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१९०३ ई. में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी 'सरस्वती' के संपादक हुए तब हिन्दी कविता में इस बात पर बहस हो रही थी कि कविता खड़ी बोली में लिखी जाए या ब्रजभाषा में, इसको लेकर एक बड़ा विवाद उठा। लेकिन द्विवेदी जी खड़ी बोली में लिखी जाने वाली कविता के पक्षधर थे, वैसे उन्होंने 'सरस्वती' में ब्रजभाषा में लिखी कविताएं भी प्रकाशित कीं। लेकिन द्विवेदी जी का बड़ा अवदान यह है कि उन्होंने खड़ी बोली कविता को दो समर्थ कवि दिए, एक हरिऔध और दूसरे मैथिलीशरण गुप्त। यह मात्रा संयोग है कि खड़ी बोली हिन्दी का पहला महाकाव्य हरिऔध जी का 'प्रिय प्रवास' और दूसरा मैथिलीशरण गुप्त का खंडकाव्य 'भारत-भारती' का प्रकाशन आस-पास ही हुआ। चूंकि 'भारत-भारती' में लुप्त हिंदू संस्कृति के पुनर्जागरण की बात कही गई थी इसलिए गुप्त जी को पुनरुत्थानवादी कवि मान लिया गया जिसके कारण उनके बारे में हिन्दी में अनेक भ्रम और भ्रान्तियां प्रचलित हुईं। गौर करने की बात यह है कि एक तरपफ उन्हें राष्टकवि कहा गया तो दूसरी तरपफ हिंदू पुनरुत्थानवादी कवि। इन दोनों वाक्यों में जो अंतर्विरोध है, वह स्पष्ट है। चूंकि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के दौरान गुप्त जी की काव्य चेतना का निर्माण हुआ था इसलिए यह सहज स्वाभाविक था कि उनकी कविताएं लोगों में यदि एक तरपफ राष्टप्रेम और देशभक्ति की भावना जगाती थीं तो दूसरी तरपफ भारतीय संस्कृति के गौरवगान से उन्हें विस्मृति की अतल खाई से उपर लाने का प्रयास भी करती थीं।
अब तक हिन्दी के आलोचकों ने छिटपुट ढंग से मैथिलीशरण गुप्त के काव्य विकास और काव्य विवके पर विचार किया है जिसमें दिनकर, डॉ. नगेन्द्र से लेकर प्रभाकर श्रोत्रिाय तक हैं, ऐसी स्थिति में यह संभव नहीं था कि गुप्त जी का काव्य व्यक्तित्व संपूर्णता में पाठकों के सामने आता।
'मैथिलीशरण ' डॉ. नंदकिशोर नवल की नई आलोचना पुस्तक है जिसमें पहली बार गुप्तजी के काव्य अवदान का संपूर्णता में विश्लेषण किया गया है। डॉ. नवल पिछले लगभग साढ़े चार दशक से कविता की आलोचना और आलोचना की आलोचना करते रहे हैं। अब तक उन्होंने तीन कवियों-मैथिलीशरण,
निराला और मुक्तिबोध पर आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी हैं लेकिन लिखने का क्रम आगे से है यानी सबसे पहले उन्होंने मुक्तिबोध पर लिखा ;मुक्तिबोध ज्ञान और संवेदनाद्ध और उसके बाद निराला पर ;निराला कृति से साक्षात्कारद्ध तथा अंत में 'मैथिलीशरण'। इस पुस्तक के निवेदन में लिखते हैं-'आगे से पीछे चलने के अपने पफायदे हैं, जैसे पीछे से आगे चलने के। आगे से पीछे चलते हुए मेरे साथ हमेशा कविता का अद्यतन सौंदर्य-बोध लगा रहा है, जो पीछे की कविता पर नए ढंग से विचार करने के लिए और अपने अध्ययन को प्रासंगिक बनाने के लिए आवश्यक है। पाठक देखेंगे कि मैंने तीनों महान कवियों के अध्ययन में अलग-अलग तीन प(तियों का सहारा लिया है।' अपने इसी निवेदन में उन्होंने यह स्पष्ट किया है, 'यह संयोग ही है कि गुप्तजी, निराला और मुक्तिबोध तीनों ही तीन युगों और तीन काव्य-धाराओं-द्विवेदी-युगीन, छायावादी और प्रगतिवादी-के प्रतिनिधि कवि हैं। स्वभावतः इनके अध्ययन के प्रतिमान भी अलग-अलग हैं, यानी न गुप्तजी के प्रतिमान पर निराला और मुक्तिबोध की कविता की परीक्षा की जा सकती है, न निराला के प्रतिमान पर गुप्तजी और मुक्तिबोध की कविता की तथा न मुक्तिबोध के प्रतिमान पर गुप्तजी और निराला की कविता की। इससे आलोचना की ढेर सारी समस्याएं हल हो जाती हैं, यद्यपि इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इन तीनों कवियों में कुछ ऐसे सार्वभौम और सार्वकालिक सौंदर्यात्मक तत्व नहीं हैं, जो उन्हें कवि-रूप में एक धरातल पर खड़ा करते हैं। गुप्तजी की कविता पर लिखे गए
आलोचनात्मक लेखों को ढूंढ़-ढूंढ़कर पढ़ने के क्रम में मुझे त्रिालोचन का एक लेख मिला, जिसमें गुप्तजी के संबंध में उनके इस वाक्य पर मेरा ध्यान गया कि 'उनके रचनात्मक प्रयोगों का पूरी तरह आकलन करके काम होना बाकी है।' दरअसल 'यह पुस्तक किसी साहित्य-दृष्टि के प्रक्षेपण के लिए नहीं, बल्कि गुप्तजी के काव्यों के संबंध में अपने अनुभवों के संप्रेषण के लिए लिखी गई है, इस आशा के साथ कि उनमें पाठक भी किसी हद तक भागीदारी कर सकेंगे।'
इस पुस्तक में डॉ. नवल ने गुप्तजी की काव्य पुस्तकों के बीच से उनकी सबसे सुंदर कृतियों का चयन करके उनका अध्ययन करते उनसे संवाद स्थापित किया है। इस पुस्तक के आरम्भ में द्विवेदी युग, जिसे आ. रामचंद्र शुक्ल ने अपने 'हिन्दी साहित्य के इतिहास' में आधुनिक काल की कविता की पुरानी धारा का उल्लेख करने के बाद नई धारा की कविता के तीन उत्थानों में द्विवेदी युग को द्वितीय उत्थान कहा है। लेकिन हिन्दी कविता के विकास का रास्ता इतना सुगम नहीं होता क्योंकि कविता प्रवृतियां किसी कालखंड में बंधी नहीं होतीं। उदाहरण के लिए द्विवेदी युग के कवि गुप्तजी छायावाद युग में भी कविता लिख रहे थे और छायावाद युग के कवि निराला नई कविता के दौर में भी कविता लिख रहे थे। इस तरह गुप्तजी के काव्यबोध को किसी एक कालखंड में सीमित नहीं किया जा सकता। आलोचकों ने गुप्तजी को तुलसी की परम्परा की मर्यादा और नैतिकतावादी आधुनिक वैष्णवभक्त कवि भी कहा है लेकिन गहराई से इस बात की पड़ताल करते हुए डॉ. नवल का निष्कर्ष है कि 'वे तुलसी की परम्परा के कवि नहीं, वाल्मीकि, कालिदास और भवभूति की परम्परा के मूलतः नवक्लासिकी कवि हैं, जो झूठी नैतिकता के कायल न थे और जिनमें जीवन के प्रति पूर्ण स्वीकार का भाव था।' आलोचक ने स्पष्टतः गुप्तजी के विश्लेषण-मूल्यांकन का आधार स्वंय कवि के वैविध्यपूर्ण काव्य से उपजे मूल्य को ही बनाया है।
प्रस्तुत पुस्तक में गुप्तजी के विपुल काव्य संसार से ११ सुंदर कृतियों पर ही आलोचक ने अपने को केन्द्रित किया है जिनमें जयद्रथ-वध, पंचवटी, साकेत, यशोधरा, भारत-भारती, विष्णुप्रिया और द्वापर प्रमुख हैं। १९१४ में प्रकाशित मैथिलीशरण गुप्त की सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक 'भारत-भारती' को हिन्दी भाषी जनता ने तहे दिल से स्वीकार किया कि गुप्तजी इसके जातिय कवि हैं। विडम्बना की बात यह है कि यदि एक ओर इस खंडकाव्य से उन्हें अपार लोकप्रियता मिली तो दूसरी ओर उन पर हिंदू पुनरुत्थानवादी कवि होने के आरोप भी लगे। लेकिन डॉ. नवल ने इसका प्रतिवाद किया है कि गुप्तजी पुनरुत्थानवादी कवि नहीं हैं, बल्कि परम्परा के भीतर से उसका विरोध करने वाले जनतांत्रिाक संवेदना और विचारों के
क्रान्तिकारी आयाम के कवि हैं। उनकी दृष्टि एकांगी नहीं थी। वे अतीत गौरव की स्मृति को उससे जुड़े उदात्त चित्राों के माध्यम से राष्टीय संदर्भ प्रदान करते हैं और जाति में विविधता और उत्साह के भाव का संचार करते हैं।'
१९३२ में प्रकाशित 'साकेत' गुप्तजी का महाकाव्य है। उनके इस महाकाव्य के केन्द्र में उर्मिला को मानने के कारण कई तरह के भ्रम पफैले। डॉ. नवल लिखते हैं, 'साकेत को उर्मिला केन्द्रित मानने से तो इसकी संरचना त्राुटिपूर्ण हुई ही, ऐसा इसे रामकथा का पुनराख्यान मानने के कारण हुआ। जबकि गुप्तजी ने उर्मिला और लक्ष्मण के त्याग के मूल में संयुक्त परिवार में उसकी निष्ठा को माना है और अपने काव्य में उसी की प्रतिष्ठा के लिए एक सर्जनात्मक प्रयास किया है।' साकेत के बारे में यह नई स्थापना है।
इस पुस्तक में गुप्तजी की व्यापक काव्य दृष्टि और काव्य संवेदना का विश्लेषण आलोचक ने हार्दिकता के साथ किया है। उनके काव्य वैविध्य, काव्य भाषा, छंद विधान पर भी विचार किया गया है। डॉ. नवल की यह आलोचना पुस्तक गुप्तजी के बारे में पफैले अनेक भ्रम और भ्रान्तियों को दूर करती है। यही नहीं द्विवेदी युगीन कविता पर नए दृष्टिकोण से विचार करने के लिए भी उकसाती है। पुस्तक के अंत में एक महत्वपूर्ण बात की ओर आलोचक ने संकेत किया है-'गुप्तजी की चर्चा चलने पर हिन्दी के अधिकांश विद्वान यही कहते पाए जाते हैं कि हिन्दी कविता के विकास में उनका योगदान ऐतिहासिक है और कि कवि के रूप में वे श्रेष्ठ नहीं हैं। १९२८ में मुजफ्रपफरपुर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का १८वां सम्मेलन संपन्न हुआ था। दिनकरजी के शब्दों में, 'सम्मेलन के दूसरे दिन, मुजफ्रपफरपुर साहित्य-संद्घ ;यह संस्था अब जीवित नहीं हैद्ध के उत्सव में सभापति के पद से बोलते हुए श्री हरिऔधजी ने आवेश के साथ कहा कि 'मुझे तो श्री
मैथिलीशरण की अपेक्षा श्री सियारामशरण की ही कविताएं अधिक पसंद आती हैं।' सभी युवकों ने तुमुल करतलध्वनि के साथ इस द्घोषणा का स्वागत किया, किन्तु मेरे हाथ नहीं बज सके।' तात्पर्य यह कि गुप्तजी के अवमूल्यन का प्रयास छायावाद के उत्थान के साथ ही शुरू हो जाता है, लेकिन विवेशील विद्वान और पाठक की दृष्टि में उनका मूल्य कभी कम नहीं हुआ।' यह उल्लेखनीय है कि 'हिन्दी कविता में ब्रजभाषा-युग का अंत और खड़ीबोली युग का आरंभ ठिकाने से मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं सामने आने के बाद हुआ। उनका प्रभाव द्विवेदीजी की तुलना में अधिक व्यापक और गहरा साबित हुआ, क्योंकि खड़ी बोली में काव्य-रचना के सै(ांतिक आग्रही होने के बावजूद उन्होंने व्यवहार पर भरोसा किया और लेख लिखने की अपेक्षा अच्छी संख्या में कविताएं लिखकर यह सि( कर दिया कि शु( और मार्जित खड़ीबोली में कठोर से कठोर और कोमल से कोमल भाव की व्यंजना की जा सकती है।' अंत में डॉ. नवल के शब्दों में, 'गुप्तजी ने अपना काव्य अपने काव्यदर्शों के अनुरूप तो रचा ही, वे अपने युग की कसौटी पर भी खरे उतरे। मेरा विश्वास है कि उनकी अनेक कृतियां काल अथवा इतिहास की कसौटी पर भी खरी उतरेंगी।'
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