अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
मूल्यांकन
 
इस तरह भी लिखी मैंने एक कविता
अभिषेक शर्मा
 

जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा
लेखक : निशांत
भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
मूल्य : १३० रुपये

 
 

जनसामान्य की अनुभूतियों से अपनी अनुभूतियों का तादात्म्य और अपनी अनुभूतियों को जनसामान्य के बीच सार्वजनिक करने में कवि 'निशांत' सि(हस्त हैं-''मैंने/अपनी बात कही/उन्हें लगा/उनकी बातें मैंने कही/इस तरह भी लिखी/मैंने एक कविता।'१ ;जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा, पृ. सं. १६९द्ध कवि 'निशांत' का यह समूचा काव्य संग्रह ही विविध अनुभवों और विविध विषयों का एक दस्तावेज है। इसमें कवि ने युवा मन के विभिन्न पड़ावों को अपने अनुभवों के आलोक में आकृति प्रदान की है। बेरोजगारी, प्रेम, प्रेम में पशुता, रोजमर्रा की समस्याएँ और युवा वर्ग की किंकर्तव्यविमूढ़ता इस संग्रह की कविताओं के मूलाधार हैं। मुझे संदेह होता है कि जो लोग कवि 'निशांत' के वैयक्तिक और सामाजिक संद्घर्षों से परिचित नहीं हैं, क्या वे भी सही अर्थों में उनकी कविताओं को समझ पाएँगे? कहने का आशय यह कि पाठकों एवं विचारकों को कवि 'निशांत' की कविताओं को समझने से पहले युवा मन के अंतर्संद्घर्ष को समझना पड़ेगा जिसमें खुद कवि भी शामिल है। एक अनुच्छेद में कवि खुद अपने ही निर्णय पर अपफसोस जाहिर करते हुए उसे एक गंभीर ऐतिहासिक और राजनीतिक भूल करार देता है-'तुमसे शादी करना/एक ऐतिहासिक भूल की तरह लगने लगा है/जैसे ज्योति बाबू का प्रधानमंत्राी न बनना/तुमसे प्रेम करना/एक और ऐतिहासिक भूल की तरह/जैसे सत्ता में शामिल न होना मार्क्सवादियों के लिए/गुड़ खाना गुलगुले से परहे८ा करने की तरह।'२ ;वही, पृ. सं. ६७-६८द्ध यहाँ कवि के प्रेम-विवाह के भीतर कवि की खीज और बेरोजगारी छिपी है, वैसे ही जैसे बंगाल की संस्कृति के भीतर राजनीतिक हिंसा और ऐतिहासिक अराजकता। कवि ने इस संग्रह में प्रेम को कहीं-कहीं मृत्यु समतुल्य और कहीं-कहीं संजीवनी के रूप में चित्रिात किया है। कवि की कविताओं में बंगाल की प्रमुख द्घटनाएँ और बंगाल की प्रकृति यत्रा-तत्रा सर्वत्रा देखी जा सकती है। प्रेम आदमी को किस तरह सहारा देता है और उसे किस तरह एक बड़ा 'इंसान' बनाता है, यह देखने वाली बात है-'एक क्षण/जब जिंदा रहने की सारी इच्छाएँ/गायब हो जाती हैं मेरे बटुए से/मैं ८िांदा रहने की उधारी के लिए/उसकी तरपफ दौड़ता हूँ/ते८ा-ते८ा बहुत ते८ा/एक क्षण में जी उठने की आदिम इच्छा से वशीभूत/माँ बहन और सबसे करीबी एक मित्रा/जो आज से कुछ दिनों पहले तक थे/मेरे दुखों कष्टों तकलीपफों और दुर्दिनों के साथी/उस जगह पर अब वह बैठी है।'३ ;वही, पृ. सं. ५५द्ध
कवि ने छद्म जीवन शैली का अपनी कविता में भरपूर विरोध किया है। वह जीवन ही क्या जो संद्घर्षों से कतराए! एक वाजिब गरीबी, एक वाजिब संद्घर्ष और एक औसत उत्साह ही मनुष्य के आदर्श जीवन का प्रमाण है। हमारा बार-बार पूंजीपतियों और नेताओं के जीवन के प्रति जो संदेह उठता है, वस्तुतः वह इन्हीं सब चीजों के अभाव के कारण उठता है। कवि ने प्रकारांतर से यहाँ जो बात कही है, वह मानव जीवन के संदर्भ में सबसे बड़ा व्यंग्य है-'जल ही जीवन है/जब चारों ओर जीवन ही जीवन दिखे/तो समझिए/बाढ़ आ चुकी है।'४ ;वही, पृ. सं. ४७द्ध कवि ने 'बाढ़' का प्रयोग यहाँ विशिष्ट अर्थों में किया है। जल और जीवन जो कभी मानव जीवन की गतिशीलता के नियामक तत्व थे, वे आज कुछ और ही आचरण करने लगे!!! समय का तका८ाा है। इस कविता में देश की आर्थिक व्यवस्था की ओर भी कवि का संकेत सापफ है। जिंदगी से प्रेम नहीं बल्कि जिंदगी से खेलने वालों की संख्या अब देश में कम न रही। कबीर बुनकर थे उनकी कविता में वयनजीवी जातियों के अनेक अनुभवों का जिक्र मिलता है।
पुराने कपड़े को बेचने और पहनने का भाव 'निशांत' का अपना भाव है, यह कोई किराये की अनुभूति नहीं है। बड़प्पन किसे प्रिय नहीं है और दरिद्रता से कौन दूर नहीं भागता। एक गरीब बालिका के माध्यम से कवि किस तरह अपने जीवन स्तर को एक आदर्श बिन्दु पर पहुँचाना चाहता है, यह गौरतलब है-'लड़की की इच्छा पूरी होती है/पहनकर चोली और द्घाद्घरा/धन्यवाद देती है/पुराने कपड़े बेचने वाली को/और जाकर खड़ी हो जाती है आईने के सामने/देखती है आईने में एक साथ/मोनालिसा और अपने को।'५ ;वही, पृ. सं. २७द्ध यहाँ पुराने कपड़े बेचने के साथ पुराने कपड़े पहनने वाली का जो संबंध है वह साहित्य के क्षेत्रा में नूतन और अत्यंत मार्मिक है। दोनों की पीड़ाएँ लगभग एक जैसी हैं। इस संपूर्ण खरीद पफरोख्त में व्यवसायी वृत्ति का न होना भी एक दूसरी नयी बात है। यहाँ कवि ने जैसे लद्घु उद्योगों की पीड़ा का चित्राण किया हो। यहाँ बेचने वाली की पीड़ा पहनने वाली से कम नहीं है किंतु कवि कौशल यह कि बेचने वाली कहीं मौजूद नहीं है।
'निशांत' एक ऐसे कवि हैं जिन्हें अपनी पूर्ववर्ती काव्य परंपरा का सम्यक्‌ ज्ञान है। बेरोजगारी के संदर्भ में उनके भाव कहीं-कहीं 'गालिब' के भावों ;इलाही मौत न आए तबाही हाली में...द्ध से मेल खाते हैं। बेरोजगारी का गम 'गालिब' को भी सताया था और 'निशांत' को भी सता रहा है। दोनों कवियों की पीड़ाओं में कितना साम्य है यह हमें देखना चाहिए- 'बेरोजगारी में बीमार पड़ना/एक चार दीवार वाले कमरे में/दुनिया की सबसे बड़ी यंत्राणा में पड़ना है।'६ ;वही, पृ. सं. ४२द्ध कवि ने अपने माता-पिता के जीवन संद्घर्षों और उनके दायित्व ;बोधद्ध को भी अपनी कविता का विषय बनाया है। लेकिन हमें इसका मूल्यांकन सिपर्फ कवि के ही माता-पिता के संद्घर्षों के रूप में नहीं करना चाहिए। अपने देश में आज शायद ही किसी व्यक्ति ;कुलीनों को छोड़करद्ध के माता-पिता की स्थिति कवि के माता-पिता से बेहतर हो-'एक विजयी यो(ा की तरह/आँखों के सामने रहते थे पिता/जिन्हें कभी हारते हुए हमने न देखा/नामुमकिन और मुश्किल शब्द नहीं होते थे/उनके शब्दकोश में/हमारे लिए सुरक्षा कवच थे पिता/किसी को पीट के आने के बाद/कोई ची८ा अप्राप्य नहीं थी पिता के लिए/बस हमारे हुक्म की देर थी।'७ ;वही, पृ.
सं. ७४द्ध कवि ने इस कविता में अपने पिता के कई मनोदशाओं का चित्राण किया है, एक वह जो वात्सल्य से भरा हुआ है और दूसरा वह जो संद्घर्षों से क्षत-विक्षत है। इन दोनों ध्रुवों के बीच पिता का वह दायित्वबोध जो बच्चों को अपनी पीड़ाओं से दूर रखकर उनकी सुविधाओं के लिए प्रयासरत...। लेकिन कवि ने पिता के संद्घर्षरत्‌ और आक्रोश भरे जीवन को भी अत्यंत सम्मान के साथ अपनी कविता में स्थान दिया है-'पिता कभी-कभी गालियाँ बकते और/हो जाते इतने उत्तेजित कि बंद कर देते चलता हुआ टेलीविजन/निकालते पॉकेट से अ(ा/खदेड़ते हमें दूसरे कमरे में/माँ चुपचाप लाकर रख देती गिलास पानी और कुछ नमकीन/उस दिन पिता ख़ूब गरियाते मिल-मालिकों को/अदने से अपफ़सर से लेकर प्रधानमंत्राी तक को।'८ ;वही, पृ. सं. ७५द्ध इसी तरह कवि ने अपनी 'माँ' के ऊपर भी कविता लिखी है। उसका बेटा परिवार के भरण-पोषण के लिए द्घर से बाहर कमाने गया है। कभी द्घर का पफोन खराब हो जाता है तो कभी अर्थाभाव में उसका बेटा उसे पफोन नहीं कर पाता। पफोन न करने की किसी भी स्थिति में कवि 'निशांत' ने जिस प्रकार अपनी 'माँ' की वेदना को हमारे सामने व्यक्त किया है, वह अत्यंत मार्मिक ही नहीं अनूठा भी है-'जब दो दिन पफोन नहीं आता/माँ कहती-पफोन गड़बड़ है/माँ की न८ारों में/पफोन के सही होने का सबूत होता/रो८ा दिन में एक बार परदेश से/भैया का आने वाला पफोन।'९ ;वही, पृ. सं. ७८-७९द्ध
पठनीयता का संकट हमारे समय का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संकट है। अच्छे से अच्छे साहित्य, अनुसंधान आदि कार्य पठनीयता के अभाव में प्रायः नष्ट हो जाते हैं। साहित्य की विधाओं में अनेक भेदोपभेद ;लद्घुकथा, लद्घु उपन्यास आदिद्ध शिल्पगत खूबी से ज्यादा पठनीयता के संकट की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। कवि ने एक कविता में लोगों को पढ़ने की तमी८ा बतलाई है। किस प्रकार एक मजदूर व्यक्ति अपने महत्वपूर्ण कामों से समय निकालकर साहित्य का अध्ययन करता है, यह समय का रोना-रोने वाले लोगों की मनोवृत्तियों को एक झटका है-'आधा द्घंटा/चुरा लिया है मैंने सुबह के समय में से/समाचार पत्रा पढ़ने के लिए/एक द्घंटा चुरा लिया है मैंने/दोपहर की कार्य अवधि के बीच से/कहानियों को पढ़ने के लिए/पंद्रह मिनट और चुरा लिए हैं मैंने/अपनी नींद से/कविताओं के लिए/इस तरह/पंखे की तरह दौड़ती हुई ८िांदगी में से/प्रतिदिन चुरा लेता हूँ मैं/पौने दो द्घंटे किताबों के लिए/इन पौने दो द्घंटे ही/रहता हूँ मैं मनुष्य।'१० ;वही, पृ. सं. ८४द्ध कवि ने अपनी एक कविता में मानव विकास का एक इतिहास प्रस्तुत किया है किंतु उसी के पीछे मानव जाति की लगातार हो रही पराजय का एक चिट भी नत्थी कर दिया है। तमाम असंभव कार्यों को संभव बनाने वाला यह 'मनुष्य' अपने ही आचरण और अपने ही अंतर्कलह से मारा जाता है-'हम लोगों ने/सब कुछ किया/हिंसक प्रवृत्ति वाले/शेर को पकड़कर/पिंजरे में कैद कर दिया/साँप को पकड़कर/उसके/विष के दाँत उखाड़ दिये/लेकिन/अब तक/आदमी को आदमी से/लड़ने से/न रोक सके।'११ ;वही, पृ. सं. ९६द्ध
कवि ने वेश्यावृत्ति के विकास के पीछे पुरुषों की अनियंत्रिात कामवृत्ति एवं उनके स्वार्थी चरित्राों को जिम्मेदार ठहराया है। कवि ने वेश्यावृत्ति के ऐसे एजेटों को अधमाधम बताया है। तमाम ऐसे लोग हैं जो महिलाओं को ऊँचे पदों की लालच देकर उन्हें वेश्यावृत्ति के धंधे में धकेल देते हैं। कवि ने पुरुष जाति के इस आचरण और इस कामवृत्ति को अपने काव्य संग्रह में कई स्थलों पर एक खूंखार जानवर के रूप में चित्रिात किया है जो स्त्राी को जहाँ तक पाए वहाँ तक भभोड़ता चला जाए। कहना न होगा कि आने वाले दिनों में कुछ ऐसे ही काव्य संग्रह 'स्त्राी विमर्श' के विकास में एक मजबूत सोपान बनकर उभरेंगे-'वे बड़ी खुश होती हैं/जब आँखें मिलाते हुए लोग/उतरते हैं उनके अंदर/और खो चुके होते हैं दुबारा उनसे आँखें/मिलाने का साहस/वे बंद करती हैं दरवा८ो/अट्ठाहास करके हँसती हैं वे औरतें/बंद दरवा८ो के अंदर/बंद द्घरों के अंदर/और पता नहीं चल पाता/हँसते-हँसते कब रोने लगती हैं ये औरतें।'१२ ;वही, पृ. सं. १३०द्ध

 
हिन्दी भवन, विश्वभारती, शांतिनिकेतन-७३१२३५, पं. बं.
मो. ०९६४१११२९५९
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)