अप्रैल २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
टॉक ऑन टेबल
''सिक्के के दो पहलू'' हैं प्रेम और सेक्स
 

 

 

हिन्दी कथा साहित्य में प्रियंवद का अर्थ खूबसूरत भाषा, अपरिचित मगर रोचक वातावरण, रहस्यमी-असामान्य और हाशिये के पात्रा, इतिहास-दर्शन की जंगलों से गुजरना है, जहां प्रेम, औरत और देह के पड़ाव भी आते हैं। अपनी पहली कहानी 'बोसीदनी' ;१९८०द्ध से लेकर इस अंक में दिए जा रहे 'दास्तानगो' तक की उनकी कथा यात्राा में कई आयाम देखे जा सकते हैं। उनका लेखन जैसा लीक से हटकर है, वैसा ही जीवन भी है, जहां तेजाबी खुलासे हैं। लेखकीय जिंदगी को अपने खास ढंग से जीने वाले प्रियंवद बातचीत के दौरान न तो सवालों से बचे, न हमें भटकाया। इस बातचीत को हमने कथा साहित्य, इतिहास-दर्शन और उनके व्यक्तित्व के कई पहलुओं पर पफोकस किया ताकि लेखक का समग्र रूप सामने आ सके। इसमें हमारे साथ थे कथाकार अशोक गुप्ता और इतिहास के शोधार्थी रोहित प्रकाश-

 
प्रियंवद
प्रेम भारद्वाज : प्रियंवद जी सबसे पहले आपका स्वागत है। आप कानपुर से यहाँ हमसे बातचीत करने आए। हमारे अनुरोध को स्वीकारा आपने। शुरुआत करते हैं हल्के-पफुल्के अंदाज में। कहानी-लिखना शुरू किया आपने १९८० में। उस समय कहानी लिखते हुए आपके जो अनुभव थे, जो सोच थी और आज भी कहानी लिख रहे हैं-पूरा एक पफासला गुजरा है। क्या पफर्क महसूस करते हैं?
प्रियंवद : देखिए, एक लेखक के रूप में पफर्क आया है। वह सबसे बड़ा पफर्क तो यही कि शुरुआती कहानियों में जो ज्यादा भवुकता थी उसमें कमी आई। हालांकि लोग कहते हैं कि पहले आप अच्छी कहानियाँ लिखते थे अब नहीं लिखते। मैं
सोचता हूँ उस तरह की भावुकता या भाषा, जो एक फ्रलावरी टच था-वो न हो। दूसरा पफर्क ये कि इधर कहानियों को लेकर पिछले ५-७ साल में एक समझ बनी है और वह ये कि इतिहास और दर्शन भी साहित्य का हिस्सा होते हैं। मतलब मेरे हिसाब से साहित्य, इतिहास और दर्शन तीन अलग विषय नहीं हैं। ये पूरा एक त्रिाकोण है। आप एक कोण से खड़े होकर दूसरे पिफर दूसरे से तीसरे पर जाते हैं। आज मैं कहानी लिखता हूँ और इन चीजों को नहीं पकड़ पाता तो बात नहीं बनती।
प्रेम भारद्वाज : आप लेखक ही क्यों बनना चाहते थे?
प्रियंवद : नहीं, मैं लेखक नहीं बनना चाहता था। इत्तिपफाक से बन गया। अगर 'सारिका' में पहली ही कहानी पुरस्कृत नहीं होती तो शायद न भी बनता। बनना तो मैं चाहता था इतिहास का प्रोपफेसर। पीएचडी भी कर रहा था और सिनोप्सिस भी
एक्सेप्टेड था। मुझे हमेशा इतिहास साहित्य से प्रिय रहा। बहुत ज्यादा। इतिहास तो मेरे ऊपर जादू करता है। आज भी करता है। कविता वगैरह लिखता या पढ़ता जरूर था। उसी दौर में पहली कहानी लिखी और भेज दी। पहली ही कहानी पुरस्कृत हो गयी तो लगा कि पिफर दूसरी लिखें।
अशोक गुप्ता : दायित्व भी बढ़ गया।
प्रियंवद : दायित्व की समझ तो उस समय नहीं थी। दूसरी कहानी भी 'धर्मयुग' में छप गयी। तीसरी पिफर 'सारिका' में छप गयी। तो पागल होने के लिए कापफी था और कहानीकार बनने के लिए भी।
अशोक गुप्ता : आपने जैसे अभी एक बात कही कि शुरू में भावुकता अधिक होती है। लेकिन मैं एक संदर्भ बताना चाहता हूँ, 'नदी होती लड़की' कहानी आपकी कब की है? उसमें
भावुकता नहीं, गहरी संवेदना है।
प्रियंवद : कहानी लिखते तब करीब-करीब १० साल बीत गए थे। उसमें भावुकता नहीं है।
प्रेम भारद्वाज : 'सारिका' में आपकी एक और कहानी छपी थी। उसका नाम था 'बहती हुई कोख'। उसको पता नहीं आपने संग्रह 'आईना द्घर' में क्यों नहीं लिया।
प्रियंवद : मुझे लगा इस कहानी में भावुकता ज्यादा है। इसलिए रोक ली।
अशोक गुप्ता : अपनी 'खरगोश' कहानी को आप भावुकता की श्रेणी में रखेंगे या संवेदना की।
प्रियंवद : नहीं, उस वक्त तो भावुकता छंट चुकी थी। वो करीब १६ साल बाद की कहानी है। भावुकता ३-४ साल में ही छंट गयी थी। लेकिन ये इतिहास और दर्शन की समझ नहीं थी। समाज की इतनी समझ नहीं थी। मैं लिखता रहा, भाषा को साधता रहा। कोशिश करता रहा कि चीजों को पकडू़ूं।
अशोक गुप्ता : दर्शन की दस्तक 'आर्तनाद' में भी दिखाई देती है।
प्रियंवद : हाँ! 'आर्तनाद' में वो आयी थी।
प्रेम भारद्वाज : क्या वो टर्निंग प्वाइंट है?
प्रियंवद : 'आर्तनाद' की बड़ी मजेदार बात है। 'आर्तनाद' को मैंने लिखा उपन्यास के रूप में था। करीब २५० पृष्ठों का पहला उपन्यास। गिरिराज जी को मैंने कहा कि भाई साब मैंने एक उपन्यास लिखा है। उन्होंने उसे राजेन्द्र यादव को भेज दिया। मेरा राजेन्द्र यादव से तब कोई संपर्क नहीं था। गिरिराज जी ने उनको बताया कि देखो ये उपन्यास है, एक नए लड़के ने लिखा है। उन्होंने उपन्यास पढ़ा वापस भेजा और एक चिट्ठी गिरिराज जी को भेजी। वो चिट्ठी मेरे पास आज भी है।
प्रेम भारद्वाज : क्या लिखा था?
प्रियंवद : तुम इसके दुश्मन हो जो इतनी गंदी रचना को छापने की बात कर रहे हो। गिरिराज जी ने चिट्ठी मुझे दे दी।
प्रेम भारद्वाज : आप चौंके?
प्रियंवद : नहीं, इसमें चौंकने वाली बात नहीं थी। इतनी समझ तब तक मुझमें आ गयी थी। मतलब मेरे अंदर वो एरोगैंस नहीं था ...बहुत ध्यान दिया राजेन्द्र जी की बात पर। कोई ऐसा कह रहा है तो जाहिर है वो सही कह रहा है। एक क्षण के लिए भी मेरे अंदर ये नहीं आया कि मैं सही हो सकता हूँ, वो गलत। मैंने मान लिया कि बात बिल्कुल ठीक है और ये छपने लायक नहीं। उसके बाद पिफर जब 'हंस' शुरू हुआ। पहली बार मैं राजेन्द्र यादव से मिलने गया। मुलाकात हुई तो बात आयी। वो मुलाकात एक अलग किस्सा है। बहरहाल, उस उपन्यास को बाद में मैंने छोटा किया। २५० पन्ने को छोटा करके एक लंबी कहानी बनायी तो जाहिर है उसमें वही आया जो उसका निचोड़ था।
रोहित प्रकाश : अब तक जो बातें हुई हैं। उसमें इतिहास और साहित्य बार-बार आ रहे हैं। मैं दोनों में आवाजाही करता रहता हूँ। भावुकता और गहरी संवेदना, इतिहास और दर्शन का जो मिला जुला प्रभाव है। उसमें कैसे पफर्क करें। क्योंकि जब इतिहास लिखते हैं तो आप इतिहास सम्मत कोई समझ विकसित करते हैं, तब क्या उसमें भावुकता नहीं होती है।
प्रियंवद : बहुत आसान है। साहित्य लेखन में भावुकता का मतलब-एक तो भाषा सद्घन नहीं होती। मतलब १० शब्द में आप जो बात कह सकते हैं उसके लिए २० शब्द लिख रहे हैं तो आप भावुक हैं। दूसरे अपने छोटे-छोटे मामूली अनुभव भी बहुत बड़े लगते हैं-खासतौर से पे्रम प्रसंग वगैरह। लगता है कितनी बड़ी बात है, इसको लिखो। जब आप समय के साथ थोड़ा सा ग्रो करते हैं, दूसरों को पढ़ते हैं दूसरों को, अपने उस्तादों से मिलते हैं। तो वे रेती लेकर छांटते हैं आपके इन दाएं-बाएं जो निकले हुए होते हैं। तो उनमें भावुकता सबसे पहले छंटती है।
रोहित प्रकाश : भावुकता को जो मैं समझता हूँ..., जब आप इतिहास लिखें, साहित्य लिखें, दर्शन लिखें उसमें एसेंसियली शामिल होती है। गहरी संवेदना और भावुकता में कोई ट्रांजिशन नहीं है।
प्रियंवद : हाँ ये बात हम आगे अभी कर लेंगे। हालांकि इतिहास में कितनी भावुकता और कितनी नहीं, इस पर बात की जा सकती है। लेकिन साहित्य की भावुकता बहुत स्पष्ट होती है। जैसे शुरू में गीत लिखते हैं। हमने जब शुरुआत की तो जिस गीतकार को पढ़ा, उसकी तरह गीत लिख दिया। बच्चन को पढ़ा तो बच्चन की तरह गीत लिख दिया-भावुकता इसी को कहते हैं।
अशोक गुप्ता : भावुकता और संवेदना में सबसे बड़ा अंतर ये है कि संवेदना विचार का प्रथम बिंदु है। संवेदना से विचार शुरू होता है। भावुकता विचार अवरु( करती है। आपका सोचना बंद हो जाता है।
प्रेम भारद्वाज : मंटो की कहानियों के बारे में क्या सोचते हैं? क्या वे बहुत भावुक कहानियाँ हैं।
रोहित प्रकाश : नहीं भावुकता उसका कंटेंट हो सकती है, लेकिन भावुकता के मन मिजाज में रहकर नहीं लिखी गयी हैं।
प्रियंवद : भावुकता शब्द को अगर आप पकड़ लें, तो भाव के बिना तो कुछ नहीं है। प्रश्न है भाव को आपने रखा कैसे है, और उस भाव को बिना पूरी तरह से पकाए कहानी में उडे़ल दिया।
अशोक गुप्ता : भावुकता के कोई निमित्त नहीं होते, संवेदना का निमित्त होता है। एक व्यक्ति के दुख में उसके साथ दुखी होना या एक व्यक्ति के दुख में उसके स्थान पर दुखी होना, दोनों में अंतर है। जब उसको दुखमुक्त करने के लिए उसके स्थान पर दुखी होने के निमित्त में पहुंचते हो, तो एक वैचारिक प्रक्रिया आपको लानी होती है कि हम दुख के लक्षणों के सहारे दुख के केन्द्र तक पहुंचें और एक प्रक्रिया शुरू करें उसके जीतने की, वो रचनात्मक है। भावुक होना रचनात्मक नहीं है क्योंकि वो रो रहा है। उसके बगल में आप भी बैठे रो रहे हैं।
प्रेम भारद्वाज : प्रेमचंद ने अमृत राय से कभी कहा था कि हिन्दी कहानी से मृत्यु कम हो रही है या खत्म हो रही है। मृत्यु को लगातार बने रहना चाहिए। आपकी अधिकांश कहानियों में मृत्यु आती है और बार-बार आती है। अलग-अलग संदर्भ और परिप्रेक्ष्य लिये। आपने शायद इस सवाल के जवाब में कहीं कहा भी है कि मृत्यु मुझे आकर्षित करती है। मेरी जिज्ञासा ये है कि मृत्यु के प्रति ये जो आकर्षण है, वह कोई रचनात्मक भाव लिए है, सूपिफयाना है, दार्शनिकता, औधड़पन है, बोहेमियन है -क्या है?
रोहित प्रकाश : जोड़ कर रहा हूँ कि इसमें मिलान कुंडेरा का तो कोई योगदान नहीं?
प्रियंवद : नहीं! मिलान कुंडेरा का योगदान नहीं है इसलिए कि मृत्यु पर हजारों सालों से हमारे भारत में सबसे ज्यादा बात की गयी है, मिलान कुंडेरा तो बहुत बाद के हैं। देखिए, जितना जीवन जरूरी है उतना ही मृत्यु भी। आप मृत्यु को, उसके रहस्यों, उसकी सारी बातों को भी तब समझेंगे जब उसके आस-पास से कभी गुजरेंगे। जैसे गालिब का वो शेर है- 'तू कहां थी ए अजल ए नामुरादों की मुराद,
मरने वाले राह तेरी उम्र भर देख किए!'
तो दुनिया में मृत्यु बड़ी महत्वपूर्ण। जरा देखिए-'...ना मुरादों की मुराद, मरने वाले राह तेरी उम्र भर देखा किए,
पास जब छायी, उम्मीदें हाथ मलकर रह गयी
दिल की नब्जें छूट गयी और चारागर देखा किए।'
आप मृत्यु के बिना शायरी नहीं कर सकते, कविता नहीं कर सकते। मृत्यु के बिना रचनात्मकता हो ही नहीं सकती। अगर आप मृत्यु नहीं समझते तो आप जीवन पर एक शब्द लिख नहीं सकते।
रोहित प्रकाश : मृत्यु में जाकर हम नहीं लिखते हैं, हम मृत्यु की अवस्था में रहकर भी नहीं लिखते। डिटैच होकर लिखते हैं। मतलब आँख पर किताब रखकर तो हम नहीं पढ़ पाएँगे, दूर ले जाकर पढ़ेंगे तो पढ़ पाएंगे कहीं। ये तो अवस्था नहीं।
प्रियंवद : देखिए ये तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन मैं ये जरूर कह सकता हूँ कि मृत्यु की अवस्था में जाकर जीवन आपको सापफ दिखाई देता है। मृत्यु के लिए कभी जीवन में हल्का शब्द इस्तेमाल मत कीजिए। बहुत बड़ी, बहुत गंभीर चीज है।
अशोक गुप्ता : आपकी कहानी 'खरगोश' में अविनाश अपनी प्रेमिका को इन्ट्रड्यूस करके कहता है-मृत्यु। 'मृत्यु' संबोधन है उसमें। उसमें दार्शनिकता का एक तत्व झलकता है। लेकिन है वो पूरी रूमानियत। दुश्यंत ने तो कहा भी है न ;'मौत में तो दर्द हो जाए एक चीते की तरह/जिंदगी न जब हुआ एक पफासला रख के हुआ।'द्ध
प्रियंवद : मृत्यु को बुरा कहता आपको कोई नहीं दिखेगा। न ही दुनिया का कोई दार्शनिक ऐसा मिलेगा जो कहे-मृत्यु बुरी चीज है।
प्रेम भारद्वाज : ओशो ने कहा है-मैं मृत्यु सिखाता हूँ...
प्रियंवद : कोई नहीं कहता। कोई धर्मगुरु नहीं मिलेगा जो कहे मृत्यु बुरी चीज है। कोई लेखक नहीं मिलेगा जो कहे मृत्यु बुरी चीज है और कोई व्यक्ति नहीं मिलेगा जिसकी अपने जीवन के अंतिम वक्त तक आते-आते अंतिम कामना मृत्यु की नहीं रह जाए।
प्रेम भारद्वाज : आपके आकर्षण का प्रमुख कारण क्या है?
प्रियंवद : भाई इतनी विराट चीज, इतनी रहस्यमय चीज मुझे आकर्षित करती है। मुझे जीवन का कुछ भी रहस्य आकर्षित करता है। मृत्यु के इतने सेड्स हैं। इसलिए मैं मृत्यु पर भी लिखता हूँ।
रोहित प्रकाश : थोड़ा उलटकर इसको मैं पूछता हूँ? मृत्यु में रहकर जीवन को देखना, जीवन में रहकर मृत्यु को देखना-ये भी तो एक बात हो ही सकती है।
प्रियंवद : नहीं!
रोहित प्रकाश : अपने साहित्य में मृत्यु को आप देख ही रहे हैं तो उसमें कितना धंसकर जीवन को देख पा रहे हैं?
प्रियंवद : देखिए, जीवन में धंसकर अगर आप मृत्यु को देखने लगेंगे तो जी नहीं पाएँगे। मृत्यु में रहकर जो जीवन देखना है वो तो सिपर्फ रचनात्मक क्षणों की बात है। रचनात्मक क्षणों में अगर आप जीवन में मृत्यु को देखने लगेंगे तो पिफर नहीं जी पाएँगे। वो तो पिफर एक दूसरी स्थिति होगी।
रोहित प्रकाश : मुझे तो अक्सर लगता रहा है कि लोग जीवन में धंसकर मृत्यु की कामना भी करते हैं। मतलब आज जो दौर है २१वीं सदी का। उसमें दुनिया में जो चीजें बदली हैं, लोगों में लगातार आत्महत्या के मामले देख रहे हैं। मृत्यु के प्रति आकर्षण सिपर्फ लेखन के स्तर पर ही नहीं है। मतलब जीवन में एकदम धंसा हुआ आदमी, जो जीवन की सारी दुनियावी चीजें करता है, दिन-रात उसमें लगा रहता है-वो लगातार मृत्यु के बारे में उतना ही सोचता है।
प्रियंवद : आप जो कहना चाहते हैं वो मुक्ति है-जब उसे मुक्ति चाहिए होती है तो मृत्यु के पास जाता है। मृत्यु मुक्ति है। कुछ कहते हैं निर्वाण है, कोई कहता है बुझ जाना है, कोई कहता है वस्त्रा बदलना है। सबने कुछ न कुछ कहा है। आत्महत्या को तो उस तरह नहीं जोड़िए, वो तो मुक्ति है। रचनात्मक क्षणों में अगर जीवन को देखना है तो पीछे लौटकर मृत्यु की स्थितियों में जाइए।
प्रेम भारद्वाज : अच्छा, मृत्यु की तरह आपके यहाँ कई पात्रा जो असामान्य होते हैं, अर्धविक्षिप्त हैं, या सनकीपन भी कह सकते हैं, एबनॉर्मल लोग। वे बहुत आते हैं।
प्रियंवद : देखिए, ऐसे पात्रा समाज में होते हैं। मतलब ये ऐसे पात्रा नहीं हैं जो वास्तविक जीवन में नहीं होते।
प्रेम भारद्वाज : 'बूढ़े के उत्सव' में गिरगिट, छिपकली का नशा करना...?
रोहित प्रकाश : मैं एक बात जोर रहा हूँ... समाज में होते हैं लेकिन चरित्रा के रूप में आपका चुनाव वही क्यों होते हैं।
प्रियंवद : ये सब समाज में होते हैं। 'बूढ़े का उत्सव' कहानी का पात्रा... उसके अनुभव की सारी तात्विकताएँ, सारा संचार बोध वहीं से आया है।
प्रेम भारद्वाज : वे चीजें आती कैसे हैं?
प्रियंवद : ...मेरे ऊपर एक निजी आक्षेप है, कि आप बहुत एरोगेंट हैं/एलीट हैं, उच्च वर्ग के हैं-वगैरह-वगैरह। मैं आपको दावे के साथ कहता हूँ कि जितने हाशिए के चरित्रा मेरी रचनाओं में हैं, उतने आपको किसी लेखक में नहीं मिलेंगे।
प्रेम भारद्वाज : सो तो है...
प्रियंवद : ...और जितने हाशिए के प्रोपफेशन्स हैं, वो मेरी रचनाओं में अच्छी तरह से देखे गए हैं। समाज को उनकी निगाह से मैंने देखा है। मेरी पूरी रचना में कोई एलीट व्यक्ति, कोई उच्च वर्गीय व्यक्ति आपको नहीं मिलेगा।
अशोक गुप्ता : वो तो आपने खुद ही कहा है कि जटिलता, सूक्ष्मता, विशिष्ट अनुभव इन तीनों का समावेश रचना की केन्द्रीयता बनता है।
प्रेम भारद्वाज : आप ऐसे पागल लोगों को ढूंढ़ कैसे लेते हैं, बावस्ता कैसे होते हैं-हमारी जिज्ञासा ये है?
प्रियंवद : वो इसलिए कि मैं अपने समाज में जीता हूँ।
प्रेम भारद्वाज : आपके बारे में तो कहा जाता है कि आप तो अपने मकान में रहते हैं। बंद गली के आखिरी मकान में। कहीं आते जाते नहीं।
प्रियंवद : मेरे बारे में तो बहुत सी बातें कही जाती हैं... मैं क्या कहूँ इसके लिए ...मैं आता-जाता नहीं ऐसी कोई बात नहीं... हाँ-किनके पास नहीं आता जाता वो एक अलग बात है। ...वो पसंद-नापसंद मेरी है।
प्रेम भारद्वाज : पात्राों को लेकर थोड़ा खुलिए...। जैसे छिपकली खाने वाला पात्रा।
प्रियंवद : हकीकत ये है कि मैंने अपनी उम्र के २५ साल बहुत आवारागर्दी में बिताए हैं। मैं अगर लेखक नहीं बनता, तो निश्चित तौर पर एक छोटा-मोटा गुंडा होता। अपने शहर को जिस तरह मैं जानता हूँ, उसकी गालियों को, उसके एक-एक मकान, समाज को, उसके लोगों को... तो ऐसे पात्रा बहुत हैं। आप नदी के द्घाटों पर जाइए, आप मंदिरों में जाइए, उन पतली गलियों में जाइए-जहाँ वो औरतें बैठती हैं... उन औरतों को जो रोटी सप्लाई करते हैं, उनके आस-पास जो द्घड़ीसाज हैं, जो छोटे-छोटे लड़के उन औरतों के द्घरों में काम करते थे, जो हकीम उनका इलाज करता था- आप कभी उस दुनिया को द्घुसकर तो देखिए... लेकिन अब आप दरियागंज में पाईप पीएं और बातें करें... तो क्या होगा... कुछ नहीं होगा।
प्रेम भारद्वाज : बोहिमयन जिंदगी ने कभी आकर्षित किया आपको?
प्रियंवद : बोहेमियन जिंदगी तो मैं जी ही रहा हूँ... पारंपरिक अर्थ में बोहेमियन जीवन नहीं... जैसा कि अशोक जी ने अभी तीन शब्द बोले... रचना में क्या चीज आकर्षित करती है, क्या चीज लगती है कि ये कहानी बननी चाहिए। एक बड़ी चीज जो मुझे आकर्षित करती है वो है रहस्यमयता। जिस चीज के आर-पार नहीं दिखाई पड़ता वो मुझे जकड़ लेती है।
रोहित प्रकाश : रचनाकार का उद्देश्य इसमें कहीं शामिल हो पाता है।
प्रियंवद : नहीं, मैं अपनी बात जानता हूँ। रचनाकार का उद्देश्य बड़ा लंबा सवाल है-उस पर अलग से बात हो सकती है। इसका लंबा उत्तर है। चलताऊ उत्तर नहीं। मैं जो लिखता हूँ-उसके पीछे सिपर्फ इतना है कि ये चीज मुझे आकर्षित करती है। जो चीज फ्रलैट है-उसमें मुझे मजा नहीं आता, भाषा फ्रलैट है, तो उसे मैं नहीं लिखता। जैसे 'पाखी' के इस अंक में मेरी कहानी का प्रारंभ ही होता है- तीन जवान लड़की टमाटर की चटनी में गिरकर मर गयी-मजा तभी है जब उसमें कुछ रहस्य-रोचकता हो... वर्ना लिखना क्या?
रोहित प्रकाश : यही तो मुझे पसंद है। वर्ना मैं अखबार पढूंगा, आपकी कहानी क्यों पढूंगा।
प्रियंवद : ये चरित्रा मुझे खींचते हैं मैं सड़क पर आधा द्घंटा रुक सकता हूँ किसी आदमी को, कोई खास चीज देखने के लिए। मेरा ऑब्जर्वेशन इसलिए ऐसा है कि मैं पूरी तरह उन लोगों के बीच, उस भीड़ में, उस समाज में रहा हूँ। गंगा मेलों में मदारियों के बीच जमूरों के साथ रहा हूँ। जड़ी-बूटी बेचने वाले या सांडे का तेल बेचने वालों को सबको मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ।
प्रेम भारद्वाज : वो तो है, दिखता भी है। ऐसा परिवेश किसी ने रचा ही नहीं हिन्दी साहित्य में।
प्रियंवद : और अभी भी मेरे पास बीसियों चरित्रा ऐसे हैं जो कि मैं आँख बंद करूँ तो निकाल सकता हूँ। 'छुट्टी के दिन का कोरस' में कई लोग आए हैं।
अशोक गुप्ता : इतना यायावरी हुए बिना मर्म के सन्धि स्थल पर नहीं पहुँचा जा सकता।
प्रियंवद : ये जो चरित्रा समाज में हैं, स्थितियां हैं। मैं उनमें रहा हूँ, आपको न लगता हो-लेकिन जो मुझे जानते हैं-वे जानते हैं कि मैं उस समाज में रहा हूँ।
प्रेम भारद्वाज : राजेन्द्र यादव से अभी कुछ दिन पहले मेरी बात हो रही थी। आपके बारे में कुछ प्रसंग आए तो उन्होंने कहा- यार प्रियंवद में सब तो ठीक है ;एम्स में जब भर्ती थे, तब बात हो रही थीद्ध लेकिन उनमें अब वो पहले वाली बात नहीं रही। मैंने पूछा क्यों नहीं रही-तो उन्होंने कहा-कि अरे वही एक बूढ़ा है, वही एक असामान्य पात्रा है, वही निराशा है, वही अंधेरा है, वही रहस्यमयता है कुल मिलाकर उन पात्राों का कोई भविष्य दिखायी नहीं देता। इसलिए शुरू में उनकी कहानियों ने मुझे बांधा, मगर अब प्रियंवद मुझे अच्छे नहीं लगते।
प्रियंवद : देखिए, राजेन्द्र जी ने मेरा लिखा हुआ पिछले दस साल में कुछ पढ़ा है, मुझे शक है। ये जो उनका इंप्रेशन है, ये दस-पंद्रह साल पुरानी रचनाओं का है। उन्होंने मुझपर 'लास्ट सामुराई' यानी अंतिम लेखन का ठप्पा लगा ही दिया है। अगर राजेन्द्र जी नाम लेकर बात करते। मुझे विश्वास है उन्होंने
'धर्मस्थल' नहीं पढ़ा। 'छुट्टी के दिन का कोरस' नहीं पढ़ा। बल्कि उन्होंने दस साल में मेरी कोई कहानी नहीं पढ़ी। इसलिए इस पर उनके कुछ कहने का कोई मतलब नहीं है। और रही पात्राों के भविष्य की बात, तो राजेन्द्र जी अगर मेरे सामने हों और आप वहाँ उनके सामने ये सवाल करेंगे तो मैं बिलकुल उनसे ये पूछूंगा कि भाई साब आज जो आप यहाँ बैठे हैं मैं आपसे मिल रहा हूँ लिखा तो मैंने वही है न जो आज है, भविष्य की बात आप क्यों करते हैं।
जब बार-बार मैं मृत्यु की बात कर रहा हूँ, कि मृत्यु मुझे आकर्षित करती है, मृत्यु की तरह सबकुछ है और उसकी
पूर्वपीठिका की तरह ये सब चरित्रा आते हैं। तो कोई समाज बदलने की बात, किसी विमर्श की बात, किसी झंडे वाली बात ही नहीं। मेरा लेखन ही ऐसा नहीं है।
रोहित प्रकाश : ८० में आपने लिखना शुरू किया। शुरुआती कहानियाँ लिखीं और तमाम तरह की बातें बतायीं। आज जो कहानी लिख रहे हैं। इन बीस सालों में पात्रा नहीं बदले हैं, क्या पात्राों की अवस्थिति नहीं बदली है समाज में?
प्रियंवद : अरे कैसे नहीं बदली है। सिपर्फ वही पात्रा मेरी रचना में नहीं हैं। अभी 'धर्मस्थल' में बिल्कुल अलग तरह के पात्रा हैं। कैसे कोई बार-बार इसे दोहरा सकता है। लेकिन राजेन्द्र यादव वहीं रुक गए।
अशोक गुप्ता : एक बात मैं कहना चाहता हूँ जिससे मेरे कहानीकार को भी दिशा मिलेगी। मैं ऐसा समझता हूँ कि किसी भी कहानी में किसी भी पात्रा का या किसी भी चरित्रा का भविष्य अर्थ नहीं रखता है। अर्थ इस बात का होता है कि उस पात्रा के सहारे जो पाठक कहानी पढ़ रहा है उसकी मानसिक संरचना में क्या परिवर्तन होगा और वहाँ से रचनात्मकता में क्या बदलाव हुए?
प्रियंवद : बिल्कुल ठीक बात। पात्रा का क्या भविष्य होगा, पात्रा का पूरा जीवन थोड़े ही लिख रहे हैं...।
अशोक गुप्ता : ...उस समाज में वो 'बूढ़ा काकुन' कूडे़ के ढेर में छोटी बच्ची के भीगे हुए कपड़े देखता है-एक आद्रता पाठक के मन में आती है जो संवेदना के लिए जरूरी है।
प्रेम भारद्वाज : अब दूसरे विषय पर आते हैं। आपकी कहानियों का एक और स्थायी भाव है-वो है प्रेम और सेक्स।
'बूढ़े का उत्सव', 'अपवित्रा पेड़' या 'उस रात की वर्षा में'-आप से पूछना ये है कि प्रेम और सेक्स के बीच विभाजक रेखा कहाँ है? और सेक्स की अनिवार्यता कहाँ है?
प्रियंवद : देखिए प्रेम और सेक्स में कहीं कोई विभाजन नहीं है। क्योंकि वो दो अलग चीजें नहीं हैं। रही नैतिकता की बात तो प्रेम में आदमी को न तो किसी के नैतिक सर्टिपिफकेट की जरूरत है, न उससे कोई नैतिकता पर संकट आता है। प्रेम और सेक्स में विभाजन की अनिवार्यता क्यों? मैं इस पर बहुत लंबी बात कर सकता हूँ। बहुत सरल सी बात है। सिक्के के दो पहलू हैं। एक पहलू प्रेम है, दूसरा पहलू सेक्स है।
रोहित प्रकाश : मुझे लगता है कि प्रेम जी जो बात कहना चाह रहे हैं वो ये है कि आम तौर पर लेखक जो विवरण करता है उसमें वर्जनाएँ आपके यहाँ नहीं हैं।
प्रेम भारद्वाज : आपकी एक कहानी 'उस रात की वर्षा में' बारिश हो रही है और व्यक्ति के भीतर सेक्स की इच्छा जागती है...
रोहित प्रकाश : देखिए, पचास की पिफल्मों में भी वो सुहागरात दिखा रहे थे और आज भी सुहागरात दिखा रहे हैं। लेकिन वो वर्जना एक लेबल पर टूटी है।
प्रियंवद : मेरी कहानियों में सेक्स का वर्णन कहीं नहीं है।
प्रेम भारद्वाज : सेक्स है।
प्रियंवद : नहीं, आप देखिए ठीक से।
प्रेम भारद्वाज : उत्तेजना नहीं है।
प्रियंवद : मैं सेक्स का वर्णन नहीं करता। देखिए पहले तो ये 'सेक्स' शब्द हटाइए। ये शब्द ठीक नहीं है। इसकी जगह 'देह' रख लीजिए। 'सेक्स' द्घटिया शब्द है। प्रेम और देह शब्द ठीक है। देह और प्रेम का वर्णन है। देह के सौंदर्य का बहुत वर्णन है। एक पूरा-पूरा पन्ना मैंने 'दस्तानगो' में इसकी खातिर... दिया।
अशोक गुप्ता : मैं यही कहने जा रहा था। इस लंबी कहानी में पेंटिंग वाली लड़की है। उसकी पेंटिंग में पूरा वृतांत है लेकिन कहीं भी देहानुराग नहीं है। उसमें कोई एक्सोथर्मिक ;मगवजीमतवउपबद्ध नीड नहीं है। उसमें कोई इरोशन ;मतवेपवदद्ध नहीं है। केवल बॉडी का एस्थेटिक है। उसी तरह से देह को लेकर तीन-चार पेंटिंग्स अलग-अलग हैं। पहली पेंटिंग, दूसरी पेंटिंग, तीसरी पेंटिंग, चौथी पेंटिंग। सारी चीजें उस पफीलिंग को तो रिफ्रलेक्ट कर रही हैं लेकिन वो बातें जो अतिरेक और उन्माद सामने लाती हैं, वो नहीं हैं।
प्रियंवद : देह से उन्माद का मतलब क्या है? देह को देखने से उन्माद का कोई मतलब नहीं है, देह को छूने से उन्माद का कोई मतलब नहीं है, उन्माद तो एक मानसिक चीज है। अगर हारमोन्स में उन्माद नहीं तो आपको कुछ भी हो जाए उन्माद पैदा नहीं होगा।
प्रेम भारद्वाज : आप प्रेम को बहुत अलग लेकर जाते हैं। जैसे 'अधेड़ औरत का प्रेम' है उसमें आपने लिखा भी है नाजायज संबंध मुझे ज्यादा आकर्षित करते हैं।
प्रियंवद : प्रेम में भी अगर विशिष्ट बात नहीं है। उसे अगर आपने ठीक से नहीं समझा तो सबसे ज्यादा उबाने वाली चीज हो जाती है। प्रेम से ज्यादा कोण किसी के नहीं हैं। प्रेम को आप विशिष्ट तरीके से रख सकते हैं। बहुत से लोग हैं जो ये कहते हैं कि उनको प्रेम की विविधता का जीवन में अनुभव नहीं है। पूरी दुनिया में बहुत से ऐसे बड़े लेखक हैं जिनकी पूरी रचना में प्रेम कहीं नहीं है।
प्रेम भारद्वाज : ठीक है प्रेम में और देह में कोई पफर्क नहीं है, सारी वर्जनाएँ नहीं हैं तो अनैतिकता कहाँ से शुरू होती है।
प्रियंवद : देखिए, अनैतिक तो जीवन में कुछ नहीं होता। ये शब्द ही गलत है। ये आपको सिखाता कौन है कि ये चीज अनैतिक है।
प्रेम भारद्वाज : आपका ही कथन है कि किसी औरत का नाजायज संबंध आपको आकर्षित करता है...
प्रियंवद : नाजायज और अनैतिक में पफर्क है। नाजायज मतलब-इनलीगल। कानूनी शब्द है, ये अनैतिक हुआ इममॉरल। कानून का अस्तित्व है। ये बताता कौन है कि ये अनैतिक है-या समाज या धर्म। दोनों ॉड हैं। मैं इन संस्थाओं को शत-प्रतिशत खारिज करता हूँ।
प्रेम भारद्वाज : क्या समाज एक काल्पनिक शब्द है।
प्रियंवद : काल्पनिक नहीं। लेकिन मैं उसकी सत्ता को
बिल्कुल अधिकार नहीं देना चाहता। मैं धर्म और राज्य सत्ता को खारिज करता हूँ।
प्रेम भारद्वाज : 'धर्म स्थल' आपका नया उपन्यास आया है, उसमें भी तो आपने न्यायपालिका को खारिज कर दिया है, कठद्घरे में खड़ा किया है।
प्रियंवद : न्यायपालिका भी तो राज्य का अंग है। मैं राज्य को खारिज कर रहा हूँ तो न्यायपालिका, विधायिका और
कार्यपालिका अपने-आप ही खारिज हो जाएँगें।
रोहित प्रकाश : प्रेम और देह वाली बात में एक चीज मैं और पूछना चाहता हूँ। जब भी कोई लेखक प्रेम और देह की बात करता है तो बार-बार और हर बार उस पर यह आरोप लगाया जाता है कि वो कुंठा में ऐसी बातें कर रहा है।
प्रियंवद : कैसी कुंठा? किस बात की कुंठा।
रोहित प्रकाश : अभाव वाली।
प्रियंवद : मतलब देह का अभाव है, इसलिए ये है। यही है न आपका मतलब?
अशोक गुप्ता : नहीं, मनोभाव का अभाव भी हो सकता है। जब तक आपका मेडिकल इंटीग्रेसन नहीं होगा तब तक आपका देह से जुड़ाव नहीं होगा।
रोहित प्रकाश : जिस तरह के समाज में हम लोग रहे और जिस तरह का समाज अभी भी है। स्त्राी अभी भी एक बड़े युवा समाज के लिए देह ही है और वो देह की तरह ही उसे देखता है व्यक्ति की तरह नहीं। कुंठा संवाद के भी अभाव से और शायद उस देह को पाने की इच्छा पूरी न हो पाने से पैदा हुई है। इसके बारे में लोग बात करते हैं-मैं अपनी बात नहीं कह रहा था। मैं पूछ रहा हूँ क्योंकि उन्होंने मुझ पर भी आरोप लगाए।
प्रियंवद : समाज को तो मैं खारिज कर ही रहा हूँ। समाज में ये सब बुड़ाईयां तो हैं ही।
रोहित प्रकाश : नहीं मेरा सीधा सवाल ये है कि प्रेम और देह के बारे में जब आप बात करते हैं। कोई लेखक, रचनाकार या व्यक्ति-आम जीवन में भी बात करता है तो उस पर पहला आरोप यह लगाया जाता है कि वो कुंठा में बात कर रहा है।
प्रियंवद : प्रेम जी ने मेरी कुछ कहानियों को ले लिया। मेरी कहानियों में ऐसा नहीं कि प्रेम और देह की बहुत बात है।
अशोक गुप्ता : विवाह संस्था के बारे में आपकी दृष्टि कहाँ ठहरती है?
प्रेम भारद्वाज : विवाह तो किया नहीं इन्होंने।
प्रियंवद : हाँ, विवाह तो किया नहीं। मैं चूंकि समाज की बात कर रहा हूँ तो विवाह तो उसमें आता ही है। उसे भी मैं बिल्कुल नहीं मानता।
अशोक गुप्ता : मैं विवाह संस्था को बहुत अमानवीय मानता हूँ।
प्रियंवद : हाँ है। देखिए वो तो एक मजबूरी है। जब आपको समाज बनाना है। जब आप एक समाज निर्मित करेंगे तो परिवार चाहिए, विवाह करना ही पड़ेगा। वो समाज का नाविक है।
रोहित प्रकाश : मैं एक पफेज इस्तेमाल करता हूँ। 'व्हेन यू गेट समथिंग, व्हेन यू लूज समथिंग।'
प्रियंवद : ये जितनी संरचनाएँ हैं धर्म, समाज या राज्य की। ये बनायी ही इसलिए गयी हैं कि मनुष्य को सुरक्षा मिल सके...
अशोक गुप्ता : भाषा के स्तर पर आपकी रचना में शब्द का खिलंदरापन है। मुझे पूरी तरह से थ्रिल हो गया जब मैंने शैम्पेन की जगह चम्पगने पढ़ा। मजा आ गया।
प्रेम भारद्वाज : जादू। वो जादू है। नाटककार रतन थियम बोलते हैं-मैं नाटक नहीं करता हूँ, जादू करता हूँ। आपकी भी भाषा कहीं-न-कहीं जादू करती है। भाषा का जादू कहाँ से सीखा आपने?
प्रियंवद : सब जीवन से सीखा है। आप अगर ऐसा जीवन जीएं। हवा से कुछ नहीं लाते आप। कोई रचना, भाषा भी हवा से नहीं आती। सीखना जरूर पड़ता है। भाषा तो निश्चित रूप से सीखनी पड़ती है और गुरुओं के पैर के पास बैठकर सीखनी पड़ती है।
प्रेम भारद्वाज : आपके गुरु?
प्रियंवद : मेरे बहुत गुरु हैं। अपने जीवन में मैं गुरुओं का बहुत सम्मान करता हूँ।
प्रेम भारद्वाज : उनके बारे में कुछ बताईए।
प्रियंवद : 'बोसिदनी' की भाषा जैसी है, उसमें अच्छे-अच्छे शब्द तो हैं कि मेरी एक हथेली में चांद था, दूसरे में अमलतास-लेकिन ये बहुत भावुक है। इसमें कोई डेंस नहीं है। वो सद्घनता नहीं, वो बात नहीं है। गुलजार साहब गीत लिखते हैं-उनकी भाषा, उनके गीत में बड़े अच्छे-अच्छे शब्द होते हैं लेकिन बहुत गहराई नहीं होती। सबसे पहले मैंने भाषा का जादू देखा बांग्ला लेखकों में। मैंने सब बांग्ला लेखक पढ़े। कोई ऐसा बांग्ला लेखक नहीं है जिसको मैंने न पढ़ा हो। मुझे लगा कि भाषा में कुछ होता है। पिफर मैंने निर्मल वर्मा को पढ़ा, मुझे लगा कि भाषा में तो निश्चित कुछ बात होती है। मैंने साधने की कोशिश शुरू की ये आरोप लगा कि मेरे ऊपर निर्मल वर्मा की भाषा का असर है। उस पर मेरे कुछ सीनियर्स ने समझाया कि इससे तुम्हें मुक्ति पानी है। वर्ना इसमें पफंस जाओगे। अंततः ये तुम्हें मैनरिज्म की तरपफ ले जाएगा। मैं उस दिन सुनकर सतर्क हो गया। मैंने माना। भाषा में सिपर्फ मैनरिज्म नहीं होना चाहिए। भाषा के अंदर भी कुछ होना चाहिए। पिफर मैंने बर्टेड रसल को पढ़ा। मैं जब भी लेख लिखता हूँ-तब मेरी भाषा में मेरा एकमात्रा गुरु वो है। रसल को पढ़कर मैंने सीखा कि कैसे गणित की तरह भाषा लिखी जाती है। २+२=४ अगर गणित में है तो भाषा में भी होता है। मैंने उसको पढ़कर देखा कि भाषा में शब्द कैसे अरेंज किए जाते हैं, कैसे सद्घनता आती है। सार्त्रा की आत्मकथा पढ़ी-'वर्ड्स'। उसमें मैंने देखा कि कैसे दस शब्दों की जगह छह शब्दों से ही काम चल सकता है। इन सबसे बहुत सीखता रहा। नायपॉल की भाषा से सीखा। मैं इसके २० पन्ने पढ़ गया, कुछ नहीं था, सिपर्फ एक कमरे का वर्णन। लेकिन नॉनस्टॉप पढ़ता चला गया तो मैंने उसको समझा कि क्या था इसमें। ये कैसे पढ़ा मैंने? वो आदमी क्या लिखता है-बिल्कुल छोटे-छोटे वाक्य।
देखिए दुनिया की सबसे अच्छी भाषा हम सबने अपने जीवन में लिखी होती है। तीसरे-चौथे और दूसरे क्लास में। लेकिन बाद में हम मूर्खों के साथ बैठकर, ज्ञानियों के साथ बैठकर कौन सी भाषा हमने लिखी? गाय एक पालतू जानवर है। गाय के चार पैर होते हैं। गाय हमें दूध देती है-ये दुनिया की सबसे अच्छी भाषा है। प्रेमचंद को महारत हासिल थी ऐसी भाषा में। ये भाषा तो सीखनी पड़ती है। ये जादू भी सीखना पड़ता है।
प्रेम भारद्वाज : जब शुरुआती दौर में लेखक बनने से पहले पढ़ रहे थे। तब शायद गुलशन नंदा, गुरुदत्त को भी पढ़े थे।
प्रियंवद : देखिए मैंने पढ़ा तो गुलशन नंदा, मस्तराम, गुरुदत्त, प्यारेलाल अवारा और पता नहीं किस-किस को है।
प्रेम भारद्वाज : उसका कुछ योगदान रहता है लेखन में। कुछ इम्पैक्ट है साहित्य संसार में।
प्रियंवद : उसका बहुत बड़ा प्रभाव रहता है-पढ़ने की आदत। पढ़ने की आदत उसी से पड़ी। गंभीर साहित्य पढ़ने से पहले यदि आप ऐसा साहित्य पढ़ लेते हैं तो किताबों को पढ़ने की आदत पड़ जाती है।
प्रेम भारद्वाज : जैसे कुशवाहाकांत या गुलशन नंदा हैं उनकी कोई भूमिका मानी जाएगी साहित्य में। देवकीनंदन खत्राी की मानी जाती है।
प्रियंवद : इसलिए मानी जाएगी कि हम सबने पढ़ा है। आजकल की मैं नहीं जानता लेकिन उस समय कोई ऐसा नहीं था जो इनको पढ़े बगैर लेखक बने। पढ़ने की रुचि और आदत वो डलवाते थे। उसके बाद आप प्रेमचंद वगैरह को पढ़ते थे। मैं जासूसी की एक-एक दिन में १३-१३ किताबें पढ़ जाता था। साइकिल के स्टैंड पर लादी। चार आने में किताबें मिलती थीं-किताबें लाए, कोने में बैठे और पढ़ गए। बिना पलक झपकाए और बिना खाना खाए। उससे पढ़ने की आदत बनी और पिफर धीरे से अच्छी किताबों की आदत पड़ी। आपको बताऊँ हिन्दी में एक बड़ी अजीब सी बात है, मुझे जिस लेखक गुरुदत्त को पढ़कर अच्छी किताब पढ़ने की आदत पड़ी उसने कम से कम सौ उपन्यास हिन्दी में लिखे। मगर उसका कोई नाम नहीं लेता-मगर गुरुदत्त इतने बुरे लेखक नहीं हैं।
प्रेम भारद्वाज : थोड़ा सा हिन्दुज्म था उनमें।
प्रियंवद : पूरा आरएसएस का मामला था, लेकिन देश की बात, देश का भविष्य पूरा है उनमें। मैं जासूसी से उन पर शिफ्रट हुआ। और गुरुदत्त से पिफर बांग्ला पर और बांग्ला से पिफर हिन्दी पर आया।
रोहित प्रकाश : लोलिता, क्लीयोपैट्रा ये सब कहीं नहीं आया था बीच में।
प्रियंवद : नहीं इंग्लिश मुझे उन दिनों बहुत नहीं आती थी?
रोहित प्रकाश : हिन्दी अनुवाद किया था।घ्डायमंड ने...
प्रियंवद : नहीं उन दिनों ऐसा नहीं था और इंग्लिश मेरी बहुत खराब रही हमेशा। मैं पफेल था १२वीं में इंग्लिश में।
अशोक गुप्ता : तो बर्टेड रसल को तब आपने क्या अनुवाद में पढ़ा।
प्रियंवद : इधर पढ़ा, बाद में। जब साहित्य में आ गया, थोड़ी समझ आ गयी, पिफर तो मैंने बीए इंग्लिश लिटरेचर में कर डाला। हुआ ये कि मुझे इंटर में इंग्लिश लिटरेचर में ३१ नं. मिले १०० में और २ नं. ग्रेस मार्क्स मिले तो ३३ नं. मिले-मैं पफेल था। लेकिन मैं अपने शहर के उस कॉलेज में गया जहाँ को-एजुकेशन थी। कॉइचर्स कॉलेज उस वक्त लड़का-लड़की साथ पढ़ते नहीं थे। मैं पहले थर्राया हुआ कि यहाँ लड़कियाँ भी पढ़ती हैं। वे सब इंग्लिश मीडियम से आए हुए लोग थे। मैं गया एडमिशन तो हो रहे थे। उन्होंने सब्जेक्ट पूछे-मैंने कहा इंग्लिश लिटरेचर लूंगा बीए में। उन्होंने नं. देखे १०० में ३१, बोले इंग्लिश लिटरेचर आप पढ़ेंगे। मैंने कहा-जी। पता नहीं कैसे मिल गया एडमिशन मुझे। पिफर शेक्सपियर आए... तो हो क्या रहा है कुछ समझ में ही नहीं आता था। लेकिन मुझे जो इंग्लिश पढ़ाने वाले लोग थे। वे बहुत अच्छे थे। पिफर हो गया।
प्रेम भारद्वाज : एक कहानी आपकी है 'पलंग'। बहुत चर्चित कहानी रही है और उसकी एक पात्रा है 'माँ'। हिन्दी कथा साहित्य में मुझे नहीं लगता-कोई और माँ वैसी है। वो कहानी जब छपी थी तो बड़ी बहसें भी हुई थी। हम लोगों को याद है तब हम एम.ए. में पढ़ रहे थे। कहीं मैंने पढ़ा उसके बारे में कि आपने उसकी 'माँ' को 'औरत' में बदल दिया। माँ के भाव को महपफूज नहीं रख पाए। आरोप यह कि माँ को औरत के रूप में क्यों देखा? माँ को माँ के ही रूप में देखना चाहिए था।
प्रियंवद : उसमें ये जरूर दृश्य है-कि माँ-बेटे एक ही कमरे में रहते हैं, उसको निर्वस्त्रा देखता है और पिफर डांटकर निकाल देता है- 'निकल द्घर से, इसी हालत में निकल।' बस यही है। माँ को औरत के रूप में देखने वाली बात गलत है।
अशोक गुप्ता : इसी से जुड़ी एक बात कहूँगा जो मेरी शब्द चेतना की बाधा हो सकती है कि आपने स्त्राी देह में जहाँ भी उरोज की बात आयी है स्तन शब्द का इस्तेमाल किया है। मेरी शब्द चेतना में स्तन केवल माँ का अंग होता है जिससे वो बच्चों को...। उसके अतिरिक्त यौवन के संदर्भ में स्तन शब्द नहीं ठहरता।
प्रेम भारद्वाज : ये भाषा विज्ञान का मामला ठहरता है।
अशोक गुप्ता : उरोज शब्द हो सकता है।
रोहित प्रकाश : वक्ष का इस्तेमाल भी करते हैं। अब तो उभार इस्तेमाल करने लगे हैं लोग।
अशोक गुप्ता : जहाँ स्तन कहते हैं-एक ममत्व की छवि उभरती है।
प्रियंवद : बहुत बढ़िया बात आप कह रहे हैं अशोक जी।
अशोक गुप्ता : मैंने भी अपनी कहानियों में देह पर बहुत लिखा है लेकिन मैं ऐसे संदर्भ में ऐसे शब्द का प्रयोग करने से बचा।
प्रियंवद : क्या शब्द यूज करते हैं आप?
अशोक गुप्ता : उभार कह सकता हूँ, सीना कह सकता हूँ, वक्ष कह सकता हूँ।
प्रियंवद : नहीं, सीना तो पुरुष का होता है और छाती भी अमूमन पुरुष की होती है।
प्रेम भारद्वाज : मंटो लिखते हैं छाती।
प्रियंवद : कहते हैं, मगर बात बनती नहीं। बात वहीं आ गयी जो शुरू में थी। मैंने कहा था कि देह में बुड़ा कुछ नहीं होता। मैं उस तरह देखता ही नहीं। डिरोगटरी उस पर नहीं...। अगर मैं स्तन कहता हूँ तो मेरे अवचेतन में स्त्राी का वो रूप ही है। मैं स्त्राी का बहुत ज्यादा सम्मान करता हूँ। मेरी चुनौती है-मेरी किसी भी रचना में एक शब्द आप दिखा दें जो स्त्राी के लिए
अपमानजनक हों।
प्रेम भारद्वाज : नहीं हैं।
प्रियंवद : हम और गिरिराज जी ही थे जिसने उस मामले का विरोध किया। उससे हमें कोई लेना-देना नहीं था-बस अखड़ गया स्त्राी का अपमान। हम कोई स्त्राी विमर्श में शामिल नहीं थे। खैर अगर मेरी कहानियों में स्तन शब्द है तो पूरे सम्मान के साथ है। और दास्तानगो में तो पूरा का पूरा प्रकरण है...।
ᅠप्रेम भारद्वाज : एक और कहानी पर आते हैं। 'बूढ़े का उत्सव' में। नाम तो 'उत्सव' लेकिन मामला वहाँ भी मृत्यु का है। उस कहानी के संबंध में भी एक आरोप लगा है कि शायद आपसे सेक्स और मृत्यु का संबंध स्थापित करने में कहीं न कहीं चूक हो गयी। अपराध बोध क्यों और आत्महत्या क्यों कर लेती माँ। वहाँ सेक्स की अनिवार्यता क्यों नहीं दिखाया आपने?
प्रियंवद : मैं एक बार वहाँ गया जहां मानसिक शारीरिक रूप से विकलांग रहते हैं। वहाँ कुछ बच्चे देखे। बड़ा गंभीर सवाल किसी लड़की ने मुझसे पूछा था-आपने इसमें ये दिखाया कि लड़का है और एक माँ है। मान लीजिए लड़की इस स्थिति में हो और पिता होता-तो आप क्या करते?
प्रेम भारद्वाज : सवाल सचमुच गंभीर है।
प्रियंवद : मुझे नहीं समझ में आया। क्योंकि मेरा विषय वो नहीं है। मेरी वो पूरी कहानी माँ की है। ये बड़ी जेनुयिन
प्रॉब्लम है अगर आप उन लोगों से बात करें। उनके ;बच्चोंद्ध मस्तिष्क में काम चेतना होती है। कहाँ ले जाएँ उसको। उसका कोई इंतजाम, कोई सिस्टम, कोई एजुकेशन नहीं है।
शारीरिक विकलांगता की सारी कमियों की बात करते हैं-लेकिन वो होती है। वो उस क्षण की कहानी है-माँ और बच्चे की। उसकी माँ को केवल इतना लगा कि मैं सुख दे रही हूँ... मतलब ये माँ के मातृत्व की मेरे खयाल से चरम स्थिति है।
प्रेम भारद्वाज : हाँ! बेटे के सुख के बारे में सोच रही है।
प्रियंवद : उसके बाद उसे जो भी लगा हो!
प्रेम भारद्वाज : लेकिन जब आप नैतिकता को मानते नहीं तो कहानी में माँ को अपराध बोध क्यों हुआ?
प्रियंवद : नहीं अपराध बोध नहीं था। प्रेम जी कहानी वहाँ पफंस जाती है। अब आप थोड़ा रचनाकार की तरह सोचिए। हम कहाँ ले जाते कहानी को... क्या ये सिलसिला चालू रखते। कहानी कहाँ जाती और आपको बड़ी हैरानी होगी कि मुझे बहुत उम्मीद थी कि लेखिकाएँ, महिलाएँ इसका समर्थन करेंगी-मगर बहुत
विरोध हुआ। किसी ने नहीं कहा कि आपने जो दिखाया है वो ठीक है।
देखिए जब प्रेम, देह इन सब विषयों पर आप लिखते हैं तो नट की डोरी से भी हजारहवीं महीन डोरी पर चलने जैसा होता है। एक क्षण भी चूके कि पूरी कहानी गड्ढे में चली जाएगी।
अशोक गुप्ता : निर्मल वर्मा की
 
मैंने अपनी उम्र के २५ साल बहुत आवारागर्दी में बिताए हैं। मैं अगर लेखक नहीं बनता, तो निश्चित तौर पर एक छोटा-मोटा गुंडा होता। अपने शहर को जिस तरह मैं जानता हूँ, उसकी गालियों को, उसके एक-एक मकान समाज को, उसके लोगों को... तो ऐसे पात्रा बहुत हैं। आप नदी के द्घाटों पर जाइए, आप मंदिरों में जाइए, उन पतली गलियों में जाइए-जहाँ वो औरतें बैठती हैं... उन औरतों को जो रोटी सप्लाई करते हैं, उनके आस-पास जो द्घड़ीसाज हैं...
 
साहित्य को अंततः दर्शन शास्त्रा में समाहित होना है-ये उसका लक्ष्य है। ये उसके विकास का चरम है। साहित्य को धीरे-धीरे उस तरपफ जाना है जहाँ उसको अंततः दर्शन में मिल जाना है। इस प्रक्रिया में साहित्य जटिल होगा, मल्टी लेयर भी होगा, उसकी भाषा सद्घन होगी, उसकी सम्प्रेषणीयता भी कठिन होगी। सवाल है दर्शन क्या है-साहित्य+विचार। बिना विचार के साहित्य नहीं लिखते आप। साहित्य में विचार बहुत आवश्यक तत्व है। अब मैं यहाँ सख्त विरोध करता हूँ यथार्थवाद का। वाद शब्द बोल रहा हूँ। मेरा तात्पर्य उनसे है जो साहित्य को गहन विचारों से हटाकर देखते हैं। जब साहित्य को आप विचार से जोड़ेंगे तो इतिहास उसकी अनिवार्य स्थिति है। क्योंकि इतिहास हमेशा मनुष्य की बाहरी संरचनाओं की बात करता है- समाज, राज्य, धर्म, पूंजी। साहित्य हमेशा मनुष्य की आतंरिक संरचनाओं की बात करता है।
 
राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक जो भी रहे और जाकर उनका कॉम्बीनेशन भारत के विभाजन में हुआ। मेरी तथ्यात्मकता को कोई चैलेंज नहीं कर सकता। चीजों को लाकर एक जगह रखना और उस पर अपनी एक टिप्पणी देते हुए, अपना एक पक्ष रखा। मैंने रिस्पांशिवलिटी पिफक्स किसी की नहीं की। सब रख दिया कि ये पूरे पफैक्ट्स हैं जो कई चीजों पर रोशनी डालते हैं। इसके बाद मैं इसके आगे नहीं गया। न तो मैं उस तरह इतिहास लिख रहा था, न शोध कर रहा था, न मैं अन्वेषन कर रहा था, न मैं इतिहासकार था। मेरा सिपर्फ और सिपर्फ एक उद्देश्य था कि हिन्दी पाठक के पास एक ऐसी किताब पहुंचा दूँ जिससे वो पूरे विभाजन के प्रसंग को बहुत तथ्यात्मक रूप से जान सके
 
 
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