दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
खबरनामा

श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में श्र(ांजलि सभा

 

प्रख्यात हिन्दी कथाकार श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित श्र(ांजलि सभा में लगभग सभी वक्ताओं ने उन्हें केवल व्यंग्यकार के रूप में मान्यता देने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसा करके

 

   
हम उनके विशाल और विविधतापूर्ण रचनाकर्म को नज़रअंदाज कर रहे हैं। साहित्य अकादेमी के सभागार में आयोजित इस श्र(ांजलि सभा में सबसे पहले श्रीलाल शुक्ल जी की

पुत्रावधू साधना शुक्ल ने अकादेमी को इस आयोजन के लिए तथा उपस्थित सभी लेखकों/पत्राकारों को धन्यवाद दिया।
अकादेमी के उपाध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने नए लेखकों के प्रति उनकी उदारता को याद करते हुए कई संस्मरण सुनाए। अज्ञेय पर गोरखपुर विश्वविद्यालय में उनके दिए गए वक्तव्य को याद करते हुए उन्होंने कहा कि इतने

विद्वतापूर्ण व्यक्तित्व को केवल व्यंग्य लेखक मान लेना बहुत गलत है। प्रभाकर श्रोत्रिाय ने कहा कि उनके जाने से लखनऊ का साहित्यिक आकाश सूना हो गया है। वे नम्रता की पराकाष्ठा थे। उन्होंने व्यंग्य में जो प्रबंधात्मकता और महाकाव्यता पैदा की वह दुर्लभ है। वह संभवतः लेखकीय गरिमा के अंतिम प्रतीक थे।
विश्वनाथ त्रिापाठी ने उन्हें स्वतंत्रा भारत का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला हिन्दी लेखक बताया शुरू में आलोचकों ने 'राग दरबारी' की उपेक्षा इसलिए की कि वे उस समय व्यंग्य उपन्यास की कल्पना ही नहीं कर सकते थे। उन्होंने उनके संस्कृत, उर्दू, संगीत की व्यापक समझ और स्वाभिमान की भी चर्चा की। प्रयाग शुक्ल ने उन्हें हर बार चौंकाने वाला रचनाकार बताया। मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने लखनऊ में बंदी रहने के दौरान जेल में आकर मिलने की चर्चा करते हुए कहा कि श्रीलाल जी ने कभी रचना के सांचे को
दोहराया नहीं। मंगलेश डबराल ने उनके लेखन के विस्तृत दायरे की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने उत्तर भारत की राजनैतिक व्यवस्था और सर्वण समाज की पतनशीलता को बेहद विश्वसनीयता के साथ चित्रिात किया। उन्होंने उत्तर भारत के समाज का नया रूपक सामने रखा। वे पहले साहित्यकार थे, जिन्होंने दलित साहित्य का पक्ष लिया।
कृष्णदत्त पालीवाल ने उन्हें अखण्ड व्यक्तित्व का रचनाकार बताते हुए कहा कि उनमें कहीं कोई दोहराव नहीं है। वो जो कहते थे वह करते थे।
श्र(ांजलि सभा में कैलाश वाजपेयी, प्रो. इंद्रनाथ चौधरी, उद्भ्रांत, गंगा प्रसाद विमल, और पद्मा सचदेव ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
अंत में ब्रजेन्द्र त्रिापाठी ने साहित्य अकादेमी द्वारा तैयार शोक प्रस्ताव पढ़ा और उपस्थित सभी लोगों ने खड़े होकर एक मिनट का मौन रखा।

ई.पी. चेलीशेव के ९०वें जन्मदिवस पर कार्यक्रम

''ई.पी. चेलीशेव ने भारतीय साहित्य का जिस प्रगतिशील और लोकतंत्रावादी दृष्टि से मूलयांकन किया वह अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने हिन्दी के सहारे भारतीय साहित्य/समाज/संस्कृति की विविधता को पहचाना। ऐसा पहले किसी विदेशी भारतविद् ने नहीं किया'' उपरोक्त विचार साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष और प्रसि( कवि/आलोचक डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने रूस के महान एकेडमिशियन, शिक्षाविद्, विचारक, लेखक, अनुवादक और साहित्य अकादेमी के महत्तर सदस्य तथा पद्मभूषण प्राप्त ई.पी. चेलीशेव के ९०वें जन्मदिवस पर भारत स्थित रशियन पफ़ेडरेशन के राजदूतावास के साथ आयोजित कार्यक्रम में कहे।
विशिष्ट-अतिथि के रूप में बोलते हुए डॉ. नामवर सिंह ने कहा कि साहित्य अकादेमी पहली बार किसी विदेशी विद्वान को इतनी कृतज्ञता से याद कर रही है यह उनके बहुमुखी व्यक्तित्व को सि( करता है। उनके द्वारा सुमित्राा नंदन पंत पर लिखी गई किताब उन पर सबसे पहले लिखी गई महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में से एक है। उन्होंने उनमें 'लिरिक हीरो' की अनूठी कल्पना की थी जो पहले या बाद में सामने नहीं आई। वे पंत के बाद अरविंद दर्शन से भी प्रभावित हुए।
इस अवसर पर अपने उद्द्घाटन वक्तव्य में रूस के
राजदूत महामहिम अलेक्जेंडर एम. कदाकिन ने साहित्य
अकादेमी और भारत सरकार को चेलीशेव को ९०वें जन्मदिवस पर याद करने के लिए बधाई देते हुए कहा कि चेलीशेव भारत-रूस की ऐतिहासिक मित्राता की सच्ची मिसाल हैं।
केदारनाथ सिंह ने कहा कि चेलीशेव की सबसे बड़ी विशेषता अपने को लगातार बदलते और संशोधित करते रहने की थी। हिन्दी पठन-पाठन के क्षेत्रा को व्यापक करने और रूस के अतिरिक्त यूरोप तक पहुँचाने में उनका बहुत बड़ा हाथ है।
कार्यक्रम में गंगा प्रसाद विमल, प्रो. वयराम सिंह, पंकज मालवीय, प्रो. जितेन्द्र रद्घुवंशी, प्रो. रामाधिकारी कुमार, रंजना बनर्जी, रणजीत कुमार साहा, देवशंकर नवीन और
देवेन्द्र चौबे ने भी अपने विचार रखे। धन्यवाद ज्ञापन अकादेमी के उपसचिव के. श्रीनिवास राव ने किया।

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में संगोष्ठी

हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के सहयोग से हुई त्रिादिवसीय जन्मशती ;अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन एवं केदारद्ध हुई। राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्द्घाटन अक्टूबर १९, २०११ को मध्यान्ह २ बजे हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोपफेसर रामकृष्ण रामास्वामी ने किया।
अपने स्वागत भाषण में मानविकी संकाय के प्रभारी अध्यक्ष प्रोपफेसर के. नारायण चंद्रन ने अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन एवं केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशती के अवसर पर इन कवियों के महत्व पर संक्षेप में प्रकाश डालते हुए भारत के विभिन्न भागों से पधारे विद्वानों के प्रति आभार व्यक्त किया।
राष्ट्रीय संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए हिन्दी विभाग के अध्यक्ष, प्रोपफेसर रवि रंजन ने देश-विदेश में आयोजित विभिन्न संगोष्ठियों के साथ ही अनेकानेक पत्रा-पत्रिाकाओं के विशेषांकों के चलते इन रचनाकारों के मूल्यांकन के क्षेत्रा में बदलते मॉडल या प्रादर्शों को दृष्टिपथ में रखते हुए विद्वानों से अपनी बात रखने का आग्रह किया। जिससे दक्षिण भारत के इस हिस्से में हिन्दी भाषा एवं साहित्य के अध्ययन-अध्यापन में संलग्न छात्रा एवं प्राध्यापक इन कवियों के पुनर्मूल्यांकन के नए क्षितिज एवं संदर्भ से परिचित हो सकें।
अपने उद्द्घाटन भाषाण में भारत के जाने-माने वैज्ञानिक एवं हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोपफेसर रामकृष्ण रामास्वामी ने हैदराबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की अकादमिक सक्रियता की सराहना की।
उद्द्घाटन सत्रा में बीज व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए गुजरात विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की प्रोपफेसर रंजना अरगडे़ ने कहा ''भारतीय साहित्य के अध्येता के रूप में २०११ के आते ही धीरे-धीरे क्रमशः हमारे सामने यह संयोग और आश्चर्य खुलता गया कि यह पफैज़ अहमद पफैज़ तथा मजाज़ का भी शताब्दी वर्ष है। यह तेलुगु कवि श्री श्री एवं गुजराती कवि उमाशंकर जोशी, श्रीधारानी तथा प्रहलाद पारेख का भी शताब्दी वर्ष है... हर पीढ़ी अपनी-अपनी समझ और रुचि के अनुकूल रचनाकारों को स्वीकार करती ही है। प्रश्न इतना ही है कि हम इन रचनाकारों को आज उस माध्यम के द्वारा नई पीढ़ी तक ले जाएँ।''
शमशेर बहादुर सिंह की रचनाशीलता पर केंद्रित संगोष्ठी के प्रथम सत्रा की अध्यक्षता महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के साहित्य संकाय के अध्यक्ष प्रोपफ़ेसर सूरज पालीवाल ने की। इस सत्रा में मुंबई से पधारे सुप्रसि( हिन्दी आलोचक विजय कुमार ने शमशेर की सौंदर्य-चेतना एवं शिल्प वैभव का सोदाहरण जिक्र करते हुए उनके महत्व पर प्रकाश डाला। सुप्रसि( कवि लाल्टू ने शमशेर की बच्चों पर लिखी कविताओं में चाँद की बिम्बात्मकता पर नए सिरे से विचार किया। अध्यक्षीय भाषण प्रस्तुत करते हुए प्रोपफ़ेसर सूरज पालीवाल ने शमशेर के गद्य पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उसमें निहित भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को खास तौर पर रेखांकित किया।
२० अक्टूबर को प्रातः ९ः३० बजे डॉ. बी.आर.
अम्बेडकर सभागार में 'अज्ञेय' के साहित्य पर केंद्रित संगोष्ठी के दूसरे सत्रा की अध्यक्षता हिन्दी के बहुभाषाविद विद्वान, कन्नड़-हिन्दी के ख्यात अनुवादक एवं मौलाना आजाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोपफ़ेसर टी.वी. कट्टीमनी ने की। इस सत्रा में केंद्रीय हिन्दी संस्थान के हैदराबाद केंद्र की प्रोपफ़ेसर अनिता गांगुली ने अज्ञेय के साहित्य पर पाश्चात्य प्रभाव की सविस्तार चर्चा की। अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की प्राध्यापिका डॉ. प्रियदर्शिनी ने अज्ञेय के साहित्य में स्वातंत्रय की चेतना को सोदाहरण रेखांकित किया। 'पाखी' पत्रिाका के संपादक प्रेम भारद्वाज ने 'शेखर एक जीवनी' उपन्यास का पुनर्मूल्यांकन करते हुए कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े किये। हिन्दी विभाग के डॉ. आलोक पाण्डेय ने अज्ञेय की
पत्राकारिता को केंद्र में रखकर प्रपत्रा प्रस्तुत किया। अंत में इस सत्रा के अध्यक्ष प्रोपफ़ेसर टी.वी. कट्टीमनी ने अज्ञेय के बारे में कई संस्मरण सुनाते हुए उनके महान रचनात्मक व्यक्तित्व के प्रति अपनी श्र(ा व्यक्त की।
नागार्जुन के साहित्य पर केंद्रित तृतीय सत्रा में हिन्दी विभाग के डॉ. भीम सिंह एवं डॉ. एम. आन्जनेयुलु, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद के हिन्दी हिन्दी विभाग के डॉ. अभिषेक रोशन एवं डॉ. रेखा रानी तथा हिन्दी विभाग की शोध छात्राा डी. हेमलता ने नागार्जुन-साहित्य के विविध आयामों पर नए सिरे से विचार किया। इस सत्रा की अध्यक्षता सूरज पालीवाल ने की। अपने संबोधन में उन्होंने नागार्जुन के 'बलचनमा' की 'मैला आँचल' से सविस्तार तुलना करते हुए नागार्जुन की प्रगतिशीलता को खास तौर से रेखांकित किया।
विभाग के विद्यार्थियों ने अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन, केदार, मुक्तिबोध, रद्घुवीर सहाय एवं विनोद दास जैसे कवियों की विभिन्न कविताओं के चुने हुए अंशों पर आधारित एक नाटक प्रस्तुत किया।
२१ अक्टूबर को प्रातः ९ बजे केदारनाथ अग्रवाल की कविता पर केंद्रित सत्रा में हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के डॉ. जे. आत्माराम एवं पुड्डुचेरी विश्वविद्यालय की हिन्दी विभाग की प्राध्यापिका डॉ. पआप्रिया ने क्रमशः केदार के कविता की प्रगतिशीलता एवं स्त्राी पक्ष पर प्रपत्रा प्रस्तुत किया। इस सत्रा में विभाग के दो शोध छात्राों श्री ए. बाबूराव एवं तेलकीकर संतोष तुकाराम-ने भी प्रपत्रा प्रस्तुत किये। अपने अध्यक्षीय भाषण में केंद्रीय हिन्दी संस्थान के हैदराबाद केंद्र के प्रोपफ़ेसर हेमराज मीणा ने केदार की कविता में किसानी संवेदना को रेखांकित करते हुए उनके साहित्य पर समय-समय पर प्रकाशित कई दुर्लभ सामग्रियों की सूचना दी।
मुख्य अतिथि के रूप में विचार व्यक्त करते हुए केंद्रीय हिन्दी संस्थान, हैदाराबाद केंद्र की क्षेत्राीय निदेशक प्रोपफ़ेसर शंकुतला रेड्डी ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा किये गए इस आयोजन की सराहना करते हुए भविष्य में भी संस्थान की ओर से इस तरह के आयोजनों में यथासंभव सहायता देने का आश्वासन दिया। समापन व्याख्यान देते हुए विजय कुमार ने अज्ञेय, शमशेर,
नागार्जुन एवं केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं के संदर्भ में इक्कीसवीं सदी में हिन्दी कविता की चुनौतियों की विस्तार से चर्चा करते हुए इन कवियों के महती योगदान पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के अंत में विभिन्न प्रतियोगिताओं में सपफल विद्यार्थियों को मुख्य अतिथि प्रोपफ़ेसर शंकुतला रेड्डी ने पुरस्कृत किया। धन्यवाद ज्ञापन संगोष्ठी के निदेशक एवं विभागाध्यक्ष प्रोपफ़ेसर रवि रंजन ने किया।

कहानी संग्रह 'सातवीं औरत का द्घर' का लोकार्पण

१७ अक्टूबर को साहित्य अकादेमी के सभागार में कथाकार नीला प्रसाद के पहले कहानी संग्रह 'सातवीं औरत का द्घर' का लोकार्पण सुप्रसि( साहित्यकार राजेन्द्र यादव ने किया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने की। कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कथाकार और पत्राकार प्रियदर्शन ने कहा कि यह एक लगातार खामोशी से रचनाकर्म करती रहने वाली कथाकार के संग्रह का विमोचन है, जिनकी कहानियों में नारी अस्मिता की बारीक और सटीक अभिव्यक्तियां हैं। कामकाजी महिला की ऐसी कहानियाँ कम ही लोगों के पास हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत में युवा कथाकार अनुज ने नीला की कहानियों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कहानियों में कथानक और परिस्थितियों के अनुसार बदलती भाषा का प्रयोग आकर्षक है। ये स्त्राी संवेदना की खूबसूरत कहानियाँ हैं। अपने लेखकीय वक्तव्य में नीला प्रसाद ने कहा कि वे आर्थिक स्वतंत्राता को स्त्राी स्वतंत्राता की पहली सीढ़ी मानती है।
अपने वक्तव्य में वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र यादव ने कहा कि नीला की कहानियां पढ़कर उन्हें धक्का लगा है कि उनके साथ धोखा किया गया है क्योंकि उन्हें अपफसोस होता रहा कि नीला की ये चकित करने वाली कहानियाँ उन्होंने पहले क्यों नहीं पढ़ी। अपफसोस इसीलिए भी कि क्यों ये एक किनारे पर पड़ी रहीं।घ्उन्होंने कहा कि इस संग्रह में कई ऐसी कहानियाँ हैं जिन्हें प्रकाशित करते उन्हें खुशी होती। नीला की कहानियाँ आत्म अनुसंधान और आत्म आविष्कार की कहानियाँ हैं।
अपने अध्यक्षीय भाषण में नामवर सिंह ने की है।
असहमति जताते हुए कहा कि कहानी तो भय की नहीं, द्घर की है भाई। स्त्राी विमर्श के संदर्भ में स्त्राी पुरुष संबंधों पर विचार किया जाता है, पर वह तो सिपर्फ विमर्श है, इनकी कहानी में बेटी वो महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसके बिना विमर्श पूरा नहीं होता।
कार्यक्रम में उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल, साधना अग्रवाल, भारत भारद्वाज, भारत यायावर, सुभाष शर्मा तथा गंगा प्रसाद विमल ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

शिवमूर्ति को मृगेश स्मृति सम्मान

कथाकार शिवमूर्ति को अवध भारती संस्थान, हैदराबाद ने 'मृगेश स्मृति सम्मान' से विभूषित किया। अवसर था अवधी के मूर्धन्य कवि गुरु प्रसाद सिंह 'मृगेश' के जन्म शताब्दी समारोह का। समारोह का आयोजन किया अवधी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संवर्धन हेतु विगत दो वर्षों से कार्यरत संस्था 'अवध भारती' ने। जनेस्मा बाराबंकी के विवेकानंद सभागार में आयोजित इस समारोह में संस्थान द्वारा विगत अट्ठारह वर्षों से प्रकाशित होने वाली अवधी त्रौमासिक 'अवध-ज्योति' के मृगेश विशेषांक का लोकार्पण भी शिवमूर्ति ने किया।
इस अवसर पर जनेस्मा के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. राजेश मल्ल, डॉ. विनय दास, डॉ. भगवान वत्स, अवध ज्योति के संपादक डॉ. राम बहादुर मिश्र तथा लखनऊ के अपर
जिलाधिकारी ओ.पी. पाठक उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. गौरीशंकर पाण्डेय ने तथा संचालन संस्था के अध्यक्ष डॉ. राम बहादुर मिश्र ने किया।

भारतीय भाषाओं का भी हो सम्मान

धनबाद जिला हिन्दी साहित्य विकास परिषद, झारखंड प्रदेश का ३२वां स्थापना समारोह स्थानीय इंडस्ट्रीज एंड कॉमर्स एसोसिएशन के सभागार में पिछले दिनों संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे हिन्दी के प्रसि( कवि मदन कश्यप। उन्होंने परिषद के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि सिपर्फ हिन्दी को सम्मान देने से हमारा काम नहीं चलने वाला, बल्कि हमें सभी भारतीय भाषाओं को भी उतना ही सम्मान देना होगा, जितना हिन्दी को देते हैं। तभी हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं का सही विकास संभव है। इस अवसर पर झारखंड के दो हिन्दी साहित्यकार डॉ. अशोक प्रियदर्शी तथा डॉ. नरेश अग्रवाल को 'हिन्दी सेवी सम्मान' से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के अंत में कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया। इसकी अध्यक्षता पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और उपन्यासकार श्रीराम दुबे ने की। मदन कश्यप, अनवर शमीम, दिलीप चंचल, डॉ. कमलेश द्विवेदी, डॉ. मनजीत सिंह, डॉ. नरेश अग्रवाल, कुमार ब्रजेन्द्र आदि कवियों ने काव्य पाठ किया।

समकालीन महिला काव्य लेखन

कमला नेहरू कॉलेज ने 'समकालीन महिला काव्य-लेखन और सामाजिक सरोकार' विषय पर एक दिवसीय साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया। इसमें प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि महिलाएं कविता कम लिख रही हैं शायद इसलिए कि इसमें वे अपनी संवेदनाएं उस तरह नहीं व्यक्त कर पातीं, जितनी कहानियों में व्यक्त कर पाती हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं के दुखों को उभारने की दिशा में इधर कई कवयित्रिायों ने कापफी अच्छा काम किया है।
उद्द्घाटन सत्रा की अध्यक्षता करते हुए कालेज की प्राचार्या डॉ. मिनोती चैटर्जी ने कहा कि लेखन के क्षेत्रा में वर्गीकरण के औचित्य पर सकारात्मक दृष्टि से सोचने की जरूरत है। संगोष्ठी की संयोजिका डॉ. मंजु गुप्ता ने अपने बीज भाषण में कहा कि कविताएं स्त्राी जीवन की विडंबनाओं को कापफी बारीकी से उभार सकती हैं। स्त्राी जीवन के सभी पहलुओं पर कापफी कविताएं लिखी जा रही हैं और जो पक्ष छूटे हैं उनपर भी लेखन की जरूरत है।
संगोष्ठी के प्रथम सत्रा की अध्यक्षता करते हुए प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि कथन की प्रमाणिकता कर्म से सि( होनी चाहिए। आरक्षण से शक्ति की दुर्बलता और अवसरवादिता की बू आती है। बातें हमेशा सकरात्मक दिशा में ही की जानी चाहिए। लेखन में यह भी देखा जाना चाहिए कि किस स्त्राी की बात हो रही है। लक्ष्य क्या है? मानसिकता और व्यवस्था क्या है? डॉ. अर्चना वर्मा ने कहा कि समाज और व्यक्ति पक्ष और प्रतिपक्ष नहीं, बल्कि एक-दूसरे के विस्तार हैं। उन्होंने कहा कि 'मैं' के साथ परिवार, बेटियां और भविष्य का आश्वासन भी जुड़ा है। अपने संबोधन में जानी-मानी कवयित्राी डॉ. अनामिका ने कहा कि जहां संवाद होता है वहीं उम्मीद भी होती है। शिक्षा के ही कारण आज अस्तित्वबोध है।
सुप्रसि( कवि/लेखक डॉ. दिविक रमेश ने अपने शोधात्मक आलेख में कहा कि स्त्राी-विमर्श के स्वर में प्रतिरोध तो हो, लेकिन प्रतिशोध उचित नहीं है। डॉ. शशि सहगल ने 'नारी मुक्ति का सपना' विषय पर विस्तृत प्रकाश डाला। द्वितीय सत्रा की अध्यक्षता करते हुए डॉ. नरेन्द्र मोहन ने कहा कि स्त्राी और पुरुष की रचना प्रक्रिया के संताप एक समान होते हैं इसलिए स्त्राी लेखन और पुरुष लेखन का वर्गीकरण उचित नहीं है। डॉ. शशि खुल्बे और डॉ. सरोज सक्सेना ने अलग-अलग सत्राों का संचालन किया।

प्रस्तुति : रवि रंजन कुमार



 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)