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पानी
राज चला है अजब यहाँ मनमानी का
चलने लगा दुकान अब तो पानी का
कुआँ ताल तलैक्षया तब सब बनवाते थे
अब धंधा है- 'मंदिर और जजमानी का', |
हाय तौबा मची हुई है लोगों में
खुशगवार मौसम है बस राजधानी का
छाँह नहीं, न दौर पर ऐसा आलम
पिफर भी चली है चर्चा किसी महादानी का
इस प्रजातंत्रा में मुँह सभी ने खोल रखे
राजा जी तो सुनते हैं बस रानी का
रहिमन पानी राखिये का कहना क्या
पानी न बन जाये किस्सा नानी का
सरकार
साझे में सरकार चलाते हैं-
कहते हैं अखबार चलाते हैं
बैसाखी पर चलने वाले
अब तो मोटर कार चलाते हैं
जिन्हें कर्म का ज्ञान नहीं है
वे ही गीता सार समझाते हैं
देखो आग है बड़ा भयंकर
हम ठण्डा पी यह बतियाते हैं
दिल्ली वालों के खेल निराले
अब तो वे हाजमोला खाते हैं
उनको भी कुछ दे दो भाया
जो पूंछ नहीं तो सिर हिलाते हैं
जो होता हो हो जाने दो वह
हम तो लिख बस कवि कहाते हैं
जीना क्यों लाचारी में
सुविधाएँ लो उधारी में
जो चाहो सो पालो
सब संभव है खादी में
नदी रहे न ताल तलैक्षया
जल देखो नाला नाली में
अजब तमाशे हैं संसद के
बड़ा मजा है ताली में
याद हमें आते हैं बापू
लाल किला की गाली में
मुफ्रत पा गये तो लागे हैं
रक्खा क्या है आजादी में |