अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
संपादकीय/प्रेम भरद्वाज
कौन बचाता है इस समाज को
प्रेम भारद्वाज
 

सभ्यताओं का संद्घर्ष। सपनों के मरने। गोली दागने। नैतिकता, मूल्यों-सि(ांतों के पतन। जुल्पफों को संवारते हुए तितलियों को पकड़ने। मस्ती। संवेदनहीनता के रेगिस्तान में स्वार्थ और दंभ की सबसे ऊंचे बुर्ज बनाने-इनमें से क्या करने का समय है यह। चौराहे पर खड़ा युवक दुविधा में है। गहरा द्वन्द्व। चौराहे अक्सर भ्रम का धुंध रचते हैं। हर रास्ते का अपना आकर्षण। अलग-अलग गंतव्य। लेकिन यह एक खास तरह का चौराहा है। जहां कुछ इश्तहार लगे हैं। विज्ञापन और पोस्टर। कुछ लोग भी खड़े हैं-अपनी-अपनी राहों की खासियत बताते हुए। एक गाईड भी। जो हकीकत और पफसाने के फ्रयूजन से एक नया सत्य उद्द्घाटित करने का स्वांग रच रहा है।
युवक चौराहे पर खड़े इश्तहारों को पढ़ता है। स्टीवेन आर्थर पिंकर का कथन है-'मौजूदा समय मनुष्य के इतिहास में सबसे अधिक शांति का समय है। आज के दौर में साहित्य और सिनेमा से ज्यादा कल्पनाशीलता कंपनियों-कॉरपोरेट हाउसों के बैलेंस शीट में खर्च हो रही है। साथ ही एक और हस्तलिखित पोस्टर-यह वह सनसनीखेज समय है जिसमें द्घटिया राजनीति, अपराध, संवेदनहीनता और स्वार्थ हमारे जीवन के स्थायी भाव बन गए हैं। हमें स्मृतिहीन-विचारहीन बनाने का विराट षड्यंत्रा रचा जा रहा है। एक युवा पूरे जोश के साथ झंडा लहरा रहा है-उस पर अंग्रेजी में लिखा है-म्दरवल
जॉक फ्रयूचे की तख्ती-यह कैसा समाज है जहां कोई व्यक्ति लाखों की भीड़ में खुद को गहन एकांत में पाता है, वह अपने आपको मार डालने की अदम्य इच्छा से अभिभूत हो जाता है और किसी को इसका पता नहीं चलता। यह समाज नहीं, बल्कि एक जंगल है जहां जंगली जानवर बसते हैं, जैसा कि रूसो ने कहा था।
आलोक धन्वा सिगरेट नहीं पीते। लेकिन कविता में उनको सबसे मुश्किल दिनों में इस देश की सबसे सस्ती सिगरेट ने बचाया था। वह कितने बचे हैं, इतर बात है। मगर ठीक यहीं एक बड़ा सवाल खड़ा होता है जिस समाज में हम जीते हैं उसको अब तक किसने बचाया? हजारों-सालों में वह मर-खप क्यों नहीं गया? अमरत्व का कौन सा द्घूंट पिया है उसने? कहां से मिलती है उसके पफेपफड़ों को ऑक्सीजन, पेट को भोजन, हलक को पानी। लुठार-लुआत्से के शब्दों में 'कायरता भी एक तरह का साहस है।'
दरअसल, इस समाज को साहसियों ने नहीं, कायरों ने बचाया है। यह बात कुछ अटपटी लग सकती है। लगनी भी चाहिए। मगर सच यही है। वे कवि गलत थे जिन्होंने कायरता के विरु( कविताएं लिखीं। 'कुछ तो होगा अगर मैं बोलूंगा न टूटे सत्ता का तिलिस्म, मेरे अंदर का कायर टूटेगा'-कहने वाले रद्घुवीर सहाय ने संकेत दिया था जिसे शायद गहरे और व्यापक अर्थ में समझा नहीं गया। धूमिल ने भी इसे आगे बढ़ाते हुए कहा-'भाषा से भदेस हूं, इतना कायर हूं कि उत्तर प्रदेश हूं।' उत्तर प्रदेश व्यक्ति का प्रतीक है जिसकी बात रद्घुवीर सहाय भी करते हैं। सत्ता का अर्थ समाज भी है। समाज को कायर मन चाहिए। भीरू लोग। इन्हीं से चलता और बचता है समाज। भयभीत लोग समाज के सुरक्षा-कवच होते हैं।
धर्म समाज विरोधी होता है और समाज व्यक्ति विरोधी। व्यक्ति का आशय स्वतंत्रा चेतना वाला साहसी। समाज हमेशा से ही साहसी आदमी को नष्ट करने, उसे झुकाने और मिटाने का काम करता रहा है। साहसी व्यक्ति उसके लिए दिक्कतें पैदा करता है-उसकी संरचना को तोड़ने की कोशिश करता है। कायर लोगों को सज्जन और साहसी को बागी कहा जाता है। पागल का भी तमगा देकर उसको खारिज करने की परंपरा पुरानी है। जीसस, सुकरात, गैलीलियों से लेकर हर वह व्यक्ति पागल है जो सत्य कहने या लीक से हटकर कुछ नया करने-कहने की हिम्मत दिखाता है। अपराधी और क्रांतिकारी दोनों ही साहसी होते हैं। समाज दोनों में पफर्क नहीं करता। सत्ता के लिए क्रांतिकारी भी अपराधी ही होता है। उसके लिए हर वो शख्स अपराधी है जो उसकी गलत और सड़ांधभरी मान्यताओं-नियमों के पायों पर टिकी सत्ता को चुनौती देता है। लोग रेडिमेड चीजों के अभ्यस्त हैं। वह विचार, रास्ता, भोजन या वस्त्रा ही क्यों न हो? दर्जी भूखों मर रहा है। बाजार में रेडिमेड वस्त्रा उपलब्ध है। जरूरत का हर सामान। आपको कुछ भी करना नहीं है। पैसा पफेंको, तमाशा देखो। लीक छोड़ना कोई नहीं चाहता। भीड़ का हिस्सा बन जाने में बहुत सुविधा है। भीड़ के कई सिर होते हैं पर उनमें से किसी में दिमाग नहीं होता। भीड़ को इतिहास के पहिये ने हमेशा रौंदा है।
पिफर वही सवाल। चौराहे पर खड़ी दुविधा का। यह जानने का कि ये कौन सा समय है। समय की किताब को पढ़ने की कोशिश। हाल में एक पिफल्म आई है-'पान सिंह तोमर'। उसमें एक संवाद है-चंबल में बागी पैदा होते हैं, संसद में डाकू। यह पिफल्म एक
होनहार खिलाड़ी के मजबूर होकर डाकू बनने की सच्ची कहानी है। एक लंबी परंपरा है इंसापफ के लिए डाकू बनने की। समाज आदमी का शाेषण करता है। जुल्म ढ़ाता है। व्यवस्था उसे इंसापफ नहीं देती। ऐसे में अगर वह आदमी साहस दिखाता है तो यह न समाज को बर्दाश्त होता है, न सत्ता-व्यवस्था को। क्योंकि साहस को संविधान के लिए खतरा मान लिया जाता है। पिफर उसका पीछा गोली करती है। नक्सली भी इसी समाज और सत्ता-व्यवस्था के गर्भ से पैदा हुए हैं। कोई मां के पेट से नक्सली या बागी पैदा नहीं होता। उसे सत्ता-व्यवस्था जन्म देती है। और एक दिन वह अपने ही बच्चों की हत्या कर देता है।
बहुत ही जटिल और क्रूर समय है। प्रेम करने के अपराध में मां-बाप औलाद को ही जिंदा जला देते हैं। और हत्या करने वाले किसी राजनेता-मंत्राी के पैर छूकर स्वार्थ-सि(ि का आशीर्वाद पाते हैं। धूमिल ने जिस संविधान के बारे में कहा था-'यह एक ऐसा द्घानी है, जिसमें आधा तेल, आधा पानी है।' अब वह संविधान और गड़बड़ हो चला है। हम जनतंत्रा का तमगा भले ही लगाए रहें। लेकिन उस तमगे के ठीक नीचे धड़क रहा दिल ये जानता है कि हम कितने सच्चे हैं। अभी पांच राज्यों में चुनाव हुए। उनमें से दो राज्यों के चुनाव को करीब से देखने-जानने का मौका मिला। विधायकी का चुनाव लड़ने में एक से पांच करोड़ खर्च हो रहे हैं। न झण्डा, न पोस्टर, पिफर कैसे हो जाते हैं इतने खर्च? जनता भी चालाक हो गई है। हर आदमी के भीतर राजनेता का तत्व है,
राजनीति का बीज है। अब मतदाता पैसे लेकर अपना मत देता है। जनतंत्रा में जनता की यह नए ढंग की सौदेबाजी है। तुम मुझे हरे-हरे नोट दो, हम तुम्हें वोट देंगे। सब कुछ सौदे पर टिका है। चुनाव बाद यही प्रत्याशी विधायक बन सौदा करता है। मंत्राी बन बड़े द्घोटाले करता है। एक का पांच वसूलता है तो तकलीपफ क्यों? और उन्हें तो तकलीपफ बिल्कुल ही नहीं होनी चाहिए जो पैसे लेकर वोट देते हैं।
समाज को राजनीति हांकता है और साहित्य उसे अभिव्यक्त करता है। राजनीति आज से नहीं, शुरू से ही गंदी रही है। सम्राट अशोक ने सत्ता के लिए अपने ९९ भाइयों की हत्या की। औरंगजेब ने पिता को कारागार में डाला। महाभारत में सत्य तो बहाना है। असल लड़ाई सत्ता की थी। सत्ता के लिए भाई ने भाई को, शिष्य ने गुरु को मारा और चालाकी से इसे धर्मयु( का नाम देकर गंदी चीजों को ढंक़ने का काम किया गया।
लगता है समय की चूलें हिल गई हैं। साहित्य को अगर साहस के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो बहुत निराशा होगी। लीक छोड़कर चलने वाले लेखक हिन्दी साहित्य के इतिहास में ऊंगलियों पर गिने जा सकते हैं। जड़ परंपरा को तोड़ नई लकीरें या लीक बनाना सबके बूते की बात नहीं। जो बात समाज में सच है, वो साहित्य में उलट है। समाज को कायरों-भीरूओं ने बचाया है तो साहित्य को साहसी लेखकों ने। कबीर ने अलग राह पकड़ी और अपार विरोध झेला। रीतिकाल की परिपाटी को धता बताकर द्घनानंद ने प्रेम में स्वच्छंदता स्वीकारा। साथ ही यह उद्द्घोषणा-'कविता द्घनानंद की न पढ़ो, पहचान नहीं एहि खेत की जू'। बाकी अन्य कवियों से मीरा इस मायने में भिन्न थी कि उनमें विद्रोह के तत्व थे। आज से पांच-छह सौ साल पहले राज द्घराने को छोड़कर 'गली-गली हरि गुण गाना' एक क्रांति सरीखी बात थी। बाद में कुछ लेखक ट्रेंड सेटर बने जिनसे साहित्य की नई राह का आगाज हुआ। भारतेन्दु ने 'गद्य' को स्थापित किया। स्थूलता के प्रति सूक्ष्मता का विद्रोह करते हुए छायावादी कवियों ने व्यक्तिगत-प्रेम की अभिव्यक्ति की। राधा-गोविन्द का अवलंबन छोड़ा। चालीस के दशक में कविताओं में अज्ञेय ने 'राहों के अन्वेषी' बन नया ट्रेंड सेट किया। निराला एक ऐसे लेखक रहे जिन्होंने सबसे अधिक साहस दिखाया और प्रयोग किए। पचास के दशक में मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर ने मिलकर कहानी में 'नया' आंदोलन सा चलाया। कविताओं में जटिलता, बेचैनी, सूक्ष्म संवेदना को नए तरीके से लाने का श्रेय मुक्तिबोध को जाता है तो धूमिल को नाराजगी को स्वर देने के लिए। श्रीकांत वर्मा ने इस मर्म को समझा-'चाहता तो मैं बच सकता था-
मगर जो बचेगा
कैसे रचेगा?
समय के साथ सत्य भी बदलता है। मौजूदा समय में चाहे वह सियासत हो या साहित्य, दोनों में बचने का चलन बढ़ा है। हर कोई बचना चाहता है। मिटने का जोखिम उठाना मूर्खता मान लिया गया है। बचना समझदारी। बचने के कई पफायदे हैं। वह पद, पुरस्कार और सुविधाओं तक पहुंचाता है। अब साहित्य भी बच-बचाकर लिखा जा रहा है ताकि उससे किसी को चोट न पहुंचे। शब्द जो कभी हथियार थे, औजार थे, वो अब श्र(ासुमन पुष्प में परिवर्तित हो गए हैं। यानी अब सवाल यह है कि क्या साहित्य को भी कायर लोग, लीक पर चलने वाले ही चलाएँगे? लीक पर चलने वाला कायरों का साहित्य कब तक बचेगा, और कैसा होगा? कुछ सवालों को हम समय के हवाले कर देने के आदी रहे हैं। काश उसमें धंसकर हम जवाब ढूंढ़ते।

हाल ही में 'इंडिया' टुडे में राजेन्द्र यादव पर एक लेख प्रकाशित हुआ। उसमें राजेन्द्र जी ने कहा कि 'लेखकीय रचनात्मकता की बुनियादी जरूरत है स्त्राी'। अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए उन्होंने हेमिंग्वे को कोट किया-'मेरे जीवन में हर नई स्त्राी ने मुझे नया उपन्यास दिया।' 'पाखी' के इस अंक में भी प्रियंवद ने समाज और नैतिकता को खारिज किया है। सुधी पाठकों-लेखकों से निवेदन है कि वे इस बाबत अपना पक्ष रखें कि क्या वास्तव में नैतिकता और समाज का कोई वजूद नहीं है? नैतिकता है भी या नहीं? अरग है तो उसका दायरा क्या है? और किसी लेखक या बु(जिीवी को नैतिकता लांद्घने या उसे खारिज करने की छूट क्या इसलिए मिल जाती है कि वो रचनाकार है। क्या स्त्रिायां और हाशिये के लोगों के हिस्से की नैतिकता अलग होती है?

 
 
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