दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
मूल्यांकन
 
चेहरों में गुम सच की टोह
 

त्रिाकोण के तीनों कोण
हरीश पाठक

महेश कटार

'त्रिकोण के तीनों कोण मिलकर दो समकोण के बराबर होते हैं।' यह हमारी छठी कक्षा के रेखा गणित की सातवीं साध्य थी जो हमें रेखाएं खींचकर अ ब स आदि बिन्दुओं के माध्यम से सि( करनी पड़ती थी। हरीश पाठक की नई पुस्तक 'त्रिाकोण के तीनों कोण' पढ़ते हुए मुझे पैंतालीस साल पुराने पेंसिल पैमानों का स्मरण तो हो आता है किंतु वह पुरानी पढ़ाई और नाप जोख रेखाओं के नए गणित के आगे लाचार दिखने लगती है। यह पुस्तक सच की उन रेखाओं और कोणों को सामने लाती है जिन्हें लेखक ने पत्राकार जीवन में जाना समझा, भोगा और नापा है-
आग और राख, ठंडापन और गर्मजोशी, चतुराई और कपटता, प्यार और द्घृणा, यो(ा और क्लीव, प्यास और तृप्ति, तर्क और जालसाजी इसी संस्कृति के सालोंसाल से पलते, पनपते बीजों की बेचैनी ने विवश किया तो आत्म-कसौटी पर कसे जीवन से बनी, समय-समय पर विभिन्न पत्रा-पत्रिाकाओं में प्रकाशित हुईं यह रपटें विभिन्न चेहरों के भीतर जीवन के विभिन्न पहलुओं का अन्वेषण करती हैं। 'सिलसिला' तथा '...और कुछ चेहरे' के तहत दो हिस्सों में बंटी इस पुस्तक में कुल ६२ रपटे हैं जिनमें लेखक के पत्राकारिता जीवन के दो दशक टुकड़ा-टुकड़ा दर्ज हैं। चीजें जब टुकड़ा-टुकड़ा हों तथा टुकड़ा हुए चेहरे, तस्वीर के बहुत से हिस्से सामने न हों तो बीच का 'गैप' पाठक को अपना रंग भरने के लिए भी उकसाता आमंत्रिात करता है। पत्राकार हरीश पाठक मूलतः कहानीकार हैं। इसलिए वह किसी द्घटना या चेहरे का
पफोटोग्रापिफक अंकन नहीं, पुनर्सृजन करते हैं। ध्यान से देखने पर हम पाएँगे कि इन रपटों में अनुभूत सत्य के साथ जो व्यक्तिचित्रा हैं। ...संस्मरण या उद्वेलित करने वाले द्घटनाक्रम हैं वे सभी अपने समय और समाज की कहानी रचते हैं। यह कथातत्व कथनी या वर्णनीय के प्रति उत्सुक-जिज्ञासा पैदा करता है क्योंकि इसकी भाषा पत्राकारिता की सरलरेखा वाली सूचनापरक नहीं है... कुछ इतर है। जिक्र करना अनुचित न होगा कि लगभग ढाई दशक पूर्व हरीश पाठक का कथा संग्रह 'सरे आम' प्रकाशित हुआ तो उसके भाषागत शिल्प ने युवकोचित अतर्द्वंद्व, अंतः संद्घर्ष व विकलता को नया स्वर दिया था- खीझ भरा, अपने-आपको द्घोंटता, बेचैन थरथराता स्वर। जिसमें एक ऐसे सामान्य, पढ़े लिखे युवा की पीड़ा झलकती है जो अपने अस्तित्व ;होने न होनेद्ध को सि( करना चाहता है। वह अपने समय की जटिल स्थितियों में अपनी छाती पर नाकारा होने की द्घोषणा सुनने को अभिशप्त है क्योंकि वह संयोगवश पैदा होकर आँखों पर ढपली बांध अपने बाप दादा की तरह उसी कोल्हू का चक्कर लगाते हुए नौकरी और पत्नी पाकर, द्घर द्वार जोड़ बच्चे पैदा करते हुए बूढ़ा हो पेंशन के पैसे की जुगाली नहीं करना चाहता। ...अपने ही ढर्रे पर चलने की शाबासी ओढ़ने वाली केंचुआ संतति पैदा करने की लीक तोड़ना चाहता है। तभी तो वह विद्या प्रभुदेसाई की अमानुषिक हत्या पर अभी तक स्तंभित है अन्यथा आज के इस लोकतांत्रिाक समय और परदे की ओट में कितना कुछ नहीं द्घट जाता और लोग अपने तयशुदा टाइम टेबल पर नित्य क्रियाएँ करते हुए सुखपूर्वक जीते रहते हैं। हत्यारा हत्या करता है, लुटेरा लूट और बलात्कारी बलात्कार और हम 'हमें क्या करना है' का द्घूंद्घट ओढ़ सामना करने से बच लेते हैं। हमारा पौरुष जाति व धर्मवाली भीड़ में खूब हिलोरें मारता है तब हम भी जाने अनजाने लूट, आगजनी, बलात्कार के सहयोगी बन बैठते हैं। भूल जाते हैं कि जो कर रहे हैं वह शर्मनाक है।
यद्यपि लेखक ने दो दशकों के कालखण्ड में स्वयं को परिब( किया है, वह जानता है कि उसके द्वारा उठाये गए सवाल बीते हुए कल में भी थे तथा आने वाले कल में भी रहेंगे-'संदर्भ बदल गए हों, वे बासी भी लग सकते हैं पर उनसे उठे सवालों को आप पुराने कैसे कहेंगे? क्योंकि सवाल पुराने या अप्रासंगिक होने के लिए उठते ही कहाँ हैं।' ;पृ.१०द्ध

बेशक न आदमी की क्रूरता पुरानी पड़ती है न करुणा। हाँ उनका स्वरूप और उनके वाहक चेहरे बदल जाते हैं। इन चेहरों में सुप्रसि( कथाकार, सामाजिक कार्यकर्ता चित्राा मुद्गल का चेहरा 'भूल सकता नहीं भुलाने से' में बहुत आत्मीय और 'सुंदर बन पड़ा है। यूं भी ज्यों ज्यों चित्राा जी की उम्र बढ़ रही है त्यों-त्यों चेहरे की गरिमा भी। उनके पासआत्मीयता का ऐसा अक्षुण्ण खजाना है कि वहाँ से कोई भी तो खाली हाथ नहीं लौटता। वह जितनी बड़ी रचनाकार हैं उतनी ही स्नेहमयी और शायद इससे भी अधिक स्वाभिमानी। एक अन्य रपट '...उठो मेरे उत्तर' के केन्द्र में धर्मवीर भारती हैं। इस रपट में बहुत दिलचस्प जानकारियाँ हैं- 'सुना गया कि रवीन्द्र कालिया 'धर्मयुग' में नौकरी करते वक्त इतने आक्रांत रहते थे कि टेबल से टकरा जाने पर भी 'सारी' बोलते थे।' ;नोट- उनकी प्रसि( कहानी 'काला रजिस्टर' इसी दौर की देन है। धर्मवीर भारती को वह अभी भी उसी शिद्दत से याद करते हुए समय-समय पर 'तर्पण' कर देते हैं।द्ध इसी में आगे है- 'सुना गया कि जब रद्घुवीर सहाय भारती जी से मिलने 'धर्मयुग' आए तो उन्हें इरादतन बाहर के सोपफे पर इंतजार करवाया गया। सुना गया कि भारती जी के द्घर रुकने वाले अशोक वाजपेयी की बाद के दिनों में भारती जी से इस कदर चल गई कि मामला 'छाया तक से नपफरत' तक पहुँच गया। इसी क्रम में हरीश पाठक ने सुरेन्द्र प्रताप सिंह, उदयन शर्मा, आलोक मेहरोत्राा, कैलाश सेंगर, ओमप्रकाश सिंह, सुमन आदि का जिक्र किया है पर 'जी' केवल भारती के साथ ही लगाया शेष 'जी' हीन छाया छवियाँ हैं। भारती जी के बारे में और भी अनेक चर्चे सुने जाते हैं-सुना है कि टाइम्स ऑपफ इंडिया के मालिकों की जैसी सांस्कृतिक ताबेदारी भारती जी कर गये उतनी कोई न कर पाया। सुना है कि भारती जी...। निश्चय ही इस तरह के सच्चे-झूठे बयान या कनकहीं लेखक ने भी जरूर सुनी होगी किंतु जाने क्यों उन्होंने ऐसे सच को उजागर करने से परहेज रखा?
ध्यान इधर भी जाता है कि त्रिाकोण के आकार में एक कोण साहित्य का है, दूसरा राजनीति तथा तीसरा कला का ;पत्राकारिता तो शब्द का संसार है अतः इसे साहित्य के अंतर्गत गिन लेने में यहाँ कोई हिचक न होनी चाहिएद्ध किंतु इससे अलग भी एक त्रिाकोण है-थ्री सी का। यह सी है-सिनेमा, क्रिकेट और क्राइम। सिनेमा में वनमाना और
राजबब्बर हैं। शत्राुघ्न सिन्हा, रजनीकांत, हेमामालिनी, जयाप्रदा और दीपिका चिखलिया हैं तो क्रिकेट का प्रतिनिधित्व लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर से है। क्राइम में वरद राजन मुदलियार की उपस्थिति के साथ किरण बेदी व के.पी.एस. गिल भी लेखक के सच के हिस्से बने हैं।
एक बात बहुत सापफ है कि सभी चेहरे अपने स्तर पर प्रसि( हैं। प्रसि(ों पर लिखना पत्राकारिता की व्यावसायिक विवशता भी है और धर्म भी। दोनों के बीच संतुलन निभाते हुए बने रहना सचमुच एक कठिन कार्य है। हरीश पाठक यह कैसे साध पाते हैं इसका कुछ-कुछ पता पुस्तक पढ़ने से ही लग पाता है। पत्राकारिता भी तो अब दो बांसों के बीच तनी हुई रस्सी है-एक छोर मालिक के हित का है और दूसरा सच का। ...बीच में तो जाने कौन-कौन हैं? सबसे बड़ी चुनौती है-राजनेताओं व मापिफया का सच लिखना। हरीश पाठक जो और जितना लिख सके हैं, उतने साहस के लिए भी उन्हें सराहा जा सकता है। पुस्तक में कोई एक चौथाई सैकड़ा मंत्राी, सांसद ;असांसद भीद्ध अपनी किसी न किसी छवि विशेषता के साथ उतरे हैं... सभी भारतीय राजनीति के दिग्गज हैं। ...'किस मोड़ से शुरू करें?' में लेखक का अनुभव बताता है कि 'चुनावी राजनीति हिंसक बलात्कारों को जन्म दे रही है।' अर्थात्‌...? अर्थात्‌ यह बहुत बड़ा प्रश्न है जिसमें कदाचित्‌ यह भी शामिल हो कि हिटलर का उदय चुनावी राजनीति के गर्भ से ही हुआ था। भारतीय राजनीति और चुनाव तो नितांत जाति और धर्म आधारित हो चुके हैं। बलात्कारियों में सदैव बाहुबली, लठैत जातियां ही आगे हैं। ये ही लठैत जाति-धर्म के कंधों पर पांव रख संसद, विधानसभाओं में पहुँच राजनीतिक बंदरबांट में महत्वपूर्ण पद हथिया कर सीनाजोरी खेलते हैं। अपनी रपटों में लेखक ने इन नेताओं के कौशल को तो प्रकट किया है- मूल चरित्रा की सीवनें भी उधेरी जातीं तो कुछ और बात होती। इतने बड़े कर्म ;काण्डद्ध शील मान्यवरों के बीच पफूलन देवी का छूट जाना समझ में नहीं आता। पफूलन के बिना राजनीतिक सच कतई अधूरा है।
पुस्तक के अनेक प्रिय सच तब दीप्त हो उठते हैं जब लेखक खिलाड़ियों, कलाकारों पर कलम उठाता है। इनमें एक नाम है अपने समय की मशहूर अभिनेत्राी वनमाला का। 'सन्‌ १९४१ से शुरू हुआ वनमाला का पिफल्मी सपफर १९५६ तक अविरल चला' इसमें अनेक सपफलतम मराठी पिफल्मों के अलावा दसियों सपफल हिन्दी पिफल्में भी रहीं। वनमाला का जीवन किंवदंती व त्राासदी दोनों है। एक अत्यंत प्रतिष्ठित, सामंत परिवार की लड़की का पिफल्म में जाने का साहस ही उन दिनों विरल था। दूसरे उस समय सौंदर्य और कला की प्रतिष्ठा थी। टांगें उद्घाड़, अधखुली छातियां मटकाकर, उत्तेजना भड़काने के अधिकतम रुपये नहीं वसूले जाते थे।
कलाकारों में एक नाम है- तीजनबाई का। छत्तीसगढ़ की इस लोक गायिका का नाम पंडवानी के साथ ऐसा द्घुल मिल गया है कि पूर्व के महान पंडवानी गायक झाड़ूराम देवांगन भी पीछे छूट गए। और भी बड़े-बड़े लोगों पर हैं रपटें, पर वे पत्राकारिता के समकालीन सच की जरूरतों के तहत भी बनती हैं। पत्राकारिता के संद्घर्षशील चेहरों को भी लेखक ने सामने रखा है-'वे हर शहर में अक्षरों से डरते हैं।' 'झूठ के अंधेरे में थरथराता सच' ऐसे सवालों को सामने रखता है जिन पर इसी पुस्तक में आए राजनीतिक चेहरे मुँह खोलने से मुँह पफेर लेते हैं। 'एक लड़ते हुए अखबार की हत्या' की साहसी रिपोर्ट के साथ वह कुकुरमुत्तों की तरह उगे पत्राकारों का भी 'यह प्रेस किसे डराता है?' में नोटिस लेते हैं। तभी तो वह कह पाते हैं-'सच तो यह है कि अक्षरों का ताप रह-रहकर अपना असर दिखाता है। मैं दर्प और गर्व के संधिस्थल पखड़ा यह कह सकता हूँ कि पिछले वर्षों में जो तथ्य सामने आए, उनका बड़ा प्रभाव सत्ता, समाज और प्रतिष्ठान पर पड़ा है।'
'त्रिाकोण के तीनों कोण' भले ही पत्राकारिता की रपटों का संकलन है किंतु वह 'जस की तस' पत्राकारीय अभिव्यक्ति नहीं है। इसके भीतरी परतों तक धंसने के चिन्ह प्रकट करते हैं कि वहाँ हरीश पाठक का कथाकार सक्रिय हो जाता है- अपनी भाषा, शब्द-विन्यास, शिल्प और बेचैनी के साथ संस्तर भेदी दृष्टि चीजों, चेहरों को किसी अलग ही आलोक में ले आती है। इस संकलन को पढ़ना समय, विशेष के विशेष चेहरों को पहचानते हुए गुजरने जैसा है।

निराला नगर, सिंहपुर रोड, मुरारग्वालियर-४७४००६

;म.प्र.द्ध

 
 
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