| बेटी, तू तो बची रह... |
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अशोक गुजराती
गांव से झांसा देकर दलाल ने लाया उसे और बेच दिया गोश्त की मंडी में। हर रात वह अलग-अलग लोगों द्वारा भोगी जाती रही अपनी इच्छा के विरु(।
समय की मार! पता नहीं कैसे सारे एहतियात के बावजूद वह गर्भवती रह गयी। उसे इसका इमकान भी नहीं था लेकिन अचानक तबीयत खराब हुई तो पता चला। यह भी कि उसके गर्भ में पल रहा भ्रूण मादा है।
कोठे की मौसी की व्यावसायिक चालाकी यह थी कि अभी तो ये युवा है, बढ़िया कमाई का जरिया भी, गर्भपात कराने में ही पफ़ायदा है। उसने भी गर्भपात खुशी-खुशी मंजूर कर लिया। क्यों?... क्योंकि वह कदापि नहीं चाहती थी कि पैदा होने के बाद उसकी कन्या उसी की तरह पुरुषों की काम-वासना की शिकार बन आजन्म कुचली-रौंदी जाती रहे...
बी-४०, एपफ़-१, दिलशाद कॉलोनी, दिल्ली-११००९५
मो. ०९९७१७४४१६४ |
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| खामियाज़ा |
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| डॉ. तारिक असलम 'तस्नीम' |
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मिसेज सान्याल के दरवाजे के कॉलबेल की द्घंटी बजी और उनके दरवाजा खोलते ही नौकरानी कम्मो पर नजर पड़ी। वह गर्म होने लगी-''अरे! यह क्या तमाशा लगा रखा है कि एक सप्ताह से काम पर ही नहीं आ रही हो। अगर काम करने का मन न हो तो वह भी कह दो। मैं किसी और को रख लूँगी। ऐसी भी क्या आपफत आ गयी है कॉलोनी में नौकरानियों की जो न मिले...। यह कहते हुए मेम साब ने आँखें तरेरीं।
कम्मो ने बिना किसी नाखुशी को प्रकट करते हुए मेम साब से इतना भर कहा, ''मेम साब उस दिन यहाँ से द्घर गई तो बेटी दामाद आए हुए थे। वह पेट से थी और उसे कुछ तकलीपफ हो रही थी, जिसे दिखाने डॉक्टरनी के पास गए तो उसने भर्ती कर लिया। आपको मैं क्या बताऊँ कि बेटी ने अपनी जैसी ही एक नन्ही सी परी को जन्म दिया है... वह इतनी सुंदर है कि मैं आपको बता नहीं सकती...।'' यह कहते हुए उसके चेहरे पर छलकती खुशी को मेम साहब सहन नहीं कर पा रही थीं। सो बोलीं, ''अरे! इसमें इतराने की कौन सी बात है? लड़की ही हुई है न लड़का तो नहीं हुआ न? हमारे यहाँ तो खुशी लड़कों के जन्म पर मनायी जाती है... या पिफर जब वह ब्याहकर बहू द्घर में लाता है। समझी तू?'' मेम साब ने उसकी खुशी पर पानी पफेरने की कोशिश की।
लेकिन कम्मो के चेहरे की रंगत में तनिक भी अंतर नहीं आया। उनके चेहरे का रंग पफीका पड़ने लगा। क्योंकि मेम साब की बातें सुनकर उसने कहा था- ''मेम साब! हर कोई परिवार में केवल लड़के ही चाहेगा और हरेक स्त्राी बेटा ही जनेगी तो वह ब्याह कर किसे लाएगा? गाय-भैसों को? यह आप क्यों नहीं सोचतीं कि समाज में यदि मर्दों की आवश्यकता है तो औरतों की तादाद भी उसी अनुपात में होनी चाहिए। मुझसे डॉक्टरनी जी तो यही कह रही थी और वह गरीब जानकर भी मेरे मेहमान को बधाई दे रही थी कि उन्होंने पहली संतान बेटी होने के बावजूद पत्नी पर भ्रूण हत्या के लिए दबाव नहीं डाला। इतना ही नहीं उन्होंने हमें सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी भी दी। जिससे हमें उसकी परवरिश में मदद ही मिलेगी, पिफर चिंता किस बात की मेम साब...!''
कम्मो के मुँह से यह सब सुनकर उनका मन भारी हो उठा। वह अंदर से हिल सी गयीं। उसने मेम साब को जैसे झिंझोड़ दिया था। उनके पास तो किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, यदि कमी थी तो एक बेटी की, जिसे उन्होंने पति की द्घोर आपत्ति के बावजूद जन्म नहीं लेने दिया था क्योंकि उन्हें लगता था कि उसके जन्म के बाद उन्हें ढेर सारा धन अनावश्यक रूप से व्यय करना पड़ेगा... जबकि वह स्वयं एक स्त्राी थीं।
हारून नगर कॉलोनी, सेक्टर-२, पफुलवारीशरीपफ, पटना
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