दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
पुस्तक के साथ

तालीम का इल्म

 

सुशील सि(ार्थ

 

  सुशील सि(ार्थ

किसी भी किताब को पढ़ना ठीक किसी अपरिचित से परिचय करने जैसा होता है। जितना समय आप किताब पढ़ने में लगाते हैं, जैसे उतना समय आपने किसी के साथ बिताया। अच्छा या बुरा, यह तो पढ़ने या बिताने के बाद ही महसूस होता है। याद करें तो कुछ किताबें ऐसी भी होगी जो जीवन भर आपके साथ रहती हैं। मैं याद करूँ तो प्रेमचंद, निराला, हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, नामवर सिंह और मुक्तिबोध की लगभग सारी किताबें लगातार सहचर की तरह मेरे साथ रहती हैं। कुछ और लेखकों की किताबें भी हैं। सबसे अच्छी किताब वह है जिससे आप बहस कर सकें। कभी वह आपको एक अप्रत्याशित आशय से द्घेर दे और कभी आप उसके सामने पाठ का नया प्रांतर प्रशस्त कर दें। सुलाने, रिझाने, गुदगुदाने और वक्त काटने में सहायक किताबों में मेरी दिलचस्पी बी.ए. पास करते करते खत्म हो चुकी थी।
'दो शब्द' में प्रेमपाल शर्मा लिखते हैं, 'जिस शिक्षा का चेहरा ऐसा क्रूर हो कि बच्चे और नौजवान आत्महत्या करने को मजबूर होंऋ जो आपके चेहरे, विचारों को और सांप्रदायिक, जातिवादी, कूपमंडूक बनाएऋ जो प्रतिभा के नाम पर सिपर्फ रट्टू, नकलची, ढिंढोरची नागरिक बनाए, उसे आज और अभी बदलने की जरूरत है और यह तभी संभव है जब हम और हमारे बच्चे हँसते-खेलते पढ़ने के आनंद में शामिल हों।' यह पूरी किताब का सारांश है। शिक्षा के बड़े क्षेत्रा में व्याप्त विसंगतियों पर समय-समय पर किताबें लिखी गई हैं। लेखों, टिप्पणियों और गोष्ठियों आदि की बहुतायत तो है ही। अकबर इलाहाबादी ने अपने अंदाज में कहा था-
'हम ऐसी कुछ किताबें काबिले ज़ब्ती समझते हैं।
जिन्हें पढ़कर के लड़के बाप को ख़ब्ती समझते हैं॥'
या भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की मुकरियां या बहुत पहले
तुलसीदास की ऐसी पंक्तियों-'मात पिता बालकन्द बोलावहिं, उदर भरइ सोइ धरम सिखावहिं।' एक दूसरी तरह से कबीर

पढ़ने का आनंद
प्रेमपाल शर्मा
सामयिक बुक्स,
दरियागंज, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-२,
मूल्य १२० रुपये
पृष्ठ : २४०

ने भी 'कागद की लेखी' और 'आंखिन की देखी' कहकर कुछ ऐसा ही मत दिया था। शिक्षा की सार्थकता पर महात्मा गाँधी, टैगोर, गीजूभाई, यशपाल, कृष्ण कुमार आदि के विचार भी विमर्श के लिए उपलब्ध हैं। ऐसा भी नहीं कि आजादी मिलने के बाद शिक्षा पर ध्यान न दिया गया हो। सभी सरकारों ने अपनी-अपनी तरह से देश में शिक्षा की व्यापक जरूरतों को पूरा किया। भारत के एक राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस की तरह मनाया जाता है। लोग साक्षर हो सकें इसके लिए कैसी कैसी योजनाएँ हैं, यह बताने की शायद जरूरत नहीं है। सुभाषितों, भाषणों, योजनाओं, शिक्षा-संस्थाओं से सचमुच देश पटा पड़ा है। तब पिफर प्रेमपाल शर्मा क्यों परेशान हैं! शिक्षा से या एक शिक्षित व्यक्ति से उनकी अपेक्षाएँ क्या है! क्यों वे संधियों से झांकती दुरभिसंधियों को रेखांकित करना चाहते हैं! क्या वे नयेपन के या बदलावों के नाम से भड़क जाने वाले परंपरावादी व्यक्ति हैं! ऐसे बहुत सारे प्रश्न पुस्तक पढ़ते समय मुझे परेशान करते रहे। 'पढ़ने का आनंद पढ़ जाने पर महसूस हुआ कि प्रेमपाल शर्मा ने अगणित सक्रियताओं के भीतर सार्थकता तलाश करने की कोशिश की है। यदि शिक्षा या विद्या को लेकर प्रचलित सुभाषितों ;'सा विद्या या विमुक्तये' या 'विद्या ददाति विनयं' इत्यादिद्ध को छोड़ भी दें तो शिक्षा का आधुनिक लोकतांत्रिाक समाज में कोई तो अर्थ होना चाहिए। मैथिलीशरण गुप्त के अति कठोर दृष्टिकोण को भी भूल जाएँ, 'शिक्षे, तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनीं।' ...लेकिन यह तो देखना होगा कि 'काला अक्षर भैंस बराबर' के खिलापफ लगातार चल रही सक्रियताओं और अकूत धन से सुसज्जित हजारों हजार परियोजनाओं के बाद भी भारत में 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' की भयावह स्थितियाँ क्यों बनी हुई हैं!
प्रेमपाल शर्मा ऐसी स्थितियों के छोटे बड़े कारणों की तलाश करते हैं। कारणों की तलाश पहले भी कुछ लोग कर चुके हैं। पिफर इस किताब की अपनी विशेषता क्या है! विशेषता यह है कि पूरी किताब 'शिक्षा की व्यावहारिक आलोचना है। सि(ांत के स्तर पर कापफी दिलदहलाऊ विवेचन भी किया जा सकता था, लेकिन प्रेमपाल ने दूसरी शैली अपनाई-'मैंने मैं शैली अपनाई।' पूरी पुस्तक प्रत्यक्ष अनुभव की देन है। इसे उदाहरणों से गुज़रते हुए लिखा गया है। अधिकांश छोटी छोटी टिप्पणियां हैं। कुछ लम्बे आलेख भी। लेखक अपने पास पड़ोस को देखता है, किसी संतोष्ठी-सेमीनार में शामिल होता है या किसी से संवाद करता है। इन सबके दौरान वह इस बात पर नज़र रखता है कि शिक्षा के तमाम रूपों के बीच व्यापक मनुष्यता का कोई चेहरा बन पा रहा है या नहीं! पुस्तक के कुछ उपशीर्षकों से इस चिंता की थोड़ी सी ख़बर मिल सकती है- पापा के कहने पर, दीवार पर लटके मूल्य, अच्छा स्कूल, पढ़ने का आनंद, पुस्तकालय में हिन्दी, समाज में रहने की शिक्षा, बजट में शिक्षा, छात्रा और छुट्टियाँ, कुर्सी पर प्राचार्य, शिक्षा : दाखिले की नीति, पढ़े लिखे बैल, सांप्रदायिकता : स्कूली इतिहास का कहर, शिक्षा : स्कूल के विकल्प और मेरे जीवन में पुस्तकालय आदि। अर्थात्‌ किताब में लेखक ने शिक्षा की बहुआयामी समस्याओं को अधिकाधिक समेट लिया है। प्रेमपाल शर्मा कहानीकार और व्यंग्यकार हैं। इस पुस्तक में उनके दोनों रूप देखे जा सकते हैं। यहीं कहीं विवरण पढ़ते हुए मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी 'बड़े भाई साहब' की याद आने लगती है, जिसमें उन्होंने 'स्ट्टापिफकेशन' वाली, 'सूचना गोदाम' बना देने वाली शिक्षा प(ति पर मज़े ले लेकर प्रहार किया है। 'पढ़े लिखे बैल' में लिखते हैं, 'संद्घ लोक सेवा आयोग से चुनी हुई एक महिला अधिकारी ने दसवीं में पढ़ रही अपनी बेटी की खातिर पूरा वर्ष पूजा उपवास में लगा दिया... बेटी पूजा और ट्यूशन की रेल-पेल के बावजूद मुश्किल से पास हुई। जनजागृति का आ''वान करने वाले पत्राकारों की दसों अंगलियों में नीलम जड़ित अंगूठी और रुद्राक्ष की माला देखकर बार-बार अपफसोस होता है।' और तीखा व्यंग्य तो अवसर मिलते ही प्रकट हो जाता है। अपने बच्चों पर अपने सपनों को लादने वाले पापाओं के लिए ये वाक्य है-'सारे पापाओं! ध्यान से सुन रहे हो न! देश आज जिस दुर्गति में है, उसमें आपका योगदान सबसे ज्यादा है। मम्मियों का संबोधन भी अंतर्निहित है।
यदि सूत्रा रूप में समझना चाहें तो प्रेमपाल शर्मा की शिक्षा से अपेक्षाएँ हैं- रुचि-रुझान-क्षमता अनुसार शिक्षा, शिक्षा में न्याय-समानता, पाठ्यक्रम की सार्थकता, परिवार और विद्यालय का सामंजस्य, शिक्षा में श्रम की संस्कृति का विकास व सम्मान, शिक्षा के औपचारिक रूपों के विकल्पों की खोज, पुस्तकालय संस्कृति का पुनर्नवन, शिक्षा की स्थानीय व राष्ट्रीय संस्थाओं का आत्मान्वेषण और सर्वोपरि शिक्षा द्वारा व्यक्ति के मानवीय वैश्विक व्यक्तित्व का विकास। जाहिर है इन अपेक्षाओं के रास्ते में आने वाली बाधाओं के प्रति लेखक ने सचेत किया है। बाधाएँ दूर कैसे हों। इसके लिए लेखक ने बहुत सारे सुझाव दिए हैं, जिनका निचोड़ है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने दायित्व को महसूस करें। स्वाभाविक रूप से यह गाँधीवादी दृष्टिकोण के पास ठहरता है। 'समान और सार्थक शिक्षा वाले आलेख में प्रेमपाल ने गाँधी जी के उस वाक्य को उद्धृत किया है जो उन्होंने राजनीति को चुनने के सवाल पर कहा था-'क्योंकि कोई भी बड़ा सामाजिक परिवर्तन भारत जैसे बड़े देश में सिपर्फ राजनीति से ही संभव है। प्रेमपाल शर्मा राजनीति के स्थान पर कोई और शब्द रखना चाहते हैं-'..उसके लिए एक शब्द होता शिक्षा, और वह भी समान शिक्षा।' इसके बाद वे संविधान का हवाला देते हैं। अपनी व्यापक इच्छा और सदाशयता में यह बात दुरुस्त है। लेकिन जातियों, क्षेत्राों और पार्टियों में विभक्त बु(यिों द्वारा संविधान के प्रत्येक शब्द का अपना-अपना भाष्य किया जा रहा है। यह कोई छिपी बात नहीं है। शिक्षा मापिफयाओं की बात तो प्रेमपाल ने भी स्वीकार की है। तो स्वभावतः 'शिक्षा' की किसी भी नीति के पीछे एक सुस्पष्ट 'राजनीति' है। तो पूछिए ना कि पार्टनर, आपकी पॉलिटिक्स क्या है। पिछले वर्षों में पाठ्यक्रम को लेकर अनेक राज्यों में विवाद छिड़ता रहा है। नीले, भगवा, तिरंगे, लाल रंगों में बंटे राजनीतिक यु(ों में शिक्षा को लेकर क्या कभी कोई 'सर्वोपरि राय' बन पाएगी। आखिर इतिहास, संस्कृति, पुरातत्व, भाषा आदि आदि शिक्षा के ही तो अनुषंग हैं। इसलिए किताब के सारे विचारों से सहमत होते हुए इस बात की जरूरत महसूस होती है कि शिक्षा के 'धर्म निरपेक्ष जातिविहीन 'स्वरूप को तय करने वाली राजनीति की रूपरेखा भी स्पष्ट हो। संभव है प्रेमपाल शर्मा अगली किसी पुस्तक में यही स्पष्ट करें। क्योंकि समकालीन हिन्दुस्तान में सबकुछ अतिस्पष्ट है। इस अतिस्पष्ट को ही स्पष्ट करना है। 'पढ़ने का आनंद' किताब इस दिशा में पाठक की चेतना को अग्रसर करती है। पाठक आनंदित से अधिक बेचैन होता है।

बी-२/८-बी, केशवपुरम, लारेंस रोड, नई दिल्ली-३५
मो. ०९८६८०७६१८२

 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)