दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कहानी

कहानियों की तरह है उनके चेहरे

 

श्रीधर करूणानिधि

जन्म : १३ सितंबर १९७८

युवा कथाकार। एम.ए. ;हिन्दी साहित्यद्ध दैनिक हिन्दुस्तान, उन्नयन, संवदिया, प्रसंग, वसुधा, साहित्य, अमृत, साहिती सारिका, परिकथा, शब्द प्रवाह, पगडंडी, सांवली, परिषद पत्रिाका आदि पत्रा पत्रिाकाओं में कविताएं, कहानियां और आलेख प्रकाशित।
द्वारा- श्रीमती इंदु शुक्ला
आलमगंज चौकी, गुलजारबाग, पटना-८००००७


  श्रीधर करूणानिधि
इधर दुनिया में एक बड़ी द्घटना द्घट गई लेकिन तेज-तर्रार मीडिया में यह खबर आई ही नहीं। ''सरसों के पौधों में पफूल आ गए हैं... पीले-पीले पफूल!'' ...हा...हा...हा ''बी सीरियस यार!'' ''ओके...आंके... नहीं मैं उस द्घटना की बात नहीं कर रहा। गाँवों से बैल खत्म हो चुके हैं। हाँ सीरियसली कोई भी बैल नहीं बचा गाँवों में।'' आप जरूर कहेंगे वाहयात! हाउ बोरिंग न! ''एवरी यूथ हैज इनट्रेस्ट इन गोशिप्स लाइक लव स्टोरी ऑपफ सलमान-कैटरीना करीना-सैपफ... ऑर रणवीर-पदुकोने

व्हाट पेटी सब्जेक्ट्स आर यू टॉकिंग अबाउट!'' नहीं नहीं दोस्त! आपके पीले पफूलों में कुछ भी नया नहीं। पफूल हर साल आते हैं। इस बार भी आए होंगे, मुझे क्या?
बात दरअसल यह है कि अभी-अभी होंडा की चिता सरसों के खेत के पास जली है। लेकिन देखिए सरसों के पफूलों को! पिफर भी खिल रहे हैं और हवा के साथ हिल रहे हैं।
...उसे हम प्यार से होंडा कहते थे। उसका नाम था करण। वह होंडा कार का दीवाना था और अक्सर कहता कि देखना मैं एक दिन होंडा कार ड्राइव करते सीधे गाँव आऊँगा। कल ही उसी शहर के रेलवे स्टेशन पर लाश मिली है उसकी, जहाँ वह सपने बुनता... जहाँ थे सिपर्फ पैसे और पैसे का मायाजाल...। साल भर से गायब था। करोड़पति बनने के ख्वाब सजाए भागा था। साल भर से लोग ढूंढ़ रहे थे उसे। होंडा की माँ परेशान। पिता परेशान। साथ में पूरा गाँव परेशान।
गायब होते वक्त शहर के मशहूर कॉलेज के हॉस्टल में वह ग्लोबल विश्व की भाषा अंग्रेजी का स्टूडेंट था और ठीक उसी दिन उसके पिता गाँव से आए थे रुपये लेकर। उसके पिता की भाषा हिन्दी थी, जिसमें देहाती बोली की छौंक मिली थी। पिता के वापस होते ही वह भी गायब हो गया।
जिस समय उसके पिता जी हॉस्टल के कमरे में थे, होंडा के हाथ में इंग्लिश की एक ब्रांडेड शराब की बोतल थी जिसे पीकर भी नशा नहीं हुआ था उसे। पूरे होशो-हवास में उसने अपने पिता को हिकारत भरी नज़र से देखा और अंग्रेजी का सबसे आसान जुमला... नॉनसेन्स कहा। और साथ ही कहा 'पुअर'!
''यू विल बी ऑलवेज पुअर। एंड लुक! माइसेल्पफ इज करण रस्तोगी... आई विल बी मिलयेनयर बिदिन फ्रयू वीक्स। यू नो मिस्टर स्कूल मास्टर!''
उसने पिफल्मों के किसी पात्रा के प्रभाव में अपना नाम करण कुमार से करण रस्तोगी कर लिया था। पिता ने आरजू की कि वह उसके महीने के खर्च को बढ़ाकर ५ हजार कर देगा। यह जानकर कि वह यानी करण, उसके खानदान का पहला आदमी है जो इस बड़े शहर में आया है और अपने खानदान का नाम रोशन करने की ख्वाहिश को जीवित रखने वाला एक मात्रा उम्मीद!
खुद उनके पुरखों ने उन्हें पढ़ने किसी शहर नहीं भेजा और गाँव के स्कूल से मिडिल पास कर वे शिक्षक बने... शिक्षक बनने से पहले तक डोरिया पैंट पहन कर ही उसने ज़िंदगी काटी, भले आज धोती-कुर्ता पहनने लगे। पर होंडा के लिए तो उसने पूरी छूट दी। लेकिन होंडा बोलता रहा... बड़बड़ाता रहा।
''आई कांट सरवाइव लेस दैन टेन थाउजेंड। इपफ यू विल नॉट गिव द मनी आई विल कमिट सुसाइड।''
मास्टर साहब ने बेटे को पहली बार अंग्रेजी बोलते सुना था। खुश तो बहुत हुए वे लेकिन थोड़े डर भी गए जबकि उन्होंने शोले पिफल्म में वीरू को सुसाइड की धमकी देते देखा था। और वो जानते थे कि सुसाइड की धमकी कितनी खोखली होती है अक्सर। पिफर भी अपने इकलौते बेटे के पुल से कूदने के नाम पर वो थर-थर कांपने लगे। ...होंडा लगातार 'पिफप्टी लैक्स' 'पिफप्टी लैक्स' की रट लगाता रहा। न जाने उसने ये शब्द कहाँ से सुने थे। अपने कॉलेज में दोस्तों के बीच सिगरेट के धुएँ के छल्ले बनाने की प्रैक्टिस करते वक्त। या पहली बार शहर के रेस्टोरेंट में किसी लड़की को गर्ल ैंड समझ कर डिनर कराकर उल्लू बनते वक्त।
''इस लड़के का कुछ नहीं हो सकता। ही इज ए बिग चीटर। ही इज जस्ट चीटिंग हिज पफादर!''
और इस तरह से इस शताब्दी के गाँव के एक होनहार आखिरी उम्मीद का अंत होता है। विचारधारा के अंत और सदी का आखिरी आदमी की तरह।
गाँव के पीएचसी के डॉक्टर ने लाश का मुआयना करते हुए कहा था। ''इसकी कमर के पास चीरा लगा हुआ है। दोनों किडनी निकाल ली गई है। यह किसी किडनी-चोर रैकेट का शिकार हुआ है।'' ''हारिबल! रियली ए केस ऑपफ बिट्रेयल!''

पगडंडी के सहारे सड़क पर पहुँचते हैं सब लोग। लाश जलाकर भीड़ तितर-बितर हो रही है। कई लोग तालाब में नहाएँगे, कई लोग कुएँ पर और कई पास चल रहे पंप सेट पर। पिफर भीगे शरीर ही द्घर की देहरी पर खड़े हो जाएँगे और द्घर की महिलाएँ सरसों के दाने जलाकर आग की परिक्रमा करा कर ही उन्हें द्घर में प्रवेश करने देंगी। कैसी रस्म है यह!

झारियों में भी जहाँ-तहाँ इक्के-दुक्के पफूल खिले हैं।

जंगली गेंदा के पफूल हैं कि किसी प्यारे बच्चे के पफूले गाल!
इस धरती का न जाने कौन सा वसंत है। इस गाँव का सबसे पुराना बरगद का पेड़ भी नहीं बता सकता। मैं तो झाड़ियों के जंगली पफूलों और सरसों को खिलते देखकर अपने शरीर में तेइसवां वसंत-या सूखा जो कहें-महसूस कर रहा हूँ और मुझे होंडा यानी करण रस्तोगी के इस भयानक अंत के बाद हीरो चाचा की कहानी याद आ रही है।
हीरो चाचा! न जाने धरती के किस भाग में किस आँतु का शीत-ताप झेल रहे हैं।

बारह बरस पहले एक दिन की बात। गाँव के रेलवे हॉल्ट पर रोज की तरह ट्रेन आती है। दो द्घंटे देर से अपनी आदत मुताबिक। उसी ट्रेन में अपनी किताबों की पोटली सहित चढ़ जाते हैं हीरो चाचा। दमद्घोट भीड़ में भी नीचे बैठकर किताब खोले उसमें खो जाते हैं हीरो चाचा।
ऐसे खोए ऐसे खोए जैसे झुंड से बिछड़ती है चिड़िया... ऐसे डूबे ऐसे डूबे जैसे नदी में डूबता है पनडुब्बा! वह ट्रेन भी क्या ट्रेन थी!... खूब चली खूब चली... जाने कहाँ-कहाँ गई। जाने किस-किस नदी-नाले के ऊपर से गुजरी। शायद दुनिया के सबसे शक्तिशाली द्घोड़े की तरह दौड़ी... खेत-खलिहानों को रौंदती... और उस पर बैठे हीरो चाचा न जाने क्यों किताबों के पन्नों में द्घुसते ही चले गए... भीतर और भीतर! हूबहू हैरी पॉटर की तरह।

कोई खंडहर दुनिया का आखिरी खंडहर नहीं हो सकता
कोई द्घर सिपर्फ आदमी से नहीं बनता
बिना पतंग के यह धरती आसमान में नहीं उड़ सकती
किताबों की सुरंगों से ही सपनों तक पहुंचना होता है

हमारा द्घर खंडहर बना पड़ा है। यह सही है कि यह आखिरी खंडहर नहीं। ;एक दूसरा खंडहर तो होंडा का ही द्घर है।द्ध जब वह द्घर था, खंडहर बनने से पहले तब उसमें सिपर्फ आदमी ही नहीं रहते थे। गोरैया छप्पड़ में खोता बनाकर खूब उत्पात मचाती। देहरी पर पिंजड़े में कैद सुग्गा खूब बोलता। छोटा सा कुत्ता मिक्की खूब दुलार मांगता और दरबे में चितकबरा कबूतर उड़-उड़कर पतंग बन जाता और हमारी छोटी सी दुनिया को अपने नन्हें पंखों में लेकर वह उड़ा करता... खूब ऊँचे आसमान में।
दुनिया बदल रही है। क्यों बदल रही है दुनिया, क्योंकि किसी ने इशारे ही इशारे में कहा है कि बिना चोला बदले खूबसूरत नहीं हो सकती है यह दुनिया। क्या हुआ है? ...बस पूछो मत दोस्त!... कहो कि क्या नहीं हुआ... सुनो केवल... महसूस करो अगर कर सकते हो। अगर सूंद्घ सकते हो तो सूंद्घों कि हवा में किस शराब के किस ब्रांड की दुर्गंध तैर रही है। देखो जाकर शराब की दुकानों पर ...कौन खरीद रहे हैं! एक बार चस्का लगा दो पिफर देखो इसका मार्केट! कोई जरूरत नहीं विज्ञापन की ...बड़ी चेन है लौंडों की... पिफर क्या! कंडोम बेचो...हा..हा..हा।

पगडंडियों से गुजरते हुए एक सपना बहुत याद आया

बात दरअसल यह है कि अभी-अभी होंडा की चिता सरसों के खेत के पास जली है। लेकिन देखिए सरसों के पफूलों को! पिफर भी खिल रहे हैं और हवा के साथ हिल रहे हैं ...उसे हम प्यार से होंडा कहते थे। उसका नाम था करण। वह होंडा कार का दीवाना था और अक्सर कहता कि देखना मैं एक दिन होंडा कार ड्राइव करते सीधे गाँव आऊँगा। कल ही उसी शहर के रेलवे स्टेशन पर लाश मिली है उसकी, जहाँ वह सपने बुनता... जहाँ थे सिपर्फ पैसे और पैसे का मायाजाल...। साल भर से गायब था। करोड़पति बनने के ख्वाब सजाए भागा था। साल भर से लोग ढूंढ़ रहे थे उसे। होंडा की माँ परेशान। पिता परेशान। साथ में पूरा गाँव परेशान

ठूंठ पेड़ देखकर एक चिड़िया बहुत याद आयी।
मौसम खिलने का था पर जाने क्यों एक सूखा-दिन याद आया

''बबुआ सुने कि हीरो बड़का आदमी बन गया है। हमरा त पहले लग गया था। जेतना किताब उ पढ़ रहा था लगता था बड़का आदमी बनके रहेगा। हम तो हरदमे देखते थे कि खेत के आर पर, गाछी के नीचे, मचान पर, मैदान में सब जगह किताब खोल के खोया रहता। जाए द्घड़ी भी पोटली में किताब बाँधे मिला था टीशन पर... हम आ रहे थे बीज और दवाई लेके... बस खाली हाथ भर हिला दिया... बाय बाय कह दिया। हम का जाने बबुआ कि कहाँ जा रहा है। तू तो शहर में रहे तेरे पिता जी कित्ता खोजे हीरो के! अब लोग बोलते हैं कि बड़ा आदमी बन गया है हीरो... एकदम हीरो जइसा!''

रामधन काका से सुना हीरो चाचा का मिथक! है न सुंदर। हीरो को तो हीरो ही होना चाहिए। उसे लड़ना चाहिए। टकराना चाहिए हर जुल्म से। मुझे तो हिन्दी सिनेमा में एक ही हीरो लगते हैं हीरो जैसे। सन्नी देओल। एक-एक हाथ ढाई किलो का... जब पड़ता है तो आदमी उठता नहीं उठ जाता है... आदमी के शरीर में ट्यूबवेल धंसा देने वाले... पाकिस्तान जाकर... अकेले ही पूरी पफौज से लड़कर वापस आ जाने वाले। पर यकीन कीजिए हमारे हीरो चाचा ऐसे नहीं थे... बदन भी इकहरा... नाटा कद... सांवले... बहुत कम बोलते... चिल्लाते कभी नहीं। लेकिन हीरो से कम नहीं थे।
...न जाने कहाँ-कहाँ टकरा रहे हैं हीरो चाचा... जाने किस ट्रेन की किस बोगी में बैठे अपनी किताबों में खोए कौन-कौन से सपने बुन रहे हैं वो। जाने कौन सी सड़क उन्हें कहाँ ले जा रही है। किसी दोराहे-तिराहे पर खड़े अपनी किताबों को पलट कर कितनी बार देखते होंगे वो कि कौन सी राह होगी जिस पर चलने से वो पहुँच जाएँगे सपनों तक! मैं तो कहता हूँ बिना डरे-सहमे, बिना खाए-पीए, बिना रुपये-पैसे के वो किसी भी राह को चुनकर चलते चलें गए होंगे। उनके सामने पहाड़ आया होगा...धत्‌! बोलकर उसे अपने हाथों से बगल कर वे आगे बढ़ गए होंगे और उसी की पीठ पर लदा बादल उनका साथी बन गया होगा। बार-बार समझाने पर भी न मानने पर उन्हें गुस्सा आया होगा और पिफर छड़ी उठाकर उनने बादल को पीट दिया होगा। वही बादल मेरी तरह भरभराकर रो दिया होगा। नहीं मैं तो कहता हूँ दुखी नहीं कर सकते वे किसी को। वो तो जिद्दी बादल को वापस भेजने का उनका तरीका होगा जैसा कि वो अपने प्यारे कुत्ते मिक्की के साथ करते, जब खेत जाते वक्त वह मना करने पर भी उनका साथ धर लेता।
...बढ़ते-बढ़ते पिफर वो बढ़ गए होंगे किसी अद्भुत अदृश्य सपने की तलाश में। उन्हें नहीं पता कहाँ मिलेंगे वो। हमारे साथ हमारे गाँव में भी उन्होंने कम नहीं ढूंढ़ा। नदियाँ... तालाब... गाछ-वृक्ष...जंगल...कुएँ... गाय-गोरू के झुंड, जंगल-झाड़ों में पफसलों के बीच, खेतों की मेड़ पर। हर जगह... जहाँ उन्हें लगता। हर उस जगह जहाँ लोगों को नहीं लगता कि यहाँ भी कुछ हो सकता है।

किताब थी छोटी
उसमें एक महल था बड़ा
कहीं तहखाने में खजाना था एकउसकी छोटी सी चाबी थी कहीं
ढूंढ़ना जरूरी था सपनों को
बदलना जरूरी था दुनिया को

और सपनों को बदलने के लिए ही तो चला था होंडा भी! गोबर लीद और कचरे के बीच ही वह गया था एक बड़े शहर में। इतनी रोशनी में तो उसकी आँखें रहने की आदी ही नहीं थीं पिफर कैसे सपने और कैसी ख्वाहिशें। चूहे की तरह अंदर ही अंदर दौड़ लगाता रहा वो। छटपटाता रहा। अपने खानदान का पुअर होने का कलंक जल्दी से जल्दी धो डालने के लिए व्याकुल हो करता रहा भाग-दौड़।
सबसे पहले अपने खानदानी रंग-जमुनिया पफास्ट कलर-को पोंछ डालने के लिए उसने बाजार के विख्यात मॉल में एक मशहूर क्रीम खरीदी और बड़ा सा आईना लाकर उसके सामने खड़ा होकर चेहरे और बाँहों पर उसे लेप लिया। शाहरुख खान उसके सामने नाचने लगा... 'मर्द होकर लड़कियों वाली क्रीम क्यों! पफेयर एंड हैंडसम बनने के लिए इस्तेमाल कीजिए' ...चंद मिनटों में गोरा कर देने वाली क्रीम!
अगर आप चाहते हैं कि लड़कियाँ आपसे चिपकी रहें। अगर आप चाहते हैं कि 'द पाइपर आपफ हेमिलीन' की तरह लड़कियाँ आपकी मादक देह की धुन पर खिंची चली आएँ तो इस्तेमाल कीजिए धान के सड़े हुए पुआल और पेशाबी पसीने की गंध को दूर करने के लिए पावरपफुल डियोडरेंट! 'एक्स' 'वाइल्ड स्टोन' 'एटीन प्लस' 'इट गिव्स ए माचो पफीलिंग' ...बस बस कापफी है।
ये तो ट्रेलर है इस कहानी का। चलिए अनुमान लगाते हैं कि क्या-क्या हुआ होगा होंडा के साथ और हीरो चाचा के साथ। सोनी चैनल पर आने वाली सीआईडी में भी तो किसी के साथ हुए हादसे में मिले क्लू के आधार पर ही तहकीकात की जाती है... आइए हम और आप मिलकर खेलते हैं यह अद्भुत खेल... मापफ कीजिएगा मेरा ध्यान भटक कर सोनी पर आ रहे एक और महासीरियल कौन बनेगा करोड़पति पर चला गया... लेकिन देखिए मेरा उद्देश्य आपको भटकाना नहीं... बल्कि आपके अंदर के छिपे सीआईडी तक पहुंचना है ताकि आपकी प्रतिभा के साथ न्याय हो सके। कोई भी नहीं चाहेगा कि होंडा के साथ जो कुछ हुआ वह किसी और के साथ हो।
...दरअसल इसमें कोई बुराई नहीं कि किसी द्घटना के बारे में अनुमान लगाया जाए। हमारा सारा इतिहास लेखन हमारे पूर्वजों के क्रियाकलापों का अनुमान भर है। वो छोड़ क्या गए हैं टूटे-पफूटे खंडहर...कुछ गहने... टूटे हुए मटके.. और क्या? बस इतनी चीजों पर ही हम उनकी गतिविधि उनके पतन का इतिहास लिख डालते हैं तो पिफर होंडा और हीरो चाचा के बारे में क्यों नहीं!

पूरे एक साल तक होंडा उपर्फ करण कुमार उपर्फ करण रस्तोगी ठोकरें खाता रहा होगा... ऐसा अनुमान किया जाना चाहिए। कल ही उसकी डेड बॉडी बरामद हुई है और बॉडी की स्थिति देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि उसकी डेथ तीन दिन पहले हुई होगी यानी उसकी दूसरी किडनी इन्हीं दिनों निकाली गई होगी। ;यह अनुमान किया जाना बुरा नहीं है कि कोई जालिम भी दोनों किडनी एक साथ नहीं निकाल सकता। हो सकता है कि एक किडनी का दाम तय कर होंडा की एक किडनी निकाल ली गई और बाद में दूसरी का दाम तय होने के बाद दूसरी किडनी। हालांकि ऐसा भी हो सकता है कि दोनों किडनी एक ही साथ निकाली गई हो।द्ध
पिफर उसे शहर के उस बड़े रेलवे स्टेशन पर वेटिंग रूम में रोगी के समान ट्रीट करते हुए अर्थात्‌ सहारा देते हुए लाया गया होगा। भीड़ तो वहाँ होगी ही लेकिन लोग समझ रहे होंगे कि एक रोगी है। लाश को ऐसे लाया जा सकता है इसका किसी को अनुमान नहीं होगा। पिफर उसे वहीं लिटा के चादर से ढक कर कातिल चलते बने होंगे। दिन भर सोते रहने और कोई हरकत न करने के बाद लोगों का ध्यान उस ओर गया होगा और तब स्टेशन पर कापफी हलचल मच गई होगी। इस सिचुएशन के बाद आप चश्मदीद गवाह मुझे बना सकते हैं क्योंकि उस लावारिश लाश की पहचान मैंने ही होंडा के लाश के रूप में की जब उस बड़े स्टेशन के रिजर्वेशन काउंटर पर टिकट की बुकिंग करा रहा था। ''ओ माय गॉड!'' आप शायद शिवाजी साटम अर्थात्‌ सीआईडी के एसीपी प्रद्युम्न की तरह कह रहे होंगे या पिफर हाथ हिला-हिला कह रहे होंगे ''पता करो अभिजीत! पता करो दया!''
हो सकता है आप मुझे अपने शक के दायरे में लेना चाहें। ''इट्स ए हॉरिबल स्टोरी... इट्स केस ऑपफ प्रोपर बिट्रेयल! लेट्स पफाइंड आउट द इंगेजमेंट ऑपफ एनी किलर लेडी! किलर लेडी! इट्स आलवेज पॉसिबल।
...जाते वक्त होंडा अपने हॉस्टल के कमरे में कपड़े टांगने के खूंटे पर अपनी लगभग सारी प्यारी सर्ट छोड़कर गया था। उसकी प्यारी मरून कलर सर्ट जिसे वह लाल ही कहा करता, खूंटे पर ही टंगी थी। बैग-पाइपर की कुछ बोतलें और सिगरेट के कुछ डब्बे उसके टेबुल पर थे। उसने अपने जूते भी रूम में ही छोड़े हुए थे... यानी वह स्लिपर पहन कर ही गायब हुआ।

जरूरी नहीं कि दुनिया के अंत के समय
बड़ा धमाका हो और उसके बाद
अंत हो जाए सपनों का
सपनों के अंत के साथ ताश के महल के समान
दुनिया खत्म हो सकती है

रात हो गई है। और गाँव में वैसे भी रात कुछ ज्यादा ही लंबी होती है... न बिजली न बत्ती, बस लालटेन की पफीकी तंबई रोशनी! होंडा के द्घर से उसके माँ के सुबकने का स्वर भी दूर तक सुना जा सकता है। हम ठंड की दबिश महसूस कर सकते हैं जैसे कोई अपराधी और उसका परिवार पुलिस की दबिश महसूस करता है।
रामधन काका के दरवाजे पर अलाव के पास बैठे हैं हम। हमारे साथ दो बुजुर्ग हैं। एक रामधन काका और दूसरे सरजुग काका। हम दोनों बुजुर्गों का स्वागत करते हैं इस कार्यक्रम में जिसका नाम है... दो चरित्राों होंडा और हीरो चाचा में से एक हीरो चाचा के गायब होने के बाद उनके जीवन की संभावनाओं और उनकी मृत्यु की आशंकाओं के बीच उनके संद्घर्ष के पहलुओं की तलाश। यह बताते हुए कि होंडा की लाश तो जल चुकी है और हीरो चाचा के बारे में पूरा गाँव जानता है कि वे बड़े आदमी बन गए हैं। कहाँ बने? बड़ा आदमी का मतलब क्या? कोई नहीं जानता। इसलिए हम दोनों बुजुर्गों से सिपर्फ उनकी स्मृति में बसे हीरो चाचा की तस्वीर का विश्लेषण करेंगे। उन्हें यह एहसास नहीं होने देंगे कि हीरो चाचा आज भी गायब हैं। यह बारहवाँ साल है। अब कौन पूछेगा उस ट्रेन से जो उसे ले गई। हम सिपर्फ उनके सपनों के आधार पर जान सकते हैं कि वो कहाँ होंगे या होंगे भी कि नहीं। देखिए! जानता हूँ आप पिफर जोर से चिल्लाएँ और कहेंगे कि सोनी के सीआईडी के साथ आपने ये दूसरा कार्यक्रम शुरू कर दिया... इंडिया टीवी की तरह स्वर्ग और नर्क की यात्राा के रास्ते बताने लगे!
दरअसल ऐसा कुछ भी नहीं है। आपकी सुविधा के लिए बता दूँ मैं मुद्दे से भटक नहीं रहा। हीरो चाचा के बारे में भी मैं अपनी बचपन की स्मृति के आधार पर बहुत कुछ बता सकता हूँ। इस आधार पर आप मुझे भी एक गवाह के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।
हाँ सचमुच मुझे लगता है कि हमारी छोटी सी दुनिया को बदलने चल पड़े हीरो चाचा एक लंबे सपफर पर।...
एक ऐसा था बचपन
जैसे सपफेद दूध बिलकुल दूध की तरह
जैसे रसगुल्ला भक-भक सपफेद रसगुल्ले की तरह
और बतासा चिन्नी की तरह मीठा
बचपन बचपन की तरह ही मीठा

एक पूरे चाँद की रात में शहतूत के पौधों पर गिरती चाँदनी... और हमारी जिद शहतूत के खट्टे पफल तोड़ने की!... ऐसी ही एक और मादक चाँदनी रात... खेतों में पफसलों पर बरसता अमृत... पानी का सोता पफसलों के बीच जा रहा है और कुदाल लिए खड़े हीरो चाचा की बगल में खड़ा हूँ मैं... चाँद पानी में तैर रहा है...। मैं पूछता हूँ...
''ये खेत किसके हैं चाचा?''
''तुम्हारे हैं और किसके हो सकते हैं इतने सुंदर खेत।''
''ये चाँद किसका है?''
चाचा चुप हैं। पिफर अचानक हँसते हुए बोलते हैं
''इतना गोल मटोल चाँद तुम्हारे सिवा दूसरे का हो ही नहीं सकता।''
क्या वास्तव में ये खेत हमारे हैं। क्या लगता है उन पर किसी और की नज़र नहीं है!
सवाल अजीब हैं
जवाब कठिन हैं इनके
चलिए ढूंढ़ते हैं कोई आसान तरीका
चलिए सवाल को कर देते हैं आसान
छोड़िये बंद ही कर देते हैं सवाल करना

''इलाके में एक ही तो किसान था बबुआ। हीरो। क्या नहीं उपजाया उसने। ईख उगाया तो बांस जैसा मोटा। रस से सराबोर टमाटर उपजाया तो एक टमाटर सवा किलो का।... लाल लाल टमाटर देख के लोग-बाग गदगद हो जाएं। लेकिन न हाट में बिका न कोल्ड स्टोर खाली। पड़ा-पड़ा सड़ गया खेत में। पूरा गाँव छक कर खाया। सूद पर उठाया पैसा डूब गया। पिफर पटुआ का खेती किया लेकिन भाग का खेल देखो पटुआ तो इतना उपजा कि रखने की जगह नहीं और भाव भी खूब शुरू में लेकिन पिफर भाव जो गिरना शुरू हुआ... जो गिरना शुरू हुआ सो रुकने का ही नाम न ले। बहुत द्घाटा हुआ बहुत। पिफर सनक गया हीरो। खूब किताब पढ़ने लगा। शायद इसका काट किताब में ही खोजने लगा।''
''नहीं सरजुग काका! किताब तो वो पहले भी खूब पढ़ते थे।''
''पढ़ता तो था बिटवा पहले भी। लेकिन जब हीरो बीमार पड़ा। का कहे उ बीमारी को मैजाइटिस।''
''काका मेनेंजाइटिस! मस्तिष्क ज्वर।''
''हाँ! और बचने की कोई उम्मीद नहीं थी तब तुम्हरे पापा शहर ले गए हीरो को और डॉक्टर से कहा जितना पैसा खरच होगा तो होगा पर बचा लीजिए इसे। और लाख रुपया खरच हुआ होगा। और ई देखो बहुत पहले रेल में चढ़ते बखत रामधन को मिला था। अब क्या सुनते हैं कि बड़ा आदमी बन गया है। चलो अच्छा हुआ। भगवान ने न्याय कर दिया हीरो के साथ।''
क्या आप भी न्याय और अन्याय को मानते हैं? क्या आप भी पुण्य और पाप, स्वर्ग या नर्क को मानते हैं। अगर हाँ तो अभी भी वक्त है होशियार हो जाइए। इधर बेचारे होंडा उपर्फ करण कुमार उपर्फ करण रस्तोगी के पिता मास्टर साहब! बुरा हाल है उनका। सच कहूँ तो उन्होंने शायद ही अपने जीवन में कोई पाप किया हो। वे स्कूल भी बिना नागा किए जाते रहे। किसी से भी झगड़ा नहीं, किसी तरह का कोई लपफड़ा नहीं। अपने बेटे को उन्होंने अच्छे संस्कार दिए पिफर क्यों...।
''मैं जानता था कि हीरो चाचा साधु नहीं हो सकते''
ये बात मैंने तब कही थी जब हीरो चाचा के साधु के रूप में भिक्षा मांगने की अपफवाह पफैली थी। छोटी बुआ के द्घर एक साधु को पकड़ कर रखा गया था जो सारंगी बजाते हुए भिक्षा मांगता था। उसके झोले में भी किताबें थीं और उसका चेहरा हीरो चाचा से बहुत मिलता था। वह बार-बार कहता कि वह ज्ञानीदास है हीरो नहीं। लेकिन लोग उसकी सुनते ही नहीं। कहा जाता है कि जब तक कोई साधु अपनी बहन से भिक्षा न ग्रहण कर ले तब तक उसका धर्म सपफल नहीं होता। लेकिन छोटी बुआ को ख्याल आया कि हीरो की जांद्घ पर बड़ा सा काला तिल था... और वह साधु अपने कपड़े हटाने ही न दे। बड़ी मसक्कत के बाद उसके कपड़े हटाए गए... लोग देखकर अवाक थे कि तिल नहीं था।... वो हीरो चाचा नहीं थे...
किसी ने ऐसा रिक्शा बनाया है जो सड़क पर चलने के साथ पानी पर तैर सकता है। किसी ने ऐसा ठेला बनाया है जिसमें स्कूटर का इंजन लगाकर कम खर्च में तेज सामान ढो सकता है... कहाँ है सरकार! और कहाँ है इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट की संस्था। कंपनी के इस उत्तरआधुनिक युग में जुगाड़ टेक्नोलॉजी को पेटेंट कौन देगा। कौन इन कमारों को इन लोहारों को वैज्ञानिक द्घोषित करेगा जो पढ़े-लिखे नहीं हैं लेकिन काम के औजार बनाने में उस्ताद! आप कहेंगे कि मैं कहाँ भटक रहा हूँ! नहीं नहीं मैं भटक नहीं रहा मैं तो हीरो चाचा की बात कह रहा हूँ... कितनी ही चीजें बनाई थीं उन्होंने उन दिनों! दुनिया में कोई भी चीज पफालतू नहीं है। सबका उपयोग है अगर आप उपयोग करना जानें। अपनी साइकिल वो खुद ठीक करते... पंपिंगसेट की मशीन कम तेल खाए इसके लिए भी उन्होंने दिमाग लगाया। कहीं भी कोई चीज गिरी मिलती... आलपीन, लोहे की राड... सबका कोई न कोई काम में इस्तेमाल कर लेते हीरो चाचा।... मुझे तो लगता है कि इन्हीं सब प्रश्नों से जूझते... दो-दो हाथ करते निकल गए हीरो चाचा बु( की तरह ज्ञान प्राप्त करने... कोई अदृश्य शक्ति से अपने को लैस करने...। बु( ने मृत्यु, रोग और वृ(ावस्था से लड़ने की खातिर... द्घर छोड़ा। लेकिन हीरो चाचा भौतिक समस्याओं से लड़ने के लिए ढूंढ़ रहे हैं कोई उपाय...
समंदर को चीरना था बड़ी आरी से
पहाड़ों को दोनों हाथों से हटाना था
बने हुए रास्तों से अलग एक रास्ता बनाना था

''माई नेम इज करण रस्तोगी उपर्फ होंडा! ओ सिट! आई मीन माइसेल्पफ इज करण रस्तोगी! आई एम ए ओ नो! आई एम नथिंग बट प्लीज सर! आई नीड ए जॉब आई वांट टू पफुलपिफल माई ड्रीम। आई नीड मनी सर! आई वांट टू बी ए मिलयेनेयर।''
''ओके ओके मिस्टर! आई नो आई नो। यंग पीपुल हैव ए ड्रीम लाइक बटरफ्रलाई! माई नेफ्रयू आशीष हैज सेड एवरीथिंग एबाउट यू!''
आप विश्वास नहीं करें, लेकिन मेरे हिसाब से होंडा के साथ कुछ ऐसा ही हुआ होगा। उसके कॉलेज में कोई करोड़पति द्घराने का बनावटी लड़का मिला होगा और करोड़पति बनाने के सपनों के साथ उसे ले गया होगा किसी आलीशान दफ्रतर में... और जैसा कि आप जानते हैं कि बड़े शहरों में ऐसे रईशजादे थोक के भाव में मिलते हैं।

सपनों के पंख कुतर डालेंगे खूंखार जानवर
और किसी स्ट्रीटलाइट के नीचे मिलेंगे बेपंख कबूतर
भीड़ लगेगी इर्द-गिर्द पर नहीं चीन्हेगा कोई
क्योंकि उड़ान भरते पंछी ही पहचानते हर कोई

और होंडा एक कबूतर की तरह ही पकड़ में आ गया होगा शिकारी के।
दुनिया एक रोगी है और उसके लिए दवा तैयार करने में कंपनियों के खरीदे वैज्ञानिक जुटे हैं खबास की तरह। इतना पैसा है इतना खाना है कि लोग मोटे हो रहे हैं... दुनिया में इतनी मिठास है कि लोगों को इन्सुलीन की सुई चाहिए मिठास को पचाने के लिए... और कंपनियों ने ठेका लिया है इस दुनिया को निरोग बनाने के लिए!... प्रयोग पर प्रयोग हो रहे हैं...बंदरों पर... चूहों पर... खरगोशों पर ...और जानवर जैसे इंसानों पर... जो अपने पेट के लिए अंग बेचते हैं... खून बेचते हैं...। जो रोग जहाँ नहीं है वहाँ भी लोगों को दवाइयाँ खिलाई जा रही हैं...। होंडा को भी कई दवाइयाँ खिलाई गई होंगी... उसे भी बेहोशी का इंजेक्शन दिया गया होगा। ...उसके सस्ते शरीर पर भी खबास वैज्ञानिकों ने प्रयोग किए होंगे... किसी बड़े पिंजड़े में जकड़ कर रखा गया होगा... होंडा को... रह रह के जब उसे होश आता होगा तो वह... चिल्लाता होगा... आई वांट टू बी ए मिलयेनेयर सर! प्लीज लीव मी! आई वांट टू बाय ए लक्जरी होंडा कार सर!... मुझे अपने पिता को कार दिखानी है... मुझे अपने खानदान का नाम
रोशन करना है... पर भुक्खड़ शिकारी नहीं माने होंगे। एक साल कम नहीं होता... और उस एक साल तक होंडा अपनी वही सर्ट और वही पेंट पहने रहा होगा... उसकी प्यारी मरून कलर की सर्ट तो हॉस्टल के कमरे में ही टंगी है... उसकी सर्ट भी उसी तरह द्घिस-द्घिस कर रद्दी हुई जैसा द्घिस-द्घिस कर खुद होंडा रद्दी बन गया...।
''ब्रूटल कीलिंग इन ब्रॉड डे लाइट। इट्स ए होरिबल स्टोरी।''
मुझमें अब इतना साहस नहीं कि आपको सीआईडी के शिवाजी साटम की तरह इस कहानी के अंतिम तक ले जा सकूँ... अपराधी को पकड़ कर आपके सामने कर सकूँ और कह सकूँ कि तुमको तो पफांसी होगी!... किस किस को पफांसी देंगे...।
...रात कापफी हो चुकी है सो जाइए आप... पिफर सोनी पर कोई हॉरर सीरियल शुरू हो जाएगा।

...मैं सोने के बाद नींद में एक सपना देखना चाहता हूँ... जानता हूँ हकीकत में ऐसा नहीं हो सकता। पिफर भी मैं देखना चाहता हूँ कि हीरो चाचा... ट्रेन से उतरे हैं... किताबें अब भी उनके पास... और जैसा कि रामधन काका कहते हैं कोई बड़ा आदमी बन गया है हीरो ठीक वैसा ही... और होंडा अपनी होंडा कार से चश्मा लगाकर उतरा है और कह रहा है... हैलो! मास्टर साहब!... और भीड़ जमा है... मास्टर साहब के दरवाज़े पर भी... छोटे से स्टेशन पर भी... मास्टर साहब भी हैरान हैं और मैं भी... पता नहीं आप हैरान हैं या नहीं...।

 
 
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