अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
मेरी बात/अपूर्व जोशी
मछली डूबी पानी में
 

 

 

   
संसद के शीतकालीन सत्रा के दौरान मुंबई में लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर धरने पर बैठे अन्ना को अपेक्षित जनसमर्थन न मिलने के बाद से मानो आंदोलन ही बैठ गया है। स्वास्थ्य कारणों का हवाला दे अन्ना सक्रिय नहीं रहे तो उनकी टीम विशेषकर अरविंद केजरीवाल, मनीष सिशोदिया, कुमार विश्वास, किरण बेदी आदि भी भ्रमित होते दिखे। मुझे लगता है पूरी टीम एक प्रकार से लकवा ग्रस्त हो गई है। यही कारण है कि आज अन्ना को अपने कार्यक्रम/अनशन सपफल बनाने के लिए रामदेव का समर्थन लेना पड़ रहा है। जिस अंदाज में टीम अन्ना अपने नेता अन्ना हजारे के साथ पिछले दिनों बाबा के आश्रम पतंजलि हरिद्वार पहुंची और अन्ना ने रामदेव का यशोगान किया उससे मेरी यह आशंका बलवती होती है कि अब आई ए सी का भटकाव उस बिन्दु तक जा पहुंचा है जो इस संस्था और इसके कर्ताधर्ताओं को ऐसी अंधी गली में धकेल रहा है जहाँ कालिख और अंधकार के सिवा कुछ नहीं
 
अन्ना हजारे का आंदोलन कहीं दिशाहीनता का शिकार हो भटक ना जाए इसकी आशंका मुझे उस दौर में भी थी जब सभी उनकी शान में कसीदे पढ़ रहे थे। 'पाखी' मई २०११ के अंक में, मैंने लिखा था-'उम्मीद की जानी चाहिए कि यह विधेयक मानसून सत्रा में संसद से पास हो कानून बन जाए और इसका स्वरूप जनलोकपाल मसौदे के करीब हो। पर यदि ऐसा नहीं हो पाता तो अन्ना के पास विकल्प क्या है? क्या वो भ्रष्टाचार को मुद्दा बना इस तंत्रा की जड़ें वाकई हिला पाएँगे? क्या भ्रष्टाचार से त्रास्त किंतु कापफी हद तक स्वयं भ्रष्ट हो चला हमारा मध्यम वर्ग, यानी हम खुद इतना साहस रखते हैं कि पफेसबुकों, ब्लॉगों और जंतर-मंतर में कैंडल मार्च निकाल क्रांति में हिस्सेदारी वाली रोमांच-रोमांस की रुमानी दुनिया से बाहर निकल सड़क पर संद्घर्ष कर सकें? यह मैं इस आशंका के चलते कह रहा हूँ कि जंतर-मंतर पर या देश के अन्य शहरों में गाँधी की मूर्ति के समक्ष मोमबत्ती जलाने और क्रूर-भ्रष्ट सत्ता के दमन का सामना करने में जमीन आसमान का पफर्क है। मिस्र की जनता द्वारा होस्नी मुबारक के तख्ता पलट को अन्ना के जंतर-मंतर की मुहिम की सपफलता से जोड़ा जाना ठीक नहीं है। हमें यह याद रखना होगा कि अन्ना की वर्तमान मुहिम का हश्र भी ६ अप्रैल २००८ में मिस्र में हुए नरसंहार समान हो सकता है जब मिल मजदूरों की हड़ताल को इंटरनेट पर मिले जबरदस्त जनसमर्थन से उत्साहित नौजवानों ने बगैर किसी तैयारी के होस्नी के खिलापफ मोर्चा निकालने का पफैसला किया जिसका नतीजा रहा लगभग साठ हजार के जनसमूह पर पुलिस की गोली बारी में हुई असंख्य मौतें। मुबारक की निरंकुश सत्ता से निपटने की रणनीति तब बदली गई और पूरे तीन साल जमीन पर संद्घर्ष की मजबूत नींव रखने के बाद ही तहरीर चौक पर तख्ता पलट आंदोलन शुरू किया गया।'
अंततः मेरी आशंका सही साबित हुई। एक तरपफ लोकपाल कानून एक बार पिफर राजनीतिक दलों के षड्यंत्रा का शिकार हो अधर में लटक गया है तो दूसरी तरपफ अन्ना हजारे और उनकी टीम मुंबई में आंदोलन को जनसमर्थन न मिलने के बाद से मायूस हो बैठ गई प्रतीत होती है। यह मायूसी हर उस भारतीय के लिए एक बड़ा सदमा है जो अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का समर्थक है और जिसे इस आंदोलन के चलते कुछ आस बंधी थी कि अब स्थितियां सुधरेंगी और पिछले ६४ वर्षों से इस राष्ट्र की लूट में लगे राजनीतिज्ञों व नौकरशाहों को उनके किए की सजा मिल सकेगी। ऐसा कुछ-कुछ होते नजर भी आने लगा था। मुंबई में आदर्श हाऊसिंग सोसाइटी द्घोटाले का पर्दापफाश होना, टूजी स्पेक्ट्रम द्घोटाले में केंद्रीय मंत्राी सहित कई ताकतवर लोगों का तिहाड़ पहुंचना आदि उदाहरण इस दौरान देखने को मिले जिससे लगा कि अब सोया समाज करवटें बदलने लगा है। लेकिन संसद के शीतकालीन सत्रा के दौरान मुंबई में लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर धरने पर बैठे अन्ना को अपेक्षित जनसमर्थन न मिलने के बाद से मानो आंदोलन ही बैठ गया है। स्वास्थ्य कारणों का हवाला दे अन्ना सक्रिय नहीं रहे तो उनकी टीम विशेषकर अरविंद केजरीवाल, मनीष सिशोदिया, कुमार विश्वास, किरण बेदी आदि भी भ्रमित होते दिखे। मुझे लगता है पूरी टीम एक प्रकार से लकवा ग्रस्त हो गई है। और ऐसा होना तय था। कारण आंदोलन का मजबूत आधार न होना है। इससे इंकार नहीं कि अन्ना का आम जनमानस में भारी प्रभाव है। पूरे देश में अन्ना के समर्थक भारी तादात्‌ में मौजूद हैं। ये वे लोग हैं जो वर्तमान व्यवस्था से, उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार से व्यथित-भ्रमित हैं। ये वही लोग हैं जो धर्म की हानि और अधर्म की बढ़त से द्घबराए किसी कृष्ण के जन्म लेने की प्रतीक्षा कर रहे हैं-
'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाभ्यहम्‌॥
ऐसे सभी को अन्ना में यही अवतार दिखा और पूरे देश को उनमें एक आशा की किरण नजर आई। अन्ना का आंदोलन मीडिया की मदद से जंगल के आग की तरह पफैला जरूर लेकिन टीम अन्ना अपने उत्कर्ष काल में वह सब कर पाने में पिछड़ गई जो इस आंदोलन को मजबूत जमीं दे पाता। आंदोलन का असर पूरे देश में अवश्य था लेकिन जैसे-जैसे उसमें तेजी आई अवांछनीय तत्वों ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर पर कब्जा करना शुरू कर दिया। कई शहरों में इस आंदोलन की अगुवाई खनन्‌ मापिफया, भूमापिफया और शराब के अवैध करोबार से जुड़े लोगों के हाथों में आने की बात सामने आई है। उत्तराखण्ड और उ.प्र. में ऐसे कुछेक उदाहरण हैं जिनमें निश्चित तौर पर आंदोलन के साथ गलत लोगों के जुड़े होने की बात प्रमाणित होती है। अच्छा होता अरविंद केजरीवाल आई ए सी ;इंडिया अगेंस्ट करप्शनद्ध को मजबूत सांगठनिक ढांचा बनाने की कवायद तब ही शुरू कर देते। मैंने अनेकों बार उन्हें यह बिन मांगी सलाह दी। त्रिापुरा सरकार के साथ उत्तराखण्ड की तर्ज पर लोकायुक्त बनाने की बातचीत मैंने शुरू की थी। राज्य सरकार के एक कद्दावर मंत्राी ने लोकायुक्त के मुद्दे पर अपनी सरकार के रुख से अवगत कराते हुए जानकारी दी कि पूरे त्रिापुरा में अन्ना के अनशन काल के दौरान रोज जुलूस, कैंडल लाईट मार्च निकले। उन्होंने नेक सलाह दी कि आई ए सी त्रिापुरा आकर अपना संगठन जमीनी स्तर पर तैयार करे तो स्वतः ही राज्य सरकार पर कठोर लोकायुक्त लागू करने का जनदबाव बढ़ेगा। मैंने यह बात आई ए सी तक पहुंचाई। लेकिन मीडिया के बनाए प्रभामंडल के वशीभूत हमारे मित्राों ने इसको कोई विशेष तवज्जो दी नहीं। संगठन तैयार करने और उसमें सही सोच व छवि के लोग जोड़ने का कोई गंभीर प्रयास होता कम से कम मुझे तो नजर नहीं आया। यही कारण है कि आज अन्ना को अपने कार्यक्रम/अनशन सपफल बनाने के लिए रामदेव का समर्थन लेना पड़ रहा है। जिस अंदाज में टीम अन्ना अपने नेता अन्ना हजारे के साथ पिछले दिनों बाबा के आश्रम पतंजलि हरिद्वार पहुंची और अन्ना ने रामदेव का यशोगान किया उससे मेरी यह आशंका बलवती होती है कि अब आई ए सी का भटकाव उस बिन्दु तक जा पहुंचा है जो इस संस्था और इसके कर्ताधर्ताओं को ऐसी अंधी गली में धकेल रहा है जहाँ कालिख और अंधकार के सिवा कुछ नहीं। यूं रामदेव से मेरी कोई व्यक्तिगत्‌ रंजिश नहीं लेकिन काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर उनके द्वारा चलाई जा रही मुहिम मुझे प्रेरणा देने का काम नहीं करती बल्कि मुझे आश्चर्य होता है कि जिस व्यक्ति की बुनियाद में भ्रष्टाचार और पफरेब हो, वह कैसे साधु होने का स्वांग रच पूरे देश को बेवकूपफ बना रहा है और कैसे यह देश ठगा जा रहा है। हजारों करोड़ की संपत्ति एक दशक के भीतर अर्जित करने वाले रामदेव और उनके खास सहयोगी बालकृष्ण जब अन्ना की तारीपफ का पात्रा बनते हैं तो दुख होता है। हजार करोड़ कमाना कोई बुराई नहीं लेकिन यदि उसके अर्जन का तरीका गलत है, और गरीब मजदूरों का हक मार कर अर्जित किया गया है तो निश्चित ही अन्ना हजारे का ऐसे किसी स्थान में पाया जाना एक गलत संदेश का कारण बनता है। अन्ना शायद समझ नहीं रहे हैं या पिफर वे और उनकी कोर टीम के सदस्य हताशा के चलते अपने कर्तव्यों को भूल रहे हैं। कारण जो भी हो रामदेव के साथ मिलकर भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़ने का एलान करना एक भारी भूल है जिसका असर सीधे-सीधे इस आंदोलन पर पड़ेगा। भले ही तात्कालिक तौर पर अन्ना के अनशन आदि में रामदेव समर्थकों की भीड़ उन्हें थोड़ी राहत देने का कारण बने, आंदोलन की बुनियाद कमजोर होगी। देश भर में बिखरे लाखों ऐसे लोग जो हजारे के भीतर गाँधी अथवा कृष्ण की छवि तलाश उनसे आ जुड़े हैं, जिन्हें मैं अन्ना के स्वाभाविक मित्राों की संज्ञा देता हूँ, रामदेव के साथ अन्ना के गठजोड़ से जरूर ही हताश होंगे। टीम अन्ना से मेरे खासे मतभेद रहते हैं। उनसे खुलकर इस पर बहस भी होती रही है। लेकिन ये मतभेद कभी मनभेद का कारण नहीं बने। कारण मैं जानता हूँ कि अरविंद, मनीष कुमार और उनसे जुड़े सैकड़ों युवा एवं बुर्जुग सही में बेहद ईमानदार और सच्चे भारतीय हैं जो रसातल में पहुंच चुके अपने देश को और गिरने से रोकना चाहते हैं। लेकिन ऐसा रामदेव, श्री-श्री अथवा अन्य किसी बड़ी दुकान के समर्थन से नहीं होने वाला। इसके लिए पफेसबुक की दुनिया का मोह त्याग सीधे जनता से संवाद स्थापित करना होगा। लेकिन हमारे मित्रा ऐसा न करके शॉर्टकट अपनाने की भारी भूल कर रहे हैं। इसके चलते मेरे जैसे न जाने कितने शुभ चिंतकों का टीम अन्ना के साथ मनभेद पनपेगा। टीम अन्ना यदि रामदेव की मदद से कोई बड़ा आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलापफ छेड़ने की योजना बना रही है तो उन्हें मेरी कोटिश शुभमानाएँ और साथ में राजेश रेड्डी की एक गजल भी उनकी नजर जो उनकी वर्तमान दशा और दिशा पर सटीक बैठती है-आया मोड़ कहानी में/मछली डूबी पानी में/आके भंवर से बाहर हम/डूब गए हैरानी में/दाना बनने निकले थे/हम अपनी नादानी में/हसरत महल-दुमहलों की/वो भी जहाने-पफानी में/अब जाकर ये ध्यान आया/उम्र गई बेध्यानी में।/मेले लगे हैं अश्कों के/आँखों की वीरानी में/आसानी थी मुश्किल में/मुश्किल है आसानी में।
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)