राजीव कुमार सुमन, म.ग.अ.हि.वि.वि., वर्धा
श्वेत पक्ष पर पफोकस
पाखी का राजेन्द्र यादव पर केंद्रित अंक ;सितंबर २०११द्ध पढ़ा। हालांकि 'निंदक नियरे रखिये' में एवं अन्यत्रा लेखों में इनके स्याह पक्ष को भी उकेरा गया है पर कुल मिलाकर चोर दरवाजे से राजेन्द्र जी के श्वेत पक्ष पर ही पफोकस ज्यादा है, खास कर मन्नू जी के संदर्भ में। अपवाद में सुधा अरोड़ा की इन्टरव्यू को छोड़ दिया जाय तो आम पाठकों में ऐसा 'इम्प्रेसन' बनता है कि उसका कारण जानते भी हैं। वे या तो इसे खोलने से डर रहे हैं। या लिहाज कर रहे हैं। वरक्स अपूर्व जोशी कि अभी इसका खोलने का समय नहीं है। ;सही में इन्द्र समान पृ.३२०द्ध
इतना ही नहीं इनकी तुलना कबीर एवं सुकरात से करना बेमानी है। क्या कबीर अपने दैनिक जीवन के ब्लैक स्पाट छिपाते? क्या कबीर अपने दैनिक जीवन वाले कर्तव्य जुलाहा वाला से मुह चुराते? सुकरात तो सच बोलने के कारण विष का प्याला पिये पर ये तो सच नहीं बोलते बकौल दामोदर दत्त दीक्षित। ये एक जिम्मेवार पिता भले ही न बन पाये हो पर इनमें अपनी बेटी के प्रति पिता का लगाव तो है ही जबकि कविता इनमें पिता का रूप देख सकती है। किशन का परिवार इनका सगा है, रहना भी हो रहा है तो बेटी के फ्रलैट में। अपूर्व जोशी का अनुमान है कि हंसाक्षर ट्रस्ट
सौपेंगे भी तो बेटी को। यही इन्हें विरोधाभासों का इन्द्रधनुष बनाता है! एकाध जगह वह पत्नी के प्रति भी दायित्व नहीं मोड़े हैं, इसकी चर्चा होनी चाहिए थी। राजेन्द्र यादव एवं २३ लेखिकाओं में मैत्रोयी ने लिखा है कि उनका डॉक्टर दामाद मैत्रोयी पर बिगड़ते हुये कहता है कि ये आदमी अपनी पत्नी की बीमारी पर हमें, आधी-रात को पफोन कर बुलाने में नहीं हिचकता।'
इस अंक में 'होना सोना... लेख देने की बजाय चूंकि पत्रिाकाओं के पाठक तो इसे पढ़ ही चुके हैं, इसकी जगह २३ लेखिकाओं में से मन्नू जी का आलेख 'डार्करूम में बंद आदमी' साभार उद्धृत करते तो थोड़ा ही सही मन्नू जी का पक्ष भी आम पाठकों के सामने आता। इसके बावजूद साहित्य, पत्राकारिता एवं हाशिये के लोग यथा दलित, गरीब विमर्श के प्रति इनका योगदान है, भले ही स्त्राी विमर्श को ये देह विमर्श तक ले जा इसे भटका देते हों। आशा है कि भविष्य में 'कथादेश' के मन्नू भंडारी पर जो छूट गया उस पर पफोकस करते अगला विशेषांक देंगे।
प्रो. दीपक कु. सिंह, चतरा, झारखंड
साहित्य की सामाजिक भूमिका
पाखी का विशेषांक और अक्टूबर २०११ का अंक देखने को मिला। खरीद कर पढ़े। आपको साधुवाद दिये बिना नहीं रह सका। साहित्य की सामाजिक भूमिका और साहित्य तथा साहित्यकार की भूमिका पर बेबाक विचार-चिंतन शुरू करने के लिए धन्यवाद। पिछले कई वर्षों से या यूं कहें कि
आजादी के बाद से सब क्षेत्राों में जिसमें साहित्य भी सम्मिलित है, आजादी ही आजादी का माहौल बन गया है। साहित्यकार भी अब किसी के गुलाम नहीं रहे- न समाज के, न सत्य के न किसी लक्ष्य के। यह अनिश्चितता का माहौल विज्ञान के प्रिंसिपल ऑपफ अनसरटेनिटी ने निर्मित किया है। अब तो सब जगह अनिश्चितता ही पफैल गयी है। यहाँ तक कि हर चीज के अंत में आ जाने की द्घोषणाएँ की जाने लगी हैं। अंत क्या हमारे कहने या मानने से आयेगा? वह तो अनंत के इरादे पर निर्भर करेगा, लेकिन उसका अभी ऐसा कोई इरादा दिखायी नहीं देता। समय की मांग है कि अनिश्चितता से निश्चितता पर लौटा जाये। निराशा से आशा पर लौटा जाये। अंत से अनंत की ओर चला जाए और यह उत्तरदायित्व यदि साहित्यकार नहीं उठायेंगे तो क्या राजनेता उठायेंगे?
सुखदेव प्रसाद दुबे, भोपाल, म.प्र.
संजीव राजेन्द्र जी के डॉक्टर
पाखी का राजेन्द्र यादव केंद्रित विशेषांक पढ़ गया।
राजेन्द्र यादव के पक्ष और प्रतिपक्ष में आई ढेर सारी बातों ने अंक को जानदार-दमदार बना दिया है। विवादप्रिय और विवादास्पद व्यक्ति पर केंद्रित विशेषांक विवादास्पद न हो, यह कैसे संभव है? विशेषांक महत्वपूर्ण है। बड़े लोगों की तरह राजेन्द्र जी की सभी बातें गोपन-कक्ष से बाहर आ गयी हैं। कुछ टिप्पणियाँ तो अजीबोगरीब हैं। संजीव लिखते हैं, '';राजेन्द्र यादव केद्ध सारे अंग ही पफेल हैं लेकिन मस्तिष्क और जननेन्द्रिय उर्वर हैं।'' लगता है संजीव 'हंस' के कार्यकारी संपादक ही नहीं, राजेन्द्र जी के निजी डॉक्टर भी हैं। तभी बयासी वर्षीय राजेन्द्र यादव के जननेन्द्रिय की उर्वरता के बारे में आधिकारिक तौर पर कह सके हैं।
कृष्ण बिहारी की टिप्पणी विवादास्पद और विध्वंसकारी है- ''इस मामले में जितने भी मुँहचोर रचनाकार हैं, वे छिछोरे हैं ...वे बीवी के सामने कुछ और हैं और रखैलों के सामने कुछ और ...और रखैले हैं कि जैसे कुछ जानती ही नहीं जबकि उनके पेट में दाढ़ी है। सब कुछ जानते हुए उन्हें अपनी कमर सहलवाने ;क्योंकि कमर सहलाने से ज्यादा कुछ उनके आका कर भी नहीं सकतेद्ध और कब्र खुदवाने का मर्ज लगा है...।'' टिप्पणी से ध्वनित होता है कि लेखन-संसार छिछोरे रचनाकारों और कमर सहलवाने वाली रखैलों से भरा पड़ा है। क्या सचमुच ऐसा है? छिनाल-प्रकरण की आग ठण्डी ही हुई थी कि सनसनी-जीवी कृष्ण बिहारी छिछोरे रचनाकारों और कमर सहलाने वाली रखैलों की सनसनी लेकर प्रकट हो गये! भगवान ही मालिक है!
तेजेन्द्र शर्मा का कथन कि नामवर जी आज भी किसी पुस्तक का विमोचन करने उसे बिना पढ़े चल देते हैं ;पुस्तक पहले मिल जाने का ग्रंथ-चुम्बकी तो करते ही होंगेद्ध, उसी तरह विश्वासयोग्य नहीं लगता जैसा कि उनका यह कथन कि राजेन्द्र यादव झूठी तारीपफ नहीं करते।
विनय कुमार, ५८, बाराबंकी, उ.प्र.
अभाव खला
पाखी का राजेन्द्र यादव अंक बेहतरीन बन पड़ा है। विश्वविद्यालयों के प्रोपफेसर्स भी इतना व्यवस्थित, तारतम्य युक्त और संतुलित कार्य नहीं कर पाते जितना आपने कर दिया। पाँच दर्जन से अधिक सुविख्यात, ख्यात और नए नाम जिनसे धैर्यपूर्वक लिखवाकर वाकई कमाल किया है आपने। सुधा अरोड़ा जी का लेख वाकई चौंकाता है। पर अप्रकाशित उपन्यास अंश, कहानी का अभाव खला। वह शायद सामग्री अधिक होने से नहीं जा पाया होगा। मेरी शुभकामनाएँ आप देश के ऐसे संपादकों में शुमार हो गए हो जो बड़े-बड़े विशेषांकों का बु(मित्तापूर्वक संपादन करते हैं। कैसा अच्छा लगता है जब हम देखते हैं कि हिन्दी पट्टी के लोगों से लेकर सुुदूर बैठे लोगों के अलग-अलग अनुभव होते हैं। वह अपने में कुछ-कुछ बात लिए होते हैं। जब उन सबको ;समग्रद्ध संपादित करके क्रमवार जमाकर यह ग्रंथ आपने बनाया तो इसकी नाद की गूंज बरसों बरस सुनाई देगी। इतनी उत्कृष्ट सामग्री जुटाने के लिए आपकी टीम, आपको बहुत-बहुत आभार।
डॉ. संदीप अवस्थी, अजमेर, राजस्थान
रोचक-संग्रहणीय अंक
पाखी हरेक माह सहज रूप से कोटा में उपलब्ध है। राजेन्द्र जी वाला विशेषांक भी पूर्व दो विशेष अंकों की तरह पठनीय, रोचक एवं संग्रहणीय है। कुछ खामियाँ हैं लेकिन मैं इसे ज़िंदगी का लक्षण मानता हूँ। उठाने-गिराने के खेल में आप लोग शामिल नहीं हैं- यही 'पाखी' का व्यक्तित्व है। किसी संपादक को यदि अपना चेहरा पसंद आये तो समझिये पत्रिाका का हाल बहुत अच्छा नहीं है। संपादकीय पृष्ठ के बाद संपादक यदि हरेक पृष्ठ पर दबंगई से नज़र आये तो पत्रिाका का नील गगन धुंधला पड़ने लगता है।
शशिप्रकाश चौधरी, कोटा, राजस्थान
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