कविता का पक्ष' में विचार किया है। अरूण कमल का यह सुचिंतित और कसा हुआ व्याख्यान, बनारस से, विनोद तिवारी के संपादन में प्रकाशित पत्रिाका 'पक्षधर' ;अंक-आठद्ध में छपा है। यह व्याख्यान कविता का महत्व कमतर आँकने वालों के अनर्गल प्रलाप का तार्किक प्रतिवाद पेश करता है।
पिफलहाल राजेन्द्र यादव सरीखे लोगों को छोड़ दें जो कभी कविता को हाशिए पर चली गयी विधा मानते हैं ;देखें 'पाखी' प्रवेशांकद्ध तो कभी कविता को 'सेल्पिफश विधा' का दर्जा देकर ;देखें 'हंस' नवंबर २००९द्ध इसके अवमूल्यन की कोशिश करते हैं। परंतु ऐसे लोग भी हैं जो राजेन्द्र यादव की तरह कविता को खारिज तो नहीं करते, पर यह मानते हें कि 'कविता उस तरह से अपने यथार्थ को- अपने समय को व्यक्त नहीं करती है- जैसे उपन्यास करता है' या कहानी करती है। अपने इस मत की पुष्टि के लिए देश की आजादी के बाद मुल्क के बंटवारे का हवाला देते हैं। ऐसे लोगों के मुताबिक 'जब देश आजाद हुआ और विभिन्न स्थानों पर दंगे हुए, बहुत लोग मारे गए, भीषण रक्तपात हुआ', इस पर कहानी और उपन्यास तो कई मिलते हैं, 'जिनमें उस समय का चित्राण और उसके प्रति अपने दायित्व का निर्वाह मिलता है पर कविता नहीं मिलती।' वास्तव में, ऐसा मानने वाले लोग, अपने समय के साथ जो रिश्ता कथा का होता है, वैसा ही संबंध कविता और समय में चाहते हैं। ऐसे मतों की मुखालपफत करते हुए अरूण कमल ने ठीक कहा है कि 'उपन्यास या कथा-विधा जिस तरह से काम करती है- विवरणों के माध्यम से सीधे-सीधे अंकन करती हुयी, जिसको कई बार यथार्थ की नकल भी कहा जाता है- कविता वैसे नहीं करती है। कविता उसके स्थान पर किसी केन्द्रीय भाव को पकड़ने का यत्न करती है।' इन्होंने बताया है कि निराला की 'कविताओं में लगातार अंधकार का बिम्ब मिलता है। भीषण संताप, कष्ट, दुःख और हड्डियों को बेधने वाली शीत की हवा, ये सब उस काल की कविताओं में मिलता है। निराला ने अपने समय को इन बिम्बों के माध्यम से व्यक्त किया। ...कविता वहाँ पर जाकर एक आतिशी शीशे की तरह सूर्य के संपूर्ण ताप को एक बिन्दु पर केंद्रित करती है और वो बिन्दु है, व्यक्ति का हृदय, उसका चित्त, व्यक्ति की भावनाएँऋ निराला ने वहाँ जाकर अपने आतिशी शीशे से उस पूरे ताप को एक बिन्दु पर केंद्रित किया और वह ताप था संताप, अंधकारऋ जो उस पूरे काल को व्यक्त करता है। उनकी सारी कविताएँ मिलकर एक बहुत बड़े अंधकार का बिंब बनाती है- जो मृत्यु के भी बहुत करीब है लेकिन उसमें प्रतिरोध भी है और एक आशा भी है।'
अलग-अलग दौर के कई रचनाकारों की रचनाओं का उदाहरण प्रस्तुत कर, तत्कालीन समय से उसके जटिल रिश्ते की पड़ताल के बाद अरूण कमल ने पूछा है कि कविता का पक्ष क्या है? क्या कविता का कोई पक्ष होता भी है अथवा कविता निष्पक्ष होती है? कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि कविता तो कला है और यह निष्पक्ष होती है। लेकिन क्या आदि कवि वाल्मीकि निष्पक्ष थे? या तो वे व्याध के पक्ष में थे या उस क्रोंच पक्षी के पक्ष में थे। इन्होंने इस बात पर ठीक ही जोर दिया है कि कविता का एक मात्रा पक्ष यही होता है कि वह किसी न किसी के पक्ष में खड़ी होती है।
कविता का एक बड़ा काम है उन लोगों का पक्ष लेना जिनका कोई नहीं है।
व्याख्या बगैर ;पुनद्धर्मूल्यांकन
'पक्षधर' के इस अंक में दलित रचनाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने प्रेमचंद की कहानी 'कपफन' का अपने तईं 'पुनर्मूल्यांकन' ;!द्ध किया है। वाल्मीकि जी हिन्दी दलित-लेखन के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं, जिनकी पहचान आत्मकथा और कहानियों से बनी है। इस ढीले-ढाले 'आलोचनात्मक विवेचना' में, अपने भोले तर्कों के जरिए शोध-आलेख के ढाँचे में इन्होंने जो लिखा है, उसके ज्यादातर हिस्से में बगैर तारतम्य और तार्किकता के उ(रण-दर-उ(रण पेश कर 'भानुमती का कुनबा' बनाया गया है। जाहिर तौर पर, मेरे जैसे लोग, जो वाल्मीकि जी को 'जूठन' और 'सलाम' सरीखी महत्वपूर्ण रचनाओं की मापर्फत जानते हैं, उन्हें निराशा होगी। इसमें वाल्मीकि जी ने न तो दलित नजरिए से 'कपफन' की व्याख्या के लिए नए गवाक्षों को खोला है और न ही इसकी संरचना में अंतर्निहित समस्याओं का खुलासा ही किया हैऋ जैसा कि अतिव्याख्या और एक हद तक कुपाठ के बावजूद डॉ. धर्मवीर ;प्रेमचंद : सामंत का मुंशीद्ध या रत्नकुमार सांभ्ारिया ;अपने लेखों मेंद्ध ने किया है। क्या यह अनायास है कि इस आलेख में अनिता भारती ;कृति संस्कृति संधान, अंक-२, अप्रैल-दिसंबर २००३, संपादक-सुभाष गाताडेद्ध सहित 'कपफन' पर उल्लेखनीय लिखने वाले ज्यादातर दलित रचनाकारों का जिक्र तक नहीं है? क्या यह माना जाए कि वाल्मीकि जी इन सबके 'कपफन' पर लिखे गए से नावाकिपफ हैं?
बहरहाल, 'कपफन' एक ऐसी कहानी है, जिस पर तकरीबन हर दौर में बहसो-मुबाहिसा होता रहा है। कापफी समय तक, इस कहानी को 'श्रम से अलगाव' की कहानी मानकर पढ़ा जाता रहा है। द्घीसू और माधव के मन में काम के प्रति द्घर कर गयी विरक्ति को मार्क्स के ।सपमदंजपवद वि संइवनत के सहारे समझा जाता था। प्रसंगवश, मार्क्स के लेखन में एलिऍनेशन संबंधी अवधारणा की भूमिका और विकास पर निशाद पटनायक ने अपने शोध-आलेख ''द क्वैश्चन ऑपफ एलिऍनेशन इन मार्क्स'' ;सोशल साइंटिस्ट, अंक ४३८-४३९, नवंबर-दिसंबर २००९ऋ संपादक-प्रभात पटनायकद्ध में विस्तारपूर्वक विचार किया है। मार्क्स की इस अवधारणा से कहानी का रिश्ता स्थापित करने की पर्याप्त वजह भी है। कहानी में प्रेमचंद ने लिखा है 'जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी ;द्घीसू-माधवद्ध हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना चाहते थे, कहीं ज्यादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी।' पर यह कहना निहायत जरूरी है कि यह कहानी का एक पक्ष है। 'कपफन' कहानी पूरी तौर पर इस धारणा से व्याख्यायित नहीं होती है। बल्कि इससे कापफी आगे तक जाती है। जिस बात- कपफन के पैसा से दारू पीने और भरपेट खाने-पर सबसे अधिक आपत्ति प्रगट की जाती है, उसकी व्याख्या उपरोक्त धारणा से नहीं हो पाती है।
दरअसल, कपफन के पैसे खा-पीकर द्घीसू-माधव समाज के वर्चस्ववादी समूहों द्वारा निर्धारित इहलौकिक और पारलौकिक दोनों सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। यह अतिक्रमण एक साथ पैसा देने वाले शोषक धनी वर्ग ;जमींदार और बनिया, महाजनद्ध, धर्म के ठेकेदार ब्राह्मण और ईश्वर की सत्ता को मार्मिक चुनौती है। ऐसा करके वे शास्त्रा मत और लोकमत दोनों की अवहेलना करते हैं। यह अवहेलना प्रतिरोध का रूप है। इसी लोकमत और शास्त्रा मत का परिणाम है कि बुधिया के इलाज और तन ढकने वास्ते एक कौड़ी न देने वाले लोग कपफन के लिए पाँच रुपये दे देते हैं। द्घीसू को यह भी पता है कि जब रुपये गिरने का बहाना बनाया जाएगा तो 'लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन पिफर वही रुपये देंगे।' बहरहाल, यह जरूर पूछा जा सकता है कि 'चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम।' का क्या मतलब है? तो क्या यह पंक्ति 'सारे गाँव' की तरपफ से दरकार है? जिस तरह इस 'सारे गाँव' की नजर में चमारों का कुनबा 'बदनाम था, वैसे ही इस कुनबे की नजर में शेष 'सारा गाँव' भी बदनाम ही था। 'ठाकुर का कुआँ' कहानी याद करें। इसकी मुख्य किरदार गंगी सोचती है ''हम क्यों नीच हैं और लोग क्यों ऊँच हैं? इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं? यहाँ तो जितने हैं, एक से एक छंटे हैं? चोरी ये करें, जाल-पफरेब ये करें, झूठे मुकदमें ये करें। अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिये की एक भेंड़ चुरा ली थी और बाद में मार कर खा गया। इन्हीं पंडित जी के द्घर में बारहों मासा जुआ होता है। यही साहूजी तो द्घी में तेल मिलाकर बेचते हैं। काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है। किस बात में हैं हम से ऊँचे। हाँ, मुँह में हम से ऊँचे हैं। हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊँचे हैं, हम ऊँचे। कभी गाँव में आ जाती हूँ, तो रस भरी आँखों से देखने लगते हें। जैसे सब की छाती पर साँप लोटने लगता है, परंतु द्घमण्ड यह कि हम ऊँचे हैं।''
ओमप्रकाश वाल्मीकि, 'गोदान' में, सिलिया-प्रसंग में आयी पंक्ति 'जो अपना धरम पाले, वही ब्राह्मण है, जो धरम से मुँह मोड़े, वही चमार है।' से पता नहीं क्या अर्थ निकालते हैं? संदर्भ से काटकर, इस पंक्ति को पढ़ने के साथ-साथ इसमें प्रयुक्त 'धरम' को रिलीजन के अर्थ में समझने की भूल भी करते हैं। काबिल-ए-गौर बात यह है कि यहाँ 'धरम' का प्रयोग दायित्व-बोध, कर्तव्य-बोध के लिए किया गया है। इसी दायित्व-बोध का नतीजा है कि मातादीन सिलिया के साथ रहने आ जाता है। हाँ, यहाँ एक सवाल पूछा जा सकता है कि कर्तव्य-बोध पालने वाले के लिए 'ब्राह्मण' का मेटापफर और इससे च्युत होने वाले के लिए 'चमार' मेटापफर का प्रयोग क्यों किया गया है?
इसका जवाब भारतीय सामाजिक संरचना में छिपा है। जिसमें ब्राह्मण को श्रेष्ठ माना जाता रहा है। यही इस संरचना की भी कमजोरी है। सिलिया-मातादीन प्रसंग इसी भयावह गड़बड़ी का प्रतिवाद भी पेश करता है। पिफर भी यह कहा जा सकता है कि प्रेमचंद का पात्रा मातादीन इस मेटापफर का उपयोग करता है। कबीर के यहाँ भी प्रेम की गहरी अंतरंगता के क्षणों को व्यक्त करने वाले पदों में ईश्वर के लिए 'पति' का मेटापफर और भक्त ;कबीरद्ध के लिए पत्नी का आया है। कबीर जैसे कवि से पूछा जा सकता है कि कभी यह मेटापफर बदलता क्यों नहीं? ईश्वर पत्नी के रूप में और भक्त पति के रूप में एकमएक क्यों नहीं होते? इसके जरिए मेटापफर के निर्माण में सामाजिक-संरचना में रची-बसी मान्यताओं का असर देख सकते हैं। बहरहाल, ओमप्रकाश वाल्मीकि ने इसमें कपफन की कोई व्याख्या नहीं की है, कि आखिर क्या है इस कहानी में? पता नहीं यह पूनर्मूल्यांकन कैसे है? |