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कुछ थे जो कवि थे
कुछ थे जो कवि थे
उनके निजी जीवन में
कोई उथल-पुथल भी नहीं थी
सिवाय इसके कि वे कवि थे।
वे कवि थे और चाहते थे
कि कुछ ऐसा कहें और लिखें
कि समाज बदल जाये
बदल जाये देश की सभी
प्रदूषित नदियों का रंग
धसकते पहाड़ बच जायें
और बच जायें उनके ग्लेशियर भी।
कटे हुए पेड़
पिफर से अंकुरित होने लग जायें
पृथ्वी के देह का हरापन
आँखों की नमी बच जाये।
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कुछ थे जो कवि थे
वे कला की दुनिया में भी
छोड़ जाना चाहते थे अमिट छाप
इसके लिए वे कापफीहाउसों में
खूब बहसें किया करते थे
वे लिखा करते थे
बड़े-बड़े विचारों से भरे आलेख
कविता पर उनकी टिप्पणियाँ
उनकी नज़रों में
बहुत महत्व रखती थी।
पर वे उन रास्तों पर भी
संभल-संभल कर चलते थे
जहाँ दौड़ा जा सकता था।
वे उस सभा में भी
गुप-चुप रहा करते थे
जहाँ आतताइयों के खिलापफ
बोला जाना चाहिए
एक आध शब्द ज़रूर।
पर वे आश्वस्त थे
अपने किये पर कि
कविता में पकड़ लिया है
उन्होंने अंतिम सत्य।
उन्हें अपने किये पर गर्व था
इसके लिए वे पा लेते थे
बड़े-बड़े पुरस्कार भी
वे तालियाँ भी ढूंढ़ लिया करते
और प्रशंसा भी यहाँ तक कि
सुखों के बीच सोते जागते हुए
ढूंढ़ लेते थे दिखावटी दुख भी।
वे जब कीमती शराब पी रहे होते
या भूने काजू खा रहे होते
उस वक्त भी वे इस तरह जतलाते
जैसे वे दुख ही खा-पी रहे हों।
वे जब जहाज पर सौभाग्य से कहीं जाते
तो दूर-दूर तक सभी को बतला देते
पर जब लोगों से मिलते
तो ऐसा जतलाते जैसे ये इतनी सारी थकान
उन्हें पैदल चलने से ही हुई है।
वे जब तिकड़में करते
या किसी अच्छी रचना की
हत्या की सुपारी लेते या देते
तो ज़रा भी अपराध बोध से
ग्रस्त नहीं होते
यह उनके व्यक्तित्व का
असाधारण पाजटिव गुण था
वे अमर होना चाहते थे
इसके लिए वे प्रयत्न भी
खूब किया करते थे।
वे अपनी प्रशंसा में खुद ही
बड़े-बड़े वक्तव्य देते
अपनी रचना को सदी की
सर्वश्रेष्ठ रचना द्घोषित कर देते
इस तरह की हरकतों को वे
साहित्य में स्थापित होने के लिए
ज़रूरी मानते थे।
वे सामाजिक प्राणी थे
उनके कुछ मित्रा थे
कुछ शत्राु भी
वे मित्राों से मित्राता
न भी निभा पाये हों कभी
पर शत्राुओं से शत्राुता
दूर तक निभाते थे।
वैसे उनका न कोई
स्थाई शत्राु था और न कोई
स्थाई मित्रा ही।
कुछ थे जो कवि थे
उनके निजी जीवन में
कोई उथल-पुथल नहीं थी
सिवाय इसके कि वे कवि थे।
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