अप्रेल २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
मीमांसा
तिलिस्म का ताना-बाना : साधना अग्रवाल

भारतेन्दु युग में गद्य की अन्य विधाओं के साथ उपन्यास का भी जन्म हुआ लेकिन उपन्यास के केन्द्र में मुख्यतः भूत-प्रेत थे या पिफर जासूसी ढंग के उपन्यास। देवकीनंदन खत्राी और गोपाल राम गहमरी द्वारा लिखे गए उपन्यासों को हम चाहे तो याद कर सकते हैं। वैसे भी भूत-प्रेत की कहानियाँ हर भाषा के पाठकों के लिए रोमांच पैदा करती रही हैं और यह


लंबा सिलसिला है जो भारतेन्दु युग से लेकर राजेन्द्र यादव के पहले उपन्यास 'प्रेत बोलते हैं' ;बाद में यह उपन्यास संशोधित रूप में 'सारा आकाश' के नाम से पुनर्प्रकाशित हुआद्ध पफैला है। हिन्दी के यथार्थवादी आलोचक ऐसे उपन्यासों को इसलिए ज्यादा तरजीह नहीं देते कि जीवन-यथार्थ से इनका कुछ लेना-देना नहीं होता। जबकि सच्चाई यह है कि ऐसी कथाओं में भी जीवन-संद्घर्ष प्रतिबिम्बित होता है। अपने समय के सच को कई बार हम पफैंटेसी से उठाते हैं। हिन्दी ही नहीं अन्य भाषाओं में भी इस तरह का प्रचुर लेखन सराहा गया है।

'प्रेम की भूतकथा' हिन्दी के प्रतिष्ठित कथाकार विभूति नारायण राय का पाँचवा उपन्यास है। संभवतः वे हिन्दी के एकमात्रा वैसे कथाकार हैं जिन्होंने बिना कोई कहानी लिखे सीधे-सीधे उपन्यास लिखने का जोखिम उठाया। 'द्घर', 'शहर में कफ्रर्यू', 'किस्सा लोकतंत्रा' और 'तबादला' के बाद उनका यह नया उपन्यास है। अब तक लिखे उनके उपन्यासों की विषयवस्तु पर विचार करें तो यह स्पष्ट होता है कि बहुत छोटे विषय को केन्द्र में रखकर उन्होंने बहुत विश्वसनीय ढंग से अपने लेखकीय अनुभव के आधार पर प्रायः छोटे कलेवर में लिखे अपने उपन्यास को एक बड़े पफलक पर पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है।
खासकर 'शहर में कफ्रर्यू' और 'तबादला' इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। अब जब उनके पाठक बंगाली टोला उनके द्वारा द्घोषित उपन्यास का इंतजार कर रहे थे, 'प्रेम की भूतकथा' का प्रकाशन पाठकों को चौंकाता है। वैसे यह उपन्यास उनके लेखन का प्रस्थान बिन्दु ही है।
इस उपन्यास के आरंभ में लेखक द्वारा बहुत संक्षेप में कथा भूमि का संकेत किया गया है-'आज से ठीक १०० वर्ष पहले १९०९ में दो द्घटनाएँ हुई थीं- मसूरी में पहली बार बिजली आयी और वहाँ पहली हत्या हुई। हत्या भी कोई साधारण नहीं। अंग्रेजी शासन में मरने वाला अंग्रेज था और उसकी हत्या के जुर्म में जिसे पफाँसी चढ़ाया गया, वह भी एक अंग्रेज पफौजी था।'

यहीं यह स्पष्ट भी किया गया है कि 'कोई भी कथा यदि १०० वर्ष बाद सुनाई जाए तो स्वाभाविक है कि उसमें कापफी कुछ कल्पना रचित होगा ही। इस कथा में भी है।' उपन्यास का आरंभ 'नो रिग्रेट्स माय लव' से होता है जो वस्तुतः एलन को पफाँसी दिए जाने के पूर्व पफादर कैमिलस और जल्लाद कल्लू मेहतर के बीच का संवाद है। कहने की जरूरत नहीं कि यह संवाद बेहद रोचक और रहस्यमय है क्योंकि पाठकों की दिलचस्पी ठीक लेखक की तरह जेम्स के असली हत्यारे का पता लगाने में है वैसे प्रेम की भूतकथा का असली सारांश 'नो रिग्रेट्स माय लव' में ही है। १४४ पृष्ठों का यह छोटा उपन्यास ६ अध्यायों में बंटा हुआ है। और हर अध्याय का शीर्षक बेहद आकर्षक है। उपन्यास पढ़ते लगता है अब असली हत्यारे का रहस्य खुल ही जाएगा लेकिन जब हम 'रोते हैं भूत भी' अंतिम अध्याय पर पहुँचते हैं तो हमें हैरानी होती है। असली हत्यारे की खोज में हमें हासिल होती है प्रेम की अद्भुत भूतकथा रिप्लेबीन और एलन के बीच की। वैसे इस उपन्यास में बहुत सूक्ष्म रूप में हत्यारे का भी संकेत है। लेकिन कहानी है यह पे्रम की ही।

हिन्दी में खासकर कुछ ऐतिहासिक उपन्यास शोध के उपरांत लिखे गए हैं बाबू वृन्दावनलाल वर्मा, अमृत लाल नागर और रांगेय राद्घव द्वारा। लेकिन जिस तरह प्रेम की भूतकथा का लेखक तिथि और ईठ के साथ उपन्यास के वृतांत को आगे बढ़ाता है, पाठकों को लगता है जैसे उसकी आँखों के सामने सब कुछ द्घटित हो रहा है। पृ. ४३ पर तिथि दर्ज है १४ अगस्त, १९१० और जिस तरह का विवरण है, उससे सापफ लगता है कि आप पफादर कैमिलस के साथ चर्च जा रहे हैं। लेखक की सपफलता इस बात में है कि उपन्यास के आरंभ में ही वह पाठक को अपनी गिरफ्रत में ले लेता है। उपन्यासकार की कल्पनाशीलता का कमाल यह है कि जासूसी उपन्यास होने के भ्रम को वह एक झटके में तोड़ देता है और उपन्यास प्रेम की कथा में बदल जाता है। जिस शिल्प में यह उपन्यास लिखा गया है, हिन्दी में संभवतः पहला प्रयास है।
जेम्स की हत्या के बाद एलन की तलाशी में दो ऐसी चीजें मिली जो इस हत्या की तपफतीश में बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकती थीं। उसके बक्से से कुछ सोने के सिक्के मिले। जेम्स को हत्या वाले दिन ही वेतन मिला था और उसमें भी सोने के सिक्के थे। एलन के सामान में टिन का छोटा टिपिफन बॉक्स भी था जिसमें अधखाये सैंडविचे८ा थे। स्पष्टतः यहाँ हत्यारे का संकेत है लेकिन एलन जेम्स का हत्यारा नहीं था। जेम्स और मिसेज सेमुअल के बीच चल रहे प्रेम प्रसंग ही जेम्स की हत्या का कारण हो सकता है। एलन और रिप्लेबीन की यह प्रेम कहानी यदि मल्लिका विक्टोरिया की नैतिकता का शिकार हुई तो हैरानी की बात नहीं-' लड़की कायर थी। कितना चाहती थी कि चीख-चीखकर दुनिया को बता दे कि एलन हत्यारा नहीं है पर डरती थी...।'
यह उपन्यास बेहद रोचक और पठनीय है इसकी भाषा पारदर्शी और शिल्प अद्भुत।

 
 
 
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