अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
मूल्यांकन
 
विमर्श बनाम विकल्प
अश्विनी कुमार
 

समय संवाद
श्रीभगवान सिंह
भारती प्रकाशन नई दिल्ली
मूल्य : ३०० रुपये

 
 

गाँधीवादी विचारधारा के वरिष्ठ लेखक श्रीभगवान सिंह की पुस्तक 'समय संवाद' से गु८ारते ऐसा प्रतीत होता है कि यह सचमुच में 'गति की तलाश में बेलगाम दिशाहीन दौड़ते समाज को चेताते विमर्श का साक्षात दस्तावेज है। गाँधीवाद की सर८ामीं पर खड़े होकर श्रीभगवान सिंह साहित्य, संस्कृति और राजनीति सब पर गहरी चिंतन प्रक्रिया में आस्था रखते हैं। इस प्रक्रिया में अक्सर कई एक क्रूर सच्चाइयों से मुठभेड़ भी उन्हें करना पड़ता है। इसी मुठभेड़ की परिणति है-'समय संवाद' जहाँ वे पर्यावरण, उपभोक्तावाद, अपसंस्कृतिवाद, बाजारवाद, स्त्राीमुक्ति आदि से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों से टकराते हैं। इन लेखों को पढ़ते हुए सचमुच में ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिकता, प्रौद्योगिक विकास, यौनमुक्ति के नाम पर जिस प्रगति एवं स्वतंत्राता को हम हासिल करते जा रहे हैं वह एक छलावा है। पुस्तक दो खंडों में विभाजित है। प्रथम खंड-'मुठभेड़' में पर्व-त्योहार, ग्राम्य-जीवन, प्रकृति, खेल, लोक जीवन आदि विषयों से संबंधित आलेख संकलित हैं तो दूसरा खंड-'हस्तक्षेप' में लेखक ने कई-एक गंभीर मुद्दे उठाए हैं-यथाऋ नारी मुक्ति, विवाह संस्था, सेक्स, हिन्दी मीडिया की भाषिक पिफसलन, भूमंडलीकरण, लोक बनाम शास्त्रा इत्यादि। पहले खंड में लेखक जीवन की आधुनिकता और पारंपरिकता के बीच समन्वय भी स्थापित करने का प्रयास करता है और कहीं-कहीं आधुनिकता के नाम पर परोसी जा रही अपसंस्कृति का पुरजोर विरोध भी करते हैं। दरअसल पुस्तक का पहला खंड एक प्रकार से लेखक के जीवनानुभवों का आईना है। इस आईने में न केवल लेखक का बल्कि हम सभी अपने-आप का और समाज का चेहरा निहार सकते हैं। इस प्रक्रिया में उनका संवेदनशीलता और भावुकता का स्तर कितना गहरा है उसे हम आसानी से परख सकते हैं। लेखक कहीं बैलगाड़ी के विलुप्त होने पर चिंता प्रकट कर रहे हैं तो कहीं सुनामी की त्राासदी उन्हें बेरहमी से सता रही है।
'विकास के महायान में' शीर्षक लेख में लेखक की चिंता विचारणीय है-'विकास के इस टीले पर मनुष्य ने सुख का जो महल खड़ा कर लिया है, क्या उससे मुक्त होना संभव है। कहीं हमारी स्थिति उस मकड़ी जैसी तो नहीं होती जा रही जो खुद के बनाए जाल में ही दम तोड़ देने को अभिशप्त होती है? विकास का यह महायान हमें अंततः किस छोर पर ले जाएगा?' इसी प्रकार एक अन्य लेख 'एक वीरान होती दुनिया' में लोकनृत्यों के विलुप्त होने पर वे चिंतित हैं। 'बेटी बेचवा', 'विदेसिया',
'लौंडा नाच' जो भोजपुरी अंचल का लोकप्रिय लोकनृत्य हुआ करता था उसका गायब होना और तेजी से पाँव पसारते 'ऑरकेस्ट्रा कल्चर' लेखक की चिंता का कारण भी है। लेखक ने सच ही लिखा है कि 'हजारों वर्षों की सभ्यता विकास के अनुभवों को संजोए भारत जैसे देश को टटोलने पर महसूस होता है कि आज मनुष्य विकास की तमाम सरहदों और मर्यादाओं को ध्वस्त कर देने पर आमदा है। विकास और सुख की अतिशय चाहत और प्रयास में कितनी सभ्यताएँ नष्ट हो गईं। यह कैसा विकास कैसी उन्नति जो हमें नितांत आत्मकेंद्रित, स्वार्थ-संकुल बनाती जा रही है, जिसमें दूसरे जीवों के अस्तित्व की कोई चिंता नहीं। नाना यंत्राकृत सामानों की उपलब्धता से आत्ममुग्ध होकर हम प्रकृति के अनमोल उपहारों से वंचित होते जा रहे हैं।'
ऐसे विचारों से गुजरते हुए निश्चित रूप से हमें यह प्रेरणा देती है कि ८ारा हम 'स्वयं' से उठकर सोचें कि हम कहाँ जा रहे हैं? यह सवाल हम सबों से जुड़ा है।
दूसरा खंड -'हस्तक्षेप' एक वैचारिक परिपक्वता की खुली तस्वीर है। जो लेखक के निरंतर संद्घर्ष का नतीजा है और जिसका प्रस्पफुटन वैचारिक रूप में हुआ है।
'नारी मुक्ति : किससे?' लेख में लेखक का मानना है कि आज की तारीख में नारी मुक्ति आंदोलन अपनी दिशा से भटककर 'यौन मुक्ति' में तब्दील होती जा रही है। नारी मुक्ति का परिदृश्य ऐसा बदला है कि आर्थिक स्वालम्बन की बात गौण हो गई है। स्वस्थ समाज के लिए स्त्राी स्वतंत्राता को अति यौन-स्वतंत्राता का पर्याय बना देना कतई मुनासिब नहीं है। अब तक का इतिहास यही बताता है कि केवल यौन-उनमुक्तता की कामना कभी किसी सामाजिक राजनीतिक विप्लव क्रांति का कारण नहीं बन सकती है। हाँ, समाज में अराजक स्थिति पैदा करने में जरूर इसकी
भूमिका हो सकती है।
पुस्तक में शामिल एक अन्य महत्वपूर्ण लेख-'भूमंडलीकरण के दौर में साहित्य का भविष्य' में लेखक के विचार विचारणीय हैं। यहाँ लेखक का मानना है कि भूमंडलीकरण की कोख से पैदा हुई चुनौती सबसे भयावह और त्राासद है। आज भूमंडलीकरण के नाम पर समय को मूल्यवान बनाने का जो कोलाहल पैदा किया जा रहा है एवं एक नई दुनिया को गढ़ने का स्वप्न देखा जा रहा है दरअसल वह पूंजीवाद का अत्यंत निकृष्ट, विकृत स्वर हैं।
'हिन्दी मीडिया की भाषिक पिफसलन' शीर्षक लेख में उन्होंने मीडिया को भी एक बार कटद्घरे में खड़े करने की कोशिश की है। 'विवाह संस्था क्यों बनी रहे?' आलेख भी रचनात्मक समाज का ढाँचा मजबूत रहे-इस दिशा में एक वैचारिक प्रयास है।
अतः कुल मिलाकर यह कहना होगा कि 'समय-संवाद' में श्रीभगवान का आलोचनात्मक तेवर जो लोकजमीं से विकसित हुआ है, सामने आया है। लोकचिंतन और समाज सापेक्ष परंपरागत विचारों को इस पुस्तक में बिना किसी लाग-लपेट किए जगह मिली है। इस प्रकार की कृति का निश्चित रूप से साहित्य और विमर्श जगत में स्वागत होना चाहिए क्योंकि यह पाठकों को 'स्वयं' की पहचान कराते हुए अंधे की तरह दौड़ लगाने की दिशा में लगाम देती है। यहाँ लेखक के विचारों पर अमल करने की जरूरत है न कि उसे नजरअंदाज करने की। कारण, यह
श्रीभगवान सिंह द्वारा थोपा विचार नहीं बल्कि किसी भी भारतीय की आत्मा की पुकार है।

 
भारतीय भाषा परिषद
३६ए, शेक्सपियर सरणी, कोलकाता-१७
मो. ९६७४०९१५६४
 
 
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