अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
शातिरदास की डायरी
मेलाचरितम
 
मेले में अभिनय भी जरूरी है। एक से बढ़कर एक मुखौटे! कई बार तो पता ही न चले कि चेहरा है या मुखौटा। साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार जिनके नाम निकला है वे दिखे। पत्नी के साथ। विनम्रता के नये संस्करणों के साथ। इतने कृतज्ञ कि पूछिए मत! एक आँषि ने कहा है कि पुरस्कार हथकंडों से मिलते हैं। पुरस्कार मिलने के बाद नये-नये हथकंडे समझ में आने लगते हैं। ठीक है, चहल-पहल बनी रहनी चाहिए। वे पत्नी के साथ तो ये प्रेमिका के साथ। प्रेयसी को किसी प्रशस्ति पत्रा या तमगे की तरह लेकर द्घूमते हुए। देखने वाले समझ जाते, पिफर भी बताते। इनसे मिलिए। ये हैं। मेले में बाजार है। बाजार में प्रेम भी 'डिस्प्ले' किया जाना चाहिए।
 
विश्व पुस्तक मेला था, लगता भी मेले जैसा ही था। किताबों के कुंभ में आकर... शामिल होकर किसी को भी आनंद आता। शातिर सुल्तानपुरी को भी आया। साथ ही शातिर ने बहुत कुछ ऐसा भी देखा सुना जो एकदम नया अनुभव था। साहित्य में 'नया' और 'अनुभव' दोनों शब्द बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। तो इनका वजन समझते हुए विश्व पुस्तक मेला उपर्फ 'मेलाचरितम' के कुछ नये अनुभव पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं।
दिल्ली में एक गालिब भी हुए हैं, जिन्होंने कहा, 'आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना।' साहित्य वाले इसे बहुत बार कहते सुनते हैं, मगर कभी इस दर्पण में खुद को नहीं निहारते। निहारते तो ऐसे वाक्य भी दिख जाते, 'पोथन्नों को भी मसस्सर नहीं पुस्तक होना।' शातिर पुस्तक और पोथन्ने में अंतर करने के तर्क तलाश ही रहा था कि एक स्टाल पर टंगे बैनर पर नजर गई। लिखा था-'अक्षर अक्षर ब्रह्म है।' द्घबराकर ब्रह्म को नमस्कार किया और आगे बढ़ लिया।
कौन कहता है कि दुनिया बहुत आगे बढ़ गई है। यदि लोकार्पण नामक शब्द पर भरोसा करें तो यह बात गलत नजर आती है। आज भी लोकार्पण के लिए नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिापाठी और अशोक वाजपेयी के ही कर कमल माने जाते हैं। हरिशंकर परसाई ने एक व्यंग्य में लिखा है कि मेरे कर कमल हो गये, उसी अर्थ में। प्रकाशक बिक्री के लिए परेशान, लेखक लोकार्पण के लिए। एक तरह से यह 'लोकार्पण मेला' भी दिख रहा था। लेखक परेशान कि यार, पुस्तक मेले में हो जाता तो न्यूज आ जाती। सत्य है, पुस्तक का परम उद्देश्य किसी परम व्यक्तित्व द्वारा लोकार्पण और न्यूज बनना ही है। पाठक पढ़ें न पढ़ें क्या पफर्क पड़ता है। शायद इसी माहौल से खीझकर नामवर जी ने राजकमल प्रकाशन के स्थापना समारोह में कहा कि अब ये सब बंद होना चाहिए। चाहता हूँ कि एक बार अंतिम रूप से लोकार्पण कर दूँ। जब नामवर जी मंच पर यह बोल रहे थे तो दर्शकों-श्रोताओं में बैठे एक सज्जन पफुसपफुसा रहे थे, 'खुद ने तो द्घूम-द्घूम कर खूब कर लिया। अब जब हमसे लोग कराना चाहते हैं तो कहते हैं कि बंद होना चाहिए।' वरिष्ठता की ओर द्घातक तरीके से बढ़ रहे इन सज्जन की पीड़ा का अनुमान किया जा सकता था। खैर, नामवर जी को चाहिए कि ऐसे सि(ांत न निकालें जिससे सन्निपातपूर्व आसन्न बूढ़ों की संभावनाएँ ही समाप्त हो जाएँ।
तो लोकार्पण मेले में कुछ वरिष्ठ तभी आये जब उन्हें किसी ने आर्शीवाद देने के लिए बुलाया। वरना उनके लिए पुस्तक मेले का क्या महत्व! जिन लेखकों की किताबें नहीं आ पाईं, वे मौका ताड़कर किसी-किसी को पकड़कर समझा रहे थे, 'कहा तो था पब्लिशर ने कि ले आएगा। लाता तो हम भी करवा लेते।' इसके बाद वे ऐसी मुद्रा बनाते कि भई, हमें इन सब चोचलों से कोई पफर्क नहीं पड़ता। एक तथाकथित कवि-आलोचक ऐसे थे जो दो स्टालों पर लोकार्पित होकर गर्वोन्नत ग्रीवा के साथ टहल रहे थे। गोवा से जयश्री राय आई थीं, जिनके उपन्यास का लोकार्पण था। यह उपन्यास पहले एक लम्बी कहानी थी। वैसे भी उत्साही लेखकों ने लम्बी कहानी और उपन्यास दोनों का पफर्क समाप्त कर रखा है। जयश्री को क्या पता था कि यह मेला उनको पफलेगा नहीं। गोवा पहुंची ही होगी कि उन पर कहानियाँ चुराने का आरोप इंटरनेट पर तैरने लगा। जो संजीव पहले जयश्री राय की भाषा आदि पर मुग्ध थे, वे द्घोषित रूप से क्षुब्ध हुए कि जयश्री ने उनके एक उपन्यास से 'मार कर' 'बेटी बेचवा' कहानी रची है। विवेक मिश्र और मनीषा कुलश्रेष्ठ ने तो 'राय' की सारी 'जयश्री' धूमिल कर दी। सच है, लोकार्पण सबको पफलता नहीं। खास कर दिल्ली में।
बहरहाल, खूब हुए लोकार्पण। अब देखना है लोकार्पितों में से कितनी पढ़ी भी जाती हैं। लोकार्पण प्रकाशक का हथकंडा होता है, लेखक को पफोटो खिंचाने से कुछ ज्यादा लाभ होता हो तो बताइयेगा। लेकिन दिल है कि मानता नहीं। मेले में यह झमेला भी खूब रहा। झमेले का विश्लेषण करते हुए किसी ने कहा कि 'वे' नहीं आये मेले में। 'वे' यानी पचपन वर्षीय युवा कहानीकार! इस पर एक ने टीका की कि वे तो साहित्य के स्पाइडर मैन हैं, बैटमैन हैं। अब उन जैसा 'मकोड़ा पुरुष' या 'चमगादड़ पुरुष' बिना किसी प्रयोजन के शौचालय भी नहीं जाता तो यहाँ कैसे आएगा! वह आएगा तो हथेली से जुगाड़ के धागे निकलकर किसी सार्थक जगह से चिपक रहे होते। पिफर वह स्पाइडर की तरह हवा में कलाबाजियां खाते आते बढ़ेगा। ठीक उसी तरह जैसे पिछले कई वर्ष से कहानी लेखन में कलाबाजियां खा रहा है।
चलिए वे नहीं आए, मगर कई तरह के लेखक दर्शनीय मुद्राओं में उपस्थित थे। एक के बारे में कुछ कहने से पहले सस्ता साहित्य मंडल से प्रकाशित गाँधी डायरी की याद आती है। इस डायरी में गाँधी के वचन भी छपे हैं। एक वचन है, 'जैसे एक पफोड़ा भी आदमी को तंग करता है, उससे भी बदतर उद्विग्नता है।' तो इनको देखकर लगता था कि इनके हर उस स्थान पर पफोड़ा है जहाँ नहीं होना चाहिए। इतने बेचैन... इतने उद्विग्न। किसी की तारीपफ सुनते तो परेशान, कोई पुस्तक देखते तो हैरान!
एक लेखक मेले में आये, जैसे इतना बताने के लिए कि अभी वे जीवित हैं। हालांकि लेखन में वे कभी के दिवंगत हो चुके हैं। कुछ लेखक ऐसे द्घबराये द्घबराये द्घूम रहे थे जैसे इस मेले में खो गये हों और अपने गॉडपफादर या गॉडमदर की तलाश कर रहे हों। ऐसे लेखकों से कापफी प्रकाशक परेशान रहे होंगे। सामयिक प्रकाशन के मालिक महेश भारद्वाज किसी से कह रहे थे कि 'यार अपना तो हाल अजब है। जाने कितने लेखक ऐसे हैं जो सब जगह द्घूमेंगे, मगर बैठने के लिए, पानी पीने के लिए यहीं आ जाएँगे।' अब लेखक भी क्या करें, जहाँ कोई प्यार से पूछेगा, वहीं तो जाएँगे। कुछ लेखक तो टहलते हुए कनखियों से ताकते रहते थे कि कोई तो पुकार ले। अरे! आप भी हैं! तब चकित और संतुष्ट भाव से कहें कि बस द्घूमने चला आया। यानी 'इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो।' मेले में अकेले रहना या रह जाना सचमुच भयानक होता है।
मेले में अभिनय भी जरूरी है। एक से बढ़कर एक मुखौटे! कई बार तो पता ही न चले कि चेहरा है या मुखौटा। साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार जिनके नाम निकला है वे दिखे। पत्नी के साथ। विनम्रता के नये संस्करणों के साथ। इतने कृतज्ञ कि पूछिए मत! एक आँषि ने कहा है कि पुरस्कार हथकंडों से मिलते हैं। पुरस्कार मिलने के बाद नये-नये हथकंडे समझ में आने लगते हैं। ठीक है, चहल-पहल बनी रहनी चाहिए। वे पत्नी के साथ तो ये प्रेमिका के साथ। प्रेयसी को किसी प्रशस्ति पत्रा या तमगे की तरह लेकर द्घूमते हुए। देखने वाले समझ जाते, पिफर भी बताते। इनसे मिलिए। ये हैं। मेले में बाजार है। बाजार में प्रेम भी 'डिस्प्ले' किया जाना चाहिए।
युवा लेखिकाओं के भी कई दल न८ार आये। एक दल में शामिल लेखिकाओं को देख सुन कर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के 'बाणभट्ट की आत्मकथा' का यह प्रसंग याद आ गया-
''निपुणिका को अवसर मिल गया। बोली, 'उसे न
छोड़ मित्तिया। गाँव से नई आई है, अभी यहाँ की
रीति-नीति नहीं जानती।' मित्तिया जोर से हँस
पड़ी, 'दो दिन में सीख जाओगी लली, न जाने
कितनी आँखों पर नाचती पिफरोगी'।''
इस दल की नेता बहुत सारी आँखों पर नाच नाच कर थक चुकी लग रही थीं। अब वे नयी पीढ़ी का मार्ग दर्शन कर रही थीं।
अच्छा लगा मनीषा कुलश्रेष्ठ को सपरिवार देखकर। उनके उपन्यास 'शिगापफ' के पेपरबैक संस्करण की रिलीज थी, राजकमल प्रकाशन पर। आवरण मनीषा की बेटी ने बनाया था। बेटी भी थी और पति भी। यानी रचनाशीलता के संस्कार मनीषा ने अगली पीढ़ी को सौंप दिये हैं। एक बार तब और अच्छा लगा जब अल्पना मिश्र के कहानी संग्रह का लोकार्पण करने के बाद विश्वनाथ त्रिापाठी ने कुछ वाक्य कहे। उन्होंने बताया कि अल्पना पंडित जी ;हजारी प्रसाद द्विवेदीद्ध के छोटे भाई की बेटी हैं। यह भी जोड़ा कि जब भी पंडित जी या उनके परिवार के बारे में कुछ कहने का अवसर आता है तो भावुक हो जाता हूँ। त्रिापाठी जी, यह भावुकता अपनी अपनी तरह से औरों में भी बची रहे तो साहित्य-समाज में 'मनुष्यता की मात्राा' थोड़ी बढ़ जाय। वरना इस संदर्भ में एक सुना हुआ प्रसंग याद आता है। एक बार नामवर जी से किसी ने कहा कि डॉक्टर साहब, पफलाने साहब उस दिन आपकी बहुत निन्दा कर रहे थे। नामवर जी ने मुस्कराते हुए कहा कि भाई, मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने पफलाने साहब की कभी कोई मदद की हो। भला वे मेरी निन्दा क्यों करेंगे। मेरी निन्दा तो वही करते हैं जिनकी मैंने कभी कोई मदद की होती है। ...ऐसे परिवेश में विश्वनाथ त्रिापाठी की भावुकता का मूल्य समझा जा सकता है।
जब मैत्रोयी पुष्पा की पुस्तक 'गुड़िया भीतर गुड़िया' का पेपरबैक संस्करण जारी हो रहा था तब एक लेखिका कह रही थीं कि इनकी आत्मकथा का अगला खंड पढ़ने की जरूरत नहीं। पता है उसमें क्या होगा! उसमें होगी राजेन्द्र यादव की बेवपफाई की दास्तान। सुनते हैं राजेन्द्र यादव ने भी किसी समय मैत्रोयी की बहुत मदद की थी। खैर, मेले में राजेन्द्र यादव की कमौौी बहुतों को खली। उन्हें भी जिन्हें लोकार्पण करवाना था, उन्हें भी जिन्हें बतरस का आनंद लेना था। दुआ है कि राजेन्द्र जी स्वस्थ होकर बतरस का आनंद लुटाएँ।
मेले में भांति भांति के संवादों का दौर रहा। जिनहें सुनकर एक दोहा याद आता रहा-
'ग्यानी से ग्यानी मिलै होय ग्यान कै बात।
गदहा से गदहा मिलै चलै भड़ाभड़ लात॥'
इसलिए हे तात! इस मेले में बात और लात दोनों की बहार रही। रहनी भी चाहिए। बस यह सोचना पड़ रहा है कि बिक्री से हटकर ऐसी पाँच नयी हिन्दी पुस्तकों के नाम याद करूँ, जिनका पढ़ना जरूरी हो। आपको याद आये, तो बताइयेगा।
 
 
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