शोहरत
बंद कमरे में मैं
अपनी नन्ही पौत्राी से बाल-संवाद कर रहा था
लग रहा था कि
दुनिया का सारा सुख इस संवाद में समा गया है
किवाड़ पर दस्तक हुई
किवाड़ खोल पूछा 'कौन हैं आप?'
'मैं शोहरत हूँ'
'तो आइए, अंदर बैठिए'
'नहीं मैं बैठने नहीं आई हूँ
तुमसे यह कहने आई हूँ कि
तुम द्घर के अंदर क्यों द्घुसे रहते हो
मुझे पाने के लिए मेरे पीछे दौड़ना पड़ता है
यहाँ-वहाँ, न जाने कहाँ-कहाँ
देख नहीं रहे हो |
दौड़ मची हुई है'
मैं मुस्कुराया, बोला-
''तो जाओ न उनके साथ जो दौड़ मचाये हुए हैं
मुझे तो तुम जितना मिल चुकी हो, बहुत है
और हर बार तो तुम स्वयं चलकर
मेरे द्घर आई हो''
''हाँ लेकिन अब लोगों की गहन बाजारू दौड़ में
इतनी पफंस गई हूँ कि
किसी के द्घर जाने का अवसर ही नहीं मिलता
बड़ी मुश्किल से थोड़ा समय निकाल कर
आई हूँ तुम्हें परामर्श देने''
''आई हो तो एक नेक काम कर जाओ न
देखो, मेरे पड़ोस के अनेक द्घरों में
मुश्किल से कभी-कभी चूल्हा जल पाता है
एक दर्द उनमें हाहाकार करता रहता है चुपचाप
तुम उनकी आवाज बन जाओ न
उनके दर्द को उन तक पहुँचा दो
जो अभागों के हमदर्द मसीहा कहे जाते हैं''
वह चुपचाप खड़ी रही
पिफर बोली-''मैं अभागों की पुकार नहीं हूँ
मैं तो भाग्यवानों का जय जयकार हूँ''
मैं किवाड़ बंद करके कमरे में आ गया
''वह कौन थी दादा जी?'' बच्ची ने पूछा
''बेटी, एक थी, जो साथ लग जाती है तो
आदमी का खुले रूप में
खाना-पीना, चलना-पिफरना, रोना-हँसना मुहाल हो जाता है
वह अपने द्घर में भी
अपने द्घर का नहीं रह पाता''
बच्ची अबूझ भाव से देखती रही
शायद सोचती रही कि
आखिर यह कौन-सी बीमारी है
बीज
वह हँस रहा था
''क्या बात है?'' मैंने पूछा
वह हँसता ही रहा
पिफर बोला-
''उसकी मूर्खता पर हँस रहा हूँ''
''किसकी मूर्खता पर?''
''बात यह है बंधु
हम दोनों प्रतिस्पर्धी बीज
एक साथ पार्क की इस गीली धरती पर आ गिरे मैं तो सरकता-सरकता
कुछ सूखी जमीन पर आ गया
लेकिन वह मूर्ख सरकता-सरकता
कीचड़ की ओर चला गया
और धरती में समा गया
बेचारा...''
मैं हँसने लगा
''आप क्यों हँस रहे हैं?'' उसने पूछा
''बस पड़े रहो खुद जान जाओगे
दो चार दिन में''
कुछ दिन बाद वहाँ पहुँचा तो देखा
वह बहुत उदास था
और उससे थोड़ी दूर पर
एक नन्हा पौधा हँस रहा था
उसकी नन्हीं-नन्हीं लाल-लाल पत्तियाँ
हवा में स्पंदित हो रही थीं
''क्या बात है, उदास क्यों हो दोस्त?''
''क्या बताऊँ बंधु
लगता है भीतर से सूख रहा हूँ
और मेरे प्राण अब गये कि तब गये''
''तुमने उस दिन पूछा था न
कि मैं क्यों हँस रहा हूँ
देखो
तुम्हारा प्रतिस्पर्धी दोस्त
धरती के भीतर जाकर नष्ट नहीं हुआ
उसने अपने को एक पौधे के रूप में रच लिया
यह पौधा धीरे-धीरे बड़ा होकर
एक छतनार पेड़ बन जाएगा
पफूलों और पफलों से लद जाएगा
कितने ही लोग उसकी शीतल छांह में
अपनी थकन मिटाएंगे, गुनगुनाएंगे
परस्पर सुख-दुख की बातें करेंगे
आँतुएं और मौसम
उससे नवजीवन-संवाद करेंगे
पंछी पफल खाएंगे, चहचहाएंगे
और उसके पफलों में
न जाने कितने और पेड़ समाये होंगे
वह तो पेड़ों की परंपरा है
तुम तो अपने को बचाते हुए
सिमटे रहे अपने में
तुम नहीं जान सके कि
जो देता है वही पाता है
और धरती तो अक्षय रसवंती है
जो उसके भीतर से जुड़ जाता है
वह जीवन संगीत बनकर बाहर पफूटता है
और उसका राग छा जाता है दिशाओं में''
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