दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
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कहानी

अंत अच्छा है

 

ए. असपफल

जन्म : दिसंबर १९५५

लेखन की शुरुआत १९८२ से। तीन उपन्यास तथा चार कहानी-संग्रह
प्रकाशित। तमाम प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिाकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। 'नमोः अरिहंता' नामक उपन्यास पर
वागीश्वरी सम्मान।
२०, ज्वालामाता गली, गडैय़ा, भिण्ड, म.प्र.
मो. ०९८२६६९५१७२

  ए. असपफल
जतिन एक राजनैतिक दल के सदर बन गए थे। मेरी दोस्ती उनसे पढ़ाई के दिनों से थी। वे एक संपन्न किसान के बेटे थे और शहरी जीवन जी रहे थे। बाद में मैं पत्राकारिता करने लगा, वे राजनीति में चले गए। अब हम लोग कभी कभार ही मिल पाते। लेकिन जब मिलते, द्घंटे-दो-द्घंटे साथ बैठते थे। और साथ में हम गर्मियों में जिन, सर्दियों में व्हिस्की तो बरसात में बीयर का आनंद लेते। जाहिर है, बैठना तभी हो पाता, जब एक शहर में होते। पिछली कई बैठकों से वे वही एक बात दोहरा रहे थे, 'मित्रा, तुम्हें एक कहानी सुनाना है। मेरी इच्छा है कि इसे तुम अपने नाम से छपाओ। लेकिन

पात्राों के नाम बदल देना। पिछली एक बैठक में तीसरे पैग के बाद अपनी वह कहानी सुनाने की शुरुआत भी कर दी थी उन्होंने : सोमेश! जब मैं तुम्हारे साथ बीई कर रहा था, मेरे भाई की शादी के प्रस्ताव आ रहे थे। वे नए-नए बिजनेस में उतरे थे। लड़की देखने के लिए भी समय नहीं निकाल पाते। तब मैंने ही भाभी को देखकर पसंद किया था। भैया की ओर से दीदी के साथ मैं ही गया था। उन्होंने तो सिपर्फ पफोटो देखा था भाभी का। भाभी तब ग्रेजुएशन करके शादी के लिए मानसिक रूप से तैयार हो चुकी थी। भैया बिजनेस करते थे और उन्हें बीवी की तथा द्घर को बहू की सख्त जरूरत आन पड़ी थी। दीदी के साथ उनकी छोटी बच्ची भी थी जिसका एक पैर पेट से उल्टा आया था। उस पर पट्टा भी चढ़ा था। भाभी लंबी, छरहरी, गोरी और बला की खूबसूरत थीं। मुझे एक नज़र में भा गईं। दीदी की बच्ची उन्होंने गोद में ले ली थी और उसे खिलाती रही थीं। न उसके टेढ़े पाँव और पट्टे से उन्हें द्घिन हुई, न यह डर कि यह दुख जाएगा, क्या होगा! पहली भेंट में ही इतनी सन्निकट कि मन भर गया। वे एकदम परपफेक्ट गृहिणी, परिवार को जोड़ के रखने वाली बहू और स्नेहिल भाभी होंगी। ममता से ओतप्रोत।... मैंने दीदी से मशविरा कर रिश्ता पफायनल करने का विचार बना लिया।
माँ हमारी भोलीभाली। पिता थे नहीं। भैया ने बागडोर मुझे सौंप ही रखी थी। समारोह हँसीखुशी पूर्वक संपन्न हो गया।
मैं भाभी का लगभग हमउम्र था। पर भैया से चार साल छोटा। द्घर में मेरे बाद कोई छोटा सदस्य न था। इसलिए उनका हमउम्र होकर भी उनसे छोटे बच्चे की तरह लाड़ लड़ाया करता। कभी उनकी बाँह में चिकौटी काट लेता, कभी गाल पर। कभी पीछे से बाँहों में बाँध लेता, देर तक नहीं छोड़ता और वे परेशान होकर माँ को पुकारतीं तब मुक्त करता। और कभी गोद में उठा लेता, वे गिरने के भय से द्घबरातीं, चीखतीं, भैया तक दौड़ पड़ते, तब उतारता!

मैं लेखक हूँ, मुझे हर मित्रा अपनी कहानी सुनाना चाहता है। मगर इसी वादे के साथ कि पात्राों के नाम बदल देना। जाहिर है, कहानी में वो हीरो निकलता है, इसलिए मैं ऐसी कहानियाँ लिखता नहीं। सुनता जरूर हूँ। उससे मुझे तमाम काम की चीजें मिल जाती हैं। दोस्तों की अपेक्षा भी पूरी हो जाती है।
जतिन मुझे इस बार मिले तो, हमेशा की तरह चीयर्स के साथ ही राजनीति में उतर गए। बोले- तुम क्या समझते हो, सोमेश! भ्रष्टाचार का मुद्दा इस तरह हल हो जाएगा? लोकपाल भी तो हिन्दुस्तानी ही होगा! उस पर नियंत्राण भी रहेगा ही किसी न किसी का।... संसदीय प्रक्रिया से चुनकर तो आएगा नहीं कि जनता के प्रति जवाबदेह हो। उसका मनोनयन, नियुक्ति आखिर विधायिका, न्यायपालिका अथवा कार्यपालिका में से कोई तो करेगा! तब वह उसके अधीन रहेगा कि नहीं? और कौन कह सकता है, उसके निर्णय प्रभावित न हों। सीबीआई जैसा हश्र न हो जाए उसका...।
बात उनकी सही थी, मैंने कहा- पर इस कोढ़ को खत्म किए बगैर हम स्वस्थ नहीं हो सकते।
-यार, तुम अव्यावहारिक बातें करते हो। क्या कोई राजनैतिक दल बिना पफंड के चलाया जा सकता है? चंदा उद्योग जगत से न लें तो भला किससे लें? कार्यकर्ता पर तो भूंजी भांग नहीं है। और पिफर वो हमारा होलटाइमर भी तो है! उसकी गृहस्थी का खर्च उठाना किसकी जिम्मेदारी है?
-राहुल गाँधी शैली एक विकल्प तो है, मैं बोला- माना कि वहाँ भी एक निहित उद्देश्य है, पर इस तरह शीर्ष नेतृत्व सीधे तौर पर जनता से जुड़े तो नौकरशाहों के हौसले पस्त पड़ जाएँ, राजनैतिक बिचौलियों का दिवाला निकल जाय और विधायिका को समस्या की जड़ मालूम पड़े, जिसे ब्यूरोक्रेसी अब तलक नहीं खोज सकी। यार, एक प्रबल राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत तो है, देश को...।
सुनकर वे गंभीर हो गए, पिफर दूसरा पैग निबटाने के बाद बोले- राहुल कांग्रेस के शहजादे हैं। सदियों से गुलाम देश पैंसठ साल की आजादी के बाद भी जहनी तौर पर गुलाम है। लोग ग्लैमराइज हैं। हमारा कार्यकर्ता जाएगा तो कोई साथ नहीं लगेगा। बिना तामझाम और प्रदर्शन के कोई नजदीक भी तो नहीं आता। और हमारे संस्कार चुनावों के दौरान हमें भेड़िया बना देते हैं। एक आदमखोर बाद्घ, जो सत्ता का खून चख चुका है। सीट उसे एनीहाउ चाहिए ही!
भेजा गरम हो गया। मैंने कहा- छोड़ो यार! तुम, अपनी कहानी सुनाओ।

सुनकर उनके चेहरे के भाव बदल गए। होशियारी की जगह मासूमियत ने ले ली, बौ(किता की भावुकता ने। नए पैग के साथ मुस्कराते से बोले-
भाभी के साथ हँसी खेल में एमबीए भी हो गई। छात्रा राजनीति से मैं विशु( राजनीति में द्घुस गया। मेरे विवाह प्रस्ताव भी आने लगे। पर मुझे कोई लड़की ही नहीं जंचती। मैं हरेक में भाभी के नैन-नक्श और उनकी आत्मीयता ढूंढ़ता। बात बनती नहीं। वह माधुर्य, रूप-रंग कहीं नजर नहीं आ रहा था। उसके बनिस्वत मुझे राजनीति में अधिक चार्म था। हालांकि भाभी इस बाबत कई बार समझातीं कि- अब तुम देवरानी लायक हो गये। कर लो तो साल भीतर द्घर में किलकारी गूंज उठेगी। और मैं कहता, तुम्हारी जैसी आँखें मिलें, तब करलूं... तुम्हारे जैसी चहक, महक और प्यार। रही किलकारी, तो उसे तुम्हीं क्यों नहीं गुंजा देतीं?
सुनकर वे उदास हो जातीं।
कहकर जतिन खुद खामोश हो गए। गिलास खाली हो गए थे। मैंने एक-एक पैग और ढाल लिया। द्घूंट भरने के बाद वे पिफर बोले-वे अक्सर कहतीं, कोई किसी जैसा होता है-क्या! बनाने वाले ने सबको अलग-अलग बनाया। और मजाक करतीं, तुम्हीं तो पसंद करने गए थे, अपने लिए कर लेते!
जतिन ने बताया कि ऐसे मौकों पर वे प्यार से उनके गाल थपथपा देते। कई बार आवेग में बाँहों में बाँध मुख भी चूम लेते। बरसों के मेल-मिलाप से उन्हें स्पर्श सुख में रोमांच महसूस होने लगा था।... द्घर में भैया भाभी के अलावा, उनकी माँ थीं। और भाभी के दो कुत्ते। जिन्हें वे हमेशा खुद से चिपकाए रखतीं। अलस्सुबह उनकी जंजीर पकड़ पफरागत को द्घर से बाहर ले जाना। नियमित नहलाना, बाल सापफ करना। समय-समय पर इंजेक्शन लगवाना और चौबीसों द्घंटे ध्यान रखना।... सोपफे पर बैठी होतीं तो वे उनकी गोद में चढ़ जाते...। टीवी वे उन्हीं के साथ देखतीं। खासकर किड्स चेनल्स। देखते हुए बीच-बीच में उन्हें सहलाती जातीं। किसी-किसी मजेदार सीन पर हाथ मिला लेतीं। कभी जीत के उत्साह में सीने में भींच लेतीं। रात को जाने कैसे बाँध देतीं जंजीरों में? शायद! भैया के साथ सोने की गरज से।...
मैं अक्सर झुंझलाता कि कोई पेट्स को इतने गले लगाता है कि उसके अपने छूटने लगें! और मैं मन ही मन बददुआ देता कि वे मर जायें। क्योंकि मैं भाभी से लाड़-लड़ाता, लिपटता, दौड़ता-दौड़ाता तो वे भौंक-भौंक कर आसमान सिर पर उठा लेते। ...और शायद, मेरी बददुआ उन्हें लग गई। ऐसा रोग पफैला कि दोनों पंद्रह दिन के भीतर चटपट मर गए। भाभी ने रो-रोकर अपनी आँखें सुजा लीं। मगर वे थोड़े दिनों बाद सामान्य हो गईं। अब वे मुझे पहले से अधिक समय देने लगीं।
कहानी में हम इतने मुब्तिला हो गए थे कि गिलास अब आसानी से खाली नहीं हो रहे थे। जतिन बता रहे थे- माँ एक दिन किसी धार्मिक उत्सव में निकल गई थीं। उस दिन भैया भी बिजनेस के सिलसिले में बाहर जा रहे थे तब अलस्सुबह भाभी उनके कमरे में आईं और सिर सहलाती हुई बोलीं, उठो, भैया को स्टेशन तक छोड़ आओ, जतिन!
जतिन यों तो सुबह जल्दी उठ जाते और जिम के लिए निकल जाते। मगर रात को पार्टी के काम से कापफी देर से लौटे थे। सो, नींद में बुरी तरह जकड़े हुए थे। स्वप्न में वे भाभी के साथ ही मशगूल थे। सिर को उनके कोमल हाथों का स्पर्श मिला तो स्वप्न और गहरा गया। ...कमरा हल्का गुलाबी पुता था। उसमें न तीखा उजाला था न नीम अंधेरा। बाबा-आदम जमाने के बेड और सोपफे थे, माया-युग की चित्रालिपियाँ! तभी भाभी पिफर आई और उनका चादरा खींच कर बोली, लौटकर सो लेना, सारा दिन पड़ा है, ट्रेन निकल जाएगी!
स्वप्न से यथार्थ में गिर पड़े जतिन ने खिसियाकर चादरा उनके हाथों से खींच दुबारा ओढ़ लिया और जवाब दे दिया, नहीं जाना, ड्रायवर हूँ-क्या!
भैया बैग लिए तैयार खड़े थे, बोले, छोड़ो, सोने दो, रात को लेट आया है... अभी तो टाइम है, मैं ऑटो से निकल जाऊँगा।
भाभी उनके पीछे ही लौट गईं मगर जतिन की नींद खुल गई।
चिड़चिड़े से उठकर बाथरूम में ेश होने चले गए वे। तब तक बगल वाले बॉथरूम में भाभी ने नहा लिया और कपड़े पहन चोटी-कंद्घी करने लगीं। जतिन नहाकर लौटे तब तक वे सजधज कर तैयार हो गई थीं। हॉल से गुजरे तो खुशबू के बादल ने उनकी चाल धीमी कर दी। नजर पड़ी तो धक से रह गए। श्ाो-केस का चमचमाता शीशा सरकाती भाभी उड़नपरी-सी नजर आ रही थीं।... साउण्ड बॉडी, गुड हाईट! मोहक मुस्कान से भरे कली से अधखिले होंठ... शानों पर लहराते रेशम से स्याह बाल। यकीन नहीं आ रहा था कि पूर्णिमा का चाँद द्घर में निकल आया है! सुबह की अभद्रता पर अचानक अपफसोस हो आया। सोचा- मापफी की मापफी और तारीपफ की तारीपफ, बोले, वाह-क्या धज है! यकीन नहीं होता कि आपकी शादी को चार साल हो गए! तभी तो हमारी नज़र में कोई चढ़ता नहीं!
वे चौंकी नहीं, मुस्कराकर आँख मार दी! जाहिर है, सुबह की बात का बुरा नहीं माना था। उत्साह में जतिन ने आगे बढ़कर उन्हें चपेट लिया। चपेटने में उन्हें बड़ा मजा आता था।
-बस ठीक है, छोड़ो-छोड़ो, चलो नाश्ता बनाएँ तुम्हारे लिए! अपने पेट पर कसे उनके हाथ उन्होंने खोलते हुए कहा तो जतिन ने हाथ ढीले कर लिए मगर द्घेरा नहीं तोड़ा। पीठ से चिपके चलते-चलते वे किचेन में आ गए। भाभी प्लेटपफार्म से पेट सटा टिक गईं तो जतिन ने कोहनियों से हाथ ऊपर की ओर मोड़ हथेलियाँ अनायास उनके सीने पर रख लीं। मगर रखते ही उनमें गुदगुदी होने लगी। जैसे, धोखे से पक्षियों के मुलायम परों पर पड़ गई हों।
हरकत पर मुस्कराती हुई भाभी मुँह मोड़ बोलीं, हलवा बनाएँ?
-नहीं।
-तो!
-मोसम्मी का जूस...कहकर जतिन ने उनके उरोज दबा दिए और भाग खड़े हुए।
कमरे में आकर वे देर तक रह-रहकर हँसते रहे। जैसे, इतनी खुशी आज तक किसी चीज में नहीं मिली थी। हथेलियाँ उस अनूठे स्पर्श के एहसास से लबरेज थीं। उन पर रीझते हुए उन्होंने मुस्कराकर दो-तीन बार उन्हें चूम लिया। प्रपफुल्लता भीतर नहीं समा रही थी। न तेल-पफुलेल किया न कंद्घी-पट्टी, वैसे ही प्रमुदित से बैठे रहे। तब तक भाभी हाथ में नाश्ते के ट्रे लिए वहीं आ गईं। जतिन ने देखा-उसमें केले, दूध बिस्किट और नमकीन थी।
- बस, इसी के लिए पूछ रही थीं, क्या बनाएँ? उन्होंने टेबिल के पास कुर्सी खींचते हुए उलाहना दिया।
-तुमने कुछ बताया ही नहीं। ट्रे टेबिल पर रख, कुर्सी खींचकर वे भी बैठ गईं। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद जतिन ने केला छीलते हुए कहा- आपकी पसंद तो पता चली!
सुनकर उन्होंने नज़रें उठाईं और शर्म से मुस्कराने लगीं। प्लेट से केला उठाते उनकी उंगलियाँ ठिठक गईं। संकोच में बिस्किट कुतरने लगीं। जतिन ने लक्ष्य किया और केला छीलकर उन्हें देते हुए कहा- लो!

जतिन ने बताया कि ऐसे मौकों पर वे प्यार से उनके गाल थपथपा देते। कई बार आवेग में बाँहों में बाँध मुख भी चूम लेते। बरसों के मेल-मिलाप से उन्हें स्पर्श सुख में रोमांच महसूस होने लगा था।... द्घर में भैया भाभी के अलावा, उनकी माँ थीं। और भाभी के दो कुत्ते। जिन्हें वे हमेशा खुद से चिपकाए रखतीं। अलस्सुबह उनकी जंजीर पकड़ पफरागत को द्घर से बाहर ले जाना। नियमित नहलाना, बाल सापफ करना। समय-समय पर इंजेक्शन लगवाना और चौबीसों द्घंटे ध्यान रखना।... सोपफे पर बैठी
होतीं तो वे उनकी गोद में चढ़ जाते...-न! रखा है, ले लेंगे। झेंपकर उन्होंने गर्दन हिलाई।
-ले लो! वे जिद करने लगे। और उन्होंने ले लिया तो मुस्कराए- ये बड़ा वाला है!
शर्म से पानी-पानी हो गईं वे और भाग खड़ी हुईं।

कहकर जतिन बगली झांकने लगे।
उनके गिलास में शराब अभी बाकी थी। एक मिनट ऐसे ही गुजर गया तो मैंने गिलास की ओर संकेत कर कहा- चलो, इसे निबटाओ, कहानी तो अब निबट गई।
जतिन ने नीचे देखते हुए उसे उठाकर एक द्घूंट में चढ़ा लिया और उल्टे हाथ से ओठ पोंछ पफंसे गले से बोले- वहीं एंड हो जाता तो मैं इसे भूल गया होता। न जाने कैसी सब्त सवार हो गई थी उस दिन... वे अपने कमरे में भाग गई थीं और मैं दबे पाँव उनके पीछे आ खड़ा हुआ। भाभी हाथ में पकड़ा छिला केला खाने लगीं तो पीठ पर धप्पी मारकर बोला-मीठा है न!
धप्पी इतनी तेज और अकस्मात्‌ थी कि वे बुरी तरह डर गईं। कलेजा धक्‌धक्‌ कर उठा। आधा केला मुँह में, आधा हाथ में। निगलते-काटते हुए मुँह लाल हो गया। कमरा उनका सचमुच गुलाबी पुता था और उसमें जीरो वॉट का लाल बल्ब जल रहा था। न तेज उजाला न नीम अंधेरा। उस रहस्यमयी उजास में सामने की दीवार पर बनी पेंटिंग माया-युग की चित्रालिपि प्रतीत होने लगी। तमतमाया चेहरा मैंने हथेलियों में भर लिया और उन कली से अधखिले ओठों पर अपने अनछुए ओठ रख दिए।
देह में सनसनाहट भरने लगी।
पहली बार उन्होंने हथेलियाँ कंधों पर रख प्यारभरी
मनुहार की-चलो, गगरमागरम भजिया बना दें!
-नहीं, मैंने कूल्हों के नीचे बाँहों का द्घेरा कस लिया, हमें जलेबी खानी है!
-बदमाश! उन्होंने बाँहों से सीना धकेला... और मैंने उन्हें ऊपर उठा लिया!
भैया द्घर में नहीं थे, जो उनकी चीख पर आ जाते!
बेचारी अवश हो गईं और गिरने के भय से मेरी कमर अपनी टाँगों में जकड़ ली, बाजुओं में।...
स्पर्श के अनोखे रोमांच में मदहोश मुझे उनका कमरा रहस्यमयी लोक प्रतीत हो उठा। जिसमें बाबा-आदम जमाने का सोपफा पड़ा था, बाबा-आदम जमाने का बेड!
कहकर जतिन ने उसांस भरी और मेरे द्वारा पिफर से बना दिया गया स्मॉल पैग अपने ओठों से लगा लिया। उनका यही तरीका था। शुरू लार्ज से करते, स्मॉल करते-करते एंड। बातें करते-करते बीच-बीच में सुरूर में कहीं खो जाते। पिफर झपकी सी खुलती और कोई नई बात छेड़ देते। आज तो लगातार एक ही कहानी सुना रहे थे। आज नशे में नहीं अतीत में डूबे हुए थे। गोया, अतीत भी नशा हो। एक मीठा नशा।
वे दूध-सी सपफेद थीं। काले कपड़े उन पर खूब पफबते। मैं हमेशा जिद करता कि काली साड़ी, काला सलवार सूट और काला ही स्लीवलैस और बड़े गले का गाउन पहनें।
उस दिन जाना कि भाभी मेरी छोटी से छोटी बात को कितनी तरजीह देती हैं! अगर मेरी इच्छा है कि आपकी भूरी चमड़ी पर काले वस्त्रा खिलते हैं, तो वे उन्हें अंदर तक पहन कर इस इच्छा की पूर्ति कर रही हैं...। ऐसी दीवानगी पर प्यार उमड़ पड़ा। काली ब्रा से झांकते उनके अधखुले स्तनों पर अपने ओठ रख लिए उन्होंने! और वे उनकी नंगी पीठ पर अपनी लम्बी उंगलियाँ नचाने लगीं।
शरीर अपनी भाषा बोल रहे थे... दिमाग ने सोचना छोड़ दिया था।
चरमोत्कर्ष के बाद जतिन ने पूछा, ऐसा मजा कभी भैया के साथ आया?
मजे के लिए नहीं... उन्होंने आँखें भर लीं, संतान सुख के लिए ये ठठकरम किया। वे तो चाहकर भी आस पूरी नहीं कर सके। सीमन्स का परसेंटेज कम है, क्या करें... कहते वे पफपफक पड़ीं।
वे चुप हो गए तो मैंने पूछा, और लोगे?
-नहीं, सोमेश!
-भाभी अब भी इश्युलेस हैं?
-ना, उस संपर्क के पफलस्वरूप उन्हें एक प्यारी बेटी मिल गई थी। अब तो इतनी बड़ी है कि दिल्ली में अकेली रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही है...।
-तुमने शादी नहीं की?
-नहीं।
-करोगे भी नहीं?
-किसलिए, दो भाइयों का नाम रोशन करने को एक
होनहार संतान बहुत है।
-शादी न सही, शारीरिक जरूरत तो होती है, भाभी से बना संबंध तो चल रहा होगा?
-नहीं, यार! वे तो भाई की अमानत हैं। एक बार नादानी में जो हो गया सो हो गया। हमारी तो पॉलिटिक्स से मैरिज हो चुकी है। इसी के साथ सोते हैं, इसी के साथ जागते हैं।
सुनकर मैं भी खामोश हो गया। बाद में वे जाने लगे तो बोला, अंत अच्छा है इसका।
-लिखोगे?
-लिखने की जरूरत नहीं है। जीवन खुद मार्गदर्शक है। भ्रम है कि साहित्य, दर्शन, आंदोलन का कोई लीड रोल है इसमें!

 
 
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