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युवा कवि-कथाकार जयश्री राय की दुनिया प्रेम की, देह-राग की, नींद की, रात की, रतजगे की दुनिया है। उनकी कथा भाषा निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, गीतांजलि श्री के आसपास है। वह बिम्बों की पफन्तासियों की, भोर के धुंधलके की दुनिया है। 'अनकही' जयश्री राय का पहला कहानी संग्रह है, जिसमें 'पिंजरा', 'आदमी का बच्चा', 'गुलमोहर', 'धूप का टुकड़ा', 'अकेला' और 'औरत जो नदी है' जैसी कहानियाँ हैं, जिन्हें धीरे-धीरे ही पढ़ा जा सकता है। 'औरत जो नदी है' एक विलक्षण कहानी है, जो चकित करती है। जैसे नींद में चलती पिफल्म। 'औरत जो नदी है- का आरंभ : मैंने उस कौंधती आँखों वाली औरत को पहली बार कहाँ देखा था, मुझे याद नहीं। हालांकि कायदे से उस सांद्घातिक क्षण की हर बात मुझे शब्द-शब्द याद होनी चाहिए थी, मगर उसकी उन कौंधती आँखों के आगे हर बात नगण्य हो जाती है। ...उस क्षण बस उसकी वह दो आँखें थीं और मेरा गलता-बहता सर्वस्व, बीच से लगता था, समय भी गुजरने से रह गया है।' यह कथा-भाषा जयश्री राय की अपनी है-अर्जित। एक लय। यहां से वहां तक हल्के गूंजती हुई।
'औरत जो एक नदी है' जैसे एक लम्बी कविता है। कहानी में कविता कोई अजूबा नहीं है। किरन सिंह, प्रत्यक्षा, वंदना राग इस हुनर को चरितार्थ करती हैं। 'औरत नदी की तरह होती है, कहीं ठहरती नहीं, मगर अपने किनारों में जीवन को ठहराव देती जाती है।' स्त्राी विमर्श के बहाने स्त्राी की विडम्बना को शब्द देते हुए जयश्री कहती हैं : 'ये असहाय सी औरतें दर असल कितनी सक्षम होती हैं-मर्दों को आंकठ लेती हैं, स्वयं में उतरने देती है। ...पुरुष उसकी देह की कई इंचें नापकर विजय उत्सव मना लेता है। आगे, इच्छा के चरम क्षणों में मैंने उसे किसी जंगली बिल्ली की तरह सांद्घातिक और उत्तेजक पाया है।... मैं बार-बार उसकी देह पर उत्पात मचाता रहा, मगर निष्पफल। वह मेरी हताशा देख गहरी वेदना के बीच मंजीरे-सी बज उठती थी। उसके शब्द हैं : 'औरत महज एक योनि नहीं होती'। प्रेम और किसे कहते हैं-मैं उसके गुदाज सीने में चेहरा धंसा देता-'इन वादियों में मेरा द्घर है-नर्म मुलायम कबूतरों-सी हरारत भरी और ये तुम्हारी जांद्घें-मेरे एक मात्रा गंतव्य की ओर जाने वाली उजली चिकनी सड़कें।' अकेलापन स्त्राी की नियति है। अतृप्ति का बयान इस तरह-'मेरा सब कुछ जस का तस रह गया है सत्य! मैं तुम पर पूरी तरह से खत्म हो जाना चाहती हूं, तुम मुझे लेते क्यों नहीं।'
जैसे, कृष्णा सोबती का उपन्यास 'सूरज मुखी अंधेरे के'। या रेखा-भुवन ;नदी के द्वीप : अज्ञेयद्ध। 'मुझे लो' रेखा ने भी भुवन से समर्पण के क्षणों में कहा था। जयश्री 'औरत जो नदी है'-में कहती हैं-'हर मर्द मानो मछली था, और वह पानी थी! नील तिलिस्म-भरा जाल थी-खुद में सुलझी, दूसरों को बेतरह उलझाती'। 'मैं नमक-सी द्घुली हूँ, हर नस में, जीवन का स्वाद हूँ-सनातन स्वाद। सत्य-'उस सेज की एक सिलवट मात्रा बन कर रह गया और वह उससे इतना ऊपर कैसे उठ गई।' जयश्री राय स्त्राी-पुरुष संबंधों की विडंबना से सुपरिचित हैं। वर्जनाओं को पीछे छोड़कर वे 'उत्तर समय' तक जा पहुंची हैं।
'गुलमोहर' कहानी स्वानुभव से प्रेरित है। कैंसर मॉडल जैसी जयश्री राय का अपना है। कहानी का आरंभ : 'खिड़की पर झुके गुलमोहर को वह विस्तर पर लेटी-लेटी देखती रही थी, कैसा खूबसूरत रंग है, जैसे आग लगी हो! कई दिनों की अनवरत बारिश के बाद आज धूप निकली है। नीला आकाश सापफ-झक्क होकर आइने की तरह चमक उठा है। पिफर 'निःशब्द दरकना' 'ऊपर से बने रहने का प्रयास' जैसे प्रयोग जयश्री के भीतर-बाहर के द्वंद्व का संकेत हैं। बीमारी के शुरू-शुरू के दिन उसके लिए बेहद मुश्किल थे। उसके परिवार के लिए भी आसान नहीं रहा होगा। मगर, उन्होंने मिलजुलकर झेल लिए थे। उसे याद है, जिस दिन उसका कैंसर कन्पफर्म हुआ था, प्रवीर किस तरह डायनिंग रूम में देर तक चुपचाप बैठा रह गया था।' यह है, जयश्री राय का अपना इतना क्रूर सच जिसमें निर्लिप्तता असंभव है। केमो
थेरेपी, रेडिएशन का लंबा सिलसिला। 'द्घर से दूर होकर जाना था कि द्घर क्या होता है। डॉक्टर मिसेज पॉल की उम्र को कम करके आंकते हैं। डॉ. विवेक का इंतजार रहता। सारे टेस्ट होते रहे। सोनोग्रापफी, हेमोग्राम, कार्डियोग्राम, सीटी स्कैन, ब्लड टेस्ट। दुःस्वप्न का लंबा सिलसिला। कैसी खुनक भरी मीठी धूप है पर प्रवीर का मन ऑपिफस जाने का नहीं है। खिड़की के बाहर गुलमोहर के सारे पफूल झड़ गये थे।
'शनिचरी' पैंतीस की है। भूख, थकान और गर्मी से बेहाल शनिचरी को बच्चों का कचर-मचर असह्य लगता है। गठिया से बेहाल शनिचरी को मुक्ति नहीं। भात की गंध थकी अंतड़ियों में उमेठ पैदा कर रही थी। 'इसी सड़क के दूसरे किनारे पर एक ढलान पर शनिचरी का कूटा-पीसा शरीर। रतन बाबू की जीप उसे रौंदकर निकल गयी। प्रचार यह कि शनिचरी ने आत्महत्या कर ली। पति की पिटाई से तंग आकर। शवदाह हुआ-पोस्टमार्टम के बाद। 'सर के ऊपर आसमान पफटा पड़ रहा था, मगर जमीन नहीं।'
जयश्री राय की कहानियों की विविधता चकित करती है। एक कहानी 'पिंजरा'-'चूल्हे में थोड़ी-सी आंच बचाकर उसने बाकी लकड़ियां बुझा दी थीं। राणा आये, तो पिफर गर्म पफुल्के सेंक लेगी। मगर वह आएगा कब, दोपहर की धूप छज्जे से सरककर अब, पिछली दीवार से नीचे उतरने लगी थी, सूरज अपनी ढलान पर था। बुढ़िया आजी दबी जुबान कह गई है-पड़ोस के गांव की किसी बंजारन से टांका भिड़ा है भतार का। हाय राम जी। अकेली बिस्तर पर पड़ी-पड़ी वह टंसुवे बहाती। छज्जे पर पुरवैया डाकिन-चुड़ैल की तरह हू-हू करती पिफरती। मेह-हिम का जुल्म अलग लगा रहता- अब तो हिया गलाने की ऊर्जा भी शेष न बची थी।'
'अभिनय' कहानी में आँत्विक अपर्णा का प्रेम-अप्रेम तीखे ऊहापोह में है। कहानी का आरंभ : 'दूर तक पसरी हुई चुप्पी को तोड़कर यकायक पफोन की द्घंटी बजी थी। उसने चौंकते हुए पफोन उठाया था। मन में एक साथ खुशी और गुस्से के भाव थे। हलो... ध्वनि तरंगों में बदलते ही यह भाव और भी स्पष्ट हो उठे थे। खुद को ही अपना यूं सहज पकड़ा जाना कहीं से अखरा था। प्रेम में सब कुछ इतना पारदर्शी क्यों हो उठता है।' आँत्विक की प्रेमिकाओं की लंबी पफेहरिस्त थी। एक अपर्णा भी। अपर्णा साथ चलने को तैयार। पर बीवी-मर्यादा-लोकरीति। 'प्रेम की भाषा पुरुषों की समझ में आती है, वही वह सीखने की कोशिश में है। 'मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ अपर्णा। अपना ख्याल रखना। एक अहद झूठ पर जीवन टिका है।
'पापा मर चुके हैं' कहानी में प्रेम उन्माद से कम नहीं है। एक अंशः 'अब बाथरूम के एकांत में पीली रोशनी के वृत्त के नीचे खड़ी आइने में प्रतिबिंबित अपनी संपूर्ण विवस्य देह की थरथराती रेखांओं की तरपफ देखने की त्राासदी झेलने के लिए मैं बाध्य थी-अभिशप्त भी। अपने अंदर के उन्माद के इस पल को मैं धैर्य से गुजर जाने देना चाहती थी। मगर जानती थी, ये इतना सहज नहीं होगा। पूरी देह में रेंगती हुई चींटियों की कतारें जैसे अब धीरे-धीरे गले के अंदर थक्के बांधने लगी थीं।' आगे-'आपस की छीना-झपटी में मेरा नाइट गाउन पूरी तरह से पफट गया था। अपने टीसते उरोजों पर उसके गर्म होंठ, जीभ-दांतों की जबर्दस्ती को मैं सह नहीं पा रही थी।' यह देह-राग यों ही नहीं है। 'मन के भीतर एक भायं-भायं करता हुआ अंधा कुआं है और उसके सीलन-भरे अंधकार में कैद मेरा सहमा हुआ बचपन... वह आज भी बड़ा नहीं होना चाहता। मेरी कच्ची देह पर पापा का जद्घन्य आक्रमण। अरनव मेरी रूह के रास्ते से दिल की ज़मीन पर उतरा था। अरनव का चूमना- 'मेरे भीगे हुए उरोजों पर अरनव की उंगलियां नहीं छिपकलियां पिफसल रही हैं।'... 'एक पहाड़ यकायक मेरे सीने से उठ गया हो-जैसे, मैंने बाहर आकर, खुली हवा में आकर गहरी सांस ली थी।' यह है पुरुष की बर्बर चाहत का आतंक चाहे वह अपना ही पिता हो।'
कहना न होगा कि जयश्री राय की कहानियां पारम्परिक कथा रूप को तोड़ती हैं और आज की कहानी को पुनर्नवता देती हैं। ये कहानियां आत्म और देह के तिलिस्म में प्रवेश करती हैं और वर्जनामुक्त स्त्राी-पुरुष संबंधों को उजागर करती हैं। जयश्री राय का जीवट सराहनीय है, जिससे 'औरत जो नदी है' सरीखी कहानियां संभव हुईं। भाषा ऐसी ऐन्द्रिक-'देहलता में उत्तेजना के सुर्ख गुलाब उगाए, रसमसाते नितंबों में इंगितों का माताल ज्वार उठाये वह अपनी राह चलती रही।' ये कहानियां एक नये समय में ले जाती हैं और वस्तु रूप को एक नया परिप्रेक्ष्य देती हैं।
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