| कैसी विडंबना है, कैसा झूठ है |
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कांग्रेस के महासचिव और वारिस ;हालांकि कईयों को 'वारिस' शब्द पर एतराज हो सकता है लेकिन सच्चाई से इंकार नहींहोना चाहिएद्ध राहुल गांधी इन दिनों एंग्री यंगमैन बन उत्तर प्रदेश का धुंआधार दौरा कर रहे हैं। उनकी मुख मुद्रा और बॉडी लैंग्वेज आक्रामक है। वे जवाब हम देंगेका नारा बुलंद कर कांग्रेस की खोई जमीन को वापस पाने निकले हैं। अपने परनाना और देश के प्रथम प्रधानमंत्राी स्व. जवाहर लाल नेहरू की संसदीय क्षेत्रा पफूलपुर में एक |

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विशाल जनसभा को संबोधित कर रहे राहुल जब मुलायम-माया को प्रदेश की बदहाली के लिए जिम्मेदार बता रहे थे तब शायद वह भूल गए कि आजाद भारत के ६४ वर्ष की यात्राा के दौरान ३९ वर्ष उ.प्र. में कांग्रेस की ही सरकार रही है। जिस पफूलपुर से वे मायावती सरकार को कोस रहे थे और प्रदेश की तमाम दुश्वारियों के लिए विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहरा रहे थे, उस पफूलपुर का हाल लेना वे भूल गए। स्व. नेहरू की संसदीय सीट रहे इस इलाके में सिवाय निराशा और हताशा के कुछ और नहीं है। यहां शारदा नदी पर टूटे पुल हैं। सड़क, बिजली और पानी नहीं है। गरीबी सूचकांक में यह क्षेत्रा ४०वें स्थान पर है। बाल विवाह यहां का रिवाज है। प्रति व्यक्ति आय मात्रा २८३ रुपए है और रसोई की गैस मात्रा १२ प्रतिशत को उपलब्ध है। केंद्रीय योजनाओं का यहां कोई अता-पता नहीं है। अतीक अहमद और कपिल मुनि जैसे बाहुबली यहां की जनता का संसद में प्रतिनिधित्व करते हैं। तब किस जवाबदेही की बात राहुल कर रहे हैं? क्योंकर जनता उन्हें एक बार पिफर मौका दे? यदि उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार भ्रष्ट है तो केन्द्र में मनमोहन सिंह की सरकार कौन सी दूध की धुली है। आजाद भारत के इतिहास में यह पहली ऐसी सरकार है जिसके मंत्राी, सचिव और संसद सदस्य भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजे गए हों। यदि उत्तर प्रदेश की जनता पलट कर राहुल गांधी से प्रश्न पूछने लग जाए तब क्या वे इतने ही आक्रामक हो जवाब दे पाएंगे? संभव है उन्हें पता न हो। एहसास ना हो कि इस देश की अधिकांश समस्याओं का एक बड़ा कारण कांग्रेस पार्टी की गलत नीतियां रही हैं। कश्मीर से शुरू होकर पंजाब, पूर्वोत्तर राज्यों और नक्सल प्रभावित इलाकों की बात करें या पिफर लोकतंत्रा के हर एक महत्वपूर्ण स्तंभ पर लग चुके भ्रष्टाचार रूपी कलंक की, हर ओर आपको कांग्रेस की छाप दिखाई पड़ती है। जिस उत्तर प्रदेश की गरीबी, पलायन और भुखमरी को लेकर राहुल गाँधी 'एंग्री' हो रहे हैं उसकी शत-प्रतिशत जिम्मेदारी कांग्रेस पर ही है। यही कारण है कि उ.प्र. में जनता ने इस पार्टी से तिक्त हो नब्बे के बाद से इनका खूंटा ही यहां से उखाड़ पफेंका। हालांकि इससे इंकार नहीं कि पिछले दो दशक भाजपा, समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी के कुशासन के नाम रहे हैं। इन तीनों ही दलों की सरकारें अपने-अपने कार्यकाल के दौरान लूट-खसोट के कीर्तिमान बनाने में अव्वल रही। कभी धर्म के नाम पर भारतीय जनता पार्टी ने यहां की जनता जर्नादन को बेवकूपफ बनाया, तो कभी पिछड़े-दलितों के आत्मसम्मान को हथियार बना मुलायम-माया ने उत्तर प्रदेश को पिछड़ा प्रदेश बनाने में अपना 'योगदान' दिया। प्रदेश की जनता अब क्षेत्रिाय दलों के मोहपाश से बाहर निकल चुकी है। टीम राहुल इस मोहभंग का लाभ उठा उ.प्र. में दरिद्र और असहाय पार्टी को वापस खड़ा करने का प्रयास कर रही है।
राहुल गांधी २००७ से ही उत्तर प्रदेश में द्घूम रहे हैं। उन्होंने दलितों के मुद्दे उठा, उनके द्घरों में खाना खा, रात गुजार मायावती की नींद में खलल डाला है। उनके दलित प्रेम से बसपा सुप्रीमों विचलित दिखाई पड़ती हैं। वैसे भी बहुजन समाज पार्टी ने जिस प्रकार की सरकार दी है उससे मायावती के प्रति लोगों का तेजी से
मोहभंग हुआ है। चूंकि यहां चुनाव जातिगत समीकरणों के आधार पर लड़े जाते हैं, माना जा रहा है कि सवर्ण मतदाता बसपा से दूर हो चुका है। उसे विकल्प की तलाश है। ऐसा विकल्प जो उसकी खोई प्रतिष्ठा को वापस लौटा सके। साथ ही दलित भी अपनी सरकार से खास प्रसन्न नहीं बताए जा रहे हैं। कारण उनका उत्पीड़न, शोषण और कानून व्यवस्था का दिनों दिन खराब होना है। ऐसे में यदि सवर्ण मतदाता बहुतायत में वोट कांग्रेस के पक्ष में डालता है और दलित वोट बैंक में थोड़ा भी डाका कांग्रेस डाल पाती है तो २०१२ के चुनाव का नतीजा २०१४ में लोकसभा के चुनाव को प्रभावित करने वाला हो सकता है। इसी चुनावी गणित को समझ राहुल गांधी 'जवाब हम देंगे' का नारा ले उत्तर प्रदेश की यात्राा कर रहे हैं। लेकिन मेरा प्रश्न इन सबके बीच जहां का तहां खड़ा है। क्या होगा यदि कांग्रेस उ.प्र. में वापस सत्ता पा भी गई? क्या यहां की दम तोड़ती कानून व्यवस्था अर्थव्यवस्था और सामाजिक कुरीतियों का कोई तोड़ है कांग्रेस के पास? मुझे नहीं लगता ऐसी कोई भी योजना राहुल ने तैयार की होगी। यदि की होती तो वे जरूर अपने भाषणों में उसका उल्लेख करते। दरअसल अपने यहां ऐसा कुछ करने की कोई परंपरा है ही नहीं। राजनीतिक दल एक द्घोषणा पत्रा जरूर रस्मी तौर पर जारी करते हैं जिसको चुनाव बाद पूरी तरह से भुला दिया जाता है। कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में वापसी के लिए 'तस्वीर बदल देंगे' जैसे जुमलों का इस्तेमाल कर एक बार पिफर जनता को भरमाने का प्रयास कर रही है। हो सकता है उसे थोड़ी-बहुत कामयाबी मिल भी जाए। परंतु इससे उत्तर प्रदेश का कुछ भला होने वाला नहीं। राहुल गांधी का जरूर भला हो जाएगा और मनमोहन सिंह को हटा उनकी ताजपोशी कांग्रेस के लिए आसान हो जाएगी। जहां तक प्रश्न उन दलितों का है जहां कांग्रेस के युवराज ने खाना खाया और रात गुजारी तो उन्हें इंतजार करना होगा अगले किसी 'युवराज' का जो उनके हिस्से आए परमानेंट अंधेरों को अपना भविष्य संवारने-सजाने के लिए इस्तेमाल करेगा।
ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि जनता के पास क्या विकल्प है? यदि कांग्रेस को नहीं चुने तो भाजपा या सपा-बसपा में से एक को चुनना होगा। इन सभी का ट्रैक रिकॉर्ड भयावह है। भाजपा भय और भ्रष्टाचार मुक्त समाज का नारा देकर सत्ता में आई थी। कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और राम प्रकाश गुप्ता के मुख्यमंत्रिात्व काल में सुशासन का नामोनिशान नहीं था। इससे व्यथित हो जनता ने भाजपा को भी सत्ताच्युत कर समाजवादी पार्टी का दामन थामा। मुलायम सिंह यादव को भले ही दीक्षा डॉ. राममनोहर लोहिया से मिली हो, समाजवाद की सोच को उन्होंने अमर सिंह के चरणों में गिरवी रख उत्तर प्रदेश को बदहाली की कगार पर ला खड़ा किया। उस दौरान उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के नित नए कीर्तिमान गढ़े गए। नौकरशाही ने अपने राजनीतिक
आंकाओं के समक्ष पूर्ण रूप से समर्पण कर चाटुकारिता का नया इतिहास रचा। जनता मुलायम सिंह के राज में त्रााहि-त्रााहि करने लगी थी। दूसरी तरपफ लोहिया का मानस पुत्रा कहे जाने वाले मुलायम सिंह पूरी तरह मुंबई की रंगीनियों के हवाले हो चुके थे। उ.प्र. का हर वह पत्राकार जिसने अपनी कलम सत्ता प्रतिष्ठान के द्वार गिरवी नहीं रखी, इस बात का गवाह है कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने नैतिकता के हर पैमाने को न केवल ठोकर मारी बल्कि भ्रष्टाचार के नए मानक भी पूरी बेशर्मी के साथ तय किए। मायावती ने मुलायम सिंह के कुशासन से त्रास्त जनता को भ्रष्टाचार और भयमुक्त समाज देने का वादा कर बहुमत से सत्ता हासिल की। आज साढ़े चार साल बीतने के बाद यदि उ.प्र. यह कहे कि इनसे भले तो सपाई थे तब यह समझा जा सकता है कि बसपा सरकार अपने भ्रष्टाचार और भयमुक्त समाज के वायदे पर कितनी खरी उतरी होगी।
अब राहुल मैदान में उतरे हैं। उनके पास लोकलुभावन नारे हैं, आकर्षक छवि है और है ऐसा वोट बैंक जो विकल्पहीनता के अभाव में बार-बार छले जाने को मजबूर है। धूमिल की कविता 'पटकथा' की कुछ पंक्तियां इस माहौल को ज्यादा बेहतर अंदाज में समेटती हैं-
यहां ऐसा जनतंत्रा है जिसमें/द्घोड़े और द्घास को/एक-जैसी छूट है/कैसी विडंबना है/कैसा झूठ है/दरअसल, अपने यहां जनतंत्रा/एक ऐसा तमाशा है/जिसकी जान/मदारी की भाषा है।/हर तरपफ धुआं है/हर तरपफ कुहासा है/जो दांतों और दलदलों का दलाल है/वही देशभक्त है/अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-/तटस्थता। यहां कायरता के चेहरे पर/सबसे ज्यादा रक्त है।/जिसके पास थाली है/हर भूखा आदमी/उसके लिए, सबसे भद्दी गाली है/हर तरपफ कुआं है/हर तरपफ खाई है/यहां, सिपर्फ वह आदमी, देश के करीब है/जो या तो मूर्ख है/या पिफर गरीब है।
मकपजवत/जीमेनदकंलचवेजण्पद |
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