१
सवाल जैसे वो कल के लम्हे हँसी-हँसी में गु८ाार देंगे
कभी सुबह की मिली जो आहट तो सारे किस्से उचार देंगे
जुबान वाले ये कह रहे हैं सियासतों की ८ामीन देकर
धुली हुई इस नयी सदी में नसीब अपना संवार देंगे
ह८ाार कोशिश है बारिशों की न भीग पाए तमाम बच्चे
दिलों की दरियादिली में सागर द्घटा की उल्पफत नकार देंगे
हमारे ८ाख़्मों
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से करके वादा वो तोड़ देंगे पुराने टाँके
लहू में देकर वपफ़ा का मरहम हमारी रग में उतार देंगे
हमारे बच्चे जवाब देंगे हवेलियों से हिसाब लेंगे
पफपफोले जिस्मों के पफोड़ देंगे निशान सारे उभार देंगे
२
धूप का ख़्वाब देकर मुझे छल गया
एक सूरज उगा और पिफर ढल गया
वक़्त ने चाह को पाँव इतने दिए
द्घर का रिश्ता भी बाज़ार तक चल गया
आग जब आँधियों के हवाले हुई
देखते-देखते मेरा द्घर जल गया
उनके वादे को सुन खुश हुए तो मगर
एक पल के लिए सैकड़ों पल गया
रात काटी गई जागकर इसलिए
उनके आने का पिफर पफैसला टल गया
३
तनिक अपने दिलों को भी नुमाइश का अमल देना
समझदारी इसी में है समय के साथ चल देनामैं कहता हूं कि सचमुच में इधर कुछ रोशनी कम है
उभरती सूर्य किरणों का ज़रा सा रुख बदल देना
समय के जिन कहारों के बहुत ही थक गए कंधे
उन्हें संभावना का एक नया आकाशतल देना
हमारी बेटियाँ अब रोज द्घर से कम निकलती हैं
जरूरी है कि इस मसले पे थोड़ा सा भी बल देना
मेरा भाई जो रिश्तों से बहुत परहेज़ करता है
बहुत मुश्किल है पहलू में मुहब्बत से दखल देना
४
अपने ही जज़्बात को लेकर बैठ गए
किन मुश्किल हालात को लेकर बैठ गए
चुपके-चुपके हर सपना मर जाता है
हम यूं ही इस बात को लेकर बैठ गए
एक अजब मुश्किल है कुछ-कुछ हम में भी
जब चाहा बरसात को लेकर बैठ गए
दिन ढलते ही लोग यहां सब ऐसे हैं
सहमी-सहमी रात को लेकर बैठ गए
जीने से पहले ही मरने वालों में
तुम वैसे सुकरात को लेकर बैठ गए
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