दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
ग़ज़ल

बल्ली सिंह चीमा

 

जन्म २ सितंबर १९५२
१९७३ को द्विमासिक पत्रिाका 'चर्चा' के सितंबर अंक में पहली कविता प्रकाशित हुई। १९७५ से अपना पूरा समय मडैया बक्सी में ही खेती को देने लगे। तब से किसानी करते हैं। इनकी पहचान गीतकार गजलकार और आंदोलनकारी के रूप में भी।
ग्रा. मडैया बक्थी, पो. सुलतानपुर, जि. उद्यमसिंह नगर
मो. ०९५६८८८१५५५



  बल्ली सिंह चीमा


अगर आँखों में दम हो तो नज़ारे बोल सकते हैं।
कोई गूंगा बता देगा इशारे बोल सकते हैं।

गिनोगे रात भर इनको तो हासिल कुछ नहीं होगा,
मुहब्बत से करो बातें सितारे बोल सकते हैं।

मदद गर चाहते हो तुम असूलों को रखो गिरवी,
मुसीबत आन पड़ने पर सहारे बोल सकते हैं।

अगर मंजिल को

पाना है तो मंझधार में प्यारे,
यहाँ पर बैठकर मत रो, किनारे बोल सकते हैं।


मेरे अजीज मेरे साथ ये भी होना था।
मुझे रुला के, मेरे साथ तुमने रोना था।

मुझे खबर थी खुशी ये भी टिक न पायेगी,
उसे हँसा के मुझे पिफर उदास होना था।

ये वारदात भी मेरे ही साथ होनी थी,
तेरी नज़र में मुझे पिफर खराब होना था।

बिना कसौटी पे परखे ही जिसको छोड़ दिया,
पता चला है कि मिट्टी नहीं वो सोना था।

ये सर्द रात भी 'बल्ली' के साथ रोयी थी,
तेरे पिफ़राक का हर दाग़ दिल से धोना था।


तेरी तलाश में कब से हूँ ऐतबार तो कर।
मेरी हयात तू मेरे से खुल के प्यार तो कर।

मेरी हयात मैं तेरे पे जाँ भी वारूँगा,
मेरे वजूद को अपनों में तू शुमार तो कर।नज़र उठा के गुज़र यार आज गलियों से,
हरेक चोर-नजर को तु शर्मसार तो कर।

तेरे बदन को मैं चूंमूँगा मौसमों की तरह,
मेरी ज़मीन तू थोड़ा सा इंतज़ार तो कर।


ज़ख्म भी वो दे गया है, इस कदर गहरा कि बस।
क्या बताएँ दर्द दिल में आ के यूँ ठहरा कि बस।

मैं भी सस्सी बन गई, जब खो गया पुन्नू मेरा,
मेरे चारों और ही था सुलगता सहरा कि बस।

बोलना, सच बोलना क्या सोचना भी है मना,
हर विरोधी सोच पर ही लग गया पहरा कि बस।

कब तलक लड़ता अकेला, अपनी बेकारी से वो,
जिनसे लड़ना था उन्हीं का बन गया मुहरा कि बस।

कौन सुनता प्यार-नगमें, नपफ़रतों के दौर में,
हाकिमें-दौरां तो बिलकुल हो गया बहरा कि बस।

 
 
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