|
बनारस आने के बाद नामवर के जीवन का एक नया ही अध्याय शुरू हुआ। उनके स्कूल में त्रिालोचन प्रायः आते रहते थे। उस समय वे चौबीस-पच्चीस साल के थे और आपादमस्तक कविता में डूबे हुए। वे उनके स्कूल के करीब ही सेन्ट्रल जेल के पास 'साधना कुटीर' में किराये पर रहते थे। त्रिालोचन से नियमित मुलाकातों का सिलसिला चल पड़ा और इसका गहरा प्रभाव नामवर पर पड़ा। वे गाँव में थे तो ब्रजभाषा में प्रायः श्रृंगारिक कविताएँ लिखा करते थे। अब उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी में लिखना शुरू किया। उनके स्कूल के छात्रा-संद्घ से एक मासिक पत्रिाका निकलती थी -'क्षत्रिाय मित्रा'। सरस्वती प्रसाद सिंह उसके संपादक थे। आगे चलकर शम्भूनाथ सिंह उसके सम्पादक हुए। कुछ समय तक त्रिालोचन ने भी उसका संपादन किया था। कवि नामवर की कविताएँ उसमें छपने लगीं। पहली कविता 'दीवाली' शीर्षक से छपी। दूसरी कविता थी- 'सुमन रो मत, छेड़ गाना!' त्रिालोचन ने पढ़ने की ओर, खासकर आधुनिक साहित्य, उन्हें प्रेरित किया। उनकी ही प्रेरणा से उन्होंने पहली बार दो पुस्तकें खरीदीं। पहली निराला की 'अनामिका' एवं दूसरी इलाचन्द्र जोशी द्वारा अनूदित गोर्की की 'आवारा की डायरी'।
बनारस में सरसौली भवन में सागर सिंह नामक एक साहित्यिक व्यक्ति रहते थे। उनके द्घर पर प्रगतिशील लेखक संद्घ की एक गोष्ठी हुई थी, जिसमें त्रिालोचन कवि नामवर को भी ले गये थे। यहीं पहली बार शिवदान सिंह चौहान और शमशेर बहादुर सिंह से परिचय हुआ। यह बनारस की पहली गोष्ठी थी, जिसमें उन्होंने कविता-पाठ किया। इसमें शिवदान सिंह चौहान ने एक रेडियो-रूपक पढ़ा था और शमशेर ने अपनी दो कविताएँ सुनाने के पहले नरेद्र शर्मा की एक कविता सुनाई थी, जो देवली कैंप जेल में तब कैद थे। नरेन्द्र शर्मा की वह कविता थी -
एक हमारी भी दुनिया,
जो द्घिरी कंटीली तारों से
द्घिरी हुई दीवारों से।
शमशेर की कविता थी- 'लेकर सीधा नारा, कौन पुकारा?'
लेकर सीधा नारा
कौन पुकारा
अंतिम आशाओं की संध्याओं से?
पलकें डूबी ही-सी थीं -
पर अभी नहीं,
कोई सुनता-सा था मुझे
कहीं
पिफर किसने यह सातों सागर के पार
एकाकी उठ मुझे पुकारा
कई बार?
मैं समाज तो नहीं न मैं कुल
जीवन
कण-समूह में हूँ मैं केवल
एक कण
-कौन सहारा!
मेरा कौन सहारा?
उस समय शिवदान सिंह चौहान 'हंस' पत्रिाका के संपादक और प्रगतिशील लेखक संद्घ के राज्य सचिव थे। वे शमशेर के साथ प्रेमचन्द द्वारा स्थापित सरस्वती प्रेस में रहते थे। इस तरह नामवर का धीरे-धीरे बनारस के साहित्यिक लोगों से मिलना-जुलना शुरू हुआ।
कहा जाता है कि बनारस अपने-आप में एक अद्भुत शहर है - तरह-तरह के मन्दिर, गंगा के अनेक द्घाट, पंडे, पुरोहित और पाखंडी, पतली-पतली गलियाँ और सनातन काल से अपने पांडित्य, शास्त्राीयता के लिए प्रसि( लोग! बनारस के विषय में नामवर सिंह कहते हैं कि काशी पंडे-पुरोहित और धार्मिक लोगों की है, किन्तु उसमें कबीर और तुलसीदास की भी उपस्थिति है। उसी काशी में प्रेमचन्द, प्रसाद हुए। इसलिए हमें कभी भूलना नहीं चाहिए कि काशी केवल एक पुरातनपंथी शहर ही नहीं है बल्कि उसके विरोधी लड़ने वाले विचारक भी हुए। उसी काशी में सारनाथ भी है और विश्वनाथ भी है।... काशी में क्वीन्स कॉलेज है जो कभी अंग्रेजियत का गढ़ था और गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज हुआ करता था जिसमें संस्कृत के बड़े-बड़े विद्वान हुआ करते थे, जिसे अंग्रेजों ने बनाया था और वहीं मदनमोहन मालवीय जी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थापित किया। वहीं बाबू शिवप्रसाद गुप्त और आदरणीय नरेन्द्र देव ने काशी विद्यापीठ स्थापित किया। ...उस काशी में आया तो एक ओर नागरी प्रचारिणी सभा और दूसरी ओर प्रगतिशील लेखक संद्घ था। उसी काशी में प्रेमचंद का 'हंस' निकलता था जो तब प्रगतिशील लेखक संद्घ का मुख पत्रा था। उस काशी में जहाँ एक ओर भारत धर्म मण्डल था वहाँ कम्युनिस्ट पार्टी का दफ्रतर भी था। वहीं कांग्रेस का भी दफ्रतर था, वहीं कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का भी दफ्रतर था। तो काशी के कई रूप हैं। एक तरह से कहूँ तो काशी में तरह-तरह के मत-विचार और सह-विश्वास अस्तित्व में रहते थे।
नामवर के व्यक्तित्व के विकास में काशी की परम्परा और परिवेश की अहम् भूमिका है। काशी उनके संस्कार में रचा-बसा है। लेकिन उनके निर्माण में आवाजापुर की साहित्यिक मण्डली के बाद बनारस के हीवेट क्षत्रिाय स्कूल के परिवेश की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी, जहाँ एक-से-एक तपे-तपाये शिक्षक थे। उस स्कूल के प्राचार्य पहले अंग्रेज हुआ करते थे, पहले भारतीय प्राचार्य जगदीश प्रसाद सिंह थे, जिन्हें लोग जे.पी. सिंह कहा करते थे। वे सेंट जोन्स कॉलेज, आगरा के पढ़े थे और अंग्रेजी पढ़ाते थे। उस समय बनारस में लोगों की यह धारणा थी कि बी.एच.यू. के कुलपति राधाकृष्णन सबसे अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं और दूसरे जे.पी. सिंह। उनका अंग्रेजी कविता पढ़ाने का प्रभावशाली ढंग था। नामवर कहते हैं-'वे कविता बहुत अच्छी तरह पढ़ाते थे। 'गोल्डेन ट्रेजरी' पढ़ाई थी। वे इस कदर पढ़ाते थे कि कविता याद तो हो ही जाती थी, यह भी कि कविता को किस तरह पढ़ना चाहिए। रिसाइट कैसे करना चाहिए, एप्रीसिएट कैसे करना चाहिए। समझाना कैसे चाहिए। इतनी अच्छी कविता पढ़ाने वाला आदमी हमें दूसरा नहीं मिला। तो कविता में एक अन्तःप्रवेश और आस्वाद यह हमें जे.पी. सिंह साहब से मिला। मुझे मानते थे। उन दिनों जब आठवीं में था तब एक कविता भी उन्होंने छापी थी पत्रिाका में। खड़ी बोली का सवैया था : 'तान के सोता रहा जल चादर, वायु-सा खींच जगा गया कोई।' मैं जब उसे पढ़ता था तो वे साथ-साथ उसे गाते थे। बड़े सहृदय थे। संगीत के मर्मज्ञ थे। गाते अच्छा थे क्लासिकल। तो एक उनकी छाप पड़ी। उनकी याद्दाश्त अद्भुत थी। जिसका नाम वो एक बार सुन लेते थे, याद रहता था। स्कूल के हजार बारह सौ विद्यार्थी और सबके नाम उन्हें याद थे। किसी को देख लेते तो नाम से बुलाते। एक बार की द्घटना है। कुछ विद्यार्थी छिपकर सिनेमा देखने गये थे और देर से लौटे थे। छह बजे शाम के बाद आये। सर्दियों के दिन थे। धुंधलका हो चुका था। तांगे पर से उतर कर जैसे ही अन्दर द्घुसे कि प्रिंसिपल साहब छड़ी उठाकर सामने थे। टोका। बारहों विद्यार्थियों को खड़ा कर दिया। नये लड़के थे। सबका नाम पूछा और सबको जाने दिया। अगले दिन जिस क्रम से वे खड़े थे उसी क्रम से नोटिस उनको पहुँच गयी और उन्हें उसी क्रम से प्रिंसिपल रूम में बुलाया गया। तो अद्भुत स्मरणशक्ति थी। आवाज गूँजती थी।' हीवेट क्षत्रिाय स्कूल, इण्टर में उदय प्रताप कॉलेज के नाम से जाना जाता था। पहले वहाँ इण्टर तक ही पढ़ाई होती थी। अब तो वह पी.जी. कॉलेज हो गया है। नामवर सिंह ने १९४१ से १९४७ ई. तक वहाँ पढ़ाई की। जे.पी. सिंह के कारण स्कूल में कड़ा अनुशासन था। एक-से-एक शिक्षक थे। सुबह पी.टी. से लेकर शाम तक के हर द्घंटे का हिसाब था। पढ़ने का, खेलने का निर्धारित समय था। साप्ताहिक सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्यक्रम होते थे।
नामवर के व्यक्तित्व के विकास में जे.पी. सिंह की अहम् भूमिका थी। १९६७ ई. में उनका देहान्त हुआ। मृत्योपरांत उनकी महाभारत के पात्राों पर लिखी गई कविताओं का एक संग्रह प्रकाशित हुआ-'धर्मक्षेत्रा'। इस पुस्तक की भूमिका में मोती सिंह ने उनके जीवन और व्यक्तित्व पर विस्तार से लिखा है- ''प्राचार्य जगदीश प्रसाद सिंह एक अद्भुत मेधावी व्यक्ति थे। औसत से थोड़ी कम ऊँचाई, साँवला रंग, तेजस्वी आँखें और उन्नत ललाट। उनकी देह-यष्टि अपने युवाकाल में अत्यंत चुस्त और स्पफूर्तिपूर्ण थी। उनकी शारीरिक विशेषताओं में सबसे अधिक प्रभावोत्पादक उनकी वाणी थी। उनकी आवाज का गरिमामय ठोस और प्रभावी संप्रेषण अद्वितीय था। चाहे आपसी वार्तालाप हो अथवा मंचीय भाषण, उनके स्वर से स्वतः स्पफूर्त आत्म-विश्वास प्रकट होता था।... उनकी चाल भी दूर से ही स्पष्ट रूप से उनका परिचय दे देती थी। कद के छोटे होने के बावजूद सीधा तना हुआ मस्तक, स्पफीत वक्षस्थल और भरे हुए भुजदंड इस बात की गवाही देते थे कि कभी बचपन में कुश्ती और व्यायाम का उन्होंने अभ्यास किया था। सभी प्रकार के खेलकूद का उन्हें सामान्य से अच्छा अभ्यास था।'' प्रस्तुत है उनकी 'अश्वत्थामा' नामक कविता का एक अंश -
कैसी भयंकर है रात्रिा यह!
आँधी है मन में, जब शान्ति शून्य वन में
चाँद है गगन में, चाँदनी लुप्त द्घोर द्घन में,
सूझता नहीं है पथ, निश्चित नहीं है ध्येय,
क्या करूँ? कैसे करूँ पूरा संकल्प प्रतिशोध का?
निद्रामग्न है सारी वसुन्धरा
खगकुल, मृगदल, पल्लवपात,
शान्त है स्वप्न की स्नेह भरी छाया में,
विकल हूँ एकाकी मैं, नींद नहीं, चैन नहीं
दुर्गम है मार्ग उस कठोर प्रण-पूर्ति का।
सुयोधन मरणासन्न है।
लाभ क्या होगा उसे शत्राुनाश से ?
शत्राुता-मित्राता जीवन की संगिनी हैं
विलीन होती है मृत्यु के साथ ही ये
पिफर अर्थ क्या यु( का, प्रतिशोध का।
उस स्कूल में प्राचार्य जे.पी. सिंह के बाद एक वरिष्ठ शिक्षक थे- मार्कण्डेय सिंह। प्रेमचन्द, प्रसाद और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जब जीवित थे, उनके साथ उनका उठना-बैठना ाा। प्रेमचन्द को वे अपने स्कूल में आयोजित एक कहानी-प्रतियोगिता में छात्राों को पुरस्कार देने के लिए बुला चुके थे। वे नामवर को इन तीनों दिवंगत साहित्यकारों के बारे में बहुत सारी बातें बताते रहते थे। वे कभी-कभार कविताएँ भी लिखते थे, किन्तु मुख्य रूप से आलोचना के प्रति रुझान थी। नामवर के मन में उनकी गहरी छाप है। 'वे भाषा की स्पष्टता के इतने कायल थे कि कहीं भी यदि उनको वागाडंबर या वाग्जाल दिखाई पड़े तो वे उसे बर्दाश्त नहीं कर सकते थे और ये ही हम लोगों को शिक्षा दिया करते थे। दो बातें उन्होंने मुझे बतलाइर् जो मेरे दिमाग में अब तक टिकी हुई है। एक द्घटना नन्ददुलारे वाजपेयी के बारे में बतायी। वाजपेयी जी का लेखकों में सम्मान था। साहित्यरत्न की परीक्षा का प्रश्नपत्रा वाजपेयी जी ने बनाया था। वे उसके मॉडरेटर थे। वाजपेयी जी ने बहुत लम्बे-लम्बे सवाल पूछे थे। समझ ही में नहीं आता था कि क्या पूछना चाहते हैं तो उन्होंने काट के एक-एक वाक्य को सरल बना दिया। पढ़ाते हुए कहते थे कि वाजपेयी के लेखन में ये चीज पायी जाती है कि सीधी-सी-बात को बहुत द्घटाटोप बनाकर कहते हैं। उसी समय इण्टरमीडिएट की एक पुस्तक थी। लेखक कानपुर के कोई भूदेव शर्मा थे। वे उसे पढ़ाते। उसकी धज्जियाँ उड़ाते। पाठ्य-पुस्तक को पढ़ाते समय ऐसा करते थे। इसलिए पढ़ाते हुए जो पहला संस्कार ;उनकाद्ध हमारे मन पर पड़ा वह था विचारों की स्पष्टता, भाषा की स्पष्टता, वागाडंबर से बचना और चूँकि प्रेमचन्द के, शुक्ल जी के प्रशंसक थे इसलिए वाजपेयी के विरु( वो रामचन्द्र शुक्ल की भाषा को पसंद करते थे, प्रेमचन्द की भाषा को आदर्श मानते थे। कठिन से कठिन, जटिल से जटिल को सुलझा करके कहने की अद्भुत क्षमता थी उनमें। बहुत बाद में जब मैं एम.ए. कर चुका था। गुरुदेव द्विवेदी जब काशी आये, तब तक क्षत्रिाय स्कूल, डिग्री कॉलेज हो गया था तो ऐसा संयोग हुआ कि वे पी-एच.डी. नहीं थे, लेकिन होड़-सी लगी। उन्हें पी-एच.डी. करनी है। तो मार्कण्डेय सिंह जी मुझसे बोले कि द्विवेदी जी आये हैं, भाई तुम्हें मानते भी हैं तो मैं चाहता हूँ कि उनके अधीन मैं पी-एच.डी. करूँ। और विषय चुन लिया है। मैं
रीतिकाल पर काम करूँगा। यद्यपि रीतिकाल उनका विषय नहीं था। मुझे कहा कि द्विवेदीजी से मिला दो। मैं ले के गया।
बातचीत कराने। आते समय वे बोले कि इरादा हमने बदल दिया है। हैं, विद्वान हैं, सब है लेकिन साहित्य के बारे में उनकी समझ जमी नहीं। इससे अंदाज लगा सकते हैं कि वे बड़े दृढ़ विश्वासों और गहरी मान्यताओं वाले व्यक्ति थे। संयोग से विचारों में वे प्रगतिशील थे। काशी प्रगतिशील लेखक संद्घ के वे नन्द दुलारे वाजपेयी के बाद अध्यक्ष भी बने थे।'
मार्कण्डेय सिंह का जन्म १९०६ ई० में हुआ था और वे आजमगढ़ के पास भावपुर गाँव के निवासी थे। नामवर के हिन्दी के प्रथम गुरु मार्कण्डेय सिंह ने आगरा विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर एम.ए. किया था। उदय प्रताप कॉलेज के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रामसुधार सिंह बताते हैं कि वे पारसरूप अध्यापक थे। जिसे छू दिया वह सोना हो गया और उनकी अध्यापन शैली ही नहीं कार्य-शैली भी आज अचरज पैदा करती है। हिन्दी लेखकों की एक पूरी पीढ़ी निर्मित करने का श्रेय उन्हीं को है। आज वे एक किंवदन्ती बन गए हैं। हस्तलिखित पत्रिाका निकलवाना, कविता-कहानी आदि की प्रतियोगिताएँ कराना, मेद्घावी छात्राों को साहित्यकारों के पास ले जाकर उनसे साहित्य के गुरुमंत्रा दिलाना आदि-आदि न जाने कितने सूत्रा थे उनके पास! प्रेमचन्द, रामचन्द्र शुक्ल, प्रसाद, निराला, अज्ञेय और न जाने कितने साहित्यकारों को उदय प्रताप कालेज में बुलाकर काव्यपाठ या भाषण करवाया है और इस तरह तराशते हुए एक ऐसी पीढ़ी तैयार की जो अनेक क्षेत्राों में शीर्ष पर पहुँच गई। मार्कण्डेय सिंह दूसरों को गढ़ने में इतने लीन थे कि स्वयं को गढ़ना ही भूल गए। समकालीन साहित्य पर अच्छी समझ रखते हुए भी स्वयं कभी जमकर नहीं लिखा। पर जो भी लिखा, अच्छा लिखा। चन्द्रबली सिंह बताते हैं कि उनका विश्वास था कि उनका ही छात्रा अच्छी हिन्दी लिख सकता है।
जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है, मार्कण्डेय सिंह प्रगतिशील विचारधारा के थे। उन्होंने 'प्रगतिवाद' पर एक लेख लिखा है, जिसका एक प्रारम्भिक अंश यहाँ दिया जा रहा है, जिससे उनके समर्थ गद्य की एक झलक दिखाई देती है -
आज से कुछ ही वर्ष पहले हिन्दी की पत्रा-पत्रिाकाओं तथा साहित्यिक गोष्ठियों और सभाओं में छायावाद की धूम थी। नूतन शैली! नवीन दृष्टिकोण! सर्वत्रा इसी की चर्चा थी। पुराने साहित्यिकों ने इसे पश्चिम की भद्दी नकल बतलाया, नवयुवकों ने इसमें नवयुग की आकांक्षाओं और आदर्शों का आभास पाया। तिरस्कार और सत्कार के भिन्न तरंगाद्घातों पर चढ़कर छायावाद निरवधिकाल की विराट् योजना में अपना कर्तव्य पूरा करने लगा। यह विलियम बटलर यीट्स और टैगोर की रहस्यवादिता, क्रोंचे की अभिव्यंजना और ायड का मनोविश्लेषण समेट कर राष्ट्रीयता और विश्व-बन्धुत्व के नये आलोक में, निराली सजधज से, प्रेम और सौन्दर्य का कल्पना-लोक बसाने लगा। किन्तु गतिमान समय की प्रगतिशील व्यवस्था में उसकी उपादेयता अधिक दिनों तक टिक न सकी। छायावाद अपना काम पूरा कर चुका था, अतः उसे स्थान छोड़ना पड़ा।
भारत में जीवन-रक्षा का प्रश्न निरन्तर जटिल होता जा रहा था। यूरोप की जिस आर्थिक विषमता और अशान्ति की परिस्थिति के पफलस्वरूप मार्क्स की समाजवादी विचारधारा चली और रूस में उसको कार्य रूप में सपफलता मिलने लगी वही विषम स्थिति भारत में भी उत्पन्न हो गई, जिससे भारतीय जीवन में समाजवादी विचारों को प्रश्रय मिलने लगा। तत्काल ही यह विचार-लहरी हमारे साहित्य में भी पहुँची। साहित्य कविचारक-समुदाय परम्परागत सि(ान्तों और व्यवस्थाओं की वैज्ञानिक परीक्षा करने लगा। ईश्वर, धर्म और न्याय बु(ि की कसौटी पर कसे गये और तर्क की खराद पर चढ़ाये गये। इससे अनेक अन्धविश्वासों और मान्यताओं के कल्पित महत्त्व का गढ़ टूटने लगा। इस प्रकार जीवन और साहित्य में पुरातन और नूतन का संद्घर्ष उग्र रूप से चल पड़ा। पूँजीवादी पुरातन और समाजवादी नूतन के इस संद्घर्ष में नूतन की ओर जाने को हिन्दी साहित्य में एक प्रगति माना गया, और आज से करीब दस वर्ष पहले कुछ सम्बु( साहित्यकारों ने 'प्रगतिवाद' का श्रीगणेष किया। निस्सन्देह सहस्राधिक वर्षों को साहसपूर्वक अपनाने का उपक्रम एक महान प्रगति है।
आधुनिक काल में भारतीय जीवन पर कार्ल मार्क्स और महात्मा गाँधी की विचारधाराओं का प्रभाव पड़ रहा है। अतएव इन्हें समझ लेना आवश्यक है। मार्क्स का कथन है : जीवन के ऐतिहासिक विकास का आधार भौतिक है, इसमें संद्घर्ष और श्रेणी-यु( अनिवार्य हैं। मूल्य का नियम पूर्णतया श्रम पर आधारित न होने से तथा अतिरिक्त मूल्य के सि(ान्त के कारण धन का असम वितरण होता रहेगा, इससे पूँजीपतियों की पूँजी-वृ(ि की अतृप्त वासना और श्रमिकों की दुर्दशा उत्त्रोत्तर बढ़ती जायगी। पफल-स्वरूप एक ओर पूँजीपतियों की संख्या में कमी किन्तु पूँजी में वृ(ि होगी और दूसरी ओर शोषितों की संख्या में वृ(ि किन्तु आर्थिक स्थिति नितान्त शोचनीय और असह्य हो जायगी। ऐसी विषम और भयावह स्थिति में क्रान्ति होगी, जिससे समाजवाद की पूर्ण प्रतिष्ठा होगी।
संस्कृत साहित्य के प्रति लगाव पैदा करने वाले उनके शिक्षक थे पण्डित विजयशंकर मिश्र। नामवर सिंह कहते हैं-'मेरी नींव मजबूत करने वालों में मार्कण्डेय सिंह और पं. विजय शंकर मिश्र और अंग्रेजी में गहरी रुचि पैदा करने वाले हमारे प्रिंसिपल जे.पी. सिंह...। लेकिन और अध्यापक भी थे जिन्होंने सिखाया कि अंग्रेजी भाषा शु( व्याकरण की दृष्टि से सही लिखी जाए-बामुहावरा लिखी जाय, वह हमारे अध्यापक थे-तारा प्रताप सिंह। वे बड़े शुष्क आदमी थे, साहित्य में उनकी रुचि नहीं थी। साहित्य की रुचि तो जे.पी. सिंह में थी लेकिन तारा प्रताप सिंह आजकल के जमाने के मुहावरे में ई.एल.टी. ;इंगलिश लैंग्वेज टीचिंगद्ध वाले थे। करेक्ट इंगलिश, उसकी शिक्षा उन्होंने दी।' इतिहास के शिक्षक थे हीरालाल सिंह, जिन्होंने उन्हें बताया कि अच्छी अंग्रेजी इतिहास की किताबें पढ़ने से बनेगी और उ(रण कैसे देना चाहिए यह राजनीतिशास्त्रा की किताबें पढ़ने से जाना जा सकता है।
स्कूल के लाइब्रेरियन थे जंगी सिंह, जो स्पोर्ट्स के भी मास्टर थे। उनका असली नाम जंग बहादुर सिंह था, लेकिन छात्रा उन्हें 'जंगी लाट' कहा करते थे। उनकी पुस्तकों में कोई रुचि नहीं थे। वे पुस्तकें किसी छात्रा को नहीं देते थे। एक बार नामवर उनके पास गये और कहा कि सर इतनी अच्छी-अच्छी किताबें अलमारी में रखी हैं, किन्तु कैद हैं। वे बोले कि 'ये पांडे का अचार है।' तो पूछा कि ये पांडे का अचार क्या है? बोले कि पांडे जी के यहाँ एक मेहमान आये, खाने बैठे तो पांडेजी ने कहा कि भाई अचार लाना। जैसे ही अचार मटकी में रखकर आया तो मटकी खोलकर बोले कि ये तेरह साल पुराना अचार है। जब मेहमान ने कहा कि खाने को जरा दीजिए, देखें तो कैसा है? पांडेजी ने ज्यों-का-त्यों मटकी को तुरंत बन्द करके अन्दर भिजवा दिया और बोले कि इसी तरह खिलाया होता तो तेरह साल अचार रहता!' जंगी लाट ने पांडे-प्रकरण सुनाकर कहा कि लाइब्रेरी इतनी अच्छी है, ऐसे ही किताबें छात्राों को दी होती तो इस लाइब्रेरी में किताबें बचतीं? दूर से देखो-शीशे में बन्द हैं, चुपचाप देखकर चले जाओ और अपने मास्टर साहब से कहना कि उनकी दिलचस्पी होगी और ले जाना चाहेंगे तो ले जाएँगे। तुम लोगों के लिए किताबें नहीं हैं बन्दरों के लिए। लेकिन धीरे-धीरे जंगी लाट नामवर को किताबें देने लगे। वे नियमित स्कूल लाइब्रेरी जाते और उनका यह शौक लगातार बढ़ता ही गया।
स्कूल में शैक्षणिक वातावरण के साथ-साथ साहित्यिक वातावरण भी बहुत अच्छा था। शनिवार को दोपहर के बाद पढ़ाई नहीं होती थी। तीन बजे सभी छात्राों को खेल के सवैया छंद में लिखी कविताओं का सस्वर पाठ कराते। उन्होंने तालाब पर आठ सवैया के छंदों में एक कविता लिखी थी, जिसे प्रिंसिपल जे.पी. सिंह सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रायः सुनाने को कहते। १९४२ ई. से नामवर की कविताओं में परिष्कार होना शुरू हुआ। वे प्रायः प्रकृति पर ही कविताएँ लिखा करते। अब ब्रजभाषा में लिखना छूट चुका था। जो भी लिखते खड़ी बोली में लिखते। अपना उपनाम 'पुनीत' वे पहले ही छोड़ चुके थे। उनके साहिित्यक विकास में सबसे बड़ी भूमिका त्रिालोचन की थी। त्रिालोचन उस वक्त भी चलते-पिफरते विश्वकोश ही थे। नामवर बताते हैं : 'त्रिालोचन जी से परिचय के बाद ही मैं खड़ी बोली में कविता लिखने लगा। कवि-सम्मेलनों में आना-जाना शुरू हो गया। शम्भूनाथ सिंह प्रेमगीत लिखा करते थे। उनके गीतों का प्रभाव मुझपर भी पड़ा। मैं प्रकृति पर लिखने लगा। बनारस में रहते अपना गाँव और सुन्दर लगने लगा। चित्रा पर बने दृश्य कागज पर उतरने लगे। उन दिनों कविता सुनने-सुनाने का खूब रिवाज था। मैं कविता गाकर सुनाता था। मेरे प्रिंसिपल मेरे स्वर में स्वर मिलाते। प्रकृति बहुत सुन्दर लगने लगी। उसमें माँ, बहन, प्रेयसी कई चेहरे उभरते।'
यशवंत नगर, मार्खम कॉलेज के निकट
हजारीबाग-८२५३०१, झारखण्ड
मो. ०९८३५३१२६६५
|