दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कहानी

अकासी

 

वासुदेव

जन्म : १६ मार्च १९५२

पहली कहानी 'ज्योत्स्ना' के जुलाई १९८१ अंक में छपी। तीन कहानी संग्रह और दो उपन्यास प्रकाशित। 'महापाश' और 'र्ध्मोनास्ति' कहानी का नाट्य रूपान्तर जिसका दूरदर्शन पर प्रसारण।
संप्रतिः मुख्य महाप्रबंधक, दूरसंचार, झारखंड परिमंडल, रांची में सहायक निदेशक ;राजभाषाद्ध। विभागीय पत्रिाका 'झारखंड संचार' का नियमित संपादन।
र्ध्मशीला कुटीर, ग्राम अरसण्डे, पो. बोड़ेया, जि. रांची, झारखंड
मो.: ९४३०३०३०९४

  वासुदेव
एक गाँव, छोटा-सा। गाँव के मध्य में देव स्थान! एक ओर ब्रह्म बाबा, दूसरी ओर काली माई। दोनों के बीच में एक बड़ा-सा चबूतरा। उसी चबूतरे पर बैठकर गाँव के लोग भजन-कीर्तन करते हैं, साधू-संत और महात्मा का सत-संग करते हैं, उनका प्रवचन सुनते हैं और पंचायतादि करते हैं। ...कुछ साल पहले तक हरिजनों और मुसलमानों के लिए वह स्थान वर्जित था। वे लोग न तो उस पर बैठ सकते थे और न ही वहाँ हो रहे कार्यक्रम में शरीक हो सकते थे। पर वर्षों बाद हुए पंचायत चुनाव के बाद से गाँव के हवा-पानी में थोड़ी तब्दीली आ गयी है। अब हरिजन विरादरी के लोग भी सार्वजनिक काम के लिए चबूतरे का उपयोग करने लगे हैं।यही कारण है कि विगत कुछ दिनों से उस चबूतरे पर संत महाराज रविदास जी का प्रवचन चल रहा है। वह बनारस से आये हैं। कबीर-पंथी हैं। बाल ब्रह्मचारी, लंगोटधारी। संत-साहित्यऔर भक्ति-परंपरा के अच्छे ज्ञाता है और व्याख्याता भी। तभी तो उनकाप्रवचन सुनने के लिए गाँव की प्रायः

हर परंपरा और विचारधारा के लोग वहाँ आये हुए हैं जिनमें कुछ उदारवादी मुसलमान भी हैं। ...संत जी महाराज, व्यास जी, ढोलकिया, हारमोनिया और झाल-करतालवाले- ये सब चबूतरे पर
विराजमान हैं, जबकि श्रोतागण नीचे दरी पर। ...प्रवचन करते-करते संत जी बीच-बीच में भजन-कीर्तन भी करने लगे हैं। कभी-चइता, कभी बारहमासा, तो कभी कजरी। अलग-अलग पद-चौपाई, अलग-अलग राग। लोगों के आकर्षण का एक कारण यह भी है।... मलमास माह का आखिरी दिन है। इसलिए एक द्घंटा पहले ही प्रवचन शुरू हो गया है, ''...जाति-प्रथा हम मनुष्यों की देन है। ईश्वर ने इसे नहीं बनाया है। बल्कि अपनी सुविधा के लिए हम मनुष्यों ने इसे बनाया है। ईश्वर की नज़र में तो सब समान हैं, 'मानुष की जाति सबै एक ही जान बौ!'' और यह भी सच है कि मनुष्य जो कुछ भी बनाता है, अपनी सुविधा के लिए बनाता है। उस निर्माण में उसका स्वार्थ निहित रहता है। ...वर्ण-व्यवस्था के मूल में यही भावना काम कर रही थी। ...पर इससे चिंतित नहीं होना चाहिए कि हम अछूत हैं, अस्पृश्य हैं, शूद्र हैं अथवा हरिजन हैं। क्योंकि मनुष्य वर्ण से नहीं अपितु कर्म से महान होता है। ...महर्षि वशिष्ठ की माता उर्वशी शूद्र थीं। बाल्मीकि आँषि भी शूद्र थे। महाराज दशरथ की दूसरी पत्नी सुमित्राा शूद्र ही थीं। यहाँ तक कि भीष्म-पितामह शूद्र सत्यवती के ही पुत्रा थे। किंतु ये सारे लोग अपने-अपने कर्म के बल पर ही महान्‌ बने थे। इसलिए हमें कर्म पर ही ध्यान देना चाहिए न कि जाति या वर्ण पर! क्योंकि कर्म ही मनुष्य को महान बनाता है। तुलसी दास ने लिखा भी है, ''कर्म प्रधान विस्व करि राखा...।'' संत जी महाराज चुप हो गये और व्यास जी उसी चौपाई को गाने लगे, ''कर्म प्रधान...।''
किंतु उस समय पोसनपासी के द्घर का आलम कुछ अलग था। यानी रोज की तरह ही द्घर के लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे। वहाँ से तो कोई प्रवचन सुनने भी नहीं आया था। जब अकासी ने पूछा, ''माँ! आज परवचन सुनने क्यों नहीं गयी...?''
''क्या जाती परवचन सुनने?'' माँ ने जवाब दिया, ''परवचन सुनने से पेट तो नहीं भरता न?''
''लेकिन सब लोग तो गये हैं। क्या सबके पेट...?''
''सब के पेट भरे होंगे, बेटी। तभी न सुनने में मन रमता होगा। पर अपना पेट तो खाली है! मन तो रमेगा नहीं। पिफर जाने से क्या लाभ...?''
माँ के कथन में छिपे व्यंग्यार्थ एवं उसकी सच्चाई को अकासी अच्छी तरह समझ रही थी। वह उसकी मनोव्यथा को भी बूझ रही थी। पर वह करती भी तो क्या? चुपचाप वहाँ से हट गयी।
''दीदी... दीदी! देखो न, इस दोहे का अर्थ कितना ऊटपटांग है! मास्टर जी ने बताया है। सुनोगी...?'' ढिबरी की कांपती रोशनी में भाषा की किताब पढ़ते-पढ़ते रुक गया था लगना, पिफर पूछा था। यद्यपि अकासी कोई खास पढ़ी-लिखी नहीं थी। पर पढ़ाई के समय भाई-बहन के साथ उठते-बैठते, सुनते-गुनते उसने भी अक्षर-ज्ञान अरज लिया था। धीरे-धीरे उसे हिन्दी वर्णमाला और ककहरा अथवा बारहखड़ी का भी बोध हो गया था। अब वह रुक-रुककर अपने छोटे भाई की किताब भी बांच लेती थी जो तीसरी कक्षा में था।
वह भाई की बगल में जमीन पर बिछे बोरे पर बैठ गयी। उसके बैठने से ढिबरी के लौ का काँपना थम गया था। शायद उधर से हवा आ रही थी और अकासी ने अनजाने में उसे छेक िदया था। उसने बैठते ही पूछ दिया, ''हाँ, मास्टर जी ने क्या अर्थ लगाया है, बताओ तो।''
''कनक-कनक हौं सौ गुनों, मादकता अधिकाइ।
यह खाएं बौराइ नर, वह पाएं बौराइ॥''
''यहाँ कनक का दो अर्थ है धतूरा और सोना। दोनों ही आदमी के लिए नुकसानदेय है। एक के खाने से आदमी बौरा जाता है, तो दूसरे को पाने से...।''
अकासी ध्यान से सुन रही थी और एक-एक शब्द के अर्थ को गुन रही थी। ...धतूरा के पफल के बीज को खाने से आदमी मातता है...! वह बुदबुदायी, ''माँ भी तो ऐसा ही कहती थी...!'' तभी माँ बोल पड़ी, ''देवी माई की लीला। तुम्हारे बाप की गद्दी में दरोगी पंडित ने अपने भाई को ही धतूरा मिली ताड़ी पिला दी थी।
''पिफर क्या हुआ माँ?'' अकासी ने आश्चर्य से पूछा। ''वही हुआ जो होना था। ...भाई मात गया। पिफर तो वह उसे नाव में लादकर बीच चौर में ले गया और वहीं उसे डूबाह पानी में पफेंक दिया। ...बिहान हो के गाँव में हल्ला उठा दिया कि उसका भाई रात में चौर में चिड़िया का शिकार करने गया था, वहीं डूबकर मर गया...।''
''लेकिन उसने ऐसा क्यों किया, माँ?'' अकासी परेशान थी।
''उसका राज-पाट हड़पने के लिए और क्यों? माँ ने आगे बताया,'' छोटका को कोई बाल-बच्चा नहीं था जबकि बड़का को पाँच-पाँच बच्चे थे-एक बेटा और चार-चार बेटियां! छोटका मर गया तो उसके हिस्से की जगह-जमीन इसी की हो गयी न...।''
''और उसकी मेहरारू?''
''मेहरारू... हूँ!'' माँ व्यंग्य मिश्रित चिंता से बोली, ''भाभी थी। पर उसने एक रात उसी के साथ जोर-जबरदस्ती करने की कोशिश की।... वह रोयी-धोयी, चीखी-चिल्लाई। पर वहाँ कौन था कि उसकी मदद करता?... उसी रात से वह पागल हो गयी। जैसे बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा हो। वह उसे ले जाकर झारखण्ड के काँके में भरती करा दिया। पता और नाम-दोनों गलत थे। ...बहुत दिनों तक वह उसे देखने भी नहीं गया और बाद में हल्ला उड़ा दिया कि वह वहीं मर गयी!... तब से वह पूरी जायदाद पर अजगर की तरह केंडुली मारे बैठा है।''
माँ की बातें लगना की समझ में आ रही थीं कि नहीं, नहीं कहा जा सकता। पर उसने आगे दूसरा ही सवाल पूछ दिया, ''दीदी, क्या तुमने धतूरा देखा है?'' हाँ, देखा तो है! तुमको भी दिखाऊँगी। उसने थोड़ा रुककर आगे कहा, ''इसके अर्थ को कॉपी में लिख लो। तब तक मैं आती हूँ। पढ़ लेने के बाद तुम लोग खाकर सो जाना। मैं आकर खाऊँगी।'' वह तेजी से बाहर निकल गयी। बच्चों ने एक बार सिर उठाकर एक-दूसरे की ओर देखा। सबके सब हौले से मुस्कराए, पिफर पढ़ाई में खो गये। हाँ माँ जरूर चूल्हे के पास से उठकर बाहर तक गयी और अंधेरे में विलीन होती बेटी को देर तक ताकती रही, पिफर बुदबुदायी, ''इस द्घर का तू ही तो पालनहार हो बेटी! तुम पर देवी माई की दया रहे...!!'' वह चिंतित-मन लौट आयी।
गाँव का नाम खरीका। खरीका गाँव का हरिजन टोला। हरिजन टोला में पोसन पासी का द्घर। पर द्घर कहाँ, बल्कि एक झोपड़ी। पर नहीं। एक झोपड़ी भी नहीं। झोपड़ी में भी तो कुछ दम-खम होता है। द्घर जैसी कोई चीज होती है। पर यहाँ तो सब कुछ एकदम से खलास है। चूल्हा तो रात-दिन उदास रहता ही है, मूच भी दंड पेलता रहता है। ...जबसे पोसन मरा है, द्घर की लक्ष्मी ही बिला गयी है। ...पोसन
पासवान जिसे लोग पोसन पासी ही कहते थे-बड़ा अच्छा गछवाहा था। सुबह-शाम बीस से पच्चीस ताड़ चढ़ आता था और दस से पंद्रह खजूर। द्घनश्याम महतो की गाछौ में ताड़ी की दुकान थी यानी गद्दी। खजूर के पल्लों और बाँस की करची से बनी हुई। पत्नी दिन-भर वहीं बैठी ताड़ी बेचती रहती थी। दो रुपये गिलास, दस रुपये टकही, सौ रुपये लवनी, दो सौ रुपये द्घड़ा...। साथ में पफूला हुआ चना, हरामिर्चा और नमकीन चीखना भी। गद्दी ठीक-ठाक ही चलती थी। दोनों टैम चूल्हा गरम हो जाता था, सब के तन ढंकने के लिए कपड़े-लत्ते पूर जाते थे और बर-बीमारी में दवा-बिरो लायक पैसे भी बच जाते थे और बस-कुछ नकद हाथ पर भी। ... पर न जाने उस हँसते खेलते परिवार को किस भूतनी की काली नज़र लग गयी। सब के जीने का सहारा ही छिन गया!!
पूरबा नक्षत्रा! सप्ताह दिनों की झपसी!! रात-दिन
बारिश-कभी हल्की-पफुल्की तो कभी तेज। कभी झमा-झम तो कभी झीसी-ही। आँधी-तूपफान अलग। पर ताड़ी तो उतारनी ही थी। रात-दिन लवनी से उपट-उपटकर ताड़ी नीचे गिर रही थी-पफलहा-बलहा दोनों से। गद्दी में ताड़ी भी नहीं थी और पिवैया की मांग अलग। पिफर भी उस झपसी में पोसन गाछ चढ़ने को तैयार नहीं था। पर जब मालिक का दबाव बढ़ गया था, तो उसे उस तूपफान में भी ताड़ी उतारने को बाध्य होना पड़ा था। हालांकि पत्नी मना करती रही थी। पर वह क्यों कर उसकी सुनता? उस पर तो अच्छा गछवाहा होने का जुनून जो सवार था। ताड़ के पेड़ सूखे भी नहीं थे। बस, थोड़ा-बूंद छेक' हुआ था और वह निकल पड़ा था बगान को। ...ढेर सारे पेड़। एक... दो-तीन-चार! लालच बढ़ता ही गया था। पाँव... छह सात वां पेड़। मोटा भी, ऊँचा भी। कमर से लटक रही भरी हुई लवनी! भीगा हुआ पेड़... भीगी हुई देह! हवा अलग तेज! ऊपर से कंपकंपी!! वह पेड़ की पफुनगी से उतरकर धड़ को बाँहों में लेना ही चाहा था कि दोनों हाथ पिफसल गये थे और वह धड़ाम से जमीन पर आ गिरा था। पफूटी लवनी के ऊपर पीठ, हसुली के ऊपर कमर, चूतड़ में चूभी हुई हसूली, लवनी के' खिमटों से बिंछी हुई कमर! अनगिनत जख्म। वह बेहोश हो गया था। उस आँधी-तूपफानवाली बरसात में कौन उसकी सुध लेता? वह देर तक बेहोश ही पड़ा रहा था। तब तक देह का अधिकांश खून बाहर निकल आया था। 'अहर-पहर' ताककर पत्नी जब ढूंढ़ने को निकली थी, तो तब तक वह लाश बन गया था। दुःख का सागर... आँसुओं का सैलाब! बह गयी थी बेचारी!!! लुट गयी थी सब की सुख-शांति। छिन गये थे सबके मुँह के निवाले। ...कुछ दिनों तक भर पेट, पिफर आधा पेट, उसके बाद चौथाई और पिफर धीरे-धीरे कभी एक शाम नागा तो कभी दो-दो शाम! थोड़े ही दिनों में जा पहुँचे थे सब भुखमरी के कगार पर। रोगी एवं जर्जर मुसमात! अकेली क्या करती? मालिक ने तो पहले ही हाथ झाड़ लिया था। ...बेटा लगना बारह साल, मंगरा नौ और छोटी बेटी रुकमा छह साल। द्घर का सारा दारोमदार बड़ी बेटी अकासी के सुकुमार कंधों पर आ सिमटा था जो अभी सोलह भी नहीं छू पायी थी। गाँव में कभी काम मिलता था तो कभी नहीं। मजदूरी भी शहर से कम। शहर भी पाँच कोस दूर। आते-जाते दस कोस। पैदल आने-जाने में ही आधा दिन निकल जाता है। पिफर काम! गाड़ी भाड़ा भी आते-जाते बीस रुपया। और शहर में भी काम जिस दिन नहीं मिला, उस दिन द्घर से बीस रुपये का दण्ड अलग। और शहर में काम मिलता कहाँ है? सब ठेकेदार भरोसे। और ठेकेदार की तो अपनी-अपनी रेजाएँ होती हैं-मनमापिफक सब कुछ करने वाली। वह नयी को काम क्यों देगा? देगा भी तो रोज-रोज थोड़े देगा? पर यहाँ तो पेट की आग बुझाने के लिए रोज दिन दाना-पानी चाहिए...!'' तबे में मक्के की रोटी जल रही थी। जब उसकी तीखी गंध से उसकी तन्द्रा टूटी, तो वह एकदम से द्घबरा उठी। झटपट तबे से रोटी निकाली, उसे कई बार देखा, कठोती में रखी, कुछ देर माथे पर हाथ देकर चुपचाप बैठी रही, पिफर पफलप कर बच्चों से बोली, ''जाओ सब, खा लो...।''
''थोड़ा और पढ़ लेने दो, माँ। तब तक दीदी भी...।'' लगना था। बिना माँ की ओर देखे ही बोला था।
''अब क्या पढ़ोगे... खाक? यहाँ तो करम ही जला है!'' उसने आगे कहा, ''देवी माई जाने, तुम सबकी पढ़ाई-लिखाई कब को छूट जाए...।''
''पढ़ाई तो छोड़ानी ही पड़ेगी सुकनी। भूखे पेट तो पढ़ाई-लिखाई होगी नहीं और पेट भरने के लिए द्घर में कुछ है नहीं। अब तू ही बता, स्कूल की सड़ी-गली खिचड़ी और पानी-भात पर कब तक पढ़ाई चल सकेगी...?''
दरोगी पांड़े था। वैसे तो उसका नाम धनसुख पांडेय था। पर प्रोन्नति पाते-पाते सिपाही से छोटे दारोगा की कुर्सी पर जा पहुँचा था और तब से लोग उसे दरोगी पांडे ही कहने लगे थे। वह हवा का रुख देखकर पैसा कमाने वाला दारोगा था। और इसलिए कापफी कुख्यात, बदनाम और दागी था। हर तरह के दुर्गुणों से लैस। भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबा हुआ और यही सब कारण थे कि वह सेवा-निवृत्ति के कई साल पहले ही मुअत्तल होकर द्घर आ बैठा था। ...पर तब तक तो उसने कापफी कुछ अरज लिया था। द्घर-द्वार, खेत-बाड़ी, माल-मवेशी, गाड़ी-छकरा, गहना-गुरिया-सब। द्घूस और रिश्वत लेकर, गरीब-गुबार को सताकर, चोरी-डकैती करवाकर, झूठे मामले-मोकदमे में लोगों को पफंसवाकर,
बेईमानी-शैतानी कर खूब-खूब धन जमा लिया था। ...पर कहावत है न, रहे न कौड़ी पाप की, ज्यों आवै त्यों जाए...!' ...एकलौता बेटा भरी जवानी में कैंसर से मर गया। तीन बेटियां हैं। पर बड़की विधवा होकर द्घर आ बैठी है। मंझली भी मरद को छोड़कर मैके में ही पड़ी है। अब वह उससे तलाक चाहती है। संझली ही थोड़ा ठीक-ठाक है। वह समझदार भी है। यही कारण है कि वह शादी में जो गयी है सो अब तक वापस मैके नहीं आयी है। न तो वह आना चाहती है और न उसके ससुराल वाले उसे आने ही देना चाहते हैं। अब रह गयी छोटकी। तो वह दो-दोबार है। यही कारण है कि विगत कई वर्षों से उसके लिए वर ढूंढ़ने में दिक्कत आ रही है। ...पर बाप को इन सब बातों की चिंता नहीं है। बल्कि वह तो खुश है कि बेटी सयानी हो रही है। भूख-प्यास की तलब जगने पर यदि इधर-उधर मुँह मार ही लेती है तो इस वास्ते शिकायत की कौन-सी बात है। उसे यकीन है कि आज के इस अर्थ-प्रधान युग में गाँठ मजबूत हो तो पैसे के लालच में कोई न कोई मुल्ला पफंस ही जाएगा।... वैसे बेटी जात को अपनी ड्योढ़ी पर बैठाए रखने का कुछ लोगों का शौक भी तो होता है तो कुछ की मजबूरी भी। कौन जाने, कल किसकी मदद की ज़रूरत आन पड़े।... शरम-हया, शिकायत-बदनामी, इज्जत-प्रतिष्ठा, मान-मर्यादा-ये सब तो पतली चमड़ीवालों के लिए हैं। उसके जैसे मोटी-चमड़ी वाले लोगों के लिए थोड़े हैं।... आज भी गाँव में उसका दबदबा है। जल्दी कोई उसके खिलापफ सिर नहीं उठाता। हाँ यह बात दीगर है कि चुनाव के बाद से हरिजन-टोला के लोग जरूर तनने लगे हैं।
अ समय में दरोगी पांडे को द्घर आया देख मुसमात को थोड़ी द्घबराहट हुई। पर वह मन-मार कर रह गयी क्योंकि संयोग से उस वक्त वहाँ अकासी नहीं थी। वह बच्चों को क्या खाना देती? धतर-पतर से उठी और आँगन में खाट गिराकर बोली, बैठिये मालिक!... इस बखत, इतनी रात को परवचन सुनना छोड़कर आप यहाँ!
''अरी नहीं। प्रवचन सुनकर ही तो आ रहा हूँ। एक जरूरी काम था। तुम लोगों को वहाँ नहीं देखा, तो द्घर आना पड़ गया।''
''कैसा काम मालिक...! आप हुकूम तो करें...!!''
''दर असल बात ऐसी है कि कल से गरमा धान की रोपनी शुरू हो रही है। सोचा, तुम लोगों को भी कह दूँ। वैसे भी अभी तू संकट में है। अपने राम को रहा न गया। रात कहा सवेरे हल बहता है न...। आ गया...।''
मुसमात भला क्या जवाब देती? भूख से तो मरने के कगार पर थे सब। वह बुदबुदायी, ''सप्ताह-दस रोज का जुगार तो हो ही जाएगा। यही क्या कम है!! आगे देवी माई ही जाने। पूछा, ''तो क्या सब आएँगे मालिक?''
''आ जाना। बिचरा उखाड़ना, धोना, पहुँचाना, खेत में पफैलाना-कितना काम है। हाँ, अकासी को जरूर लाना। ...लेकिन अभी वह है कहाँ? दिखती नहीं।''
ढिबरी की काँपती रोशनी में मुसमात को सूझ गया था कि उसकी शातिर आँखें तब से किसी को ढूंढ़ रही हैं। वह सहमती हुई बोली, ''खेत गयी है।''
''सुना है, तुम्हारी बेटी ताड़-खजूर चढ़ती है?'' मुसमात को काटो तो खून नहीं। जैसे अचानक उसे साँप सूंद्घ गया हो। वह हकलाकर बोली, ''नहीं मालिक। लड़की जात भला वह क्या ताड़-खजूर चढ़ेगी? गछवाहा को तो देवी माई ने उठवा लिया। तभी तो आज यह दिन देखना पड़ रहा है।'' वह पफटे आँचल से मुँह ढंककर सिसकने लगी। ...गरीबों को भगवान ने एक ही सौगात दिया है और सौगात है उसके आँसू जो जीवन-भर साथ देते हैं और दुःख-विपत्ति में मदद भी करते हैं।
दरोगी पांडे ने जेब टटोलकर बड़ी मुश्किल से कुछ रुपये निकाले और उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, ''चिंता मत करो। जीवन में सुख-दुख तो धूप-छांह की तरह आते ही रहते हैं। ...लो, ये रुपये रख लो। कमाकर सधा देना। और हाँ, अकासी को लाना ही लाना। वह बहुत काम करती है।'' वह सौ-सौ के पाँच नीले पत्ते मुसमात के हाथ में थमाकर बाहर निकल आया।
मुसमात नोटों को हाथ में थामे देर तक मूर्तिवत खड़ी रही। पांडे की बातें उसे निरंतर मथ रही थीं, अब अकासी पर इसका मन...। और न जाने कैसी-कैसी भय जतानेवाली बातें...। ...कहीं ये पाँच सौ रुपये के नोट पाँच नाग साँप तो नहीं जो एक न एक दिन बेटी को डस ले...! हे देवी माई... अब तू ही बता कि मैं क्या करूँ?'' वह सहसा चीखती हुई बाहर को दौड़ी, ''मालिक( मालिक(('' पर मालिक बाहर कहाँ था? वह नीम के पेड़ तले ठमक गयी। ...नहीं! द्घर आयी लक्ष्मी से क्या मुँह मोड़ना? ढेर दिनों बाद एक साथ इतने पैसे हाथ में आये हैं!! ठीक ही तो कहता है! कमाकर सधा दूँगी!! इतने रुपये से तो माह-भर सब को जिंदा रखा जा सकता है!!! कम से कम भूखे मरने की नौबत तो नहीं आएगी। वह अंदर लौट आयी और रुपये को ताखा पर रखी पउती में सहेजकर बच्चों से बोली, ''अब तो खालो...।'' वह खाना काढ़ने लगी। मक्के की रोटी के साथ बथुए का साग, हरा मिर्चा व नमक। पर न जाने क्यों खाना
निकालते-निकालते उसकी आँखें पिफर से डबडबा आयी थीं। वह भला क्या खाना निकालती। वहीं बैठी-बैठी सिसकने लगी। लगना ने शायद माँ का सिसकना देख लिया था। उसने धीरे से मना कर दिया, ''अभी नहीं, माँ। ...दी दी को आ जाने दो...।'' और इस बार तीनों बच्चे जोर-जोर से पढ़ने लगे।
सुकनी जानती थी कि उसके आने में अभी देर है। जब तक वह थककर चूर नहीं हो जाएगी, वापस ही नहीं आएगी। ...पागल लड़की। किसी की बात नहीं सुनती। सिपर्फ अपने मन का करती है!! रात-विरात कुछ हो गया तो...!!! देवी माई कृपा बनाए रखे...। उसने पिफर से बच्चों से कहा, ''दीदी के आने में देर हो सकती है। तुम लोग खाकर सो जाओ...।''
''माँ, टमाटर-मिर्चा की चटनी पीस दो न पुदीना-पत्ता देकर। कुएँ पर से ले आती हूँ।'' छोटकी थी। उठकर जानलगी।
''थोड़ा तेल-लहसून भी डाल देना माँ, स्वाद बढ़ जाएगा।'' छोटका था। खाने में चोख। स्वादी भी।
किंतु उसकी पफरमाइश माँ को रास नहीं आयी। बोली, ''आज बिना तेल का खा लेना। कल तेल ला दूँगी...।''
तभी पुदीना के पत्ते मुट्ठी में दबाए अकासी आ पहुँची। साथ में छोटकी भी थी। वह सिलौट पर चटनी पीसती हुई बोली, ''जानती हो माँ?... आज मैंने दस ताड़ चढ़े...! एकदम पफुनगी तक!! कहीं कोई परेशानी नहीं... कोई थकान नहीं...।'' वह खुश थी।
''दस ताड़! इतनी जल्दी!!'' माँ ने आश्चर्य से पूछा, ''वह भी रात में!!! वाह...!!!!'' पर शीद्घ्र ही उसने चिंतित होते हुए कहा, ''तुम्हारा बाप बहुत अच्छा गछवाहा था। पर वह भी इतनी जल्दी इतने ताड़ नहीं चढ़ सकता था। और वह भी ताड़ से गिरकर ही मरा!... अब तू वही खतरा उठा रही है। ...देवी माई ऐसा न करे। पर तुमको कुछ हो गया, तो जानती हो, इस द्घर का क्या होगा? सब बेमौत मर जाएँगे।'' वह आँचल पसारकर और आँखें मूंदकर बोली ''हे देवी माई! अब तू ही इस द्घर की नैया पार लगाना...।'' और वह सुबकने लगी।
''क्या होगा माँ? कुछ नहीं होगा। तू बेकार चिंता करती हो। तुम्हारा आशीर्वाद और देवी माई हरदम मेरे साथ रहेंगे, पिफर डर काहे को?... आओ... खा लो। चटनी तैयार है...।''
जब सब खाने बैठे, तब माँ ने खाते-खाते ही बताया, ''दरोगी पांडे आये थे। कल से रोपनी है। सबको नेवत गये हैं। पाँच सौ रुपये पेशगी भी...।''
माँ बात निगल गयी थी और अकासी बीच में ही बोल पड़ी थी, ''पाँच सौ रुपये पेशगी...!'' उसके दुखद आश्चर्य की सीमा नहीं थी,'' और तुमने रुपये रख लिए?''
''रखती नहीं तो क्या करती?'' अब तक माँ ने अपने को समझा लिया था और अकासी से मुकाबला के लिए तैयार भी कर लिया था। उसने अपने को अंदर से मजबूत करते हुए आगे कहा, ''भूख की आग ने सबकुछ जलाकर राख कर दिया है। अब कुछ सोचना ही बेकार है। बस, केवल जिंदा रहने का जुगत...''
''तब तो कल तू मुझे भी उसके पास भेज दे सकती हो?''
''द्घर बैठे-बैठे पेट तो नहीं भरेगा! और पेट के लिए तो कुछ करना ही होगा। ...भूख की भट्ठी में तपकर मरने से तो अच्छा है कि किसी की छाँह पकड़ लो...। सबकी जिनगी निबह जाएगी। मान ले कि तुम्हारी यही नियति है...।''
''माँ। तुमको पता है कि तू क्या बक रही है?''
''पता है... सब पता है।'' माँ अभी भी उसी मुद्रा में थी,'' अंधा को चाहिए दो आँखें और भूखे को दो रोटी। बाकी सब बकवास है...। मेरी तो उम्र ढल गयी यही सब झेलते...।''
''हे देवी माई। माँ को सदबु(ि दो...।'' वह गुस्से में थी। पर क्या करती? माँ थी। उस पर से विधवा। वह अंदर से टूटती-बिखरती-सी बोली, ''तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी माँ! अच्छा होता कि जनम के समय ही नमक चटा देती!!'' ...वह भाइयों के साथ खा रही थी और माँ छोटी बेटी के साथ। रोटी कम थी। बनी ही कम थी। आटा ही कम था। इतना कम कि मुश्किल से बच्चों के पेट भरते। माँ की थाली में भी रोटी कम थी। अकासी ने जान-बूझकर गुस्सा किया। और खाना पर से उठ गयी। जाते-जाते कहती गयी, ''तुम तीनों भी खाकर आ जाना। कल से अपना धंधा शुरू होगा। वह अपनी झोपड़पट्टी में आ गयी और कल की तैयारी में लग गयी।
थोड़ी ही देर बाद तीनों बच्चे वहाँ आ गये। वे सब अकासी से उसके काम में आने वाले सामान के बारे में पूछ रहे थे और वह इन्हें एक-एक कर बता रही थी, ''यह हसुली है- ताड़ और खजूर छेबने वाली। इसी से ताड़ के पफल तथा बाल और खजूर के धड़ को छेबकर ताड़ी चुलाई जाती है। ...यह लौठा है। हसुली पिजाने और ताड़ी की लवनी-तथा द्घड़ा लटकाने के लिए। ...यह पक्सी है। ताड़ के 'डमखो' के छिलका से बनती है। बहुत मजबूत होती है। पाँव में पफंसाकर इसी के सहारे ताड़ पर चढ़ा जाता है। ताड़ की गांठ में यह बैठ जाती है जिससे पाँव पिफसलने का डर जाता रहता है। ...यह मजबूत चमड़े का बेल्ट है। कमर से कसा जाता है। इसमें लोहे का एक हुक लगा होता है जिसमें लटकाकर लवनी को ऊपर ले जाया जाता है और ताड़ी ढाड़कर उसे नीचे उतारा जाता है। ...और यह बरकस है। गछवाहा के लिए यह बहुत जरूरी चीज है। इसके द्वारा वह पीठ को पेड़ के सहारे लटका देता है ताकि आराम से ताड़-खजूर छेब सके। ताड़ के छज्जा और खजूर के पल्लों झाड़ने के समय भी इसकी जरूरत पड़ती है। ...ये सब पासी के काम करने वाले के लिए बहुत ही जरूरी और उपयोगी सामान है...। पर इतना कुछ होने पर भी एक पासी के लिए पेड़ पर चढ़ने-उतरने से लेकर पेड़ पर चढ़कर काम करते समय तक सावधानी की बहुत जरूरत पड़ती है। ...हर द्घड़ी सावधानी और सतर्कता।''
हालांकि बच्चे सब बड़ी सावधानी से दीदी की बातें सुन रहे थे किंतु उनके मन में कुछ आशंकाएँ भी थीं। लगना ने पूछ ही दिया, ''लेकिन, दीदी, इतने-सारे सामान तो पिता जी के पास भी थे। पिफर भी वह पेड़ से गिर गये...?''
अकासी बूझ रही थी कि लगना का कहना सही है, पिफर भी उसने अपनी समझ के अनुसार उसे समझाने का प्रयास किया, ''इसके कई कारण हो सकते हैं भाई। ...उसदन हवा तेज होगी िजससे पेड़ हिल रहा होगा। पेड़ भीगा होगा। गाछ चढ़ते-चढ़ते पिता जी थक गये होंगे। ठंड के कारण पिता जी काँप रहे होंगे जिसके कारण हाथ छूट गया होगा या उनका पाँव पिफसल गया होगा। यह भी संभव है कि कमजोरी के कारण उन्हें चक्कर आ गया होगा और हाथ छूट गया होगा। पिता जी मोछू पांडे के डाँटने पर उस मेद्घ में ताड़ी ढाड़ने गये थे। संभव है, वह उस पर गुस्से में हों और गुस्से में ही उनसे गलती हो गयी होगी और वह गिर गये...।''
''लेकिन दीदी! तू मत गिरना नहीं तो हम सब भूखे मर जाएँगे।'' इस बार छोटकी थी।
अकासी ने प्यार से उसे गोद में सहेजते हुए कहा, ''मैं नहीं गिरूंगी मेरी दीदी। अरी बार-बार ऐसा थोड़े होता है। भगवान इतने निर्दयी थोड़े हैं।... और गिरने से सब थोड़े मर जाते हैं। सोमन काका भी तो पेड़ से गिरे थे। वह कहाँ मरे? बस, एक टाँग टूटकर रह गई थी। सब देवी माई की कृपा।''
''लेकिन दीदी!'' इस बार लगना था, ''आज मोंछू पांडे आया था। धान रोपने के लिए बुलाया है। रुपया भी दे गया है। अब क्या जरूरत है तुमको ताड़ चढ़ने की? ऐसे ही काम मिलता गया, तो सबका पेट तो चल ही जाएगा!''
''नहीं भैया!'' अकासी ने प्यार से लगना का गाल
थपथपाते हुए कहा, ''मोंछू पांडे बहुत द्घटिया आदमी है। वह जितने का काम देगा उससे कहीं ज्यादा का वसूल लेगा। हो सकता है, वह हमसे गलत पफायदा भी उठाना चाहे!! उससे कौन पार पाएगा? इसलिए अब कल से किसी को कहीं नहीं जाना है। मैं ताड़ी उतारूँगी, माँ बेचेगी और आप सब भाई-बहन स्कूल जाएँगे...।''
सब खुश। सब के चेहरे पर मुस्कान की लालिमा निखर आयी थी। लेकिन माँ! वह शायद अभी भी चिंतित व उदास थीं।
ब्रह्म स्थान के पास चल रहा प्रवचन तथा भजन-कीर्तन का कार्यक्रम अब तक समाप्त हो चुका था। लोग-बाग अपने-अपने द्घर को जाने लगे थे। रात भीग रही थी और उसका एकांत संगीत सापफ-सापफ सुनायी देने लगा था। बच्चे सब सोने चले गये थे। पर अकासी की आँखों से जैसे नींद गायब थी। वह तो कल के बारे में सोच रही थी और ताराच्छादित रात्रिा का एकांत संगीत सुन रही थी।
तभी माँ ने करीब आकर पूछा, ''नींद नहीं आ रही...?''
''आएगी, माँ अब आ जाएगी!''
''अभी भी गुस्से में ही हो?''
''नहीं तो! किस पर गुस्सा करूँगी?''
''लेकिन तुम्हारा गुस्सा सही है, बेटी। ...मैं भी क्या करूँ? भूख के कारण मेरी तो बु(ि ही मारी गयी है! जब भी तुम सब का भूखा-प्यासा चेहरा देखती हूँ, तो कलेजा मुँह को आ जाता है। पिफर तो भला-बुरा सोचने की शक्ति कहाँ रह जाती है? उस समय तो लगता है सब कुछ देकर भी रोटी मिल जाए तो भला ही है...। मुझे पांडे से पैसा नहीं लेना चाहिए था, बेटी!! हो सके तो मुझे मापफ कर...।''
''ऐसा मत सोचो, माँ। इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है, माँ। हमारा समय ही खराब है। ऐसे बुरे दिनों में कोई भी माँ ऐसा ही करती!! पर कल से ऐसा नहीं होगा, माँ।''
''तो क्या कल से तू गछवाही करेगी...?''
''हाँ, माँ। कल से मैं अपना धंधा शुरू कर रही हूँ।''
''पर रसदार पेड़ तो है नहीं कि कल से ही कमाई होने लगे और चूल्हा भी गरम हो...।''
''है न! सोमन चाचा ने पाँच ताड़ और तीन खजूर दिये हैं। मुसमात काकी के भी तीन ताड़ और पाँच खजूर हैं। ये सब के सब लगहर गाछ हैं। पिफर तो धीरे-धीरे नये गाछ भी रसा ही जाएँगे।... अब तो बस, मुझे तुम्हारा आशीर्वाद चाहिए...।'' उसने माँ के पाँव लपक लिए।
माँ ने माथे पर हाथ रखते हुए आशीर्वाद दिया, ''देवी माई सदा तुम्हारा साथ दे, बेटी।'' उसने आगे कहा, ''अब सो जाओ, बेटी। कल से सबेरे उठना पड़ेगा न...।'' वह एक ओर सो गयी। अकासी भी सोने का प्रयास करने लगी।

शाम मधुआ रही थी। पर गोधूलि ने अभी ठीक से गाँव की सड़क पर चहलकदमी शुरू नहीं की थी। लग रहा था जैसे गाँव के नंग-धडंग़ बच्चों के साथ वह भी खेलने में मशगूल है। ...गाय-भैंस बैल और भेड़-बकरियों की खुरों से उड़े सड़क के धूल-कण तथा द्घरों-अलावों से उठे धुएँ आकाश में धाराधर का आभास करा रहे थे। लगता था, जैसे गाँव में साँझ थोड़ा पहले चहक पड़ी है। ठीक अकासी की तरह। वह भी उसी सड़क पर ताड़ी से भरे द्घड़े को माथे पर सहेजे लपकी जा रही थी।
उस पर नज़र पड़ते ही बच्चे सब गोलब्द होकर गा उठे-
''ताड़-खजूर आकाश में,
चाँद-सूरज के प्रकाश में।
ज्यों-ज्यों पेड़ ऊपर भागे,
अकासी बेटी छुअन लागे।''
गाना सुनकर अकासी ठहर गयी। तब बच्चों ने उसे द्घेर लिया, उसने मुस्कराकर कहा, ''लेमन चूस कल दूँगी।'' और वह झटके से वहाँ से चल पड़ी। पर बच्चों का गाना अभी जारी था।
ताड़ी के पफेन के पफूल पुष्प पहाड़ की तरह उसकी कंचन-काया की चारों तरपफ लिपट रहे थे जिससे उसका रूप-यौवन और अधिक निखर रहा था। लगता था जैसे किसी वन-कन्या ने अपनी मन-मोहिनी देह पर सपफेद गुलाब की मालाएँ चढ़ा रखी हैं अथवा किसी यक्ष-बाला ने आकाश के तारों जड़ी चादर को अपनी देह पर सहेज लिया हो। ...द्घुटने तक उठी किंतु कमर में कस कर बंधी साड़ी, कटि-प्रदेश तक लटकी इठलाती-बलखाती केश-राशि, सुंदर काया-आकर्षक एवं मन-मोहक, यौवन-भार से दबी। देखने वाले की चाँद-चकोर की दशा होती थी। सब की इच्छा रहती उसे देखने और दो गाल बतियाने की। गद्दी से लेकर द्घर तक भीड़ा ताड़ी तो एक बहाना था। ...पर अकासी तो जैसे गूलर का पफूल हो। सुबह-शाम पेड़ पर, दोपहरी में द्घर के अंदर। बस, दो बार गद्दी में ताड़ी पहुँचाने आती-एक बार सुबह और दूसरी बार शाम को। इसलिए जिस किसी को बतियाना होता या अपना-ताड़-खजूर छेबवाना होता, वह तरबन्ना या खजूरवानी में ही उससे मिल पाता। वह भी तब, जब वह ताड़ी ढाड़कर पेड़ से नीचे उतरती। वह दो चार जरूरी बातें करती, पिफर बंदरिया की तरह दूसरे पेड़ पर पफांद जाती। ढेर बातें करने का न तो वक्त था न ही मन...।''
उस समय उसका रूप-लावण्य देखते ही बनता था। कमर में बयिाइन, पेटीकोट और कसकर लपेटी हुई तथा बेल्ट से कसी हुई साड़ी, ढेकवा कसी हुई। देह में ब्लेसियर तथा सटी हुई गंजी बस। ढीला-ढाला कपड़ा तो वह पहन नहीं पाती क्योंकि वैसे कपड़े पेड़ से रगड़ाकर पफट जाते थे या पिफर सिमटकर ऊपर चढ़ जाते थे। वैसे ही पेड़ चढ़ते-चढ़ते उसकी छाती पर रगड़ से चिन्ह हो गये थे। ...एक दिन, पोखरी में नहाते समय रिश्ते की एक भाभी ने टोक दिया था, ''अरी अकासी! तुमरी छाती में तो दाग उग रहा है री!! मरद देखेगा तो...।''
''मरद को देखने दूँगी तब न!'' अकासी ने बीच में ही जवाब दे दिया था, ''और तू जिसे दाग कहती है, वह तो मेरा गहना है जो मरते दम तक साथ निभाएगा!!'' वह खिलखिलाकर हँस पड़ी थी। तब अकासी भी खूब हँसी थी। पिफर तो दोनों की हँसी से तालाब का जल बौरा कर हिलोरे मारने लगा था।
''जानती हो अकासी?... तुम्हारी छाती हजारों में एक है! किसी-किसी को ही भगवान ऐसा उपहार देते हैं!! एकदम से क्लौजिया बेल!!! कौन मरद...। वह तो...!!!!'' उसने इशारे से ही बाकी बातें समझा दी थी।
''धत्‌ भाभी! आप भी...।'' अकासी जैसे विदक उठी थी, ''अरी मैं अपने मरद को मुँह मारने दूँगी तब न!... ऐसे ढंक लूँगी।'' और वह बड़ी अदा से अपने हाथों से दोनों वक्षों को ढंकने का प्रयास करने लगी थी। पर वे ढंकें तब तो। भाभी जोर से हँसी थी और देर तक हँसती रही थी। पिफर बोली, ''हमें तो आश्चर्य हो रहा है कि मोंछू पांडे की नज़र अब तक क्यों नहीं पड़ी इस पर...?''
''उस पापी का नाम मत लो भाभी। गाहे-बगाहे छेड़ता रहता है। मेरा बस चले तो मैं उसे कच्चे चबा जाऊँ। ...लेकिन मैं उसे छोडूँगी नहीं भाभी। एक न एक दिन जरूर उसे मजा चखाऊंगी.. कसम खायी है मैंने...।''
''वह हम हरिजन बहू-बेटियों को आज भी अपनी रखैल बनाकर रखना चाहता है। पर उसे पता नहीं है कि अब समय बदल गया है। ...तू आगे बढ़ो। हम सब तुम्हारे साथ हैं।''
अभी गोधूलि की चहलकदमी थमी भी नहीं थी कि गाछी में अंधेरा स्वच्छंद विचरने लगा था- छुट्टा सांड़ की तरह। वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते अकासी अचानक द्घबरा उठी। उसके चिंतन की दिशा बदल गयी और एक अप्रत्याशित भय ने उसे दबोचना शुरू कर दिया। वह मन ही मन देवी माई को सुमरने लगी। तभी उसने देखा, सामने दरोगी पांडे अपनी बत्तीसी निपोड़े शैतान की तरह खड़ा है। उसके जी में आया कि वह सर का द्घड़ा उसके माथे पर दे मारे और दौड़कर भाग जाए। पर शीद्घ्र ही उसने अपने को संभाल लिया, 'नहीं! ऐसा करने से इस भूत से छुटकारा नहीं मिलने को। द्घड़ा भर ताड़ी बेकार जाएगी। जग-हँसाई होगी अलग। सब इसी की सुनेंगे, मेरी कोई नहीं। वैसे भी यह तो थेथर है। शरम-हया सबसे परे!... पापी हाथ धोकर पीछे पड़ा रहता है!! राह चलते भी...!!! ...वैसे भेड़िया की तरह लार टपका रहा है? मौका हाथ लगे तो जिंदे निगल जाए। ...दौलत का नशा शायद ऐसा ही होता है! ऊपर से दारोगागीरी का भूत!! गरीब-गुबार की बहू-बेटी की इज्जत-आबरू की जरा भी चिंता नहीं!!! ...इस पापी को तो ऐसा सबक सिखाना होगा कि मरते दम तक याद रखे। ...हे देवी भाई! इस जुल्मी से अपनी रक्षा करने की शक्ति दो!!!''
''क्या सोचने लगी अकासी?'' तभी उसने टोक दिया, ''...अब और कितना इंतजार कराओगी? आखिर धैर्य की भी सो सीमा होती है! जल में रहकर मगर से बैर ठीक है क्या?... सच मानो, यदि चुनाव नहीं रहता, तो मैं कब को तुमको उठवा लिया होता...!!'' वह चुप लगा कर शैतान की तरह हँसने लगा था।
अकासी सहम गयी थी। वह समझ गयी थी कि पांडे अभी नशे में है और अंधेरे का लाभ उठाकर वह कुछ भी कर सकता है। वह गिड़गिड़ायी, ''ऐसा तो न सोचो, मालिक। आपकी ही शिकायत होगी। आखिर इज्जत प्रतिष्ठा की पगड़ी आप जैसे लोगों के ही माथे है न! हम पासी-दुसाध की क्या इज्जत?... हम सब तो आपकी प्रजा ठहरे। हम लोगों पर तो आपका पूरा हक बनता है...।''
किंतु अकासी की बातों से उसे कोई विशेष आश्चर्य नहीं हुआ। बल्कि खुशी ही हुई कि उसने इतनी जल्दी द्घुटने टेक दिये। ...शायद डर गयी! संभव है, रुपये का लालच भी हो आया हो!!'' उसने उसी तेवर में आगे पूछा, ''तो पिफर इतनीखुशामद क्यों? माँ ने तो...!!''
''गुस्सा थूक दो मालिक। सब कुछ तो आपही का है। देवी माई की कृपा से इस अछूत देह का कद्रदान और कहाँ? मैं तो कब से मौके की ताक में हूँ। मौका हाथ लगते ही आपको अपने द्घर बुलाऊँगी और आपके सारे उलाहने दूर...।'' वह हौले से मुस्कराई, तिरछी चितवन से एक बार उसकी ओर देखा, पिफर बोली, ''अब जाने दो, मालिक। ग्राहक का टाइम है न! गद्दी में ताड़ी भी नहीं होगी।'' वह बगल से होकर जाने को हुई कि तभी पांड़े ने लपक कर उसकी बाँह पकड़ ली ''यह क्या मालिक?'' अकासी गुस्सा उठी थी।
''डरो नहीं।'' उसने बाँह छोड़ दी थी, ''पर इतना तो बता दो कि वह शुभ दिन कब आएगा? जब हम मर जाएँगे...?''
''ऐसा क्यों कहते हैं मालिक? मरे आपका दुश्मन। आपको तो अभी चुनाव जीतना है। जनता-जनार्दन की सेवा करनी है। ...जब आपका यश चारों ओर पफैलेगा तो मुझे सबसे ज्यादा खुशी होगी। हम कोशिश करेंगे कि आपको ही हरिजन मोहल्ले का वोट मिले। मैं बहुत जल्द आपको द्घर बुलाती हूँ और सारी बातें बताती हूँ...।'' और वह तेजी से बगल से निकल गयी। यद्यपि उसके तलवे की लहर कपाल तक चढ़ गयी थी। ...दोनों हाथ द्घड़े पर, द्घड़ा माथे पर, द्घड़े में ताड़ी भरी हुई। और दरोगी पांड़े ने बाँह पकड़ ली थी। वह विष का द्घूंट पीकर रह गयी। '...पापी! मुखिया-प्रमुख बनना चाहता है। ऐसे-ऐसे लोग ही आज गाँव से शहर तक और पटना से दिल्ली तक भरे पड़े हैं। न जाने कब ऐसे लोगों से धरती माँ भार-मुक्त होंगी! हे देवी माई। ऐसे पापियों से लड़ने की शक्ति दे...।'
वह देर तक उसका जाना देखता रहा। वह आँखों से ओझल हो गयी, पिफर भी वह उधर ही निहारता रहा और उसके बारे में सोचता रहा, ''साली बहुत अकड़ती थी। आखिरकार रास्ते पर आ ही गयी। अब हरिजन मोहल्ले के सारे वोट मेरी मुट्ठी में होंगे और इस तीसरे पन में संजीवनी बूटी के रूप में अकासी भी मेरी अंक शायनी होगी। ''वह एक बारगी खुशी में खिलखिला पड़ा। ''...कभी-कभी ऊपर वाला बिना मांगे ही बहुत-कुछ दे देता है! हाँ, बहुत कुछ!!'' वह हँसता- गाता मूँछों पर ताव देता चला गया।

उस दिन प्रवचन का आखिरी दिन था, इसलिए भंडारा था। गाँव-भर के लोग आमंत्रिात थे और इसलिए सबके सब देव स्थान के पास जुटे हुए थे- औरत-मर्द, बच्चे-जवान-सब! यहाँ तक कि भोजन की सोंधी गंध पाकर गाँव भर के कुत्ते भी वहीं जमे हुए थे। खीर-पूरी, आलू-पटल की रसदार सब्जी और बेसन के लड्डू। शाम से ही कापफी चहल-पहल थी वहाँ। उधर भंडारा के लिए खाना तैयार हो रहा था और इधर प्रवचन तथा भजन-कीर्तन चल रहा था।
गछवाही के बाद थोड़ी देर के लिए अकासी भी वहाँ आयी थी। पर माँ जब गद्दी उठाकर बच्चों के साथ वहाँ आयी, तो वह द्घर को लौट गयी। द्घर पर जरूरी काम जो था।
द्घर यानी पफूस की एक झोपड़ी आगे को और एक पीछे। बीच में टाटी से द्घिरा एक आँगन। आँगन में ही ताड़ के छज्जे का एक छोटा-सा 'छाजन' जिसकी छाँव में खाना बनाने के लिए मिट्टी का एक दुआंछिया चूल्हा। दोनों झोपड़ियों में बाँस के बने ढढ्ढर लगे हैं जो दरवाजे का काम करते हैं। अकासी अपनी माँ के साथ आगे वाली मड़ैया में सोती है और तीनों बच्चे पीछे वाली में। आगे वाली ढढ्ढर के लिए एक ताला व सिकड़ी हैं, पर पीछे वाले के लिए वैसा कुछ भी नहीं। वह रात में भी खुला ही रहता है। दिन भर की बची ताड़ी आँगन में रहती है। बकरियाँ भी वहीं बंधती हैं। ...आगे वाली झोपड़ी प्रायः खाली रहती है। आने-जाने वाले लोग उसी में बैठते हैं। उसमें बाँस की पासी वाली एक खटिया, प्लास्टिक की बिना बाँही की एक कुर्सी, पानी से भरा मिट्टी का एक द्घड़ा, शीशे का एक गिलास, बाँस की अलगनी पर टंगे कुछ नये-पुराने कपड़े, खाट के नीचे टीन का एक बक्सा-यही सब उस झोपड़ी की संपत्ति है।
लेकिन उस दिन उस झोपड़ी का रूप-रंग बदला हुआ था। खाट पर सापफ-सुथरी चादर बिछी थी। सिरहाने नया खोल चढ़ा तकिया रखा था। एक कोने में लवनी-भर ताड़ी रखी थी। बगल में एक टकड़ी छन्ना, काँच का गिलास भी थे। एक ओर छोटी थाली में तली हुई रोहू मछली के चार-पाँच टुकड़े सजे थे। जमीन पर खजूर की एक चटाई बिछी थी। अकासी पीढ़ा पर बैठी थी और दरोगी पांड़े चटाई पर। वह टकही से गिलास में ताड़ी ढार रही थी और वह पी रहा था। उसे ताड़ी पीने और चीखना खाने से ज्यादा आनंद अकासी से बतियाने और उसे निहारने तथा स्पर्श करने में आ रहा था। परंतु जब भी उसका हाथ बहकता अथवा बहकने को होता, अकासी झटके से उसके सामने चीखना या ताड़ी से भरा गिलास बढ़ा देती-मुस्करा कर... प्यार और स्नेह के साथ। कभी आग्रह तो कभी मीठे उलाहने भी, ''इतनी भी बेताबी क्यों सरकार? अभी तो पूरी रात पड़ी है। अकासी कहीं भागी थोड़े जा रही है! यह तो रात-भर के लिए आपकी दासी है!! पहले आप अपना मूड तो बना लीजिए!!! आज अकासी के हाथ से जी-भर कर पी लीजिये। कौन जाने कल क्या होगा...? ...आप जब चुनाव जीत जाएँगे तो इस अछूत अकासी को थोड़े पूछेंगे...?''
''पूछूँगा...! जरूर पूछूँगा!!'' पांड़े ने चौंकते हुए कहा, ''मैं अकासी को जीवन-भर नहीं छोड़ सकता!''
''सच...?''
''सच!... तुम्हारी कसम!! पर यह तो बताओ कि चुनाव जीताने के लिए तुम मेरी मदद करोगी...? कैसे करोगी?''
''...क्या कुछ नहीं करूँगी, उनसे मालिक! आपके लिए सब कुछ करूँगी। ...हरिजन टोला के एक-एक द्घर जाऊँगी, उनसे आपको वोट देने का वचन लूँगी। जहाँ दिक्कत होगी वहाँ पैसा पफेंकूँगी और जहाँ पैसा से भी काम नहीं बनेगा, वहाँ अपनी जवानी दांव पर लगा दूँगी। पर वोटवा तो आपको ही मिलेगा दारोगा बाबू!'' गजब का अंदाज़ था अकासी का। उसके कथन और चेहरे की आकृति से इच्छाशक्ति की दृढ़ता का आभास हो रहा था।
दरोगी पांड़े तो जैसे चारों खाने चित्त। कुछ तो ताड़ी का नशा, कुछ अकासी की चिकनी-चुपड़ी बातों का। वह चुपचाप अकासी को निहारे जा रहा था। जैसे आँखों से उसके रूप-यौवन को पी जाना चाहता हो...।
अकासी जानती थी कि वासना के पंक में पफंसा मन भले-बूरे की पहचान खो देता है। उसे यह भी यकीन होने लगा था कि ताड़ी ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। तभी दरोगी पांड़े ने टोक दिया, ''यदि तू अपनी जवानी मेरे वास्ते कुर्बान ही करना चाहती हो, तो मैं भी तुम्हारे लिए अपनी जान कुर्बान कर दूँगा। बस, इतना और कर देना कि गाँव के कुछ सवर्णों को भी मेरे पक्ष में तैयार कर देना जो मेरे खिलापफ रहते हैं। वहाँ तुम्हारी जवानी की कीमत भी बढ़ जाएगी और मेरी जीत भी...।''
''नहीं, मालिक!'' अकासी अचानक बमक गयी थी ''देवी माई की कसम! अकासी कोई बिकाऊ माल नहीं है कि जिस-तिस से कीमत वसूलती चलेगी! यह रहेगी तो आपकी नहीं तो किसी गैर की नहीं...।''
सदा से ऐसा ही होता रहा है और आगे भी ऐसा ही होता रहेगा कि शिकारी सावधान और शिकार असावधान रहते हैं और तभी शिकार का शिकार होता है...। अकासी का यही उद्देश्य था कि जब तक पांड़े पूरी तरह से नशे की गिरफ्रत में नहीं चला जाता, तब तक उसे बातों के प्रेमजाल में पफंसाए रखना है। अपने उद्देश्य में वह सपफल भी हो रही थी। उसके जवाब से खुश होकर पांड़े उसके बाएँ हाथ को देर तक चूमता रहा। जिस अकासी को भर नज़र देखने के लिए वह रात-दिन तड़पता रहता था, वही अकासी अपनी संपूर्णता में उसकी सेवा में अकासी ने एकबार बाहर निकलकर अकानने का प्रयास किया। शांत, नीरव, स्निग्ध प्रकृति! रात्रिा का वही एकांत संगीत। उसने सर उठाकर ताराच्छादित आकाश की ओर देखा! मुस्करा रहे अनगिनत तारे! आकाश गंगा... सत भइया और तीन डोरिया। सब खुश थे!... अच्छे-भले थे।
देव स्थान के पास चल रहे भजन-कीर्तन और प्रवचन का कार्यक्रम समाप्त हो चुका था। बस, कुत्तों के भौंकने और लड़ने की आवाजें-भर सुनायी दे रही थीं।' ...ढेर रात निकल गयी! लगता है, भंडारा भी समाप्त हो चुका होगा। माँ और बच्चे आते ही होंगे। ''वह अंदर लौट आयी। ढढ्ढर बंद कर लिया और खाट में धंसगयी। ...पापी खूब मातल है! अब सुबह तक मातले रहेगा!! ...समझ में नहीं आता कि मैंने जो कुछ भी किया, वह अच्छा किया या बुरा किया...! लेकिन इतना तय था कि मैं यदि इसके साथ ऐसा नहीं करती तो यह मुझे कहीं का नहीं छोड़ता। पर अब यह छेड़ना तो दूर, मेरी ओर ताकने की हिम्मत भी नहीं करेगा। बस, इसे चुपचाप द्घर से निकालकर ऐसी जगह पहुँचा देना है जहाँ कल गाँव वाले इसके द्घिनौने रूप को देखेंगे और इस पर थूकेंगे! पिफर तो यह मुखिया का चुनाव भी जीत जाएगा। और प्रमुख भी बन जाएगा!!'' वह व्यंग्य से मुस्कराई। तभी माँ आ गयी।

वही कोई अधरतिया रही होगी। प्रवचन, भजन, कीर्तन और भंडारा...। देर रात तक जगे गाँव के लोग गाढ़ी निद्रा में सोये थे। पर अकासी और उसके द्घरवालों की आँखों में नींद कहाँ थी? द्घर में जो जिंदा लाश पड़ी थी...। सबने उसे टाँग कर द्घर से बाहर निकाला। पिफर ले जाकर इसे देव स्थान के पास के चबूतरे पर लिटा दिया। लगना ने उसकी देह पर के सारे कपड़े उतार दिये और उसी का गद्दा बना दिया। उसने अकासी के लिए जो कपड़े लाये थे, उसका तकिया लगा दिया। ...लगता था, जैसे कोई नागा साधु गाढ़ी निद्रा में सो रहा है। ...गुस्से में तो थे ही सब। अकासी उसके चेहरे पर थूक दी। माँ ने पहले तो ढेरों गालियाँ दीं, पिफर दो बार लात मारे और लगना ने पत्थर। और पिफर सब के सब दबे पाँव वहाँ से भाग निकले। ...लेकिन अभी वे तीनों कुछ ही कदम नाप पाये थे कि पीछे मुड़कर देखा। वहाँ एक कुत्ता आया। पहले तो उसने उसे द्घूम-द्घूमकर देखा, नाक-मुँह के पास सूंद्घा, चाटा भी, पिफर टाँग उठाकर पेशाब किया और वहाँ से रपफू चक्कर हो गया।
द्घर आकर लगना और छोटकी बिछावन में धंस गये। पर अकासी द्घर न आकर माँ के साथ हरिजन मोहल्ले की ओर चल पड़ी। विरादरी के लोगों से मिलकर कल के लिए रणनीति जो तय करनी थी।
लौटी तो पौ पफट चुका था। माँ द्घर पर रह गयी और अकासी गछवाही को निकल पड़ी। ...बालक प्रभात किलक रहा था। भगवान भुवन भाष्कर क्षितिज पर मुस्करा रहे थे। धरित्राी पर चारों ओर धूप के पफूल खिल रहे थे। लता-द्रुमों पर शबनम खिलखिला रही थी। अकासी ने एक बार चारों ओर देखा, पिफर बंदरिया की तरह पेड़ पर पफाँद गयी।


 
 
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