अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
मूल्यांकन
 
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या
शशिकला राय
 

बिछुड़े सभी बारी बारी
विमल मित्रा
अनुवाद : सुशील गुप्ता
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : ३०० रुपये, पृष्ठ १९२

 

'कला मूलभूत मानवीय सत्य की नींव डालती है, जिसका उपयोग न्याय की कसौटी के रूप में किया जा सकता है, मैं एक ऐसे अमेरिका की कामना करता हूँ, जो कला के स्तर को क्रमशः बुलंदियों तक ले जाए और जहाँ सभी नागरिकों को बृहद सांस्कृतिक अवसर मिले।'-
राष्ट्रपति जॉन एपफ. कैनेडी ;अक्टूबर १९६३द्ध निसंदेह कलाएँ एवं कलाकार किसी भी राष्ट्र व समाज के लिए गर्व का विषय
हैं। सांस्कृतिक समृ(ि के बिना कोई राष्ट्र कितना ही बलशाली क्यों न हो, अंततः दयनीय है? बल हिंसा का और संस्कृति मानवता का शास्त्रा रचता है। कलाएँ ऐन्द्रिक अनुभव को आध्यात्मिक आभा प्रदान कर सकने में समर्थ होती हैं। कलाकार भीड़ से अलग होता है, वह भीड़ के ेम में पिफट नहीं होता, सो भीड़ में अकेलेपन का संताप उसकी नियति है। एक महान कलाकार तो कलाकारों की भीड़ से भी अलग होता है, उसे दोहरा अभिशाप झेलना पड़ता है। ये दुनिया उनसे जीवन का अवसर छीन लेती है। कितनी अजब बात है कि हत्या और आत्महत्या की एक संगति यहाँ नजर आती है, -गोरख पांडेय की आत्महत्या, पाश की हत्या, सपफदर हाशमी की हत्या इसी क्रम में थोड़ी उलटी गिनती कर गुरुदत्त की आत्महत्या। दरअसल इनका जीवनशास्त्रा इतना जटिल होता है कि इसे केवल श्वेत-श्याम रंगों में रेखांकित नहीं किया जा सकता। इन्हें खोने का मतलब खोना ही है, यहाँ क्षतिपूर्ति का सि(ांत नहीं लागू होता। 'बिछुड़े सभी बारी-बारी' कृति से गुजरते हुए ऐसा ही भीगा एहसास दूर तक पश्चाताप एवं ग्लानि लिए चला आता है। यह संस्मरण उस व्यक्ति पर केंद्रित है, जिसकी पेशानी की सलवटें और आँखों की गहराई निरंतर रहस्य और पीड़ा की सृष्टि रचती है, जो सिनेमा के नये सौंदर्यशास्त्रा की व्याख्या करता अपनी बेहिसाब प्रतिभा का अधिकांश हिस्सा इस दुनिया को दिए बिना चला गया। गुरुदत्त, हाँ गुरुदत्त रहस्य भरे आकर्षण का नाम। गुरुदत्त की साँसें थम जाना केवल एक जीवन की गति थम जाना ही नहीं था बल्कि एक काल प्रवाह का निरवधि काल समुद्र में विलुप्त हो जाना था। गुरुदत्त पर मराठी में भाऊपाध्ये की और हिन्दी में प्रह्‌लाद कक्कड़ की पुस्तक आ चुकी है। गुरुदत्त की मुहब्बत में डूबी दोनों ही कृतियाँ, गुरु के निकटस्थ लोगों से खपफा सी लगती हैं। विमल मित्रा के गुरुदत्त अपनी मुखर प्रतिभा परंतु खामोश कमियों के साथ हमारे सामने आते हैं। बनता, ढहता पिफर बनता, ढहता गुरुदत्त जो कहता है- ''विमल बाबू मृत्यु से मैं नहीं डरता लेकिन जिं़दगी के लिए भयभीत रहता हूँ'' कैसा था गुरुदत्त का जीवन। दूर तक नाउम्मीद खिड़कियाँ दरवाजे, बेरंग आसमानी चादर ओढ़े थकी जमीन, शहर का सन्नाटा। सृष्टि का हर कण अधूरा है यह भान रखने वाला गुरु किस पूर्णता की तलाश में अपनी दुनिया रच-रच ध्वस्त करता है, पाली हिल पर अपने सपनों का महल तैयार करने के बाद एक दिन मजदूरों द्वारा उसी को ढहाकर जमींदोज कर देता है। ८िागर के शब्दों में कहीं गुरुदत्त की ही सच्चाई तो नहीं- बना-बना के जो दुनिया मिटाई जाती है
जरूर कोई कमी है, जो पाई जाती है।
कहा जाता है, पीड़ा सर्जनात्मकता की प्रक्रिया में है, गुरुदत्त जब तक जीवित रहा सर्जनात्मकता की इसी प्रक्रिया में लगा रहा। गुरुदत्त की पीड़ा के साक्षी विमल मित्रा संस्मरण के कैनवस पर गुरुदत्त के भीतरी द्घर ;द्घर के भीतर, और भीतर का द्घरद्ध का चित्रा उकेरते हैं। उदासी, खुशी, बेचैनी, पीड़ा, प्रेम, तन्हाई, तड़प, सौंदर्य के अनेक रंगों का कुशल संयोजन करते हैं। और जीवित बिबों को शब्दों के ेम में सदेह उतार देते हैं।
इस संस्मरण की शब्दयात्राा बंगला से होती हुई हिन्दी तक आई। कृति का मर्म ज्यों का त्यों अक्षुण्ण रहा। कृति का यूं हिन्दी में उतरना दरअसल अनुवाद एवं सुशील गुप्ता दोनों के प्रति आस्था पैदा करता है।
गुरुदत्त की पिफल्में ८ाख्मों का प्रतिरूप ही थीं। डायरेक्टर की हैसियत से कई बार वह निर्मम भी हो उठता था लेकिन इस
निर्ममता को कला के सापेक्ष में देखना ही औचित्यपूर्ण है। प्रसि( शिल्पकार सोमनाथ होर लिखते हैं- ''एक कुल्हाड़ी निदर्यता से जब लकड़ी काटती है, तेजाब बिना किसी पूर्वयोजना के जब भयंकरता से तांबे के प्लेट पर आक्रमण करता है तो अंत में जख्म ही मूर्तरूप में बाहर निकलता है।'' ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो भी हासिल होने का बोध नहीं बल्कि निचाट सूनापन और व्यर्थता का अहसास करने वाले गुरुदत्त की पिफल्में जीवन की इन्हीं विडंबनाओं का प्रतिरोध करती हैं। व्यक्ति के आंतरिक जीवन की गहन प्रक्रिया, शारीरिक क्रिया द्वारा अभिव्यक्त होती है, गुरुदत्त कभी खिड़कियाँ तो कभी दरवाजे रंगता हुआ जीवन के गहरे रंगों को पकड़ने की कोशिश करता है। प्रयोगधर्मिता गुरुदत्त का स्वभाव है कला के क्षेत्रा में कभी 'सिनेमास्कोप' की सपफलता तो कभी 'कागज के पफूल' की असपफलता। दोनों ही जायज है परंतु जीवन के साथ प्रयोग? भीतरी सन्नाटे से भयजदा गुरुदत्त कभी पिफल्मी ;हुड़दंगईद्ध पार्टी मनाता है, कभी रसोई में सब्जियाँ पकाता है। कभी तेज ड्राइव करता है तो कभी पेड़-पौधों से अंतरंग हो उठता है। गुरुदत्त के ही शब्दों में ''असल में हर वक्त इंसान मुझे भले नहीं लगते विमल बाबू कभी-कभी पेड़-पौधे भी मुझे अच्छे लगते हैं।'' गुरुदत्त के भीतर विद्यमान हो अंतर्विरोधी सत्ताओं का निरंतर संद्घर्ष उनकी बेचैनी का मूल है। गुरुदत्त की तड़पती आकांक्षा है, एक उन्हें समझ पाने वाला साथी मिल जाए। दरअसल यह जेनुइन आकांक्षा हर शख्स की होती है, कि उसके पास कोई ऐसा मित्रा साथी हो जो उसे ठीक-ठीक वैसा ही समझे, जैसा वो है। विमल मित्रा गुरुदत्त की 'मुझे सब कुछ चाहिए और कुछ भी नहीं चाहिए' के अंतर्द्वंद्व से भलीभांति परिचित थे। गुरुदत्त का व्यक्तित्व ''एक तरपफ वह परमविलासी, इनकमटैक्स स्टूडियो में परम व्यस्त, पैसे रुपये की कभी चिंता करता अपनी लाइपफस्टाइल को लेकर असुरक्षित महसूस करता है। दूसरी तरपफ एक ऐसा संत जिसकी दुनिया सैंडो बनियान, लुंगी व एक जोड़ी स्लीपर, छप्पन भोग छोड़ कोने में बैठकर सूखी रोटी चबाता था। निस्पृह निर्विकार और अहंकार मुक्त रात भर जाग-जाग कर विज्ञान और साहित्य पढ़ने वाला।'' विमल मित्रा की कसक यह है कि, ''गुरुदत्त की इस दूसरी सत्ता को कोई पहचान नहीं पाया। वहीदा रहमान ने नहीं, गीतादत्त ने नहीं, गुरुदत्त की माँ ने भी नहीं।''
अच्छी पिफल्में बनाना गुरुदत्त की प्रतिब(ता है, तो बाजार की सपफलता ध्यान में रखना जीवन की गरज। 'काग८ा के पफूल' की असपफलता गुरुदत्त को आहत करती है। एक पिफल्ममेकर के जीवन की त्राासदी है, बहुत कुछ गुरु के जीवन जैसा। 'दुख ही जीवन की कथा रही'। इस पिफल्म की असपफलता से गुरु का द्घायल हृदय कराह उठा ''यह पिफल्म मैंने अपने लिए बनाई है, पब्लिक के लिए नहीं। जनता एक मशहूर डायरेक्टर की निर्धनता पचा नहीं पाई या पिफर ट्रेजडी को पुरुष से जोड़कर नहीं देख पाई। गुरु सजग है। अब की बार पिफल्म सुपरहिट 'चौदहवीं का चाँद'। गुरुदत्त के कर्म और भाग्य ने वह सब दिया जिसे पाकर कोई भी व्यक्ति अपने को शिखर की उस चोटी पर महसूस करता, जहाँ से दुनिया छोटी नज़र आती। पर गुरुदत्त न आँख भर नींद जुटा सका, न ही पल भर का सुकून। एक लंबी नींद, हृदय का थोड़ा सुकून, यही अतृप्त आकांक्षा गुरुदत्त को मृत्यु का
आशिक बना देती है। बार-बार उससे मिलने को वह मचलता रहा जिद और जुनून ने उसे मृत्यु से मिला दिया। गुरुदत्त के संदर्भ में क्षतिपूर्ति का सि(ांत लागू नहीं होता। सिनेजगत दूसरा गुरुदत्त नहीं बना सका। भाऊ पाध्ये में वहीदा रहमान के प्रति ठीक वैसा ही रोष दिखाई देता है, जैसा गोपियों में अक्रूर के प्रति दिखाई देता हैऋ परंतु विमल मित्रा तीनों ;गुरुदत्त, गीतादत्त, वहीदा रहमानद्ध के सम्मान को ठेस न पहुँचाते हुए उनके जीवन की स्थितियों को तर्कसंगत तरीके से पाठक के समक्ष रखते हैं। विमल मित्रा गुरु के संदर्भ में यह जानकर क्षुब्ध होते हैं कि वे गीता जी से गाना छोड़ देने का आग्रह करते हैं। इसके बावजूद गुरु की ज़िंदगी के ताप को जिस भाषा में विमल मित्रा रूपायित करते हैं उससे गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है कि हल्का सा दबाव पड़ा तो शब्द पिद्घलने लगेगा। विमल मित्रा लिखते हैं-''बहुत बार खयाल आया है कि काश गुरु जरा कंजूस होता, तो बेहतर होता। काश औरतों के प्रति जरा सी कमजोरी होती तो बेहतर होता। औरों का चाहे भला न होता तो कम से कम अपने दिल की बात भूला रहता, अपने दिल के दर्द से उसे रिहाई मिल जाती।'' सच मानव मन का अध्ययन करने के लिए बना हर शास्त्रा विपफल नजर आता है जो शख्स साधारण नहीं उसे समझ पाना तो लगभग असंभव। औसत ेम में न पिफट होने वाले व्यक्ति को लांछित करने का क्रूर इतिहास है हमारे पास। ऐसा कोई शास्त्रा नज़र नहीं आता जो संवेदनशील मन को क्षत-विक्षत होने से बचा सके। संस्मरण के हर पृष्ठ पर पफैली हुई एक आर्द्र उदासी है, जो निरंतर गुरुदत्त और पाठक के बीच नमी का रिश्ता बनाये रखती है। उदय प्रकाश किसी के संदर्भ में लिखते हैं। उनका लिखा उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ क्योंकि गुरुदत्त के संदर्भ में यह कथन अक्षरशः चरितार्थ होता है-''कलाओं का धर्म है कि द्घोर ऐन्द्रिक अनुभव को एक आध्यात्मिक आभा प्रदान करें। हर ऐन्द्रिक अनुभव कलात्मक अनुभव से गुजरकर एक किस्म की दिव्यता और एक किस्म की समता पा लेता है।'' पिफल्मिंग इज पिकिंग। पिफल्मों के एक-एक दृश्य ेम तक में उनका अभिकल्पन और उनकी योजना प्रकट होती थी। यही कारण था कि गुरुदत्त की पिफल्में साहित्य की संगिनी सि( होती थीं। रंगों, ध्वनियों, बिंबों, शब्दों अनेक कलाओं का संगुपफन साहित्य का रसबोध, कैमरे का मर्म, रुपहले पर्दे की प्राणवत्ता समाहित थी उसमें।
विमल मित्रा गुरुदत्त एवं गीतादत्त के रिश्तों को बहुत शिद्दत एवं कसक के साथ खोलते हैं, वेदना की वेदी पर दो अकूत प्रेम करने वाले जबरन जीवन को जोखिम में क्यों डाले हुए थे, मुहब्बत को शत्राुता की तरह निभाने का समीकरण कैसे बन जाता है? क्यों वपफा का रंग गहरा होते-होते अचानक धूसर हो उठता है? गुरुदत्त के ही शब्दों में ''द्घर न होने की तकलीपफ से द्घर होने की तकलीपफ और भयंकर होती है।'' प्रेम करने वाला जीव स्वयं अपने प्रेम की सबसे बड़ी बाधा है। पति-पत्नी के मध्य थोड़ी सी भी खाली जगह दिख जाये तो सारी दुनिया धक्कमपेल मचाती हुई नकारात्मक भूमिका के साथ पसर जाती है।
कट्टरपंथियों से अधिक भयावह बु(जिीवियों का पफसाद होता है। अनाम पत्रा, खुपिफया बातें। गीता सुलझा भी ले जाती यह सब परंतु गाने के लिए गुरुदत्त का मना करना एक कलाकार द्वारा दूसरे कलाकार की अस्मिता को चोट पहुँचाना था। काश गुरु गीता की इस छटपटाहट को समझ पाता। गीता दत्त को लेकर शुरू की गई 'गौरी' पिफल्म आधे में ही बंद कर दी गई। 'त्राासदी' के भंवर में तीनों ही द्घुट रहे थे। वहीदा रहमान हमेशा के लिए जीवन से चली गई। अब भी गीतादत्त अशांत थी और गुरु भी। विमल मित्रा लिखते हैं- ''उनके जीवन में होने वाला अंधेरा वहीदा रहमान का नहीं बल्कि उनके अपने मन का था''। गुरुदत्त और गीतादत्त दोनों ही आत्महत्या का प्रयत्न कर चुके थे, परंतु होश में आते ही दोनों ही सबसे पहले एक दूसरे को ही ढूंढ़ते थे। इसके बावजूद एक दूसरे के साथ जीना कठिन हो गया। स्त्राी-पुरुष के प्रेम में उपजने वाले प्रश्न शाश्वत हैं। अबूझ हृदय से जन्मे प्रश्न शायद अनंतकाल तक यूं ही बने रहेंगे।
गुरुदत्त अपनी 'कला' ;सिनेमाद्ध के माध्यम से मानव अस्तित्व के असंगत अराजक और अर्थशून्य हादसों को उसके कालातीत मर्म के ेम में संयोजित करता था। इसलिए नहीं कि मनुष्य पृथ्वी के केंद्र में एक सार्वभौम प्राणी है बल्कि इसलिए कि प्रकृति के अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य भी अपना एक विनयशील, विवेकपूर्ण, अर्थसंगत कोना ढूंढ़ सकता है। मानवीय भावना को अपनी कला के बल पर जीवंत कर देने वाला गुरुदत्त, मुश्किल को अपना स्वभाव बना लेने वाला गुरुदत्त, अपने अंदर की कला को टूट कर प्यार करने वाला गुरुदत्त, महामानव तो नहीं था पर जो भी उसके नजदीक गया बंधकर रह गया। विमल मित्रा लिखते हैं-''हे ईश्वर गुरु को थोड़ी सी शांति प्रदान करना। उसकी आँखों को थोड़ी नींद जरूर देना। वह अर्से से जगा हुआ विनिद्र इंसान था। वह असहनीय दर्द की आग में जलता रहा था। काल के सीने पर सपफल कीर्तिमान का हस्ताक्षर रखने के बावजूद वह जीवन की लड़ाई में हार गया। मौत के बाद उसे राहत देना प्रभु।'' सबकुछ पाकर खो देने वाला, सबकुछ खोने में पा लेने का सुख अनुभव करने वाला जीवित किंवदन्ती बन जाने वाला 'कोंकणस्थ देवशरीरा' की जिंदगी के बेशकीमती पल विमल मित्रा के किताबी सपफों में बिखरे हुए उदास समय की तरह हैं, जब कोई हृदय से पन्ना पलटेगा समय बह चलेगा।

 
खेर भवन, गणेश सिंह, पुणे विश्वविद्यालय, पुणे-७
मो. ०९३२४९७४६५६
 
 
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