अप्रेल २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
गीत/ग़ज़ल
अशोक कुमार 'नीरद'

हर किसी के नयन में पानी है।
कैसी ख़ुशियों की राजधानी है?

लोग कहते जिसे ख़ुदी, वह तो।
छल-पफ़रेबों की राजधानी हैं?

 

भोगते हम जिसे, वो आ८ाादी।
दासता से भरी कहानी है।

रूढ़ियों का तिलिस्म टूटेगा,
आपको चोट-भर लगानी है।

हाथ पीले करो, बिदाई दो,
वासना हो गई सयानी है।

प्यार से जिसका पड़ गया पाला,
आ गई उसको याद नानी है।

देखकर आदमी का विष 'नीरद'
साँप का ८ाह्‌र पानी-पानी है।

कर ले शातिर अपने दिल को।
हल करना हो ग़र मुश्किल को।

पूजे हैं दुनिया जाहिल को।
ठोकर मारे जग क़ाबिल को।

हश्र ८ामाने का क्या होगा?
मान ख़ुदा बैठा बातिल को।

हाकिम, मुंसिपफ़ जिसके मुहापिफ़ज,
कौन स८ाा दे उस क़ातिल को?

किसने जानी दिल की पिफ़तरत?
पल में ताड़ करे है तिल को।

उस महपिफ़ल पर लानत भेजो,
जो जाँबा८ा कहे बु८ादिल को।

'नीरद' तेरी राह ग़लत है।
कोस रहा है क्यों मं८िाल को?

 
 
 
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