अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
रेणु की पुण्यतिथि पर विशेष
सच पे मर मिटने की ज़िद
;अमर गीतकार शंकर शैलेन्द्र एवं रेणु के अंतःसंबंधों की मार्मिक गाथाद्ध
भारत यायावर
 
तीसरी कसम' का हीरामन ही सिपर्फ गुलपफ़ाम नहीं था, रेणु दूसरे गुलपफ़ाम थे और तीसरे शंकर शैलेन्द्र। परदे पर दीखने वाले गुलपफ़ाम राज कपूर थे, पर परदे के बाहर वे एक सपफल व्यावसायिक पिफल्म-निर्माता थे। लेकिन 'तीसरी कसम' से राज कपूर की जो छवि निर्मित होती है- देहाती, भोला-भाला, पवित्रा मन का और पफूल की तरह का निर्दोष, स्निग्ध चेहरा, एक आम भारतीय जन की जीती-जागती छवि- वह अविस्मरणीय है। हिन्दी पिफल्मों के इतिहास में दुर्लभ है। यह वास्तव में रेणु और शैलेन्द्र के भावों का प्रकटीकरण एवं प्रस्तुतिकरण था। जिस समय शैलेन्द्र ने 'तीसरी कसम' कहानी पढ़ी, उसी समय वह गुलपफ़ाम मारा गया। उन्होंने बासु भट्टाचार्य से कहानी सुनते ही पफणीश्वरनाथ रेणु को २३ अक्टूबर, १९६६ को एक पत्रा लिखा- 'बन्धुवर पफणीश्वरनाथ, सप्रेम नमस्कार। 'पाँच लम्बी कहानियाँ' पढ़ी। आपकी कहानी मुझे बहुत पसंद आयी। पिफल्म के लिए उसका उपयोग कर लेने की अच्छी पॉसिबिलिटीज़ ;संभावनाएँद्ध हैं। आपका क्या विचार है? कहानी में मेरी व्यक्तिगत रूप से दिलचस्पी है। इस संबंध में यदि लिखें तो कृपा होगी। धन्यवाद। आपका- शैलेन्द्र।' अब यहाँ थोड़ा ठहर कर दूसरे गुलपफ़ाम अर्थात पफणीश्वरनाथ रेणु के जीवन के विषय में संक्षेप में कुछ चर्चा कर लेना आवश्यक है। रेणु शैलेन्द्र से उम्र में दो साल बड़े थे, किन्तु उन्हीं जैसा रूप-रंग और हृदय। दोनों शब्द-शिल्पी थे और दोनों का लोक-हृदय था। शैलेन्द्र ने जिस तरह सन बयालीस के आन्दोलन में भाग लिया था, वैसे ही रेणु
 
ने भी। दोनों ने जेल की सजा काटी थी। शैलेन्द्र ने रेलवे मजदूरों की हड़ताल में सक्रिय रूप से भाग लिया था। रेणु ने भारत और नेपाल के कई मजदूर एवं किसान आन्दोलनों में भाग लिया था। रेणु बिहार के पूर्णिया जिले के औराही-हिंगना गाँव के रहने वाले थे- एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार के। खेती-किसानी ही उनकी जीविका का मुख्य साधन थी। किन्तु उनके पिताजी शिलानाथ मण्डल जब तक जीवित रहे, उन्हें द्घर-परिवार की कोई विशेष चिन्ता नहीं थी।
उनका प्रारंभिक जीवन साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक सक्रियताओं से भरा था। वे अपने जनपद के अधिकांश गाँवों में जाते, वहाँ के लोगों से उनका जीवंत संपर्क था। बहुत कम उम्र से उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। पहले कविताएँ
 
लिखा करते थे। बाद में उन्होंने कहानी एवं कथा-रिपोर्ताज लिखना शुरू किया। उनकी पहली परिपक्व कहानी 'बटबाबा' अगस्त, १९४४ ई. के 'साप्ताहिक विश्वमित्रा' ;कलकत्ताद्ध में छपी। पिफर पहलवान की ढोलक, पार्टी का भूत, कलाकार, रखवाला, न मिटनेवाली भूख, प्राणों में द्घुले हुए रंग, धर्म, मजहब और आदमी, खण्डहर, रेखाएँ-वृत्तचक्र, धर्मक्षेत्रो-कुरुक्षेत्रो नामक कहानियाँ पत्रा-पत्रिाकाओं में छपीं। १९४६ ई. में श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी ने पटना से 'जनता' नामक साप्ताहिक पत्रा पुनः निकालना शुरू किया, जिसमें रेणु के अनेक कथा-रिपोर्ताज छपे, जिनमें प्रमुख है- डायन कोसी, जै गंगा, रामराज्य, द्घोड़े की टाप पर लोहे की रामधुन, एक-टू आस्ते-आस्ते, हड्डियों का पुल, हिल रहा हिमालय आदि। बनारस की 'जनवाणी' पत्रिाका में उनका प्रसि( कथा-रिपोर्ताज 'नये सवेरे की आशा' प्रकाशित हुआ। १९४९-५० में रेणु ने पूर्णिया से एक साप्ताहिक पत्रा का संपादन किया- 'नई दिशा'। इसमें विभिन्न विधाओं की उनकी अनेक रचनाएँ प्रकाशित हुईं। १९५१ में नेपाल के निरंकुश राणाशाही के खिलापफ आन्दोलन में वे कोइराला-बंधुओं के साथ शामिल हुए, जिस पर उन्होंने 'नेपाली क्रांतिकथा' नामक प्रसि( रिपोर्ताज लिखा है। इसी वर्ष वे भीषण रूप से बीमार पड़े। स्वस्थ होने के बाद १९५२ ई. में कालजयी उपन्यास 'मैला आँचल' की रचना की। १९५४ ई. में वह प्रकाशित हुआ और देखते ही देखते रेणु हिन्दी के शीर्षस्थ कथाकारों की पंक्ति में शामिल हो गये। १९५७ में उनका दूसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यास 'परती-परिकथा' प्रकाशित हुआ। इस बीच छठे दशक में प्रकाशित उनकी कहानियों का संग्रह 'ठुमरी' १९५९ ई. में प्रकाशित हुआ। इसी में रेणु की अमर कहानी 'तीसरी कसम अर्थात मारे गये गुलपफ़ाम' भी शामिल है, जो १९५८ ई. में पटना से प्रकाशित एक लद्घु पत्रिाका 'अपरंपरा' में पहली बार प्रकाशित हुई थी। १९५८ ई. से रेणु आकाशवाणी, पटना में सेवारत थे। आकाशवाणी, पटना के पते पर ही रेणु को शैलेन्द्र का वह पहला पत्रा मिला जिसका उत्तर शैलेन्द्र को अपनी स्वीकृति देते हुए लिखा। रेणु के लिए शैलेन्द्र का पत्रा उनमें एक नया उत्साह भरने वाला था। उसी समय टेलिविजन-स्क्रिप्ट-राइटर्स के प्रशिक्षण की ट्रेनिंग के लिए रेणु की दिल्ली में बुलाहट हुई। नवंबर, १९६० के पहले सप्ताह में ही वे आकाशवाणी, दिल्ली चले गये और शैलेन्द्र को सूचित किया कि वे तत्काल आकाशवाणी, दिल्ली में ही संपर्क के लिए उपस्थित मिलेंगे।
दिल्ली के आकाशवाणी भवन में ही १९५९ ई. को दूरदर्शन की स्थापना हुई थी एवं प्रारंभ में इसकी नींव रखने वालों में आकाशवाणी में कार्यरत कई प्रतिभाशाली लेखकों, कलाकारों का योगदान था। प्रसि( कथाकार कमलेश्वर की नियुक्ति १९५९ ई. में दूरदर्शन केन्द्र में ही हुई थी। प्रसि( पिफल्म निर्देशक शिवेन्द्र भी उसमें कार्यरत थे। और रेणु के अन्तरंग मित्रा वीरेन्द्र नारायण भी वहाँ कार्यरत थे। पी.एल. देशपांडे टेलिविजन केन्द्र के प्रमुख प्रोड्यूसर थे। साथ ही एक शंकर शैलेन्द्र नामक व्यक्ति भी उसमें कार्यरत थे। रेणु से मिलने एवं 'तीसरी कसम' कहानी के
पिफल्मीकरण के अधिकार का अनुबंध करने शैलेन्द्र ने बम्बई से अपने साले संतोष ठाकुर को भेजा। दिल्ली के आकाशवाणी-भवन के टेलिविजन-सेक्शन के एक कमरे में बैठकर रेणु ने अनुबंध-पत्रा पर हस्ताक्षर पाँच हजार रुपये लेकर किया। किन्तु बाद में शैलेन्द्र ने इस राशि को दस हजार रुपये कर दिया। दिसंबर महीने में शैलेन्द्र ने रेणु को बम्बई बुलवाया। रेणु की यह पहली बम्बई-यात्राा थी, जिसे वे एक पिफल्मी-यात्राा कहते थे। शैलेन्द्र ने रेणु को बड़े ही मान-आदर के साथ ठहराया। वहीं उनकी भेंट 'तीसरी कसम' पिफल्म के निर्माण से जुड़े बासु भट्टाचार्य ;निर्देशकद्ध, नवेन्दु द्घोष ;पटकथा-लेखकद्ध, बासु चटर्जी एवं बाबूराम इशारा ;सहायक निर्देशकद्ध से हुई एवं 'तीसरी कसम' के पिफल्मांकन की भावी रूपरेखा पर विस्तार से चर्चा हुई। तय किया गया कि ढाई-तीन लाख रुपये में अर्थात कम बजट में इसका निर्माण कर लिया जायेगा। चूंकि बजट कम था, इसलिए इसे श्वेत-श्याम ही बनाने का निर्णय लिया गया, जबकि १९६० ई. तक हिन्दी की बहुतायत पिफल्में रंगीन बनने लगी थीं। यह भी तय कर लिया गया कि पाँच-छह महीने में इसकी शूटिंग पूरी कर ली जायेगी। संवाद-लेखन की जिम्मेदारी रेणु को दी गयी एवं तय किया गया कि गीत शैलेन्द्र के होंगे। अब यह तय करना था कि हीराबाई की भूमिका के लिए किस अभिनेत्राी का चयन किया जाये एवं हीरामन की भूमिका के लिए किस अभिनेता का? इस प्रसंग को रेणु की जुबानी ही सुनिये-
'शैलेन्द्र जी ने मुझसे पूछा था, 'अच्छा! कहानी लिखते समय आपके सामने हीराबाई की कोई तस्वीर तो जरूर होगी। अब, जबकि पिफल्म की बात हो रही है, तो पिफल्म इंडस्ट्री में आपकी उस मूरत से कोई सूरत मिलती-जुलती नजर आती है? यानी, आप किसको इस भूमिका के लिए...।'
मैंने हँसकर जवाब दिया था, 'भाई! हमलोग काननबाला,
उमाशशि, यमुना, देविका रानी, सुलोचना और नसीम वगैरह के युग में सिनेमा देखा करते थे। अब तो सब चेहरे एक ही साँचे में ढले-से लगते हैं। किसका क्या नाम है, याद ही नहीं रहता।'
'यह तो बात को टालने वाली बात हुई।' वे हँसे थे।
थोड़ी देर के बाद मैंने कहा था, 'वह एक... 'प्यासा' में माला सिन्हा के साथ कोई लड़की थी न...?'
शैलेन्द्र ने बासु भट्टाचार्य की ओर देखा और बासु के मुँह से एक किलकारी के साथ निकला था- 'स्साला!' मैं जानता था, यह कोई गाली नहीं। बंगाली विद्यार्थी जब किसी बात पर खुश होते हैं, तो उनके मुँह से यह शब्द अनायास ही निकल पड़ता है। किन्तु मैं झेंप गया था- शायद मैं किसी गलत और सर्वथा 'मिसपिफट' चेहरे की बात कह गया।
शैलेन्द्र 'ताड़' गये थे। बोले, 'हमारे मन में भी उसी की सूरत है। ...आप क्या सचमुच उसका नाम नहीं जानते? ...वह वहीदा रहमान है।'
मैंने पूछा, 'इंद्राणी रहमान की कोई लगती है क्या?'
'नहीं जी! मगर नाचना जानती है।'
दूसरे या तीसरे दिन वे वहीदा रहमान को कहानी सुनाने गये। लौटे तो बहुत खुश नजर आये। सूचना दी, 'साहब! हो गयी आपके मन की हीराबाई! परसों हम एग्रीमेंट पर दस्तखत कराने जायेंगे। ...कहानी सुनकर उनकी आँखें छलछला आयीं।'
मैंने धीरे से पूछा था, 'और हीरामन?'
शैलेन्द्र जी कोई जवाब देने के बदले मुस्कुराने लगे थे। बासु भट्टाचार्य को उन दिनों लोग 'आग निगलनेवाला' मानते थे। उसने कहा था, 'शैलेन्द्र! तुम पिफर सोचो... आमार एक्केबार आसल हीरामन चाय।...'
बासु के जाने के बाद मैंने पूछा था, 'आप क्या राज कपूर साहब को लेने की बात सोच रहे हैं?... लेकिन, लेकिन...!'
तब तक मुझे 'जागते रहो' के राज कपूर की याद आ गयी थी। मैंने कहा था, 'राज साहब तो कर सकते हैं, लेकिन, करेंगे क्या? माने हीरामन की आत्मा में पैठ सकेंगे? सुना है अपनी तस्वीर के सिवा...!'
शैलेन्द्र ने कहा था, 'आप अगर यह मानते हैं कि वे कर सकते हैं, तो समझ लीजिए 'करेंगे'। ...आपने सुना है, देखा तो नहीं?'
पिफर शैलेन्द्र राज कपूर के पास 'तीसरी कसम' की कहानी सुनाने पहुँचे। कहानी सुनकर राज कपूर बेहद प्रभावित हुए और सहर्ष इसमें काम करना स्वीकार कर लिया। पिफर वे गंभीरतापूर्वक बोले- 'मेरा पारिश्रमिक एडवांस देना होगा।' शैलेन्द्र ऐसा सुनते ही मायूस हो गये। उन्हें राज कपूर से ऐसी अपेक्षा नहीं थी। शैलेन्द्र के बुझे हुए चेहरे को देखते हुए तब राज कपूर ने कहा, 'निकालो एक रुपया, मेरा पारिश्रमिक! पूरा एडवांस।'
पिफर राज कपूर ने उन्हें समझाया कि पिफल्म-निर्माण के चक्कर में तुम मत पड़ो। यह काम तुम्हें सूट नहीं करेगा। तुम कवि हो, कलाकार हो। लेकिन वे नहीं माने। राज कपूर ने दोस्त के नाते व्यापारिक सपफलता के लिए कुछ गुर भी बताने चाहे, लेकिन शैलेन्द्र ने दृढ़ता से कहा- 'यह मेरी पिफल्म है, जैसा मैं चाहूँगा, वैसा ही बनेगी।' संवेदनशील कवि के लिए पिफल्म-निर्माण के क्षेत्रा में कदम रखना कितना द्घातक हो सकता था। वे शैलेन्द्र के भविष्य को लेकर आशंकित थे। तात्पर्य यह कि एक सच्चे शुभचिन्तक की तरह राज कपूर ने शैलेन्द्र को आगाह किया था और उन्हें मुसीबतों से बचाने के लिए ही समझाया था, किन्तु शैलेन्द्र अपनी ज़िद के पक्के थे- 'तीसरी कसम' बनाने के लिए मर-मिटने को तैयार। राज कपूर ने उनके बोझ को हल्का करने के लिए बगैऱ पारिश्रमिक इस पिफल्म में काम किया। साथ ही आर.के. स्टुडियो से जुड़े अनेक कलाकारों ने भी शैलेन्द्र से पारिश्रमिक के तौर पर नहीं के बराबर ही लिया। शंकर-जयकिशन, मुकेश, हसरत आदि तो उनके राज कपूर की तरह ही अंतरंग मित्रा थे। बासु भट्टाचार्य, नवेन्दु द्घोष, बासु चटर्जी, बाबू राम इशारा आदि बिमल राय प्रोडक्शन से जुड़े लोग थे, जिनके साथ शैलेन्द्र का प्रायः उठना-बैठना होता था और इन सभी के साथ मिलकर ही शैलेन्द्र ने 'तीसरी कसम' के निर्माण का निर्णय लिया था। इनमें से कोई पैसे के लिए पिफल्म से नहीं जुड़ा था। यहाँ तक कि वहीदा रहमान भी शैलेन्द्र से आत्मीय
संबंध के कारण, बहुत कम पैसों में काम करने को तैयार हो गयी थीं। ये सभी लोग एक महान कहानी पर एक ऐसी पिफल्म निर्माण करना चाहते थे, जो हिन्दी सिनेमा के इतिहास में एक अमर कलाकृति के रूप में सदियों तक अविस्मरणीय बनी रहे। इस टीम के केन्द्र में थे शैलेन्द्र।
लेकिन इस पिफल्म के निर्माण में जो परेशानियाँ शुरू हुईं तो अंत तक बनी रहीं। इसमें पहला व्यवधान यह आया कि वहीदा रहमान ने इस पिफल्म में काम करने से मना कर दिया। पिफर इसकी 'नायिका' के लिए नये चेहरे की तलाश में यह टीम निकली, लेकिन असपफलता ही हाथ लगी। पिफर तय किया गया कि नूतन को 'नायिका' के तौर पर लिया जाये। लेकिन पिफर बात नहीं बनी। पुनः वहीदा रहमान बेहद आग्रह-अनुग्रह पर तैयार हुईं, किन्तु उनकी अपनी शर्तें थीं। शैलेन्द्र ने तय किया कि पिफल्म का मुहूर्त रेणु के अंचल में किया जाये। पूरी टीम पूर्णिया आयी और १४ जनवरी, १९६१ ई. को इसका शुभारंभ हुआ। रेणु ने बैलगाड़ियों की दौड़ प्रतियोगिता करवायी, जिसकी शूटिंग हुई। पूर्णिया के विभिन्न क्षेत्राों एवं दृश्यावलियों का भी पिफल्मांकन किया गया। 'तीसरी कसम' के कैमरामैन सुब्रत मित्रा सत्यजित राय के पसंदीदा कैमरामैन थे। पूर्णिया की शूटिंग एवं सुब्रत मित्रा के विषय में रेणु के शब्द देखिए : 'एक बात कह दूँ, मैं सुब्रत बाबू के कैमरे को सुब्रत बाबू की देह से भिन्न नहीं- उसका सजीव अंग मानता हूँ। मेरे दिल में इस व्यक्ति ;कैमरा सहितद्ध के लिए असीम श्र(ा है। मुझे याद है, आज से तीन वर्ष पहले ;१९६१ ई. मेंद्ध जब आउट डोर के लिए 'लोकेशन' देखने और गुलाबबाग मेले की शूटिंग के लिए 'तीसरी कसम' की यूनिट पूर्णिया गयी थी।... 'पथेर पांचाली', 'जलसाद्घर', 'अपराजितो', 'अपूर संसार' को सेल्यूलाइड पर अंकित करने वाले व्यक्ति ;और मशीनद्ध को निकट से देखने का सुअवसर मिला था। हम करीब एक सप्ताह साथ रहे थे। वे मेरे गाँव-मेरे द्घर में कई दिन ठहरे ही नहीं थे- मेरी हवेली के अंदर ;कथांचल के लोगों के चलने-पिफरने, बोलने-बतियाने के ढंग को चित्राब( करने के लिए!द्ध परिवार की महिलाओं का 'चलचित्रा' लिया था।... तीन दर्जन बैलगाड़ियों की दौड़... आम के बाग की ढलती हुई छाया... सिंदूरी-साँझ की पृष्ठभूमि में उड़ते हुए बगुलों की पांतियाँ... इन सारे दृश्यों को 'ग्रहण' करते समय सुब्रत बाबू, के चेहरे पर एक अद्भुत चमक खेल आती थी।...' 'तीसरी कसम' को यथार्थव्यंजक एवं प्रभावशाली बनाने में सुब्रत मित्रा एवं उनके कैमरे की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
रेणु और शैलेन्द्र के ये अच्छे दिन थे। रेणु नियमित कहानियाँ, उपन्यास और रिपोर्ताज लिख रहे थे। शैलेन्द्र पिफल्मों के लिए एक-से-एक बेहतरीन गीत लिख रहे थे। वे बार-बार मुस्कुराते हुए एक दूसरे को देखा करते थे। 'तीसरी कसम' में एक कव्वाली है, जिसकी पंक्तियाँ वे जब साथ होते तो साथ गाते और न होते तो अपने पत्राों में उसका उल्लेख करते। रेणु ने 'तीसरी कसम' की शूटिंग को लेकर एक रचना लिखी है, जिसमें इस प्रसंग को इस प्रकार रखा है- 'एक-डेढ़ द्घंटे के द्घनद्घोर-रिहर्सल के बाद पहली पंक्ति और नाच के पहले टुकड़े की 'टेकिंग' के लिए क्षणिक विश्राम दिया गया : लाइट्स ऑपफ!'
तब, हम दोनों भाइयों ;कथाकार और गीतकारद्ध ने मिलकर नौटंकी का एक गीत गुनगुनाना शुरू किया :
अरे तेरी बाँकी अदा पर मैं खुद हूँ पिफदा,
तेरी चाहत का दिलवर बयाँ क्या करूँ?
यही ख्वाहिश है कि तू मुझको देखा करे -
और दिलोजान मैं तुझको देखा करूँ।...
...पिछले तीन वर्षों से हम दोनों किसी बात पर जब एक साथ अति-प्रसन्न होते हैं, तो नौटंकी की इन्हीं पंक्तियों को इसी तरह गाते हैं और एक-दूसरे को कई मिनट तक दिलोजान से देखते रहते हैं, पिफर हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते हैं। हाँ, हम सैकड़ों योजन दूर बैठकर अपनी चिट्ठियों में भी इस गीत को गाते हैं।'
जब 'तीसरी कसम' की शूटिंग समाप्त हो चुकी थी। पूरी टीम बिखर चुकी थी। शैलेन्द्र के पास बचे थे राजकपूर और सुब्रत मित्रा। वे राज कपूर के साथ मिलकर आर.के. स्टूडियो में पिफल्म का संपादन कर रहे थे। १९६१ ई. से १९६५ ई. तक, यानी पाँच वर्षों तक रुक-रुक कर या कभी लम्बे अन्तराल के बाद हुए
शूटिंग के टुकड़ों को मिलाना-जोड़ना, बेहद श्रमसाध्य एवं पेचीदा मामला था। 'तीसरी कसम' के तीनों डायरेक्टर शैलेन्द्र का साथ छोड़कर अपने कामों में व्यस्त हो चुके थे। किन्तु शैलेन्द्र के लिए 'तीसरी कसम' को पूरा करना जीने-मरने का सवाल था। वे 'तीसरी कसम' और रेणु के रंग में डूबे हुए थे। ऐसी स्थिति में अकेले जूझते हुए उस समय की मशहूर सिने पत्रिाका 'माधुरी' के संपादक अरविन्द कुमार ने उन्हें देखा था। वे कभी-कभी शैलेन्द्र के साथ ही आर.के. स्टूडियो चले जाते थे और कभी-कभार शैलेन्द्र की मदद भी कर देते थे। इस तरह 'तीसरी कसम' को एक स्वरूप मिला। शैलेन्द्र ने इससे उत्साहित होकर १६ पफरवरी, १९६६ ई. को रेणु को एक पत्रा लिखा। रेणु उस समय गाँव पर थे। उन्होंने अपने गाँव औराही-हिंगना से शैलेन्द्र को इसका उत्तर लिखा, जो इस प्रकार है :
तीसरी कसम ज़िन्दाबाद!
टपससंहम - च्ण्व्ण् ।नतंीप-ीपदहदं
टपं . थ्वतइमेहंदर
क्पेजण् . च्नतदमं ;ठमींतद्ध
२४ण्२ण्६६
भाई जान, भाई जान
मेरी जान, मेरी जान!
आपका १८ पफरवरी का पत्रा मुझे कल मिला। द्घर भर में- गाँव भर में- इलाके भर में आनन्द-उत्साह की एक नई लहर दौड़ गयी है। हर आदमी अपनी आँख से पत्रा पढ़ लेना चाहता है। ...आपने लिखा है- 'जादूगर सुब्रत ज़िंदाबाद।' मैं कहता हूँ- कविराज शैलेन्द्र ज़िंदाबाद! ज़िंदाबाद!!'
मेरा प्रोग्राम? अब तक कोई प्रोग्राम ही नहीं था। अब, होली के बाद पटना। पटने में एक सप्ताह रह कर बम्बई के लिए प्रस्थान!
अचरज की बात! मुझे यहाँ एक ज्योतिषी ने, १५ पफरवरी, ६६ को महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इसी तारीख को किसी महत्वाकांक्षा की पूर्ति होने की संभावना है। पिफल्म के संबंध में मैंने उसे कुछ नहीं बतलाया था। किंतु, उसने कहा- चूंकि कार्यारंभ 'तिल संक्रांति' के दिन हुआ था, इसलिए काम तिल-तिलकर हो रहा है। किन्तु, श्रेष्ठ हो रहा है। इधर, मैं एक अनुष्ठान में लगा हुआ हूँ। ;मैं यह सब ढोंग करता हूँ और इन पर पूर्ण आस्था रखता हूँ।द्ध पंद्रह दिन और रह गये हैं। यह पत्रा मैं आपको 'आसन' पर बैठकर ही लिख रहा हूँ। पंद्रह दिन हो गये- एक शब्द मुँह से नहीं निकला है। मैं सुन रहा हूँ, इस 'अंध-कोठरी' में बैठकर- सभी 'तीसरी कसम
 
ज़िन्दाबाद' कर रहे हैं। एक उपन्यास ;१८० पृष्ठों काद्ध लिख कर समाप्त किया है। दूसरे में हाथ लगाया है। ...'माया' विशेषांक ;भारत-१९६६द्ध में एक कहानी प्रकाशित हुई है- 'आत्म-साक्षी'। आपको अच्छी लगेगी। आप पढ़कर देखियेगा। ...'तीसरी कसम' रिलीज होने के बाद- तुरत- 'तीसरी कसम खाने की बेला' शीर्षक संस्मरण-पुस्तक ;'अणिमा' के नये अंक में श्रीमती अमृता प्रीतम ने 'तीसरी कसम' शीर्षक एक कहानी प्रकाशित करवाई है, जिसमें नई कविता की एक पंक्ति है- 'आओ हम सब तीसरी कसम खायें। ...यह तीसरी कसम खाने की बेला है।'द्ध आ जायेगी। लिख रहा हूँ- लिखता जा रहा हूँ। जब-जब

जिसकी सूरत उभर कर सामने आयी- जब-जब बम्बई की याद आयी- लिखता गया हूँ।
स्वास्थ्य दुरुस्त है। चाहता तो हूँ कि जब मिलूँ आपसे- लाल-लाल गाल मैं आपका देखूँ और आप मेरा।... मुझे ख्वाहिश है कि तू मुझको देखा करे और दिलोजान मैं तुमको देखा करूँ।
खबर है- लतिका ने मुझे निकाल दिया है- झूठा-बेईमान कह कर।... एम.ए. की परीक्षा की जोरदार तैयारी में लगी हुई है और मैं यहाँ ढोंग धरकर द्घर में बैठा हूँ। हो-हल्ला है यहाँ।
प्लीज-प्ली... रुपये शीद्घ्र भेजिए, भाई साहब! बहुत 'दुर्गत' भोग रहा हूँ। और कितना भेजियेगा? ५००/ तो मैं कर्ज खाकर बैठा हूँ। रुपये ज्डव् से ही भेजियेगा। और ज्मसमहतंउ वपिबम है थ्वतइमेहंदर। च्ण्व्ण् ैपउतंीं त्सल ैजण् लिखने से पत्रा मिल तो जाता है, लेकिन अपना च्ण्व्ण् अपना गाँव ही है ;औराही हिंगनाद्ध - ठल जीम ूंल . ैपउतंीं त्सलण् ैजण् की बात आपको कैसे याद आयी? मैंने तो लिखा नहीं था?
छोटे-बड़े, सभी को सश्र( प्रणाम। पत्रा दें- निश्चय।
भाई ही-रेणु

रेणु पर पाँच सौ रुपये का कर्ज था

 
और वे 'दुर्गत' भोग रहे थे। उधर शैलेन्द्र भी खस्ताहाल थे। उन पर कर्ज का पहाड़ चढ़ गया था। जो पिफल्म ढाई-तीन लाख में पूरी करनी थी और समय लगना था पाँच-छह महीने, उसे बनते-बनते पाँच साल से ऊपर हो गये और खर्च बाइस लाख से ऊपर। जो रेणु शैलेन्द्र के लिए हृदय की स्पन्दन की तरह थे, उनको भी कुछ नहीं दे पा रहे थे। अजीब बेबसी का आलम था। उन्हें भरोसा था तो एक ही कि 'तीसरी कसम' रिली८ा होगी और वे तमाम कर्ज से मुक्त हो जायेंगे। देखते-ही-देखते उनकी पूरी टीम बिखर चुकी थी। वे अकेले पिफल्म को अंजाम तक पहुँचा रहे थे। ऐसे में भी उनका कलाकार-मन मरा नहीं था। वे सोचते थे कि कहीं मूल कहानी की आत्मा को ठेस न लगे। इसलिए रेणु को
पत्रा लिखकर बुला रहे थे और रेणु थे कि पैसे के अभाव में दुर्गति भोग रहे थे। पिफर वे बीमार पड़ गये। उन्होंने शैलेन्द्र को लिखा- 'मैं बहुत बीमार हूँ। वजन दस पाउंड द्घट गया है। शाम को बुखार रहता है। खाँसी है। एक्सरे रिपोर्ट अच्छा नहीं। दवा चल रही है- सुइयाँ पड़ रही हैं। अच्छा हो जाऊँगा... मुझे देखकर पहचान नहीं सकियेगा, अब। मैं तो चाहता हूँ कि पिफर 'गुलपफ़ाम' ;अर्थात्‌, जब हम पहली बार मिले थे!द्ध होकर ही आपसे मिलूँ। इसलिए, दिन-रात एक कर-जाती हुई तंदुरुस्ती को वापस लाने में लगा हूँ। पीना एकदम छोड़ दिया है। और अब पीने का जी भी नहीं करता। अब ठाकुर श्रीरामकृष्ण के ऊपर है, सबकुछ। क्योंकि बिला कसूर वे अपने प्यारे गुलपफ़ाम को क्यों मारेंगे? ;...प्यारे गुलपफ़ाम! आपफरी-सदआपफरी!!द्ध' रेणु आस्थावान प्राणी थे। दुखों, मुश्किलों, परेशानियों में वे अपने को रामकृष्ण को सौंपकर तनाव-मुक्त हो जाते थे, किन्तु शैलेन्द्र के साथ ऐसा नहीं थी। वे ऐसी स्थिति में बेहद तनावग्रस्त हो जाते थे। अस्वस्थ होने पर रेणु 'पीना' छोड़ देते थे, किन्तु शैलेन्द्र का पीना बढ़ जाता था। इस तरह अपने कमजोर स्वास्थ्य के बावजूद रेणु तो जीवित रहे, किन्तु शैलेन्द्र का स्वास्थ्य बिगड़ता ही चला गया। शैलेन्द्र की असामयिक मृत्यु का एक कारण और था, और वह यह कि रेणु की तरह ही वे अत्यंत भावुक थे। उनमें करुणा की एक अजस्र- धारा बहती रहती थी। कोई भी मार्मिक प्रसंग हो, रेणु की तरह शैलेन्द्र की आँखें भी डबडबा जाती थीं। इसे निम्न प्रसंग से, जिसे रेणु ने लिखा है, महसूस किया जा सकता है :
'तीसरी कसम' की शूटिंग के दिनों शैलेन्द्र जी मुझसे 'महुआ द्घटवारिन' की 'ऑरिजिनल' गीत-कथा सुनना चाहते थे ताकि उसके आधार पर गीत लिख सकें। एक दिन हम 'पबई लेक' के किनारे एक पेड़ के नीचे जाकर बैठे। 'महुआ द्घटवारिन' का गीत मुझे पूरा याद नहीं था। इसलिए मैंने एक छोटी-सी भूमिका के साथ 'सावन-भादो' का गीत अपनी भोंड़ी और मोटी आवा८ा में, भरे गले से सुना दिया। गीत शुरू होते ही शैलेन्द्र की बड़ी-बड़ी आँखें छलछला आयीं और गीत समाप्त होते-होते वे पफूट-पफूट कर रोने लगे। गीत गाते समय ही मेरे मन के बाँध में दरारें पड़ चुकी थीं। शैलेन्द्र के आँसुओं ने उसे एकदम तोड़ दिया। हम दोनों गले लगकर रोने लगे। 'ननुआँ' ;शैलेन्द्र का ड्राइवरद्ध टिपिफन कैरियर में द्घर से हमारा दोपहर का भोजन लेकर लौट चुका था। हम दोनों को इस अवस्था में देखकर वह चुपचाप एक पेड़ के पास ठिठककर बहुत देर तक खड़ा रहा...। ...द्घटना के कई दिन बाद, शैलेन्द्र के 'रिमझिम' में पहुँचा। वे तपाक से बोले- चलिए, उस कमरे में चलें। आपको एक चीज सुनाऊँ। हम उनके शीतताप-निंयत्रिात कमरे में गये। उन्होंने मशीन पर 'टेप' लगाया। बोले- आज ही 'टेक' हुआ है। मैंने पूछा- तीसरी कसम? बोले- नहीं भाई! 'तीसरी कसम' का टेक होता हो आपको नहीं ले जाता? ...यह 'बंदिनी' का है... पहले, सुनिए तो! ...रेकॉर्ड शुरू हुआ- 'अब के बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय रे... अमुआँ तले पिफर से झूले पड़ेंगे... कसके रे जियरा छलके नयनवाँ... बैरन जवानी ने छीने खिलौने... बाबुल जी मैं तेरे नाजों की पाली... बीते रे जुग कोई चिठियो ना पाती, ना कोई नैहर से आये रे-ए-ए।' कमरे में 'पबई-लेक' के किनारे वाले दृश्य से भी मर्मांतक दृश्य उपस्थित हो गया। हम दोनों हिचकियाँ ले-लेकर रो रहे थे- आँसू से तर-बतर।... शैली ने ;तब बंटू, यानी हेमंत!द्ध किसी काम से अथवा गीत सुनने के लिए कमरे का दरवाजा खोला और हमारी अवस्था देखकर पहले कई क्षणों तक अवाक्‌ रहा। पिफर कमरे से चुपचाप बाहर चला गया... कमरे में बार-बार रेकार्ड बजता रहा और न जाने कब तक बजता रहता, यदि शकुन जी आकर मशीन बन्द नहीं कर देतीं।'
ऐसे भावुक और संवेदनशील गीतकार-कथाकार यानी
शैलेन्द्र-रेणु की जोड़ी थी, जो 'तीसरी कसम' के नायक हीरामन की तरह ही भोला-भाला, दुनियादारी के उलट-पेंच से दूर, दूषित और नापाक में भी पवित्राता की खुशबू पाने वाली, दुर्लभ व्यक्तित्व रखने वाली अविस्मरणीय जोड़ी थी। शैलेन्द्र रेणु के बगैर 'तीसरी कसम' को 'पफाइनल टच' कैसे दे सकते थे? किन्तु, उनके पास रेणु को बुलाने, ठहराने, खिलाने-पिलाने के भी पैसे नहीं थे। सिर से पाँव तक वे कर्ज में डूबे हुए थे। लेनदारों का तकादा बराबर हो रहा था। यहाँ तक कि रेणु जो 'तीसरी कसम' के निर्माण के चक्कर में आकाशवाणी, पटना की लगी-लगाई नौकरी छोड़ चुके थे, आर्थिक तंगहाली से जूझ रहे थे, उनका देय भी नहीं दे पा रहे थे। पिफर भी उन्होंने रेणु को बुलाया। रेणु आये और शैलेन्द्र की हालत देख अपने मित्रा दीनानाथ शास्त्राी के द्घर ठहर गये जो उस समय जुहू चर्च में रहते थे। वहाँ से उन्होंने अपने गाँव के बालगोविन्द विश्वास को एक पत्रा में लिखा : मैं १७.६.६६ को बम्बई पहुँचा हूँ। दिन में १२.३० बजे उतरा और दो बजे से काम पर दाखिल हुआ सो डटा हुआ हूँ। यो, बमदेवत से पास होकर आ गयी है तस्वीर। किन्तु, म्कपजपदह और क्नइइपदह का
सिलसिला लगा हुआ है ताकि तस्वीर में सामान्य त्राुटि भी न रह जाय। सुबह आठ बजे तैयार होकर निकलता हूँ तो रात बारह बजे ;कभी-कभी एक बजे वापस आता हूँ। थक जाता हूँ लेकिन नींद नहीं आती। एक-एक दृश्य दिमाग में नाचते रहते हैं। मैंने आकर पूरे तीन-तीन दृश्यों की कनइइपदह पिफर से करवाई है। यानी संवादों को पिफर से कहलवाया है। यों, १४ जुलाई तस्वीर रिलीज होने की कमंकसपदम है, किंतु व्यावसायिक पहलू को ध्यान में रखकर थोड़ी देर भी की जा सकती है। मसलन, जब तक ळनपकम न उतर जाय, इसको नहीं त्मसमेंम करें। मगर, तस्वीर मुकम्मिल हो गयी और भगवान की दया से ऐसी बनी है कि वर्षों तक लोग इसे याद रखेंगे। अपने मुँह अपनी तारीपफ नहीं- कोई भी व्यक्ति यही कहेगा। 'सजनवाँ बैरी हो गये हमार' तो ऐसा बन गया है कि पुराने 'देवदास' के 'बालम आय बसो मेरे मन में' की तरह युगों तक गाया जायेगा। मैं ही नहीं-कई लोग ऐसे हैं जो इस गीत को सुनकर आँसू मुश्किल से रोक पाते हैं।
उसी समय उन्होंने अपने चचेरे भाई नगेन्द्र को पत्रा में लिखा : '...हाँ, सुब्रत ने मेरे एक अनुरोध का अक्षरशः पालन किया है। संवाद लिखते वक्त पांडुलिपि में मैंने 'लाली लाली डोलिया' वाले दृश्य में लिखा था- 'बच्चों के झुंड के साथ, यानी पीछे-पीछे एक कुत्ता ;देहातीद्ध हो। और जब झुंड गाता, तालियाँ बजाता हुआ दूर निकल जाय, गाड़ी के पीछे- तब एक नंग-धड़ंग ढाई-तीन साल के बच्चे को सबसे पीछे दौड़ता हुआ दिखाया जाय।' सुब्रत ने हू-ब-हू उस दृश्य को वैसा ही पिफल्माया है। लगता है अपना ही कोई बच्चा दौड़ा जा रहा है। 'गाँव की गोरी' के लेखक की हरकतों के कारण पिफल्म से पूर्णिया के सभी जगहों के नाम हटा दिये गये हैं। सिमराहा-स्टेशन का साइन-बोर्ड काट दिया गया है। सिपर्फ एक जगह 'गढ़बनैली' का नाम रह गया है। गीतों में, दो गीतों ने धूम मचाना शुरू कर दिया है- 'सजन रे झूठ मत बोलो' और दूसरा- 'सजनवाँ बैरी हो गये हमार।' दूसरे गीत को सुनकर मेरी आँखों से झर-झर आँसू झरने लगते हैं। जितनी बार सुनता हूँ- यही हाल होता है। दुःख इसी बात का है कि तुम लोग सुन नहीं पा रहे हो। मैं क्या करूँ? चेष्टा हो रही है कि बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में एक साथ रिलीज किया जाय- पन्द्रह दिन देर ही लगे किन्तु हो हर जगह एक साथ। यदि ऐसा हुआ तो अगस्त में पटना अथवा कटिहार में तुम लोग देख सकोगे। यदि पटना रिलीज के समय राज कपूर, शैलेन्द्र पटना आये तो तुमको पत्रा दूँगा।
मुझे शुरू से अंत तक के संवाद की कापी तैयार कर देनी पड़ी है। संक्षिप्त कहानी, कथासार तथा प्रमुख दृश्यों का ज्तंदेबतपचजपवद आलेख तैयार किया है। अभी और न जाने क्या-क्या काम है!'
२ जुलाई, १९६६ की रात आर.के. स्टूडियो के शानदार
ऑडिटोरियम में एक 'कव्वाली' का विशेष आयोजन था। इसमें शैलेन्द्र रेणु को लेकर पहुँचे थे। कार्यक्रम शुरू होने वाला था। तभी राज कपूर की आवाज सुनकर रेणु चौंक गये थे। वे कह रहे थे- 'अजी, खेला तो पर्दे के अन्दर है। अभी तो लोगों को जमाने के लिए 'जभनिका' दिया जा रहा है।' पिफर बात-बात पर-'जा रे जवानी!' 'जा रे जमाना!'- रेणु को लगा 'तीसरी कसम' का संवाद बोलकर राज कपूर साहब रेणु जैसे देहाती-गंवार का मखौल उड़ा रहे हैं! किन्तु ऐसा था नहीं। दरअसल राज कपूर हीरामन-मय हो चुके थे। उनकी पत्नी ने बताया कि वे द्घर में भी आजकल इसी लहजे में बोलते हैं-पफेनूगिलासी, डैमपफैटकैटलैट, उपलैन...। वहाँ से लौटते हुए रेणु ने शैलेन्द्र से कहा- 'भाई साहब! अपना हीरामन तो सचमुच हीरा आदमी है। सभी 'डायलाग' तीसरी कसम का ही बोल रहा था।'
लेकिन कुछ ही समय बाद 'अपना हीरामन' शो-मैन राज कपूर में बदल गया। वह सोचने लगा कि पिफल्म का दुखांत कहीं उसकी सपफलता में बाधक न बन जाये। राज कपूर ने शैलेन्द्र को चौंकाते हुए कहा कि इसके अंत में नायक-नायिका को मिला दो। और, इस बात के लिए वे अड़ गये। उन्होंने शैलेन्द्र को बेतरह समझाया। पर वे टस-से-मस नहीं हुए। और राज कपूर उनसे नाराज हो गये। यह शैलेन्द्र के लिए बेहद मंहगा पड़ा। जो वितरक आर.के. की पिफल्मों के थे, राज कपूर के साथ थे, वे भी राज कपूर की हाँ-में-हाँ मिलाते हुए 'तीसरी कसम' को दुखांत से सुखांत बनाने के लिए शैलेन्द्र पर जोर देने लगे। शैलेन्द्र ने रेणु से कहा- 'वे लोग पिफल्म का अंत बदलकर हीरामन-हीराबाई को मिला देना चाहते हैं। यदि मुझे बम्बइया पिफल्म ही बनानी होती तो 'तीसरी कसम' जैसे विषय को लेता ही क्यों?' शैलेन्द्र का रोम-रोम कर्ज में डूबा हुआ था, 'तीसरी कसम' की व्यावसायिक सपफलता पर ही उनका आर्थिक भविष्य निर्भर करता था, किन्तु वे उसका अंत बदलना नहीं चाहते थे। शैलेन्द्र ने रेणु को सारी स्थिति समझा दी। टक्कर राज कपूर जैसे व्यक्ति से थी, जो न केवल पिफल्म के हीरो थे, बल्कि उनके मित्रा और शुभचिंतक भी थे। दबाव से तंग आकर आखिर शैलेन्द्र ने कह दिया कि लेखक को मना लीजिए तो वे आपत्ति नहीं करेंगे।
इस सन्दर्भ में शैलेन्द्र के साथ राज कपूर एवं उनके वितरकों की अंतिम बैठक हुई। रेणु बाहर थे। शैलेन्द्र ने रेणु को बुलवाया। कमरे में अच्छा-खासा जमद्घट था। उन्हें देखते ही शैलेन्द्र बोले- 'रेणु जी, ये लोग कहानी का अंत बदलना चाहते हैं। मैंने सापफ-सापफ कह दिया है, मैं अन्त नहीं बदलना चाहता। यदि रेणु जी तैयार हो जायेंगे, तो ठीक है।' ...रेणु शैलेन्द्र के चेहरे को देखते रहे। इतना चुक जाने पर भी इस कहानी पर कितना विश्वास था और कितना लगाव! रेणु चुपचाप खड़े थे कि शैलेन्द्र ने लोगों को संबोधित कर कहा- 'इस कहानी के लेखक आ गये हैं। अगर आप इन्हें यकीन दिला सकें... 'और रेणु की ओर एक दृष्टि पफेंककर चुपचाप बाहर चले गये। रेणु थोड़ी देर तक शांत खड़े रहे, तब किसी ने उन्हें बैठने के लिए कहा। वे बैठ गये किन्तु उन्हें लगा कि किसी दलदल में पफंस गये हों और धीरे-धीरे भीतर धंसते ही जा रहे हों। पिफर भाषण शुरू हुआ। उपन्यास क्या है? साहित्य क्या है? पिफल्म क्या है? पाठक क्या है? खर्च क्या है और पिफल्म-निर्माण क्या है? उसका आर्थिक-पक्ष क्या है?- ऐसे विचार-प्रवर्तक भाषण शायद पूना पिफल्म इंस्टीट्यट में भी नहीं होते होंगे। पिफर शैलेन्द्र पर चढ़े कर्जे और उसे उतारने की दुहाई दी गयी।
रेणु को वह कमरा अदालत जैसा लग रहा था। तभी किसी ने कहा- 'आप कहानी का अंत बदल नहीं सकते? रेणु उसके चेहरे को चुपचाप देखते रहे। पिफर उनमें से एक व्यक्ति ने कहा- 'लेखक जी, बुरा न मानें, तो एक बात कहूँ... आप साहित्यकारों के साथ यही दिक्कत है, आप लोग 'एडजेस्ट' नहीं करते।' रेणु मन ही मन सोच रहे थे, हम लेखक लोग जीवन में कितना 'एडजेस्ट' करते हैं, ये पैसे वाले क्या जानें। तभी किसी ने कहा- 'हम लोगों ने कहानी का नया 'एण्ड' सोचा है। कहें तो सुनाऊँ?' रेणु के मुँह से अनायास निकल गया- 'सुनाइये!'
'हाँ साहब, वह जो अपना बैलगाड़ी वाला है... क्या तो नाम है... हीरामन... हाँ-हाँ वही हीरामन! देखिये, क्या कमाल का 'एण्ड' जमाया है। आप वाह कर उठेंगे।'
रेणु ने सभी चेहरों को देखा। वे सभी संतुष्ट और प्रसन्न थे।
'तो साहब, हीरामन प्लेटपफारम पर आता है... बाकी बातें ठीक हैं... आपने अच्छा लिखा है... पर मेरे को कहना है बिदाई का टेंस सीन... कभी हीराबाई का क्लोजअप... कभी हीरामन का क्लोजअप... चेहरे पर कभी एक एम्प्रेशन कभी दूसरा बाकी डायलाग ठीक है... तभी हीरामन की आँखें गीली हो जाती हैं... वह चेहरा द्घुमा लेता है... क्लोजअप ऑपफ हीरामन... आँसू से भीगा एक दुखी चेहरा... यहाँ राज साहब कमाल कर देंगे... मेरा दावा है, उनके चेहरे को देखकर पब्लिक की आँखें भीग जायेंगी... कट टू इंजन का ऊपरी हिस्सा- धुआँ... जैसे ज़िन्दगी अब धुएँ के सिवा कुछ नहीं- जैसे हीराबाई भी एक धुआँ-सी, आयी और हवा में उड़ गयी... लेखक साहब, आप खुद सोचिए, ढेर सारे माने निकलेंगे... कट, इंजन के भीतर के ड्राइवर का सिपर्फ हाथ... सीटी वाली रस्सी पर... कट, इंजन का ऊपरी हिस्सा- जोर की सीटी... कट- हीरामन पीठ पफेरे खड़ा है... कट- हीराबाई देख रही है... गाड़ी धीरे-धीरे सरक रही है... हीरामन पीठ पफेरे खड़ा है... हीराबाई हीरामन के चहेरे को आखिरी बार देखना चाहती है... अपने-आप में द्घुटती है... गाड़ी सरकती जा रही है... कट- इंजन का ऊपरी हिस्सा... पिफर जोर की सीटी... कट- रस्सी पर ड्राइवर का हाथ... धीरे-धीरे वह हाथ एक लड़की के हाथ में बदल जाता है- चेन पर।... कट- वही हाथ हीरामन के कंधे पर... हीरामन द्घूमकर देखता है... सामने हीराबाई खड़ी है... दोनों की आँखें गीली हैं... दोनों एक-दूसरे से लिपट जाते हैं... गाड़ी चली जा रही है... दोनों लिपटे हुए हैं। यह शॉट क्रेन से लिया जाये, तो मजा आ जायेगा... दोनों लिपटे खड़े हैं... दूर, बहुत दूर तक जाती हुई गाड़ी... अनन्त में खो जाती है... कहिए, 'जमता' है न?'
रेणु उन सज्जन को देखते हैं। वे पसीने-पसीने हो गये हैं। कहानी-सुनाने की कला पर रेणु मुग्ध हैं। वे सोचते हैं- शायद बम्बई में इसी तरह कहानी बेची जाती है। पिफर उस कथा-वाचक सज्जन ने पूछा- 'जमता है न?' रेणु ने कहा- नहीं! और जज की तरह उठकर वे कमरे से बाहर आ गये। बाहर शैलेन्द्र परेशान-से इधर से उधर टहल रहे थे। मुझे देखते ही एकदम निकट आ गये- 'क्या पफैसला किया?' 'वही जो आपने किया था।' शैलेन्द्र ने रेणु को बाँहों में भर लिया और सुबकने लगे। हिन्दी की अनेक कथाकृतियों पर पिफल्में बनी हैं, लेकिन ऐसा यानी शैलेन्द्र जैसा निर्माता जो रेणु को मिला, वह दुर्लभ है। रेणु यह स्पष्ट तौर पर स्वीकार करते थे : अगर शैलेन्द्र का निधन न होता और यह पिफल्म ठीक से प्रदर्शित हो पाती तो व्यावसायिक दृष्टि से भी सपफल होती। लेकिन वह एक साजिश का शिकार हो गयी, जिसमें अपने-बेगाने जाने किन-किन का हाथ था और इसकी वजह यह थी कि उन्हें भय था कि 'तीसरी कसम' अगर सपफल हो गयी तो बम्बइया पफार्मूले पर वह बहुत बड़ा आद्घात होगा।
कल्पना कीजिए कि शैलेन्द्र झुक जाते और 'तीसरी कसम' के अंत में हीरामन तथा हीराबाई को मिला दिया जाता तो क्या होता? सबसे पहले मूल कहानी की आत्मा ही मर जाती। इसमें तीसरी कसम की सार्थकता भी समाप्त हो जाती। पिफल्म को व्यावसायिक सपफलता मिलती या न मिलती, कहा नहीं जा सकता, किन्तु यह निश्चय तौर पर कहा जा सकता है कि इसके निर्माण के लिए शैलेन्द्र ने जो साधना की थी, वह निरर्थक हो जाती। शैलेन्द्र कवि थे, गीतकार थे और अपने लिखे हुए में एक-भी वाक्य बदलना उन्हें गवारा न था, पिफर जिस कहानी की आत्मा को अपने अन्दर रचाये-बसाये थे, उसमें थोड़ा भी हेर-पफेर उनके दिल को ठेस पहुँचाने वाली थी।
बम्बई में रेणु का काम खत्म हो चुका था। उनके पास लौटने के लिए टिकट के भी पैसे नहीं थे। उन्होंने 'जलवा' नामक एक कहानी लिखी तथा तीसरी कसम पर एक संस्मरण तथा उसे 'धर्मयुग' में दे आये। धर्मवीर भारती ने उसे तुरत छापा और बम्बई के लेखकों ने उस पर गोष्ठी की। रेणु को पारिश्रमिक मिली और वे किसी तरह पटना लौटे। रेणु बम्बई में थे तो शैलेन्द्र को उनका संग-साथ अच्छा लग रहा था, उन्हें टूटने से बचाये हुए था। अब वे अकेले हो गये- उदास और गुमसुम। लोगों से मिलना-जुलना बेहद कम हो गया। 'तीसरी कसम' से जुड़े अनेक लोग अपनी पारिश्रमिक के लिए उनसे तगादा करते रहते। उनमें एक व्यक्ति थे असित सेन, जिनका कोई तगादा नहीं आया।
शैलेन्द्र ने एक दिन उन्हें पफोन किया- असित दा! आपको पैसे की जरूरत नहीं? असित सेन ने कहा- क्या बात है? नेकी और पूछ-पूछ। तब शैलेन्द्र ने अपनी पीड़ा बताई- पिफल्म खत्म हुए देर नहीं हुई और सभी मुझ पर गि( की तरह टूट पड़े हैं।
इधर पिफल्म प्रदर्शित नहीं हो पा रही थी और यह स्थिति थी। एक लेनदार ने तो उनके खिलापफ अदालत का वारण्ट निकलवा दिया- उनकी गिरफ्रतारी के लिए। शैलेन्द्र जो नियमित पिफल्मों के लिए गीत लिख रहे थे, ऐसे में वह भी नहीं कर पा रहे थे। उन्हें पिफल्म बनाते वक्त भरोसा था कि राज कपूर और विमल राय के वितरक उन्हें सहज ही उपलब्ध हो जायेंगे, किन्तु राज कपूर उनसे रूठे थे और उनके वितरक शैलेन्द्र से नाराज हो गये थे। विमल राय के नहीं रहने से उनके वितरक बिखर गये थे- वहाँ से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। वे अस्वस्थ रहने लगे। तनाव के कारण पीना बढ़ गया। वैसी ही मनःस्थिति में उन्होंने 'ज्वेल थीप' के लिए एक गीत खिला- रुला के गया सपना मेरा! वह 'सपना क्या था? 'तीसरी कसम' ही तो वह सपना था, जो रुक-रुककर, द्घिसट-द्घिसट कर, अनेक झंझट और झमेलों में पफंस-पफंसकर किसी तरह पूरा हुआ था और प्रदर्शित नहीं हो पा रहा था। शैलेन्द्र को जार-जार रुला रहा था। रेणु थे जो उनके आँसू पोछते, किन्तु वे पटना जा चुके थे। राज कपूर ने अंतिम दौर तक साथ दिया था, लेकिन रूठे हुए थे। शैलेन्द्र के ये 'मीत' थे, 'प्रीत' थे- कैसे मनाऊँ मितवा, गुन मोरे एकहूँ नाँही! इधर-उधर से खबरें उड़ रहीं थीं- तरह-तरह की अपफवाहें! इनसे शैलेन्द्र और भी व्यथित हो रहे थे, उद्विग्न हो रहे थे। कुछ खबरें छनकर रेणु के पास भी पहुँच रही थी। उन्होंने शैलेन्द्र को लिखा- इधर की खबरों से चिंतित हूँ। पता नहीं राज साहब किस 'मूड' में हों। लगता है, सब कुछ अपने साथ द्घटा है। शैलेन्द्र इतना कुछ झेल रहे थे- पीड़ा, संत्राास! इतना टूट चुके थे और टूट-टूट कर बिखर चुके थे, किन्तु 'तीसरी कसम' से कोई छेड़-छाड़ करे, यह उन्हें बर्दाश्त नहीं था। वे पिफल्म के निर्माता थे, निर्देशक नहीं किन्तु, यह सोलह-आना उनकी पिफल्म थी। उनका कवि हृदय पूरी पिफल्म में समाया हुआ था। इसीलिए कई लोगों को लगा कि 'तीसरी कसम' सेल्यूलाइड पर अंकित एक कविता है। रेणु ने एक महत्वपूर्ण प्रसंग के विषय में बताया है, जो शैलेन्द्र की मनःस्थिति का द्योतक है- मुझे याद है 'तीसरी कसम' के होर्डिंग बन रहे थे। निर्माण विभाग का आदमी आकर शैलेन्द्र से कहने लगा, 'पफणीश्वरनाथ रेणु' तो बहुत लम्बा नाम है, बहुत जगह द्घेर लेगा। इसे पी.एन. रेणु कर देते हैं। शैलेन्द्र ने उसे डाँटा कि नाम पूरा जायेगा। हाँ, अपने नाम में से शंकर कटवा कर सिपर्फ शैलेन्द्र लिखने को कह दिया।
ऐसा था शैलेन्द्र का व्यक्तित्व! उन्होंने रेणु को लिखा था- सब भाग गये-अपने-पराये, दोस्त-यार! यहाँ तक कि 'तीसरी कसम' को पूरा करने का श्रेय शायद मुझ अकेले को मिले। रोऊँ या खुश होऊँ-कुछ समझ में नहीं आता। पर 'तीसरी कसम' पर मुझे नाज रहेगा, पछतावा नहीं।
२९ सितंबर को उन्होंने रेणु को पिफल्म के रिलीज होने की सूचना दी, पर वह दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में
प्रदर्शित हो पायी। उन्होंने लिखा- मुझे अपनी पिफल्म का प्रीमियर देखना भी नसीब न हुआ।
और उनकी तबीयत बिगड़ती चली गयी। ३ दिसम्बर को दोपहर वे राज कपूर के यहाँ आये और चुपचाप बैठे रहे, मानो अलविदा कहने आये हों। १४ दिसंबर को राज कपूर जब अपना जन्मदिन मना रहे थे, खबर आयी कि शैलेन्द्र नहीं रहे। पूरा पिफल्म-जगत मर्माहत हो उठा।
शैलेन्द्र का गुजर जाना रेणु के लिए एक आद्घात की तरह था। यह असामयिक निधन था। इसको रेणु ने शहादत कहा है। उन्होंने सही लिखा है कि शैलेन्द्र को शराब या कर्ज ने नहीं मारा, बल्कि वह एक 'धर्मयु(' में लड़ता हुआ शहीद हो गया।
शैलेन्द्र की मृत्यु से सबसे ज्यादा मर्माहत रेणु थे। वे एकांत में उनकी याद में बरसों आँसू बहाया करते। कभी उन्हें लगता, 'तीसरी कसम' के चक्कर में ही उनकी मृत्यु हुई, इसलिए उसके जिम्मेदार वही हैं। १९६७ से १९६९- ये तीन वर्ष ऐसे हैं, जब रेणु कुछ भी लिख नहीं पाये। जो कथाकार बगैर लिखे जीने की कल्पना तक नहीं कर सकता था, वह कुछ भी लिख नहीं पा रहा था। १९६७ के मध्य में राजकमल चौधरी का देहांत हो गया और पिफर आँत्विक द्घटक का जो रेणु के अंतरंग मित्रा थे। १९६९ ई. के अंत में रेणु भीषण रूप से बीमार पड़े। मरनासन्न अवस्था में उन्हें पटना मेडिकल कालेज अस्पताल में भर्ती कराया गया। वे मरते हुए शैलेन्द्र, राजकमल चौधरी और आँत्विक द्घटक को याद करते। इन तीनों की मृत्यु के बाद इनकी छाया रेणु के मन में मंडरा रही थी। स्वस्थ होने के बाद उन्होंने अस्पताल की अपनी मनःस्थिति पर पफंतासी में या कहें स्वप्न-चित्राों के सहारे एक कहानी लिखी- 'रेखाएँ-वृतचक्र' जो 'सारिका' ;१९७०द्ध में छपी थी। कहा जाता है कि इसमें रेणु ने अपने व्यक्तित्व के साथ शैलेन्द्र, राजकमल एवं आँत्विक द्घटक के व्यक्तित्व को भी समाहित किया है। आज न शैलेन्द्र हैं, न रेणु- किंतु, ये सिनेमा एवं साहित्य के ऐसे अविस्मरणीय व्यक्तित्व हैं, जिन्हें सिनेमा एवं साहित्य में एक कालजयी परम्परा एवं स्तम्भ की तरह सदियों तक याद किया जाता रहेगा। शैलेन्द्र के गुजर जाने के बाद जो 'तीसरी कसम' ठीक से प्रदर्शित नहीं होने के कारण बॉक्स ऑपिफस पर असपफल हो गयी थी, वह देश भर में प्रदर्शित हुई एवं अपार जनसमूह ने उसे अपनाया। उसे राष्ट्रपति पुरस्कार के साथ-साथ अनेक पुरस्कार मिले। लेकिन शैलेन्द्र इन सब को देखने के लिए नहीं थे- वे अपनी 'कहानी' एवं अपनी 'निशानी' छोड़कर इस धराधाम से जा चुके थे।
 
;भारत यायावर की शीद्घ्र प्रकाश्य पुस्तक 'अमरकथा शिल्पी पफणीश्वरनाथ रेणु' सेद्ध
यशवंत नगर, मार्खम कॉलेज के निकट, हजारीबाग - ८२५ ३०१ ;झारखण्डद्ध, मो. ९८३५३१२६६५
 
 
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