दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कविता

उपेन्द्र कुमार

 

जन्म : सितंबर १९४७
ग़८ाल और कविता के कई संग्रह प्रकाशित। हिन्दी अकादमी समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित। आथर्स गिल्ड ऑपफ इंडिया के उपाध्यक्ष। पिफलहाल महात्मा गाँध्ी अंतराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्ध में अध्किारी।
एपफ-७३, ईस्ट ऑपफ कैलाश
नई दिल्ली-६५



  उपेन्द्र कुमार

जो मैं लिखता हूँ

मालूम है
जो मैं लिख रहा हूँ
वह आज के लिए नहीं है
शायद कल के लिए भी नहीं है।

लेकिन जब भी जानेंगे
ये अलसाए, सुस्त पड़े सोए लोग
तो निश्चय ही पढ़ेंगे कविताएँ
जुबान पर आते ही जिनके
शब्द-शब्द जल उठेंगे मशालों की तरह
लपटें झूम-झूम नाचेंगी
उसी कविता की लय पर
जिसे मैं आज

 

लिख रहा हूँ

रौशनी में पकड़े जाएँगे
सारे नकली रंग
रंगे सियारों के
गल जाएँगे मुखौटे
नंगे हो जाएँगे वे
ज़रूरी है जिनका नंगा होना
सही पहचान के लिए
आज भी और कल भी

जागेंगे
गुपफा कंदराओं की ओर
जबरन हाँक दिए गए लोग
निर्मम अत्याचारों की बारिश में नहाए लोग
रंगीन वायदों के लालच में बहका दिए गए लोग
विवशता की लोरियाँ सुना सुला दिए गए लोग
जागेंगे

जागेंगे वैसे ही
जैसे आए हैं जागते पहले भी
इतिहास गवाह है
जब भी जागते हैं लोग
खोज लाते हैं पहले से बेहतर
गढ़ लेते हैं पहले से सुंदर
झटके से बदल लेते हैं सब कुछ
समय की धीमी आँच पर
दहकते अदहन में जिसका
कुछ हिस्सा सींझता है, कुछ जलता है
और कुछ उपफन हो जाता है बटलोही से बाहर

अबकी जब जागेंगे लोग
नहीं होंगे विवश
भीड़-तंत्रा को कहने के लिए प्रजातंत्रा
वे खोजेंगे
साम्यवाद, समाजवाद, नक्सल और माओवाद
से बेहतर कुछ
वे बनाएँगे गिलोटिन से बेहतर कुछ
तोडंगे वर्सेई की दीवारों से भी ऊँचा कुछ
और जब हो रहा होगा यह सब
तब पढ़ी जा रही होंगी कविताएँ
कितना सकूनदेह है
कितना संतोषप्रद
यह जानना
कि अबकी बार
जब होने को होगा यह सब कुछ
तो मेरे शब्द
निकाल रहे होंगे काँटे
नई राहों की खोज में भटकते पाँवों से
अबकी बार जब जागेंगे लोग
चूमेंगी उनका मुँह मेरी कविताएँ
हाँ निश्चय ही
यही होगा वो समय
जब पढ़ी जाएँगी मेरी कविताए

 
 
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