| शताब्दी के मौके पर अपने पुरखे रचनाकारों को पिफर से पढ़ने-समझने की कोशिश हर भाषा-भाषी समुदाय करता है। लिहाजा हिन्दी में भी हो रहा है। ऐसे अवसरों पर रस्म अदायगी भी खूब होती है। यह हिन्दी में भी दिख रहा है। चूंकि, हिन्दी में एक साथ चार बड़े कवियों-शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल- का शताब्दी वर्ष है, इसलिए ज्यादा चर्चा-परिचर्चा का होना भी स्वाभाविक है। पर ऐसे मौके बाबा नागार्जुन की |
कविता-फ्दिन है/शताब्दी समारोह के समापन का/दिन है/ पंडों की ध्ूमधम का/विज्ञापन का/दिन है/प्रतिब(ता के व्रत उद्यापन का/दिन है/धन रोपने का/सावन का/दिन है/स्मृतियों की सरिता में प्लावन का/य् न बने तो बेहतर। शताब्दी वर्ष के अवसर पर हिन्दी की तकरीबन सभी पत्रिाकाएं अपने रचनाकारों पर विशेष सामग्री प्रकाशित कर रही हैं। इस अवसर पर आलोचक वृफष्णमोहन ने 'साखी' ;जुलाई-सितम्बर २०११द्ध में 'कोसल में विचारों की कमी है' शीर्षक से एक लेख लिखा है। और 'जब कोसल में विचारों की कमी है', तो बकौल श्रीकांत वर्मा 'कोसल अध्कि दिन नहीं टिक सकता।' वृफष्णमोहन ने मौजूदा परिदृश्य की विचारहीनता पर उचित ही विचार किया है, कई उदारहरणों के साथ। इनमें एक है- अज्ञेय प्रसंग। बकौल वृफष्णमोहन हिन्दी आलोचना के मार्क्सवादी खेमे से अचानक अज्ञेय के पक्ष में वैसे ही अतार्किक वक्तव्यों की झड़ी लग गई है। नामवर सिंह ने उन्हें विगत अर्(शती का 'सबसे बड़ा' कवि द्घोषित किया है। नामवर जी के फ्प्रतिमानों पर अब तक यह केंद्रीयता मुक्तिबोध को हासिल थी। उन्हें अपनी राय बदलने का पूरा अधिकार है, लेकिन बिना कोई उल्लेखनीय कारण बताए जिस आसानी से उन्होंने अपने ३०-४० वर्ष पुराने विचारों को १८०० के कोण पर पलट दिया है, उससे अपनी भाषा और समाज से उनके लगाव पर संदेह होता है। इस तरीके से हिन्दी में स्वस्थ
तार्किकता का नहीं, अंध्श्र(ा का ही विकास होगा।य्
अज्ञेय न सिपर्फ अपने दौर के बल्कि समूचे हिन्दी साहित्य के एक महत्वपूर्ण कवि हैं, पर जब कोई उन्हें अर्(शती का 'सबसे बड़ा कवि' द्घोषित करता है तो इस स्थापना के लिए तार्किक वजहें बतानी होंगी। अर्(शती के अन्य कवियों के साथ तुलना करके बताना होगा। उन प्रतिमानों को स्पष्ट करना होगा, जिसके आधर पर किसी भी कवि को 'सबसे बड़ा' का खिताब दिया जा रहा है। बगैर यह किए किसी को 'सबसे बड़ा' बताने से विश्वसनीयता सवालों के द्घेरे में आती है और 'सबसे बड़ा' शब्द का वजन कम होता है।
अज्ञेय को समझने-समझाने की एक सार्थक कोशिश 'आलोचना' ;सहस्राब्दी अंक इकतालीसद्ध में दिखती है। अपने संपादकीय 'इति नहीं' में कवि अरूण कमल ने लिखा है कि जिन कवियों ने अपने समय एवं बाद की रचनाशीलता तथा भावबोध् को गहराई से प्रभावित किया उनमें अज्ञेय अग्रणी हैं। हालांकि यह कहते और मानते हुए भी हम यह नहीं भूल रहे कि आठवें दशक के आसपास और उसके कुछ पहले भी जो कवि-पीढ़ी आई उसने अपने को अज्ञेय से नहीं जोड़ा, न उनकी ओर गई। इसके अनेक कारण रहे होंगे। अनुभव अलग रहे होंगे। बदले हुए जीवन के अनुभवों ने उन्हें अज्ञेय से दूर किया होगा। जिस भाषा की खोज उन्होंने की, बोलचाल की भाषा, वह भी अज्ञेय में कम ही मिलती। और जीवन की जटिलता, दैनंदिन की भव्यता, साधरण की असाधरणता भी संभवतः अज्ञेय से अध्कि, नागार्जुन, त्रिालोचन, मुक्तिबोध् और पिफर निराला में रही होगी। अज्ञेय ने स्पष्टतः किसी बृहद हिन्दी-उर्दू-संस्कृत परम्परा को भी अन्वेषित या उपलब्ध् न कराया। इन कुछ कारणों को ओझल करके केवल अज्ञेय के राजनीतिक आशयों-सम्बन्धें को ध्यान में रखना ठीक नहीं। हालांकि अज्ञेय हिन्दी के एक सर्वाध्कि राजनीति-ब( लेखक रहे। लगभग लगातार उन्होंने राजनीतिक पत्राों का संपादन-
संचालन किया और एक-दो पीढ़ियों को दीक्षित भी किया। उन्होंने, हो सकता है, राजनीति को कविता का विषय नहीं बनाया या राजनीति उनकी कवि-कर्मशाला का काष्ठ नहीं बन पाई, लेकिन इससे उनकी राजनीतिक ब(ता कम नहीं हो जाती हालांकि यह कोई निर्णायक कारण नहीं था, बाद के कवियों के विकर्षण का। इसके साथ कहा जा सकता है कि बाद में भी कुछ लोग तो जरूर उनके साथ थे और गए और आज भी हैं या होंगे। लेकिन हर हालत में, आकर्षण या विकर्षण के कारण राजनीतिक नहीं बल्कि कलागत रहे। जीवन की छवियों से भरी, मनुष्य के सुख-दुख-ट्रेजेडी का वहन करने वाली, लोगों की बोलचाल की भाषा के करीब रहने वाली कविता की खोज में बाद के मुख्य कवि अन्य स्त्राोतों की ओर गए। हालांकि पिफर कहा जा सकता है कि हो सकता है कि आगे की कोई पीढ़ी वापिस अज्ञेय की ओर जाए। ऐसा भीहोता है कविता के इतिहास में क्योंकि तब की आवश्यकता हमें भिन्न दिशाओं में ले जाती है। और अज्ञेय में ऐसा बहुत कुछ है जो किसी भी कवि के लिए पाठशाला से कम नहीं। वह दुर्लभ भाव-बोध् के कवि हैं। जहाँ प्रत्येक शब्द अपने मसूढ़े में ठीक-ठीक बैठा है। और प्रवृति तथा मनुष्य के आभ्यंतर का ऐसा गहन प्रकाशन विरल है। अज्ञेय की कविता चित्राण नहीं करती। अज्ञेय की कविता स्व की दीप्ति है, स्व का चतुर्दिक प्रकाशन। लगता है निस्तब्ध् अंध्कार में कोई लालटेन टाँगे दुर्गम पथ पर चला जा रहा है। और हम उसे दूर से देख रहे हैं-कुछ भी और नजर नहीं आता, कोई छवि या छाया नहीं केवल एक आलोक उठता गिरता, ढंपता, उभरता-जैसे एक साँस। अज्ञेय का सम्पूर्ण काव्य आभ्यंतर का काव्य है। वैसे यह आभ्यंतर रिल्के या निराला की तरह विशद नहीं है। न ही कोई वैसी आध्यात्मिक पीड़ा या त्राास की ही अनुभूति होती है। पिफर भी यह काव्य हमें अपने गह्वर में
खीचंता रहता है। जब एक कवि वयस्क होता है, जब वह अपने आरम्भिक कार्यभार या प्रतिज्ञाओं का निर्वहन कर इध्र-उध्र सिर द्घुमाता है तब वह उन दराजों, मंजूषाओं और तहख़ानों को भी खोलता है जिनकी कभी उसे दरकार भी न थी। कवि और कविता की गति पूर्व नियोजित प्रक्षेपास्त्रा की तरह नहीं होती। एक कवि सबसे ज्यादा उस कवि से सीखता है जो उससे सबसे ज्यादा भिन्न है। अज्ञेय को समझने की दिशा में अरुण कमल की ये बातें ज्यादा सार्थक हैं बनिस्बत अज्ञेय को सबसे बड़ा द्घोषित करने या उनकी अपेक्षा के सिपर्फ विचारधरात्मक वजह मानने के।
समकालीन हिन्दी कविता
गुजरात की हिन्दी साहित्य अकादमी ने समीक्षक-अनुवादक आलोक गुप्त के संपादन में 'समकालीन हिन्दी कविता'
प्रकाशित की है। अरूण कमल, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, उदयप्रकाश के साथ आठवें दशक के आसपास जो कवि-पीढ़ी सामने आई उनकी कविताओं से लेकर पवन करण, शहंशाह आलम, कुमार वीरेन्द्र तक की कविताएं इस संकलन में शामिल की गयी हैं। इस संकलन में ग़्ाज़्ाल, गीत और बाल-काव्य को भी शामिल किया गया है। इनके अलावा दलित कविता में
ओमप्रकाश वाल्मीकि और मलखान सिंह की कविताएं शामिल हैं। स्त्राी कविता में अनामिका, नीलेश रद्घुवंशी, रंजना जायसवाल और वंदना देवेन्द्र को जगह दी गयी है। आमतौर पर कविता के संकलन में गजल और गीत को जगह नहीं दी जाती है। बाल कविता तो हिन्दी साहित्य की मुख्यधरा में उपेक्षा की शिकार रही ही है। ऐसे में आलोक गुुप्त द्वारा इन सबको समकालीन कविता में शामिल करना महत्वपूर्ण है। इस संकलन में यह भी सापफ हो जाता है कि 'समकालीन' जिन अर्थों में हिन्दी में प्रयुक्त होता है, गुप्त जी ने उस हदबंदी को नहीं माना है। किताब की प्रस्तावना में इन्होंने जाहिर किया है कि फ्आठवें दशक के अंत में ऐसी कवि पीढ़ी का आगमन हुआ जिसने वैचारिक प्रतिब(ता के बावजूद मानव जीवन के छोटे छोटे प्रसंगों, स्थितियों को कविता का विषय बनाया। इसलिए इस समय हिन्दी कविता में दो धराएँ दिखाई देती हैं। एक ओर ऐसी कविताओं की संख्या कम नहीं है जिनमें वैचारिकता का द्घटाटोप था। दूसरे शब्दों में कहें तो वह विचार आव्रफांत कविता थी, विचार के सीध्े-सीध्े प्रस्तुतीकरण से कविता बोझिल होती गई। दूसरी ओर कविता में संवेदना के महत्त्व को समझकर जीवन चित्राों के माध्यम से अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के प्रयत्न हुए और कविता पिफर से अपनी सही जमीन पाने में सपफल हुई। आठवें दशक के अंत में कविताओं के अनेक सग्रंह प्रकाशित हुए जिनमें 'नयी कविता' के कवियों के रूप में प्रसि( केदारनाथ सिंह, रद्घुवीर सहाय, सर्वेश्वर जैसे कवियों के संग्रह भी थे और उनसे पूर्ववर्ती पीढ़ी के कवियों के भी। इसी के साथ अनेक युवा कवियों के पहले संग्रह भी इस दौर में प्रकाशित हुए। 'कविता की वापसी' का जुमला छोड़ने वालों का भले ही कोई दूसरा निहितार्थ रहा हो, लेकिन इसमें दो मत नहीं हैं कि इस समय नये-पुराने अनेक कवियों के महत्वपूर्ण कविता संग्रह प्रकाशित हुए थे। राजेश जोशी का 'एक दिन बोलेंगे पेड़', 'मंगलेश डबराल का 'पहाड़ पर लालटेन', अरूण कमल का 'अपनी केवल धर' और उदय प्रकाश का 'सुनो कारीगर' आदि इन कवियों के पहले कविता संग्रह हैं जिन्हें अपनी ताजगी के कारण सराहा गया है। इनमें किसी प्रकार के मुखर राजनैतिक-सामाजिक संदर्भों के न होने पर भी संश्लिष्ट राजनैतिक-सामाजिक चेतना को पहचाना जा सकता है।य्
गुप्त जी की बात में यह जोड़ना जरूरी लग रहा है कि आठवें दशक के अंत में जिस कवि पीढ़ी का आगमन हुआ उसने अपनी वैचारिक प्रतिब(ता 'के बावजूद' मानव जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों, स्थितियों को कविता का विषय नहीं बनाया अपितु उस पीढ़ी ने अपनी वैचारिक प्रतिब(ता की 'वजह से ही' ऐसा किया। कविता में मानव जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों एवं स्थितियों को लाना उस पीढ़ी की वैचारिक प्रतिब(ता का ही परिणाम था। गुप्त जी ने अरुण, राजेश, मंगलेश, उदय सरीखे जिन कवियों का जिव्रफ किया है, सभी की कविताओं में विषय के तौर पर इन स्थितियों का चित्राण, उनकी वैचारिकता का वाहक है। इन कविताओं से कवियों की प्रतिब(ता का विकास ही दृष्टिगोचर होता है।
;लेखक युवा आलोचक हैंद्ध
६८०, वेस्ट परमानंद ;नियर किंग्सवे कैम्पद्ध, दिल्ली-९
मो. ०९८६८१७५६०१
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