दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
मूल्यांकन
 
कई विधाओं वाले सच्चे किस्से
 

कड़े पानी का शहर
अमरीक सिंह दीप
विकास प्रकाशन, कानपुर
मूल्य : २९५ रुपये, पृष्ठ : २१२

राजकुमार सिंह

हिन्दी साहित्य में अमरीक सिंह दीप एक नामवर कथाकार के रूप में जाने जाते हैं और जिस तरह का वह लिख रहे हैं भविष्य में उनकी पहचान और अधिक पोख्ता होगी।
हिन्दी साहित्य की कई विधाओं में वह निरंतर लिखते रहते हैं, जिसका साक्षात संगम है 'कड़े पानी का शहर।' इस किताब को किसी विधा में रखकर हम तौल-माप नहीं सकते हैं। इसमें हमें कविताओं के भी दर्शन होते हैं। कहानियाँ भी हैं- कोई मूर्त-तो कोई अमूर्त, तो कहीं मात्रा किस्सा-गोई। कहीं निखालिस शब्द चित्रा। संस्मरण भी आपको खूब मिलेंगे, दूसरों की स्मृतियाँ भी। अनचाही यादें भी कई तरह से देखी व सुनी जा सकती हैं बशर्ते हम उनकी ध्वनियाँ ध्यान से सुनें। यादें यानी कि मासूम बच्चे, पौढ़, अधेड़ और वृ( हो रहे कि जुम्मेदार नागरिकों की प्रतिध्वनियाँ।
दीप ने 'कड़े पानी का शहर' की एक-एक रचना में पात्रा-कुपात्रा, द्घटनाओं-दुर्द्घटनाओं, यादों कर्तव्यों, सत्य-अहिंसा, श्लील-अश्लील, पुराण-पाखंड, मानवीयता-अमानवीयता आदि का कोना-कोना झांका है। कहीं झांडू-पानी चलाया है तो कहीं पफूल व सुगंध भी वितरित कर आये हैं। हमें आईना दिखायाऋ हमारी ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति हमारी
उदासीनता-उपेक्षा को दिखाकर। हमें कई तरह से सजग ही नहीं किया है बल्कि हमारे कर्तव्यों के प्रति हमसे जवाबदेही भी चाही है। 'कड़े पानी का शहर' हम इतिहास भी देख सकते हैं और युगों का भूगोल भी।
कलम के इस सिपाही की 'एक थीं गुलाबबाई' में
रंगमंच की पैदाइश देख सकते हैं। इतिहास और भूगोल का साक्षात दर्शन कर सकते हैं। इस रचना की सबसे अहम्‌ बात मुझे ये लगी कि आप गुलाबबाई के किस्से में एक प्यारी-सी सौंदर्यशास्त्राीय कविता भी पढ़ सकते हैं... 'गुलाबबाई कैसी अपूर्व सुंदरी रही होंगी। इसका कुछ-कुछ अनुमान उनकी छोटी बेटी मधु अग्रवाल से मिलकर लगाया जा सकता है- लंबा कद। महकता हुआ चम्पई रंग! तीखे नक्श! बड़ी-बड़ी भाव प्रवण आँखें! पलाश के पफूल की पंखुड़ियों से अधर। चेहरे की त्वचा जैसे कोई झील हो। बात करते वक़्त हर भाव जलवृत्तों की तरह पूरे चेहरे पर पफैल जाते हैं...।'
जानने वाले जानते हैं कि दीप जी न कापिफ़र हैं और न धर्मांध, पर उनकी खोज इन दोनों के बीच से गुज़र कर चलती रहती है यानी कि 'संजीबा एक आग'। हम अक्सर जिनके बारे में दावा करते हैं कि हम उन्हें सबसे ज्यादा जानते हैं पर उन्हीं के विषय में कितना कम जानते हैं ये संजीबा... में पढ़ सकते हैं। कानपुर और उसके आस-पास निवास करने वाले संजीबा के बारे में मात्रा इतना ही जानते होंगे कि संजीबा नुक्कड़ नाटक करते हैं। वे इतने सनकी हैं कि किसी से डरते नहीं- न अधिकारी से, न ही ईश्वर नाम की चीज से। ये दीप जी की कलम का कमाल है कि वह संजीबा के सारे-दिल-दिमाग का एक-एक पुर्जा देख-समझ आए हैं। संजीबा का इतना सजीव चित्राण शायद पहले किसी ने किया हो।
दीप जी का संजीबा के कृतित्व-व्यक्तित्व में खूब मन रमा है... ''आश्चर्य होता है कि इस अंधे-बहरे युग में... संजीबा मौत से कहाँ डरता है यह अपना आदर्श शहीदे आजम भगत सिंह को मानता है। भगत सिंह की तरह ही वह अन्याय और अत्याचार के साथ-साथ धार्मिक रूढ़िवाद का सख्त विरोध करता है...''
सचमुच 'संजीबा एक आग' है। और इस आग से परिचय करते हैं दीप जी। संजीबा के बहाने दीप जी हमें नर से नारायण बनने की विधि बताते हैं। ये सच भी है कि संजीबा के अंदर तक पफैली आग पाखंड़ियों, अत्याचारियों, अन्यायियों और कुपात्राों को जलाकर स्वाहा कर देना चाहती है।
दीप जी ने 'कड़े पानी का शहर' में दूसरों के ही नहीं, अपने सुख-दुख, अपेक्षाएँ-उपेक्षाएँ और कुल जमा कमिटमेंटों के शब्द चित्राों, संस्मरणों, बयानों और आँखों देखा हालों से सटीक ढंग से प्रस्तुत किया है। 'तकदीर कोई नहीं लिखता' यानी कि परिश्रमहीन भोगियों का ज्वलंत उदाहरण है। दूसरों के भविष्य की चिंता रखने वाले, दूसरों का भविष्य बताने वाले, दूसरों का भविष्य सुधारने वाले स्वयं कितने असुरक्षित हैं पफुटपाथ पर बैठे या दरबार लगाए ज्योतिषियों को देख-समझ कर भलीभांति जा सकता है... 'कानपुर के गुजैनी मोहल्ले के दुर्गा प्रसाद विद्या निकेतन, ;ये नाम भी एक ज्योतिषाचार्य ने अपने जोड़-तोड़ से अपने बाप के नाम से द्घोषित करवा दिया हैद्ध में अड़तालिसवां राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन संपन्न हुआ था। इस सम्मेलन में ज्योतिषियों ने खूब दूर-दूर की हांकी।'' यानी कि भइया, पूरे सम्मेलन में ज्योतिषियों का लब्बोलुआब' ये था कि हर मर्ज, पफर्ज, दर्द, दिमाग, दिल इत्यादि रोगों की दवा है ज्योतिष। 'ज्योतिषी के पास जाओ हर समस्या का समाधान पाओ और जल्द से जल्द मालामाल हो जाओ।' ऊपर भगवान और नीचे ज्योतिषाचार्य पहलवान।
'उसकी अहिंसा : सि( अहिंसा' इसमें शायद ही कोई संदेह करे कि बीता हुआ जीवन इतिहास नहीं होता। दीप जी कबीर दास की बोली बानी के उतर आये हैं जिसकी हम कम आशा करते रहे हैं... 'गणेश शंकर विद्यार्थी। देश की आजादी के लिए गाँधी जी द्वारा शुरू किए गये अहिंसा के आंदोलन के कर्मठ यो(ा... गाँधी जी की ईर्ष्या रचनात्मक ईर्ष्या थी। उन्होंने विद्यार्थी के बलिदान से प्रेरणा ली थी। उसे अपने जीवन का लक्ष्य बनाया था। विद्यार्थी का वह बलिदान इसी शहर में हुआ था।'' इसी शहर के लोगों के लिए हुआ था। इस शहर के सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए हुआ था...।' और आगे बढ़ते हुए अपना रौंदा रूप जाहिर करते हैं। -दीप जी एक तरह से कानपुर वासियों को पूरी द्घृणा और क्रोध से पफटकारते हैं-'पर कानपुर के लोग शायद हिसाबे माजी-रखना पसंद नहीं करते। वे नहीं जानते कि आज जिस आजादी से वे अपनी मर्जी से जीवन जी रहे हैं उस आजादी के लिए इस शहर के किन-किन लोगों ने अपना खून बहाया है अपने प्राणों की आहुति दी है।'
दीप जी भावुक कवि-लेखक कितने हों, पर अहसान पफरामोशी के प्रति वह बेहद कठोर हैं और उन्हें शिद्दत से हिकारत भरी नजरों से देखते हैं 'कानपुर में किस शहीद की चिता पर हर साल मेला लगता है?'
दीप जी बेलाग-लपेट हर किसी से पूछते हैं कि अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी कहाँ शहीद हुए- जानता है कोई, '...कहाँ है चौबे गोला? कहाँ है करीम की चक्की? क्या वहाँ है अमर शहीद विद्यार्थी की समाधि? कोई शहीद स्थल? कोई छतरी? कोई स्तंभ? कोई स्मृति चिन्ह?'
दीप जी अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी की उपेक्षा से इतने मर्माहत है कि वह कानपुर के कवि जगदम्बा प्रसाद मिश्र 'हितैषी' को लपेट लेते हैं ...हितैषी नाहक ही लिख गये- ''शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले। वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।''
अमरीक सिंह दीप के दुःख-दर्द से उभरने वाला गुस्सा जायज है आज हर ऐरा-गैरा नथ्थू खैरा, सरकारी- गैर
सरकारी शासक एवं मूर्ति-देवी मायावती खुद को अमरतत्व प्रदान करने के लिए अरबों के स्मृति चिन्ह, छतरी, स्तंभ, पार्टी झंडा-बैनर और मूर्तियाँ स्थापित करवा रही हैं। और हमें ;आम व खास लोगद्ध जिन्हें याद रखना चाहिए उन्हें भूलते जा रही हैं, जिन्हें पफूटी आँखों देखना नहीं चाहिए उनके हम पाँव पखार रहे हैं- चूतड़ चाट रहे हैं।
'नौटंकी के प्रवर्तक श्रीकृष्ण पहलवान' 'कानपुर में 'कलम का सिपाही', 'नदी रेत हुई हैं', 'नदी जैसे लोग और उस शहर पर स्वर्ग भी सदके' में क्रमशः कानपुर के नौटंकी के प्रवर्तक और प्रपितामह श्रीकृष्ण मेहरोत्राा, कला शहंशाह प्रेमचंद, रमेश चन्द्र गुप्ता 'चन्द्रेश', प्रतिष्ठित वरिष्ठ लेखिका सूर्यबाला को जिस आत्मीयता, आदर-सम्मान के साथ ही साथ जिस खुलेपन से दीप जी ने स्मरण किया वो काबिले तारीपफ है। शायद कम लोग ही जानते होंगे कि आदरणीय सूर्यबाला जी का कानपुर विशेष लगाव है। एक ओर कथा सम्राट प्रेमचन्द और दूसरी ओर वरिष्ठ रचनाकार सूर्यबाला का कानपुर के प्रति रचाव-लगाव व विलगाव किसी को भी आश्चर्यचकित कर सकता है। श्रीकृष्ण पहलवान व चन्दे्रश की पफांकामस्ती और दरियादिली आज के लोगों को बहुत कुछ सीखने-समझने में सहायक हो सकती हैं बशर्ते जो अभी तक महान साहित्यकार, पत्राकार एवं आदमी न बन चुके हों। दीप जी इन पफक्कड़ मनुष्यों से सीधा संवाद इसलिए कर सके हैं क्योंकि वे स्वयं जन्मजात पफक्कड़ गुरु रहे हैं। मलंगी होने के कारण ही दीप जी पूज्यनीया लक्ष्मी सहगल को हमारे सम्मुख देशप्रेम-त्याग, उदारता, विनम्रता इत्यादि बड़ेपन से प्रस्तुत कर हमें बौना-दर बौना बना देते हैं। हम जरा-जरा स्वार्थ-लालच के वशीभूत होकर अपना जमीर बेंच डालने में संकोच नहीं करते और दूसरी ओर जांबाज महिलाएँ डॉ. लक्ष्मी सहगल व डॉ. कमलेश अवस्थी लोभ-लालच, पद-प्रतिष्ठा और पैसों से दूर बहुत दूर स्वयं को रखती हैं। हमें सच्चा सलाम पूज्यनीया लक्ष्मी सहगल-कमलेश अवस्थी जैसे लोगों को करना चाहिए या कि मालामाल। टुच्चे, खद्दरधारी या खाकीधारियों को? कुछेक को छोड़कर अधिकांश मूर्धन्य साहित्यकार राजनेताओं, हर वर्ग के मठाधीशों, छोटी-बड़ी संस्थाओं के शासकों आदि के समक्ष नतमस्तक होकर के मौसमी स्वरताल से गा रहे हैं... 'जैसा चाहो बजा लो हमें, हम नहीं आदमी, हम झुनझुना हैं' ;दुष्यंतद्ध।
'कड़े पानी का शहर' की रचनाओं में कहीं दीप जी व्यंग्यबाग चलें हैं, कहीं चीखें व करुण का हाहाकार मचा है। 'समझो पेड़ों की भाषा', पफूलों को खिलने दो', 'एक शहर का आत्मविलाप', 'कोई सुने इस शहर का रुदन', 'ये कौन रो रहा है' इत्यादि रचनाओं में परिकल्पनात्मक किस्सा गोई, शब्द-चित्रा और संस्मरणों का अच्छा समावेश रहे हैं जो रचनाओं को प्रामाणिक व रोचक बनाता है। इसीलिए प्रतिष्ठित वरिष्ठ कथाकार श्री राजेन्द्र राव दीप जी को किस्सागोई का उस्ताद मानते हैं।
'दलाल संस्कृति का पाश' और 'एक अदद लालटेन' में दीप जी अपने अभाव, दुःख उपेक्षा, इच्छा-आकांक्षाएँ इत्यादि मनोभावों को याद कर हमारी आँखें भी नमकर गये हैं। भूले-बिसरे लोग, जानलेवा द्घटनाएँ, अपनों के छलछद्म व उच्चकोटि के नीचों का पाखंड पूरी ईमानदारी और शिद्दत से चलचित्रानुमा दिखाते हैं। ''इतना सब होने के बावजूद न कोई आंदोलन, न कोई विद्रोह, न कोई क्रांति। ...पफेरीवाला हमारे मकान के सामने से गुजर कर शिव मंदिर जाने वाली सड़क का मोड़ मुड़ चुका है। एक अदद लालटेन हासिल करने के लिए मैं उसके पीछे पागलों की तरह दौड़ पड़ता हूँ।' ;एक अदद लालटेनद्ध।
साहित्य-कला में रुचि रखने वालों को पता ही होगा कि दीप जी के लेखन की शुरुआत पद्य विधा से हुई है। वह आम आदमी की तकलीपफ, आशा, विश्वास, हताशा-निराशा, अंधेर-अंधकार, एकांतता, अजनबीपन, अभिमन्युनुमा चारों ओर से द्घिर गये अनामी यो(ा का संद्घर्ष आदि के किस्से भावुक मन से उकेर कर एक मुकम्मिल कविता में बदल देते हैं। तभी तो उनका मन कानपुर के पद्य साहित्य विधा पर खूब-खूब वापस जा पहुँचा है। 'गोताखोरों की प्रजाति का एक कवि', 'काश वे कवि कानपुर के न होते' व 'क्यों है कानपुर कवियों का शहर'।
दीप जी से कानपुर और उसके आस-पास का इतिहास-भूगोल, नागरिक-समाजशास्त्रा कुछ खिलन्दड़पन से प्रस्तुत करते हैं, पर गहरे पानी बैठकर और कमोवेश हमें भी उसी गहरे जल में ले जाकर।
'किससे कहूँ व्यथा', 'प्रभु इन्हें क्षमा करना' और 'कला महर्षि सि(ेश्वर दादा' में दीप जी का भावुक मन मजबूती से अपनी बात कहता है। दूसरों की बेचारगी, संत्रााश, बिखराव की असमर्थता है तो सि(े दादा की जागरूकता, जूझारूपन, आवारगी, संद्घर्षशीलता आदि का बखूबी चित्राण हुआ है।
जो क्रिया-कलाप सरकारी-गैरसरकारी संस्थाएँ और सरकारें बुर्कापोशी से करती थीं, अब पूरी निर्लज्जता व बेखौपफी से करती हैं। हम मुँह बांये खुलेआम साहित्य, कला और संस्कृति का राजनीतिकरण देखते हैं। हमारे अन्नदाता, स्वामी, मालिक यानी कि सत्तानशीन दोमुँही राजनीति के तहत ढोल बजाते हैं कि साहित्य हमें मार्ग दिखाता है। हमारी खामियों-कमजोरियों के प्रति हमें आगाह करता है। हमें उचित परामर्श देकर राष्ट्र-समाज को आगे ले जाता है। लेकिन होता है ठीक इसके उलट। कला, साहित्य और संस्कृति को सत्ताधीशों ने अपने निहितस्वार्थ की पूर्ति का एक सीधा-सरल माध्यम बना लिया है। दीप जी इसके खिलापफ हैं। ऐसे खिलापफ हैं कि उनकी द्घृणा और क्रोध पूरी व्यंग्य रचना 'अथ पद्मश्री पाण्डेय गाथा' में स्पष्ट तौर पर देखा-समझा जा सकता है... 'लेकिन इसमें दोष दरअसल श्री पाण्डेय का नहीं है बल्कि पुरस्कारों के जरिए ओछे तुष्टिकरण हैं। जो दौर शुरू हुआ है उसने साहित्यिक सम्मानों को राजनीतिक बंदरबांट का विषय बना दिया है।'
दीप जी ने जुड़वा नाम वाले कवि श्री श्याम नारायण पाण्डेय की जमकर खबर ली है... 'हकीकत यह थी कि यह श्याम नारायण पाण्डेय वह श्याम नारायण पाण्डेय नहीं हैं... कवि की पॉलटिक्स यहीं आकर नहीं थमती। वह खड़ताल बजा-बजाकर अपनी पार्टी के नेता इंदिरा गाँधी का जोर-शोर से 'कवि कीर्तन करने लगती है...।'
'राजनीति का साहित्य' और 'साहित्य की राजनीति', पुरस्कार प्राप्त करने का साहित्य उपर्फ राजनीति से दीप जी कुंठित और कुपित हैं... 'जिस लेखक की पालटिक्स इतनी धांसू हो... विभिन्न प्रांतों के राज्यपालों को आमंत्रिात करता हो, लगभग ढाई एकड़ जमीन पर निर्मित हिन्दी भवन ;गंगपुर-बिठूर रोडद्ध का नामकरण कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी के नाम पर करता हो... देश के बड़े-बड़े नेताओं के साथ उठता-बैठता और मधुर संबंध रखता हो, पद्मश्री उसे नहीं मिलेगी क्या...?''
तो कुल जमा हमारे दीप जी का सापफ तौर रपर कहना है कि जो इस तरह अपने आपको विभूषित कर लें उसे पद्मश्री, पद्मविभूषण या यथाशीद्घ्र 'भारत रत्न' में मिल जाएगा। लेकिन मैं उनके साहित्यिक सपफर का बड़ा पुराना साथी रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि दीप जी ऐसे श्याम नारायणों से मिलकर पूरे आत्मविश्वास से गर्जना करते होंगे, '...जो कल तक यहाँ तख्ते-नशीं था, उसे भी अपने खुदा होने का यकीं था।'
अमरीक सिंह दीप के 'कड़े पानी का शहर' के बारे में एक बात और अर्ज कर दूँ कि इस दस्तावेजी किताब, में हिन्दी साहित्य की कई विधाओं का संगम लहरा रहा है। इस पुस्तक की रचनाओं के बारे में पाब्लो नेरूदा के शब्दों को उधार लेता हूँ-'यही वह कविता होनी चाहिए जिसकी तलाश हम करते हैं, तेजाब की तरह, हाथों के वनज से द्घिसी हुई, पसीने और धुएँ से भीगी हुई, बेला के पफूलों और मूत्रा की गंध लिए हुए, उन पेशों के विविध रंगों में रंगी हुई जिनसे हम जीवन-यापन करते हैर्ं-कानून के अंदर या बाहर। ऐसी कविता जो हमारे पहने हुए कपड़ों की तरह अशु( हो, दाल के धब्बे, लज्जाजनक आचरण से गंदे हमारे शरीरों की तरह, हमारी झुर्रियों और रतजगों और सपनों, निरीक्षणों और भविष्यवाणियों, प्यार और नपफ़रत की द्घोषणाओं, दृश्यावलियों और पशुओं, मुठभेड़ के धक्कों, राजनीतिक प्रतिब(ताओं, इनकारों और संदेहों, समर्थनों और करों की तरह अशु( हो...।''

६८/३१-ए, लोकमन मोहाल, कानपुर-२०८००१

मो. ०९३६९७९३१४४
 
 
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