते हैं। भ्रष्ट मूल्यों के संसार के कारण ही उपन्यास के नायक और संसार के बीच एक अलंद्घनीय दरार बन जाती है और जहाँ नायक नहीं वरन्‌ खलनायक हैं वहाँ दरार ही दरार रहती है और केवल दरार से समाज की रचना नहीं होती है। विभूति नारायण राय के तीन उपन्यास-'शहर में कफ्रर्यू', 'किस्सा लोकतंत्रा' और 'तबादला' स्वाधीनता के बाद भारतीय लोकतंत्रा के पतन का क्रमिक ग्रापफ प्रस्तुत करते हैं। ये उपन्यास लोकतंत्रा की विडंबना प्रस्तुत करते हैं। भ्रष्ट मूल्यों के संसार में नायक या तो अपराधी होता है या सनकी। राय के नायक अपराधी तथा भ्रष्ट नेता और अपफसर हैं। 'किस्सा लोकतंत्रा' में ही नहीं वरन्‌ 'तबादला' में भी ये इंजीनियर द्घूसखोर अपराधी ही हैं-एक सपफेदपोश अपराधी। उपन्यास विधा की यही परिणति इसे महाकाव्य से नीचे ढकेल देती है। पूंजीवाद से व्युत्पन्न व्यक्तिवाद की यह अनिवार्य परिणति है। राय के इन उपन्यासों में बुर्जुआ संसार और उसकी राजनीतिक परिणति लोकतंत्रा, भ्रष्ट और विकृत मूल्यों से रच गये हैं। शहर में कफ्रर्यू', 'किस्सा लोकतंत्रा' और 'तबादला'-ये तीनों किस्सा लोकतंत्रा ही है। ये तीनों लोकतंत्रा के ही अलग-अलग आयाम हैं। 'शहर में कफ्रर्यू' लोकतंत्रा में सांप्रदायिकता की कथा है। 'किस्सा लोकतंत्रा' अपराधीकरण के द्वारा सामंतवाद की वापसी और 'तबादला' नौकरशाह और नेता की जुगलबंदी में भ्रष्ट लोकतंत्रा के भयानक भ्रष्टाचार की कथा। लोकतंत्रा के विद्घटन के ये तीन आयाम। इन उपन्यासों से संसदीय लोकतंत्रा के वेश्याकरण का सही पता चलता है। सामंततंत्रा, अपराधतंत्रा और लोकतंत्रा में कोई पफर्क नहीं रह गया है। लोकतंत्रा का वेश्याकरण सामाजिक पतन की एक प्रक्रिया के तहत चल रहा है। सांप्रदायिकता, अपराधीकरण तथा भ्रष्टाचार-ये तीनों लोकतंत्रा के शत्राु हैं। यानी इन उपन्यासों के केन्द्र में हैं लोकतंत्रा के विद्घटनकारी तत्व। जो समाज आत्मानुशासन से नियंत्रिात और निर्भय नहीं होता है वह लोकतांत्रिाक नहीं रह जाता है।
 
'शहर में कफ्रर्यू' : सांप्रदायिकता और लोकतंत्रा
 
'शहर में कफ्रर्यू' ;१९८६द्ध सांप्रदायिकता को केन्द्र में रख लोकतंत्रा के पतन को परिभाषित करने वाला राय का रिपोर्ताज शैली में लिखा गया उपन्यास है। उपन्यासकार ने बहुत ही मार्मिक ढंग से बहुसंख्यक समुदाय के बीच अल्पसंख्यक समुदाय के भय का विवरण प्रस्तुत किया है। शहर में संप्रदाय के आधार पर आबादी का बंटना लोकतंत्रा की छाती पफटने जैसा है। छुरा व्यक्ति की ही नहीं, पूरे समाज की पसली में समा जाता है। सांप्रदायिक माहौल का जहर वृत्तांत के द्वारा पूरी रचना में पफैल जाता है। यह वर्णनकला की सिपफत है।
१९८० के दशक से हिन्दू बुनियादपरस्ती के उत्कर्ष से अल्पसंख्यक और भी अधिक रक्षात्मक मुद्रा में आ गए। यह उपन्यास इलाहाबाद में हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगे की पृष्ठभूमि में रचा गया है। इस उपन्यास का वर्ग-आधार ठीक-ठाक बुना गया है। हिन्दू हो या मुसलमान दोनों संप्रदाय में निम्न मध्यवर्ग ही तबाह होता है। यह उपन्यास सबालटर्न की कहानी है :
सबालटर्न के कमजोर आर्थिक आधार की कहानी। अल्पसंख्यक समुदाय के कमजोर आर्थिक आधार को उपन्यासकार ने ठीक से उन्मोचित किया है। लोकतंत्रा में मुसलमानों के जीवन की तंगी कफ्रर्यू में और अधिक बदहाली का कारण बनती है। हाड़तोड़ मेहनत कर ये मुसलमान मुश्किल से दो जून खाना जुटा पाते हैं। उसमें कफ्रर्यू से उत्पन्न कठिनाई जीवन को और नरक बना देती है। निम्न मध्यवर्ग के अल्पसंख्यक की कथा बुनने में स्थान
संकोच के कारण सईदा के दाम्पत्य की कठिनाई का विवरण बहुत ही बेधक और मार्मिक बन पड़ा है। इस दुख के साथ ही दूसरा बड़ा दुख संडास का है। ये दोनों कठिनाइयाँ उस द्घर के बासिंदों का जीवन नरक-सा बना देती हैं। गाँव के पफैलाव में यह अभाव नहीं रहता। कफ्रर्यू के समय संडास की समस्या को लाना एक कलात्मक सूझ है। उठाऊ संडास की बदहाली, बच्ची की मौत और एक अनाम लड़की के साथ जद्घन्य बलात्कार-ये तीन इस उपन्यास के सबसे मार्मिक प्रसंग हैं। गरीब के लिए कपफन-दपफन भी बहुत मुश्किल है। सईदा की बच्ची के अंतिम संस्कार के इर्द-गिर्द उपन्यास का सबसे मार्मिक प्रसंग रचा गया है। सईदा के परिवार का जीविका के लिए जद्दोजहद तथा अंतिम संस्कार की अमानुषिक यातना ने कथा को कापफी मार्मिक बना दिया है।
लोकतांत्रिाक मूल्यों का ग्रापफ ऐसे नीचे गिरा है कि वैमनस्य ही इन दोनों संप्रदायों को परिभाषित करने का व्यावर्तक लक्षण बन गया। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब सांप्रदायिकता उभार पर आने लगी तब मुसलमानों की असुरक्षा भावना को तेलुगु कवि खादर मोहीउद्दीन ने इन शब्दों में व्यक्त किया है :
डल तमसपहपवद पे बवदेचपतंबल
डल चतंलमत उममजपदहे ंतम ं बवदेचपतंबल
डल सलपदह ुनपसज पे ं बवदेचपतंबल
डल ंजजमउचज जव ूांमनच पे ं बवदेचपतंबल
डल कमेपतम जव ींअम तिपमदके पे ं बवदेचपतंबल
डल पहदवतंदबमए उल इंबाूंतकदमेए ं बवदेचपतंबल
और तब मोहीउद्दीन अपने ही देश में शरणार्थी बनने की पीड़ा का यों बयान करते हैं :
प्ज पे दव बवदेचपतंबल
;वित जीम भ्पदकनद्ध जव उांम उम ं तमनिहमम
पद जीम अमतल बवनदजतल वि उल इपतजी
प्ज पे दव बवदेचपतंबल
जव चवपेवद जीम ंपत प् इतमंजीम
ंदक जीम ेचंबम प् सपअम पद
प्जश्े बमतजंपदसल दव बवदेचपतंबल
जव बनज उम जव चपमबमे
ंदक जीमद पउंहपदम ंद नदबनज ठींतंज२
मोहीउद्दीन से लगभग एक दशक पहले विभूति नारायण राय ने लगभग इसी अंदाज में अल्पसंख्यक मुसलमान संप्रदाय के दर्द का आख्यान 'शहर में कफ्रर्यू' में प्रस्तुत किया। संद्घ परिवार वालों का ताना सुनकर वे और भी शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन हिलाने लगे। युवा मुसलमान धर्म में शरण ढूंढ़ने लगे। गरीबी और उत्पीड़न से राहत वे इस्लाम में ढूंढ़ने लगे। असल में अच्छा रचनाकार न हिन्दू होता है न मुसलमान होता है। यदि वह मनुष्य नहीं है तो वह रचनाकार नहीं है। ईमानदारी रचनाकार की एक बड़ी विशेषता होती है। विभूति नारायण राय की यह ईमानदारी एक बहुत बड़ी ताकत है। तसलीमा नसरीन ने जिस ईमानदारी से मुस्लिम सांप्रदायिकता को उजागर करने के लिए 'लज्जा' लिखी, उसी प्रकार राय ने हिन्दू सांप्रदायिकता का अमानुषिक रूप '...कफ्रर्यू' में चित्रिात किया है। यह निर्मम तटस्थता ही रचनाकार की असली ताकत है। 'शहर में कफ्रर्यू' के कदाचित्‌ दस संस्करण अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। यानी यह उपन्यास राय के उपन्यासों में सबसे लोकप्रिय हुआ है। कथाकार हिन्दू और मुसलमान दोनों संप्रदायों के बीच तटस्थ है। वह एक तटस्थ पर्यवेक्षक की तरह अमानुषिक कृत्य का विवरण प्रस्तुत कर रहा है। इस रिपोर्ताज शैली ने ही कदाचित्‌ उसे प्रामाणिकता दी है। चूंकि मुसलमान अपेक्षया कम संख्या में हैं और आर्थिक रूप से हिन्दुओं की अपेक्षा कापफी गरीब हैं, इस कारण इन झगड़े-पफसादों में मुसलमान ही अधिक हानि उठाते हैं। अधिकांश दंगों में हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमान अधिक मरते हैं और हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों के अधिक द्घर जलाये जाते हैं। चूंकि बुनियादपरस्त हिन्दू बार-बार पाकिस्तानी कहकर उन्हें ताना देते हैं। सांप्रदायिकता लोकतंत्रा की छाती में एक दरार है। असल में धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्रा की आधारशिला है। जो लोकतंत्रा नहीं वह पफासीतंत्रा बन जाता है। एक बहुलतावादी राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष हुए बिना न देश रह जाता है न राष्ट्र। सांप्रदायिकता से राष्ट्र की छाती पफट जाती है। राय ने इस उपन्यास में हिन्दू सांप्रदायिकता के संदर्भ में मुसलमानों की नियति का विवरण देते हुए लिखा है : ''मसलन शहर का एक हिस्सा पाकिस्तान बन गया और उसमें रहने वाले पाकिस्तानी।''३ 'शहर में कफ्रर्यू' का नितितार्थ यही है।
 
'किस्सा लोकतंत्रा' : राजनीति का अपराधीकरण
 
भारतीय लोकतंत्रा के पतन का दूसरा कारण है राजनीति का अपराधीकरण। जर्मन समाजशास्त्राी मैक्सवेबर ;डंग ॅमइमतद्ध ने प्रसंगात्‌ लिखा है : ''ण्ण्ण्जीमतम ंतम जूव ूंले वि उांपदह चवसपजपबे वदमश्े अवबंजपवद म्पजीमत वदम सपअमे वित चवसपजपबे वत वदम सपअमे श्वि पजण्श्श्४ भारतीय नेताओं की पहली पीढ़ी राजनीति के लिए जीती थी। वे सेवा और बलिदान की भावना से उत्प्रेरित रहते थे। लेकिन अब जो पीढ़ी है वह राजनीति से प्राप्त सत्ता और सम्मान के प्रति आकर्षण रखती है और आर्थिक लाभ उनका मुख्य लक्ष्य होता है। वे समझते हैं कि राज्य की व्यवस्था पर अधिकार प्राप्त करने से उन्हें अकूत संपदा हासिल हो सकती है। अब राजनीति एक गंदा व्यवसाय बन गयी है। उसका एक अपराधी वर्ग ;नदकमतूवतसकद्ध है। अब अपराधी छवि के प्रत्याशी चुनाव जीतने लगे हैं और मंत्राी भी बनाये जाने लगे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में यह प्रवृत्ति १९८० के बाद बहुत बढ़ती गई। इन प्रदेशों के नेताओं पर हत्या, अपहरण, बलात्कार और डकैती के आरोप होते हैं। न्याय प्रक्रिया की जटिलता और सुदीर्द्घता के कारण ये जमानत पर छूट जाते हैं और सबको डरा-धमकाकर मत बटोर लेते हैं। बंगाल के गाँवों में अनुसंधान करने वाले नार्वे के एक नृतत्वशास्त्राी ने पाया कि गाँव के लोग राजनीतिज्ञों को नुंगरा ;गंदाद्ध कहते हैं। उनको वे गालागाली, मारामारी और गंडगोल करने वाला कहते हैं।५ भारतीय लोकतंत्रा के पतन पर केंद्रित विभूति नारायण राय का दूसरा उपन्यास 'किस्सा लोकतंत्रा' ;१९९३द्ध है। यह उपन्यास लोकतंत्रा के अपराधीकरण की कथा है। इस उपन्यास का नायक ;खलनायकद्ध पी.पी. ;प्रेमपाल यादवद्ध एक अपराधी चरित्रा का व्यक्ति है। हमारे समाज में अपराधियों की संख्या अधिक होने का कारण व्यक्तिवादी सि(ांत का प्रसार होता है। सभी लोगों को सपफलता सरलता से नहीं मिलती है। पी.पी. बॉल्जक के वॉटरिन ;टंजनतपदद्ध की तरह आधुनिक व्यक्तिवाद की देन है। कदाचित्‌ कथासाहित्य में पहला अपराधीनायक डेनियल डिपफो का मॉल फ्रलैन्डर्स है। उसी का अगला सोपान बाल्८ाक का वॉटरिन है। प्रेमपाल या पी.पी. की यह धारणा है कि आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रा में उपलब्धि उसे अपने ही बाहुबल से प्राप्त करनी है और इसके लिए वह हर उपाय काम में लाता है। पी.पी. के अपराधों की जड़ में आर्थिक व्यक्तिवाद है। पी.पी. के कारनामों का आधार मूल्य का विद्घटन है। राय के पात्रा व्यभिचारी, ठग या छुटभैया नेता हैं-ये मध्यवर्ग के द्घिनौने चेहरे हैं। ये साधन और साध्य की नैतिकता को तिलांजलि देने वाले लोग हैं। इस कथा की रचना का व्यक्तिवाद के प्रसार से सीधा संबंध है। इस परिवर्तन से समकालीन नागरिक सभ्यता का विशिष्ट रूप से उद्द्घाटन हुआ। इस समाज में अपराधी वर्ग का उत्थान हुआ। राष्ट्रीय संपदा का अपहरण इसका लक्ष्य है। व्यक्तिवाद व्यक्ति की ठोस आकांक्षाओं की पूर्ति से निष्पन्न होता है। राजनीति में बाहुबलियों का वर्चस्व लोकतंत्रा में सामंती मानसिकता की द्घुसपैठ में निहित है। लोकतंत्रा एक ऐसा मूल्य है जो आत्मनियंत्राण से रचा जाता है। लोकतंत्रा का अपराधीकरण 'किस्सा लोकतंत्रा' की अंतर्वस्तु है। यह अपराधीकरण पूंजीवाद के स्वरूप में ही अंतर्निहित है। लोकतंत्रा पूंजीवाद की राजनीतिक व्यवस्था है। अपराधीकरण छोटी राह से संपत्ति प्राप्त करने का भोगवादी विकल्प है। पूंजीवाद और भोगवाद में नजदीकी रिश्ता है। हिन्दी में 'अल्मा कबूतरी' ;मैत्रोयी पुष्पाद्ध जैसे उपन्यास पूंजीवाद के विचलन का क्रिटिक प्रस्तुत करते हैं। अपराधीकरण के मूल में पूंजीवाद का चरित्रा है। अपराध का मूल पूंजीवाद के शील में निहित है। उन्नीसवीं सदी के यूरोप में जब पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का गठबंधन हुआ तब त्वरित संपत्ति प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई और औद्योगिक समाज के समानांतर अपराधीकरण से उत्पन्न समाज का भोगवाद की लालसा के कारण विकास हुआ। उन्नीसवीं सदी में अपराधीकरण का भी विकास पूंजीवाद की इसी प्रकृति के कारण हुआ जिसका प्रवर्तक एडगर एलेन पो माने जाते हैं और जिसका प्रथम क्लासिक आर्थर कानन डायल ने रचा। अपराधकथा पूंजीवादी समाज का गोश्त है। लगभग पूरा उपन्यास जगतपाल और पी.पी. के अपराधीकरण का पूर्ण इतिवृत्त प्रस्तुत करने के लिए पूर्वदीप्ति ;थ्सेंीइंबाद्ध प(ति में लिखा गया है। राय के पाँच उपन्यासों में एक यह 'किस्सा लोकतंत्रा' और 'प्रेम की भूतकथा' दो ऐसे उपन्यास हैं जो पूर्वदीप्ति प(ति में लिखे गये हैं। अपराधपरक समाज भय पर आधारित होता है। लोकतंत्रा का मूलमंत्रा निर्भयता है। यह मंत्रा ही लोकतंत्रा में गायब हो गया है। इस कारण लोकतंत्रा की रीढ़ ही टूट गई है। पत्राकारों को अपमानित करते हुए पी.पी. शराब पीता रहा। वामपंथी हर प्रसाद बागी का पतन करुण है : भारत में वामपंथ के पतन के साथ इसका सादृश्य है। वामपंथ के पतन के साथ हर प्रसाद बागी का पतन जुड़ा हुआ है। पत्राकार लोकतंत्रा का प्रहरी होता है और अगर यह भी बिक जाता है तब कोई बचता नहीं है जो पूंजीवाद से संद्घर्ष कर सके। ऐसी स्थिति में लोकतंत्रा ठंदंदं त्मचनइसपब बन जाता है। अपराधीकरण के कारण लोकतंत्रा पतनशील सामंतवाद में रूपांतरित हो गया है। हर प्रसाद बागी उपन्यास के अंत में द्घोर अंधकार में आशा के केन्द्र के रूप में उभरता है। उसके चरित्रा में विकास के सूत्रा हैं। पत्राकारिता के आरंभिक जीवन में उसने कम्युनिस्ट पार्टी में एक उत्साही की तरह काम किया था और बुर्जुआ लोकतंत्रा के विचलन से जुड़ा था। बाद में पार्टी के सै(ांतिक पतन के साथ उसका भी नैतिक पतन हो गया। वह आत्मा को खोता गया और सुख बटोरता गया। पी.पी. ने जब जबरन भारद्वाज और गुप्ता को अपमानित किया तब बागी की आत्मा जग जाती है और यह बागी उस दुर्दांत अपराधी के खिलापफ सीना खोलकर खड़ा हो जाता है। उपन्यासकार जब रोमन साम्राज्य के सम्राटों की बर्बरता की छवि इन अपराधियों की बर्बरता के समझौता में रचता है तब लोकतंत्रा के छद्म का सही चेहरा सामने आ जाता है। बागी के चरित्रा में यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं है वरन्‌ उसके मूल रूप का उधर जाना है। बागी कचहरी जाते हुए पी.पी. के नामांकन वाले जुलूस के आगे सीना खोल कर खड़ा हो जाता है और प्रतिरोध के स्वर में अनवरत्‌ बकने लगता है। बागी का प्रतिरोध निराशोन्मत है पर ऐसे ही सनकी प्रतिरोध से पिफजाँ बदलती है। साहस अपने आप में महाकाव्यात्मक होता है। साहस की त्राासदी की अपनी गरिमा होती है। पी.पी. मापिफया है। शराब की तस्करी करता है और कत्ल और लूट से वह धन एकत्रा करता है। पुलिस और प्रशासन की सुरक्षा प्राप्त करने के लिए वह चुनाव लड़ता है। यानी लोकतंत्रा की राजनीति अपराधी का सुरक्षा कवच बन जाती है। अपराध की दिशा में लोकतंत्रा का यह विकास निरंतर होता रहा है। विधायिका और संसद में नामजद अपराधी चुनकर आ जाते हैं। और इस प्रकार नेता और प्रशासन का अमानुषिक गठबंधन तैयार हो गया है। ये अपराधी नेता नये मूल्य की रचना कर रहे हैं। 'पी.पी. की मान्यता पहले भी यही थी और अब और पुख्ता हो गयी कि
शरापफत से ज्यादा द्घटिया ओर कोई चीज इस दुनिया में नहीं है।' किसी के बेटे की हत्या पी.पी. कर देता है और उसके बाप को धमका कर उससे अदालत में हलपफनामा दिलवा देता है कि उसे मारनेवाला पी.पी. नहीं था। इस तरह हर मापिफया हत्यारा अदालत के जाल से निकल जाता है और विधायिका और संसद में पहुँच जाता है। लोकतंत्रा एक मूल्य है और उसका महत्व आत्मानुशासन और मर्यादा में निहित है। पर चुनाव में भ्रष्टाचार हावी हो गया, बूथ पर कब्जा कर लेना आम बात हो गयी और राजनीति लुच्चों और लपफंगों का खेल बन गयी है। स्वच्छ चुनाव जो कि लोकतंत्रा का निकष है वह पैसा, शराब और अपराधीकरण के द्वारा सामंततंत्रा में बदल गया है। उपन्यास में एक प्रसंग है जब पी.पी. चुनाव में उतरने के पहले पत्राकारों को संबोधित कर रहा था तब एक पत्राकार ने उससे मसखरी से पूछा कि ''यादव जी, अपना चुनाव निशान क्या रखेंगे-बम या कट्टा।'' यह मसखरी १९८० के दशक से भारतीय लोकतंत्रा का सच बन गया। पी.पी. जब जेल जाता है तब अपराधतंत्रा की संरचना को समझता है। यह अपराधतंत्रा ही लोकतंत्रा का कुष्ठ रोग है। नेता और अपराधी के बीच न केवल रिश्ते-प्रगाढ़ हो गये हैं वरन्‌ अपराधी ही नेता बन गया है। पुलिस और प्रशासन जो कानून के प्रहरी हैं, उनकी गिरफ्रत में आ गये हैं। कानून के प्रहरी उनका मुँह जोहते हैं। अब राजनीति का एक अपराधी वर्ग है। अपराधी छवि के लोग प्रत्यक्ष चुनाव जीतने लगे और मंत्राी भी बनाये जाने लगे। राजनेता विचारक किशन पटनायक ने यों लिखा है, ''राजनेता-अपराधी संबंध भी मामूली स्तर को पार कर चुका है, उस स्तर को पार कर चुका है, जहाँ राजनेता यदाकदा मजदूर आंदोलन को दबाने के लिए या चुनाव जीतने के लिए अपराधियों का इस्तेमाल करता था। लेकिन अब? राजनैतिक सत्ता को आधार बनाकर अपराधियों के गिरोह संगठित हो रहे हैं और राजनेता इन गिरोहों के सदस्य हैं। बहुत सारे अपराध इस प्रकार द्घटित हो रहे हैं जो सत्ता के प्रत्यक्ष सहयोग के बगैर संभव नहीं हैं। अनेक हत्याएँ, अनेक बलात्कार और अपहरण की द्घटनाएँ इसी कोटि की हैं।''६ 'किस्सा लोकतंत्रा' में मानवीय मूल्य को अहमवादी मोलभाव के बपर्फीले पानी में डुबा दिया गया है। धार्मिक शोषण की जगह इसने नंगे, निर्लज्ज और बर्बर लूट को स्थापित कर दिया है। इस उपन्यास में राय पी.पी. की किशोरावस्था के प्रसंगों का सुविस्तार विवरण प्रस्तुत करते हुए वह मनोवैज्ञानिक आधार समझा देते हैं जो व्यवहार का नियमन करते हैं। इस उपन्यास का खलनायक मध्यकाल के बहशी राजकुमारों की तुलना में छिछोरा और द्घिनौने लगता है। नगद नारायण वाले समाज में ऐसे ही खलनायकों का निर्माण संभव है। यह उपन्यास समकालीन राजनीति में लोकतंत्रा पर एक यथार्थवादी टीका है। भारत के लोकतंत्रा के रोमांचकारी पुनर्जन्म के साथ ही उसकी भ्रूण हत्या हो गई। यह भारतीय लोकतंत्रा की इसी त्राासदी का गल्प है।
 
'तबादला' : द्घूस के तंत्रा का क्रिटिक
 
लोकतंत्रा के पतन का तीसरा कारक है भ्रष्टाचार यानी द्घूसखोरी। यह लोकतंत्रा को द्घुन की तरह खा जाता है। भारत में भ्रष्टाचार बहुत ही व्यापक है। केवल विधायिका में ही नहीं वरन्‌ प्रशासन और न्याय-व्यवस्था में भी। पहले यह नौकरशाही के निचले स्तर पर ही था पर यह अब नौकरशाहों के ऊपरी तबके में आयुक्त और सचिव के स्तर तक भी पहुँच गया है। चूंकि अपफसर की अकर्मण्यता और अयोग्यता की सजा भ्रष्टाचार के कारण नहीं दी जा सकती है, इस कारण उनका कोई उत्तरदायित्व नहीं रह गया है। भ्रष्टाचार कहीं-न-कहीं राज्य की अवधारणा में ही निहित है। अर्जेंटीना के प्रसि( कथाकार जॉर्जलुई बोर्जेज ;श्रवतहम स्वनपे ठवतहमेद्ध ने अपने देश के संदर्भ में लिखा है, ''ण्ण्ण्जीम ेजंजम पे पउचमतेवदंसए जीम ।तहमदजपदम बंद बवदबमपअम वदसल वि चमतेवदंस तमसंजपवदेण् ज्ीमतमवितमए जव ीपउए तवइइपदह चनइसपब निदके पे दवज ं बतपउमण् प् ंउ दवजीपदह ं ंिबजए प् ंउ दवज रनेजपलिपदह वत मगबनेपदह पजष्७ बोर्जेज व्यंग्य की भाषा में यह बात १९४० के दशक में अपने देश अर्जेंटीना के संदर्भ में लिख रहे थे। उसी तरह आज के भारतीय भी राज्य को निर्वैयक्तिक मानकर अपने देश की संपदा लूट रहे हैं। राय के 'तबादला' की अंतर्वस्तु भ्रष्टाचार है। धनलोभ के इर्दगिर्द रचा गया यह उपन्यास एक विशिष्ट महत्व का अधिकारी है। धनलोभ आदमी का कैरीकेचर बना देता है। कमलाकांत वर्मा और बटुकनाथ उपाध्याय ऐसे ही कैरीकेचर हैं। उपन्यासकार कैरीकेचर बनाता नहीं है, कैरीकेचर व्यवस्था बनाती है। उपन्यासकार केवल इन पात्राों का शील निरूपण करता है। वह सामाजिक जीवन का मुंशी है। परिस्थति निरूपण के साथ शील निरूपण भी यथार्थवादी उपन्यास की एक बड़ी विशेषता है। यथार्थवादी उपन्यास के दो पहलू विशेष महत्वपूर्ण होते हैं-चरित्रा-चित्राण और पृष्ठभूमि चित्राण। इस उपन्यास में पृष्ठभूमि चित्राण के संदर्भ में ही चरित्रा-चित्राण है, पृष्ठभूमि चित्राण है बुर्जुआ व्यवस्था के पतनकाल में मूल्यहीन जीवन और राजनेता तथा नौकरशाह का गठबंधन जिसका एकमात्रा लक्ष्य जनसंपदा को लूटना है। यह स्वाधीनता आंदोलन के मूल्य का सीधा प्रतिलोम है। कमलाकांत वर्मा और बटुकनाथ उपाध्याय खोटी धातु से बने हैं। पत्राकार ललनराय और ध्रुवलाल यादव के शील निरूपण में जातीय आधार तो है ही। नौकरशाही में चापलूसी की एक निकृष्ट संस्कृति पनपी है। उसी का टायप चरित्रा रिजवानुल हक है। हर प्रतिष्ठान में, हर कार्यालय में कोई न कोई रिजवानुल हक मिल जाता है। 'तबादला' में मंत्राी तथा सुमन राय का आवास एक द्घिनौना यथार्थ प्रस्तुत करता है। यह अंधकार की कथा है। इस उपन्यास के पात्राों में आत्मा नाम की कोई चीज नहीं है। इसी के आगे की कड़ी है मनोहरश्याम जोशी का उपन्यास 'हमजाद'। यह मुर्दों की बस्ती है, यहाँ ज़िंदा इंसान दिखलाई नहीं पड़ता है। इस उपन्यास के पात्रा नाली के कीड़ों की तरह पैसा चबाते हुए बिलबिलाते रहते हैं। जीवन-प्रवाह नगद नारायण में सिमट कर रह गया है। यह नेता और नौकरशाह की बेपर्द नंगी तस्वीर है। इसमें नंगे स्वार्थ तथा हृदयहीन नगद भुगतान के सिवा मनुष्य और मनुष्य के बीच अन्य कोई रिश्ता नहीं दिखता है। अतः यह परम स्वार्थी बुर्जुआ समाज का सचमुच का दर्पण हैऋ साथ ही आलोचना भी। इस उपन्यास में कुम्भमेला की व्यवस्था के लिए पदस्थापित कार्यकारी अभियंता कमलाकांत वर्मा तबादला का पत्रा प्राप्त करने के बाद पुनः उसी पद पर बने रहने के लिए लखनऊ सचिवालय में मंत्राी से स्वयं सौदा करते हैं। मंत्राी जी सौदा शौचालय में निरंतर हाँ-हाँ आदि के अनेकशः संकेतों से १६ लाख के सुविधाशुल्क पर करते हैं। यानी भ्रष्टाचार ऊपर से ही है जो नीचे के भ्रष्टाचार से कहीं अधिक द्घातक होता है। प्रसंगात्‌ किशन पटनायक का विचार उ(ृत किया जाता है : ''यह समझना चाहिए कि बड़ा और छोटा भ्रष्टाचार एक जैसा नहीं होता। जनसाधारण को यह सिखाया गया है कि छोटा और बड़ा चोर दोनों एक हैं। कानून में भी दोनों एक नहीं हैं। भ्रष्टाचार की जिस द्घटना से राज्य और मानवसमाज को अधिक हानि पहुंचती है उसे अक्षम्य अपराध माना जाना चाहिए। सत्ता में प्रतिष्ठित व्यक्तियों के गलत तौर-तरीकों को नीचे वाले लोग सहज ढंग से अपनाते हैं। इसीलिए नीचे के स्तर का भ्रष्टाचार अपेक्षाकृत कम दोष वाला होगा।''८ 'तबादला' नौकरशाह मध्यवर्ग से संबंधित विभूतिनारायण राय के यथार्थवादी उपन्यासों में एक महत्वपूर्ण रचना है। यह नौकरशाह मध्यवर्ग के यथार्थ का बेलाग उद्द्घाटन है। ऐसे नौकरशाहों के शील का विश्लेषण करते हुए किशन पटनायक ने लिखा है। ''चरित्रा के मामले में विकासशील देशों का नौकरशाह सबसे द्घटिया होता है। पिछले एक-डेढ़ दशक के इन देशों की राजनीतिक का जो चरित्रा उभर रहा है उसमें राजनेता नौकरशाह से भी ज्यादा द्घटिया और खतरनाक साबित हो रहा है। वह देशी-विदेशी स्वार्थों से पफायदा उठाने के लिए देशहित के विरु( कार्य करता है और सर्वोच्च राजनेताओं को भी गलत सलाह देता है।''९ पूंजीवादी व्यवस्था में दलाली और द्घूसखोरी अनुर्वर पूंजी के दो रूप हैं। ललन राय और शर्मा दलाल हैं। मंत्राी, कमलाकांत वर्मा और बटुकनाथ उपाध्याय द्घूसखोर हैं। आर्थिक आत्मवाद के कारण व्यक्तिवाद का उदय हुआ और सारे नैतिक मूल्यों का तिरस्कार नगद नारायण के लिए किया गया। इस उपन्यास में राय नौकरीपेशा मध्यवर्ग के प्रति द्घोर द्घृणा व्यक्त करते हैं और नगद नारायण के इर्दगिर्द रचे गये शील के पाखंड को बेपर्द कर देते हैं। जिस समय राय लिख रहे हैं उस समय मध्यवर्ग हृास की पूरी अराजकता में डूबा हुआ है। किसी भी तरह पैसा कमाने के सिवा उसका और कोई लक्ष्य नहीं है। 'तबादला' के द्घूसखोर अधिकारी, लंपट नेताओं, बाहुबली छुटभैयों तथा असती रमणियों में पूंजीवादी समाज का अत्यंत पतनशील रूप दिखायी पड़ता है। यह तो स्पष्ट है कि उपन्यासकार ने मध्यवर्गीय पतनशील
नौकरशाह चरित्राों का अध्ययन विस्तार के साथ किया है और यह उनका एक महत्वपूर्ण पक्ष है। यह पूंजीवाद की अनुर्वर पूंजी ;द्घूसद्ध को केन्द्र में रख लिया गया एक यथार्थवादी उपन्यास है।
 
'तबादला' : सेक्स का भ्रष्टाचार
 

भ्रष्टाचार का एक और रूप है सेक्स का उपयोग। हालांकि यह नयी चीज नहीं है क्योंकि सामंती समाज में इसका उपयोग होता था पर पूंजीवाद में इसका प्रचलन और भी व्यापक हो गया है। 'तबादला' में लेखक ने इस भ्रष्टाचार की भी एक प्रामाणिक, विश्वसनीय तस्वीर पेश की है। इस उपन्यास का एक अन्य पक्ष सुमन राय के कामुकता भरे दुस्साहसिक कार्यों पर निर्भर है। ये बातें नैतिक सुधार के लिए नहीं बताई गई हैं। इसका उद्देश्य सामाजिक पतन के परिवेश का निरूपण करना है। लेखक का एक काम समाज के द्घाव का चीड़-पफाड़ करना भी होता है। मवाद बह जाय तो बेहतर है। यह जहर भारतीय समाज व्यवस्था की नस-नस में पफैल गया है। 'तबादला' जब भी लिखा गया आज वह उस समय से भी अधिक प्रासंगिक है। 'तबादला' की सुमन राय नयी प्रजाति की अति महत्वाकांक्षी नारी है। वह एक सोपान से दूसरे सोपान तक पहुँचने के लिए किसी भी पंक में पफंस कर बढ़ती ही जाती है। उसके लिए उथली और भ्रष्ट
नैतिकता भी बतलाना पर्याप्त नहीं है। वह कुम्भीपाक नरक का प्रतिरूप है। वह नहीं जानती कि आत्मा भी कोई चीज है। वह जानती है केवल देह, पैसा और सत्ता की सीढ़ी पर चढ़ने का सुख। सुमन राय की कामुकता केवल कामुकता ही नहीं वरन उसमें सत्ता और पैसा का दुर्निवार लोभ भी शामिल है। कामदेव के पाँचों बाण तथा कुबेर के कोष को वह अच्छी तरह पहचानती है। कथाकार राय सुमन की देहगाथा तथा नगद नारायण के लोभ को एक ही बिन्दु पर एकत्रा कर देते हैं। काम और कुबेर की यह मैत्राी एक विद्रूप की रचना करती है। सुमन राय का शील अति तृष्णा ;बनचपकपजलद्ध से निर्मित है। राय का लक्ष्य इसी नयी प्रजाति की रचना है। सुमन राय का जीवन कामुकता, लम्पटता तथा लोभ का जीवन है। यहाँ रसिकता या प्रेम की कोई गुंजाइश नहीं है। देह से वह पैसा और सत्ता अर्जित करती है। वह पतनशील पूंजीवाद से उत्पन्न नारी की प्रजाति है।
इस प्रकार 'तबादला' बिकाऊ नारीत्व की कथा बन जाता है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम चरण में कथाकार मोपॉसा ने ठीक ही कहा था कि कहानी अच्छी नहीं वरन्‌ बुरी नारी की होती है। बिकाऊ नारीत्व सामाजिक पदानुक्रम ;भ्पमतंतबीलद्ध में उठने का साधन बन गया है। सुमन राय का राजनीतिक उत्थान भारतीय पारिवारिक और सामाजिक जीवन का कुष्ठरोग है। जब मूल्यहीनता जीवन का अपरिहार्य अंग बन जाती है तब वह साहित्य की
संरचना में समा जाती है। यथार्थवाद का पानी सदा नीचे की ओर बहता है। इस दृष्टि से 'रानी नागपफनी की कहानी' ;हरिशंकर परसाईद्ध, 'रागदरबारी' ;श्रीलाल शुक्लद्ध और 'तबादला'
सामाजिक परिवेश की एक ही तरंगरेखा पर दीखते हैं। तबादला में भ्रष्टाचार का सच आर्थिक और सेक्सपरक दोनों भ्रष्टाचार पर पूरी तरह विश्वसनीय है। इस उपन्यास के रचयिता को सारे अपराधतंत्रा, द्घूसतंत्रा आदि का बारीकी से पता है और इस कारण वृत्तांत बहुत प्रामाणिक और विश्वसनीय बन पड़ा है। सांप्रदायिकता के समाजशास्त्रा तथा मनोविज्ञान का उसे गहन अध्ययन है।
नौकरशाह के परजीवी ;च्ंतेंपजमद्ध जीवन का ऐसा विश्वसनीय वृत्तांत हिन्दी में दूसरा नहीं लिखा गया है। ये सब दिन दूसरे के पैसों से चाय, नाश्ता और भोजन करते हैं तथा उन्हीं के पैसों पर प्रासाद भी खड़ा करते हैं। 'तबादला' में बड़ा बाबू लाभचंद्र श्रीवास्तव अपवाद नहीं, वरन्‌ नियम हैं। अपने काम के प्रति उनमें कोई निष्ठा नहीं है। 'तबादला' भारत में नेता और नौकरशाह के भ्रष्टाचारी गठबंधन का एक प्रामाणिक वृत्तांत प्रस्तुत करता है।
अत्यंत गहरे अर्थ में बाजार समाज ;उंतामज ैवबपमजलद्ध में लाभ के सि(ांत ने बुर्जुआ समाज के जीवनमूल्य की रचना कर दी है। इसलिए नेता हों या अपफसर या अपराधी ये कहीं न कहीं एक ही तरंगरेखा पर बाजार समाज के मूल्य से, लाभ से, गतिशील होते हैं। इसी ने आत्मानुशासन को भंग कर लोकतंत्रा को पूरी तरह भ्रष्ट और विकृत कर दिया है। 'तबादला' के सारे क्रियाकलाप कुम्भमेला के प्रसंग में द्घटित हो रहे हैं। इन पर पात्राों को उसके धार्मिक-आध्यात्मिक पक्ष से कुछ भी लेना-देना नहीं है। इस प्रसंग की रचना में कथाकार की प्रतिभा निखरी है। महाकुंभ के इर्द-गिर्द बुर्जुआ शील का निकृष्टतम रूप रचा गया है। ये पात्रा पैसे और पद के सिवा और किसी भी मूल्य में नहीं जीते हैं। पद बना रहे जिससे कि अकूत पैसा आए। वैसा ही 'किस्सा लोकतंत्रा' में है। अन्य मूल्य जैसे कि प्रेम और मित्राता, राजनीतिक प्रतिब(ता, धार्मिक आस्था, कला और प्रकृति से प्रेम आदि उनके जीवन में हैं ही नहीं। ये खोखले मूल्यहीन व्यक्ति किसी भी दृष्टि से इंसान कहलाने के अधिकारी नहीं हैं। यहाँ सचेतन पाखंड का एकल राज्य है।
चूंकि बुर्जुआ समाज में उपन्यास विश्वसनीय मूल्यों की तलाश है इसलिए उपन्यास एक साथ ही जीवनचरित्रा और
सामाजिक इतिहास भी है। इस तरह विभूति नारायण राय के ये उपन्यास मध्यवर्ग के भ्रष्ट अपफसर और अपराधी नेताओं के जीवनचरित्रा और सामाजिक इतिहास दोनों हैं। इस तरह ये उपन्यास समाज की सत्तामूलक मीमांसा प्रस्तुत करते हैं। यही संदर्भ है जहाँ उपन्यासकार शिल्प में दो प्रमुख तत्वों का सहारा लेता है : एक है व्यंग्य ;भ्नउवनतद्ध दूसरा है विडंबना ;पतवदलद्ध। इन दोनों ही दृष्टियों से तबादला एक अद्वितीय रचना है। लुकॉच और जिटार्ड दोनों ने कहा है कि उपन्यासकार नायक की चेतना को अवक्रांत करता है और इसी से सौंदर्यबोध के स्तर पर व्यंग्य और विडंबना की रचना होती है। ये दोनों तत्व नायक की खलता के लिए मारक होते हैं। यह अवक्रांतता ;ैनचमतबमेपवदद्ध ही सौंदर्यबोधात्मक मूल्य की रचना गल्प के रूप में करती है।
उपन्यास का जो रूप अभी उपलब्ध है वह आलोचनात्मक प्रतिरोधात्मक है। उपन्यास बुर्जुआ समाज का एक प्रतिरोध है। राय के इन उपन्यासों में यह प्रतिरोध लोकतंत्रा के अपक्षय पर केंद्रित है पर इसके इर्द-गिर्द और मूल्य भी बुने गये हैं। ये उपन्यास बुर्जुआ के सचेतन मूल्यों के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं : व्यक्तिवाद, सत्ता की भूख ;जगतपाल तथा पी.पी. आदिद्ध पैसा ;कमलाकांत और बटुकनाथद्ध, कामुकता ;सुमन रायद्ध-जो पुराने सामंती मूल्य
परोपकारिता, दानशीलता और प्रेम को पदच्युत कर देता है। यह एक पतनशील सामाजिक व्यवस्था की रचना है और इन उपन्यासों का अर्थ है इस व्यवस्था का तिरस्कार। इन तीनों उपन्यासों का प्रतिपाद्य है : लोकतंत्रा का अंधकार। सूची भेद्य अंधकारा।

संदर्भ
१ण् ज्वूंतके ं ैवबपवसवहल वि जीम छवअमसय स्नबपमद ळवसकउंदय ज्ंअपेजवबा च्नइसपबंजपवदय स्वदकवदए १९७५ ;च्ंचमतइंबा म्कपजपवदद्ध
२ण् ठपतजीउंताए पद टमसबीमतन छंतंलंद त्ंवए मक ंदक जतंबम ज्ूममदजममजी ब्मदजनतल ज्मसमहन च्वमजतल ;व्गवितक न्दपअमतेपजल च्तमेए २००२ए छमू क्मसीपए चण् २०७
३. शहर में कफ्रर्यू : पुनर्मुद्रण २००६, पृ.-२८, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद
४ण् डंग ॅमइमतय म्ेंले पद ैवबपवसवहल ;च्वसपजपबे ें अवबंजपवदय म्केए भ्ंदे ॅमतजी ंदक ब्ण् ॅतपहीज डपससेय व्गवितक न्दपअमतेपजल च्तमेए छमूलवताए १९४६
५. रामचन्द्र गुह द्वारा, श्प्दकपं ंजिमत ळंदकीपश् में उ(ृत, पृ.-६८, च्ंचमतइंबा प्दकपंद म्कपजपवदए २००८
६. भ्रष्टाचार को कैसे समझें, सं. सुनील, किशन पटनायक का निबंध असहाय सत्य, पृ.-७३, रोशनाई प्रकाशन, कॉचरापाड़ा, पश्चिम बंगाल, २०११
७. रामचंद्र गुह द्वारा ।जिमत ळंदकीप में उ(ृत पृ. : ६८६ चपबंकवतए छमू क्मसीपए २००८
८. सुनील द्वारा संपादित ''भ्रष्टाचार को कैसे समझें' पुस्तक में किशन पटनायक का निबंध, पृ. ६५
९. वही, पृ. ७२

 
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