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बचपन में यज्ञोपवीत संस्कार से पहले ही मेरा साहित्यिक
संस्कार हो गया था। द्घर के कोने अंतरे में पत्रा-पत्रिाकाएं एवं लेखकों के पत्रा बिखरे रहते थे। तब साहित्यकार मेरे लिए देवता-तुल्य हुआ करते थे। छपे शब्द मेरे लिए ब्रह्म की लकीर की तरह था। मेरी कोशिश रहती थी कि पाठ्य
पुस्तकों में मुद्रित शब्द की हू-ब-हू नकल करूँ क्योंकि मुझे लगता था कि थोड़ा भी हेर-पफेर होने से शब्द गलत हो जाएगा। साहित्य के प्रति मेरे आकर्षण का एक बड़ा कारण यह था कि किस्सा-कहानी पढ़ने में मेरा मन लगता था। कविता के प्रति मेरा रूझान बाद में विकसित हुआ। चूंकि मेरे दोनों अग्रज स्नातक एवं स्नातकोत्तर कक्षा में साहित्य के विद्यार्थी थे, अनिच्छापूर्वक जबर्दस्ती मैं इतिहास की तरपफ मुड़ गया। इतिहास में एम.ए. तो मैं कर गया लेकिन साहित्य से मेरा लगाव बना रहा।
हम जैसा चाहते हैं, आश्चर्यजनक रूप से कभी द्घटित हो जाता है और कभी नहीं भी द्घटित होता। एम.ए. के साथ-साथ मैं लॉ भी कर रहा था। मेरी हार्दिक इच्छा एम.ए. के साथ-साथ आईएएस की परीक्षा में बैठने की थी और इसके लिए मैं तैयारी भी कर रहा था। बल्कि यूपीएससी से मुझे रोल नं. के साथ वांछित परीक्षा-केन्द्र भी मिल गया था। लेकिन जुलाई १९६८ में इंटिलिजेंस ब्यूरो, गृहमंत्राालय ;भारत सरकारद्ध की नौकरी मैंने ज्वाइन कर ली। लॉ की पफाइनल परीक्षा में बैठने की अनुमति तो मुझे मिल गई, लेकिन नेशनल पुलिस अकादेमी, माऊंट आबू ;राजस्थानद्ध में प्रशिक्षण के दौरान, मुझे यूपीएससी की परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी गई। इससे मैं व्यथित भी हुआ और बेचैन भी कम नहीं। मेरे सामने त्याग पत्रा देने का विकल्प था। चूंकि मैं निम्न मध्यवर्गीय परिवार से था और मेरा परिवार तब द्घनद्घोर
आर्थिक संकट से गुजर रहा था और ऐसी स्थिति में मेरा त्याग पत्रा देना पारिवारिक हित में नहीं होता। यही सोचकर मैंने आई.वी. की नौकरी की नियति स्वीकार कर ली। मेरे सामने तब संद्घर्षरत बाबू का चेहरा था।
हम जाना चाहते हैं पूरब और चले जाते हैं पश्चिम। कई बार परिस्थितियां आपके भविष्य को अनुकूलित करती हैं। हमारा भविष्य अतीत और वर्तमान के गहरे अंतर्द्वंद्व में पफंसा होता है। ठीक अज्ञेय की कविता 'नाच' की तरह। मेरी पहली पोस्टिंग गौहाटी ;अब गुवाहाटीद्ध में हुई। दो महीने के संक्षिप्त प्रवास के बाद अप्रत्याशित और अचानक मेरा
तबादला सितंबर १९७० में आइजोल ;तब असम राज्य का मिजोहिल्स डिस्ट्रिक्ट का हेडक्वार्टरद्ध हो गया। पफरवरी १९६६ में लालडेंगा के नेतृत्व में पूर्वोत्तर प्रांत के इस जिले में भारत से अलग स्वतंत्रा 'मिजोरम' देश बनाने के लिए एक बड़ा विद्रोह हुआ था। १९७० में भी मिजोनेशनल ंट की भूमिगत हिंसक कार्रवाई जारी थी और पूरा जिला भय और आतंक के साए में सांस ले रहा था। आइजोल पहुँचकर लगभग पूरी दुनिया से मैं कट गया था बल्कि साहित्य भी पीछे छूट गया था। यह एक वर्जित जिला था और यहाँ प्रवेश के पूर्व सिलचर के आयुक्त से अनुमति पत्रा लेना पड़ता था।
सचमुच यहाँ पहुँचकर मुझे अहसास हुआ कि मैं अकेला हो गया हूँ। अपने भीतर पैठी साहित्य की जिन जड़ों को मैंने हटात् झटका था, अब वही पिफर मेरे भीतर उगने लगीं। एक अच्छी बात यह हुई कि मेरे अग्रज पत्राों द्वारा मुझे
साहित्यिक गतिविधियों की प्रायः सूचना देते रहते थे। उन्हीं के एक पत्रा से मुझे पता चला कि प्रसि( कथाकार मार्कण्डेय के संपादन में इलाहाबाद से 'कथा' त्रौमासिक का प्रकाशन १९६९ के अंत में हुआ है। तत्काल मैंने वीपीपी से 'कथा' का प्रवेशांक मंगवाया। उस समय तो ठीक से पता नहीं चला था। लेकिन अब पिफर से पत्रिाका पलटने पर लगा कि पत्रिाका के प्रवेशांक में आरभ में ही 'निराला की साहित्य साधना' ;प्रथमखंडद्ध पर तीन समीक्षाएँ एक साथ छपी थीं। भगवत शरण उपाध्याय, प्रकाशचंद्र गुप्त और रमेश कुंतल मेद्घ। तीनों समीक्षाएँ सकारात्मक थीं और डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा लिखित निराला की जीवनी की भरपूर सराहना की गई थी। लेकिन इसी पत्रिाका के बीच के पृष्ठों पर श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास 'रागदरबारी' पर श्रीपतराय की विध्वंसात्मक लंबी समीक्षा थी। श्रीपतजी की समीक्षा का शीर्षक था-'बहुत बड़ी ऊब का महाग्रंथ।' वक्त ने साबित कर दिया कि 'राग दरबारी' खूब चर्चित ही नहीं हुआ, कालजयी हुआ और उसे १९६८ का साहित्य अकादेमी का पुरस्कार भी मिला। अब जब श्रीलाल शुक्ल जी नहीं रहे ;निधन २८ अगस्त २०११द्ध, मुझे हैरानी होती है कि किस तरंग में श्रीपतजी ने इस उपन्यास को खारिज कर दिया था। श्रीपत राय की यह समीक्षा कुछ उसी तरह की थी जैसी डॉ. भगवत शरण उपाध्याय ने दिनकर की 'उर्वशी' पर 'कल्पना' में लिखी थी, जिस पर बड़ा विवाद हुआ। यह विवाद इतना गहराया कि डॉ. नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक 'कविता के नए प्रतिमान' में पूरा एक अध्याय- 'उर्वशीः मूल्यों की टकराहट' लिखा। मेरी उत्सुकता यह जानने की थी कि श्रीपतजी ने 'राग दरबारी' को खारिज क्यों किया। एक निजी बातचीत में हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचक डॉ. नामवर सिंह से इसके बारे में पूछा तो उनका जवाब था-'श्रीपतजी को कहीं लगा कि यदि 'रागदरबारी' की प्रशंसा करेंगे तो प्रेमचंद्र का
'गोदान' ओझल हो जाएगा, क्योंकि दोनों की पृष्ठभूमि ग्रामीण है।'
आइजोल में मुझे अनेक लद्घुपत्रिाकाएँ मिलने लगी थीं। १९७२ में जब मैं वर्मा बोर्डर स्थित वपफाई ग्राम समूह पहुँचा तो मैं और अकेला हो गया। वहाँ असम राइपफल्स की एक टुकड़ी, जिला प्रशासन का प्रशासन अधिकारी था और भारत सरकार का एक छोटा ग्रुप, जिसका मैं अधिकारी था। ग्राम समूह में दो-तीन पूर्व सैनिक थे, जिनसे संवाद होता था। बाकी संवादहीनता की स्थिति थी। जब कभी मैं बॉर्डर पर जाता था, तो बीच में भारत-वर्मा की सीमा-रेखा-लैलट नदी के पार 'लालटीन की छत' ;निर्मल वर्माद्ध चमकती थी। मेरा मन करता था नदी पार करके वर्मा पहुँच जाऊँ। लेकिन यह संभव नहीं था। अपने एकांत के दिनों में मैंने डिस्ट्रिक्ट लाइबे्ररी, आइजोल से पुस्तकें मंगवाना शुरू किया। पहले ढेर सारे जासूसी उपन्यास पढ़े-जेम्स हेडली चेज, आगाथा क्रिस्टी। बाद में बर्ट्रेड रसेल की जीवनी ;तीन खंडद्ध वीएस नायपॉल का 'एन एरिया ऑपफ डार्कनेस', नीरद सी. चौधरी का 'आटो वायग्रॉपफी ऑपफ एन अननोन इंडियन, शशि व्रता की- 'दि कंपफेशन ऑपफ एन इंडियन लवर', सी एवं मी। यहीं मैंने तॉलस्तोय, चेखव, दोस्तोएवस्की को पढ़ा। उन दिनों पढ़ने की ललक बहुत बढ़ी हुई थी। एअर ड्रॉप में एक साथ टोल, रीडर्स डाइजेस्ट और इलेस्ट्रेटेड वीकली मिल जाती थी। 'धर्मयुग' और 'सरिका' विभागीय सहयोगी की मदद से मैं मंगा लेता था। एक दिन साहित्यिक चमत्कार हुआ। संभावना प्रकाशन ;तब दिल्लीद्ध से मुझे १६ रुपये का वीपीपी पैकेट मिला। उसमें पांच पुस्तकें थीं- हरिशंकर परिसाई की 'तिरछी रेखाएँ' एन कमल चौधरी का 'बाइस रानियों का बाइस्कोप', सतीश मदान का 'भूख और नींद'। अन्य दो पुस्तकों का नाम अब मुझे याद नहीं। परसाई को पढ़कर मेरे सामने साहित्य की एक नई दुनिया खुली। इतिहास बहुत पीछे छूट गया था और अब मैं पूर्णतः साहित्य की दुनिया में रम गया था। अग्रज के पत्रा से पत्रा-पत्रिाकाओं की सूचना मुझे लगातार मिल रही थी। बल्कि, अनेक लद्घु पत्रिाकाएँ भी मुझे मिलने लगी थीं। अनेक साहित्यकारों से मेरा पत्रा-संपर्क भी हो गया था। इस बीच एक और द्घटना द्घटी। चंपफाई ;दूरस्थ मेरा दफ्रतरद्ध से एक रोज वायरलेस पर खबर मिली कि वहाँ के डाकखाने में मेरे नाम 'आवेग' ;संपादक- चंद्रकांत देवताले, प्रसंग आईना, रतलामद्ध का कोई अंक आया हुआ है। तब तक वपफाई में पोस्ट ऑपिफस नहीं खुला था। इस पत्रिाका की सूचना मिलने पर मेरी बेचैनी बढ़ गई और मैंने निर्णय लिया कि अगले दिन मैं चंपफाई जाऊँगा पत्रिाका लेने के लिए। वपफाई से सुबह सात बजे मैं निकला था और लगभग ३५ किमी पैदल दूरी तय करके मैं अपने पिट्ठू के साथ शाम ७ बजे चंपफाई पहुँचा था। 'आवेग' का वह अंक-
'समकालीन कविता की पहचान' पर केंद्रित था। इस अंक का आयोजन अद्भुत था। एक कवि की कविता, उस पर समीक्षकीय टिप्पणी और कवि का वक्तव्य। अब उक्त पत्रिाका का अंक मेरे पास नहीं है, लेकिन दगाबाज स्मृतियों के सहारे अब इतना भर याद है कि अशोक वाजपेयी की 'जबर जोत' कविता पर किसी समीक्षक ने लिखा था और मलयज की कविता 'जख्म पर धूल' पर नंदकिशोर नवल ने लिखा था। पत्रिाका का यह अनूठा प्रयोग था। अगले दिन चंपफाई से हेलिकॉप्टर से वपफाई अपरा''न में लौटा। कहना चाहिए वपफाई में ही मेरे भीतर साहित्य के बीज अंकुरित हुए। तब तक अनेक पत्रा पत्रिाकाओं में मेरी कविताएँ छपने लगी थीं।
अगस्त १९८६ में जब मैं कश्मीर से लौटा, हंस ;संपादक राजेन्द्र यादवद्ध का प्रकाशन शुरू हुआ। पत्रिाका मैं देखता था। इस पत्रिाका में चिनगारी ही नहीं, आग भी थी। तब यह पत्रिाका आरंभिक वर्षों में साहित्यिक पत्राकारिता के शिखर पर थी। कश्मीर से लौटने के बाद मेरे सामने एक बड़ी दिक्कत यह थी कि मुझे लंबे-लंबे पत्रा क्षमा कौल और संजना कौल को लिखने पड़ते थे। मेरे पत्राों में दिल्ली की साहित्यिक हलचल, विवाद और नए प्रकाशन की सूचना होती थी। अचानक एक दिन मेरे मन में आया कि मैं 'हंस' के संपादक राजेन्द्र यादव से मिलूं और उनसे आग्रह करूं कि हिन्दी के दूर-दराज के पाठक सिपर्फ कविता-कहानी ही नहीं पढ़ना चाहते हैं, बल्कि यह भी जानना चाहते हैं कि हिन्दी साहित्य में हो क्या रहा है? पत्रा-पत्रिाकाओं, विवाद,
साहित्यिक हलचल के अतिरिक्त नए प्रकाशन में भी उनकी रुचि हैं। संभवतः १०-१५ मार्च १९९१ के अपरा''न में अक्षर प्रकाशन, दरियागंज में मैं 'हंस' संपादक राजेन्द्र यादव से मुखातिब हुआ। पत्रााचार तो उनसे बहुत पहले से था, साक्षात मिलने का यह पहला अवसर था। 'हंस' में स्तंभ लिखने के प्रस्ताव पर उन्होंने हामी भरते हुए कहा-अगले अंक से तुम स्तंभ लिखना शुरू करो। मेरे लिए यह बहुत सुखद स्थिति थी। 'हंस' के मई १९९१ अंक से मैंने, 'अन्यय' स्तंभ शुरू किया जो बाद में 'औरों के बहाने'-समकालीन सृजन संदर्भ' के रूप में जुलाई २००५ तक अवाध रूप से चलता रहा। पिफर क्या हुआ, मुझे ठीक से मालूम नहीं। अचानक राजेन्द्र जी ने मेरा स्तंभ बंद कर दिया। स्तंभ बंद करने के पीछे अनेक अपफवाह और कारण हैं, लेकिन मेरी रुचि गड़े मुर्दे उखाड़ने में नहीं है।
साहित्य की दुनिया बहुत बड़ी है। कापफी इंतजार के बाद भी जब 'हंस' में मेरा स्तंभ नहीं छपा, मैंने 'वागर्थ' ;कोलकाताद्ध के संपादक रवीन्द्र कालिया से संपर्क किया और सचमुच मैं उनका कृतज्ञ हूँ कि उन्होंने 'परिक्रमा' शीर्षक से मेरा स्तंभ एक-डेढ़ वर्षों तक छपा और पिफर जब वे दिल्ली में 'नया ज्ञानोदय' के संपादक होकर आए तो पत्रिाका में 'भारत की मेज से' उन्होंने मेरा स्तंभ प्रमुखता से छापा। जब मेरा स्तंभ 'नया ज्ञानोदय' में छप रहा था, अचानक राजेन्द्र जी का पफोन मेरे पास आया-'मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ।' तब हम लोग हिन्दुस्तान टाइम्स अपार्टमेंट्स में रहते थे। एक दिन राजेन्द्र जी दफ्रतर से सीधे मेरे द्घर आए। मैंने उनका स्वागत किया। बातचीत के क्रम में' छूटते ही उन्होंने कहा-'बहुत हो गया। अब तुम 'हंस' का ख्याल रखो और लौट आओ।' राजेन्द्र जी का यह कहना कापफी था। वे प्रतिष्ठित कथाकार हैं और 'हंस' से ही मेरी पहचान बनी है। मैं उधडे़बुन की स्थिति में था- एक तरपफ रवीन्द्र कालिया थे, जिन्होंने 'हंस' से निष्कासन के बाद मुझे शरण दी थी और दूसरी तरपफ राजेन्द्र जी थे, जिन्होंने 'हंस' से मुझे उठाया था। अंततः राजेन्द्र जी से मैंने कहा कि आगे से मैं 'हंस' में ही लिखूँगा। पाठकों, जिस संकट और अंतर्द्वंद्व से मैं उन दिनों द्घिरा था, उसकी आप कल्पना नहीं कर सकते। पिफर भी 'नया ज्ञानोदय' को छोड़कर 'हंस' में लिखने का यदि मैंने निर्णय लिया तो निश्चित रूप से राजेन्द्र यादव का 'हंस' नहीं था, प्रेमचंद का 'हंस' था। मैं सच कहूँ, रवीन्द्र कालिया ने मेरे इस निर्णय को स्वीकार नहीं किया, बल्कि आज भी वे मुझसे इसकी शिकायत करते हैं। सचमुच बाद की स्थितियों को देखते हुए मैं न केवल शर्मिंदगी, बल्कि लज्जित महसूस करता हूँ।
मैं पिफर से 'हंस' में लिखने लगा। मेरी हार्दिक इच्छा थी कि मैं 'हंस' के पच्चीसवें वर्ष-रजत जयंती अंक तक लिखूँ पिफर अपनी व्यस्तताओं के कारण खुद यह स्तंभ बंद कर दूँ। बल्कि मैंने 'हंस' के जुलाई अंक में खुद लिखा था 'मैं बहुत बैटिंग कर चुका, अब नए लोग मैदान में आएँ।'
यह संकेत था। लेकिन राजेन्द्र जी हमें ठीक से समझ नहीं पाए। एक दिन दफ्रतर से उन्होंने पफोन किया- 'तुम आज शाम ७ः ०० बजे द्घर पर मिलो कुछ जरूरी बातें करनी हैं।' उनके आदेश का पालन करते नियत समय पर उनके निवास पर पहुँचा। इधर-उधर की अनेक बातों के बाद वे विषय-वस्तु पर उतर गए-'भारत जी, आपके स्तंभ के बारे में अनेक शिकायतें हैं, आप बहुत कठोर-टिप्पणी करते हैं। कभी भारतेन्दु युग में, कभी द्विवेदी युग में जाते हैं। आपके स्तंभ को लेकर मुझ पर बहुत 'प्रेशर' है।' उनकी बात ध्यानपूर्वक सुनते हुए उनके मंतव्य को समझकर मैंने कहा- राजेन्द्र जी, आप संपादक हैं। आप जो भी निर्णय लेंगे, मुझे मान्य है। भविष्य में 'हंस' में अपना स्तंभ लिखना मैं बंद कर दूँगा। वे थोड़ा विचलित हुए। लेकिन पिफर संकेत किया कि उन पर मेरे स्तंभ को लेकर ज्यादा 'प्रेसर' है। हमारी बातचीत आत्मीय वातावरण में हो रही थी। मैं उनको 'प्रेशर' के संकट से उबारना चाहता था। इस तरह से प्रकरण का अंत हुआ।
'हंस' में मेरे स्तंभ को बंद होने को लेकर हिन्दी समाज में अनेक भ्रम और भ्रांतियां हैं। पिछले दिनों जम्मू से मेरे कवि-मित्रा मनोज शर्मा ने पफोन पर कहा- राजेन्द्र जी के संपादकीय से तो नहीं लगता है कि उन्होंने आपका स्तंभ बंद कर दिया। पिफर यह क्योंकर हुआ कि 'समयांतर' के दरबारी लाल ने लिखा- 'समकालीन सृजन-संदर्भ' के हंस से बाहर कर दिए जाने का अपफसोस शायद ही किसी को होगा।' मैंने कहा- मनोज जी, दरबारी लाल को वस्तुस्थिति का ठीक से पता नहीं। मैं 'हंस' से बाहर नहीं किया गया हूँ क्योंकि वहाँ से कभी मुझे नियुक्ति का पत्रा नहीं मिला था। यह उनकी अपनी राजनीति है।
यह स्तंभ मैं पाठकों के लिए लिखता हूँ। मेरे ध्यान में सुदूर हिन्दी प्रदेशों के पाठक हैं। मुझे सचमुच अच्छा लगा कि अपूर्व जोशी और प्रेम भारद्वाज ने 'पाखी' के लिए पिफर से इस स्तंभ को जारी करने का आग्रह किया। मैं उनका सचमुच कृतज्ञ हूँ।
पत्रिाकाएँ
आलोचना - ४१ ;अप्रैल-जून २०११द्ध, संपादक अरूण कमल, संपर्क : राजकमल प्रकाशन, १-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य : रुपये ५०
'वीणा' के बाद लंबे अर्से तक 'आलोचना' हिन्दी में निकलने वाली दूसरी पत्रिाका है। इस पत्रिाका का प्रवेशांक शिवदान सिंह चौहान के संपादन में अक्टूबर १९५१ में निकला था। राजकमल प्रकाशन का इतिहास और इस पत्रिाका के इतिहास की अवधि लगभग ६०-६२ वर्ष की है। हिन्दी में पहली आलोचना पत्रिाका गुलेरी जी के संपादन में १९०२ में निकली थी। नाम था समालोचक। 'आलोचना' के प्रकाशन के बाद आगरा से डॉ. रामविलास शर्मा के संपादन में १९५८ में 'समालोचक' निकला था। दो वर्षों के बाद यह पत्रिाका बंद हो गयी। १९६७ में डॉ. गोपाल राय के संपादन में पटना से 'समीक्षा' निकली। पिफर 'प्रकट' भी। १९९९ में पटना से ही नंदकिशोर नवल के संपादन में आलोचना त्रौमासिक 'कसौटी' के १५ अंक निकले। 'आलोचना' पत्रिाका की लगभग ६०-६२ वर्षों की यात्राा में कई उत्थान-पतन हैं। बदलते संपादकों के और ९० के बाद दस वर्षों तक पत्रिाका के स्थगित होने के।
''आलोचना' का प्रस्तुत अंक अज्ञेय पर केंद्रित है और कहने की जरूरत नहीं कि इस अंक में अज्ञेय के रचनाकार को अनेक अछूते कोने से विश्लेषित करने की कोशिश की गई है। नामवर सिंह, रमेशचंद्र शाह, नीलाभ, मधुरेश और शंभुनाथ के लेखों से। यह अंक मुझे अच्छा लगा है। क्योंकि दोनों आँख खोलकर अज्ञेय की रचनाओं पर विचार किया गया है।
२. पक्षधर ;जुलाई २०११द्ध, संपादक- विनोद तिवारी, संपर्क : बी-२, तीसरी मंजिल, महेन्द्र एन्क्लेव, स्टेडियम रोड, दिल्ली-११००३, मूल्य : ५० रुपये,
शमशेर पर केंद्रित पत्रिाका का यह अंक इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि शमशेर की कविता की पंखुड़ियों को इसमें कई आलोचकों ने खोला है। विशेषतः ए अरविंदाक्षन, कृष्ण मोहन और रोहितास ने। मंगलेश डबराल की इस कविताएँ, नामवर जी और शंभुनाथ का लेख विशेष-ध्यान खिंचते हैं। नवल किशोर ने विश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' की समीक्षा हार्दिकता के साथ लिखी है, लेकिन दुख की बात यह है कि उनका ध्यान पुस्तक की पुनरावृत्ति और तथ्यात्मक भूलों पर नहीं गई। सूरज पालीवाल ने विभूतिनारायण राय के उपन्यास 'प्रेम की भूत कथा' पर गहराई से लिखा है। वैसे भी यह बेहद पठनीय पुस्तक है। यह अंक अच्छा और पठनीय है।
३. मार्क्स-दर्शन ;जुलाई-सितंबर २०११द्ध, संपादक-सुरेश श्रीवास्तव, संपर्क : २०३/ई-५८८, ग्रेटर कैलाश-टू, नई दिल्ली-११००४८ मूल्य : एक प्रति २५ रुपये।
वैचारिक विमर्श की यह त्रौमासिक पत्रिाका इसलिए भी हमारे लिए प्रासंगिक है कि हम मार्क्स दर्शन का पुनर्पाठ कर सकें। मार्क्सवाद के प्रति प्रतिब( इस पत्रिाका का कलेवर छोटा है, लेकिन इसकी चिंता के केन्द्र में वस्तुतः मनुष्यता की मुक्ति है।
४. व्यंग्य यात्राा ;जुलाई-सितंबर २०११द्ध, संपादक प्रेम जनमेजय, संपर्क : ७३, साक्षर अपार्टमेंट्स, ए-३, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-११००६३, मूल्य २० रुपये।
आज हिन्दी में व्यंग्य की कम ही पत्रिाकाएँ हैं। 'व्यंग्य-यात्राा' कभी कमलेश्वर के संपादन में प्रकाशित 'कथा-यात्राा' की याद दिलाती है। इस पत्रिाका ने श्रीलाल शुक्ल पर पहले एक बहुत अच्छा अंक निकाला था। प्रस्तुत अंक के केंद्र में विष्णु नागर हैं। लेकिन इस अंक का दायरा बड़ा है। इसमें तट की खोज ही नहीं, अन्य व्यंग्य रचनाएँ भी हैं। अच्छी बात यह है कि जार्ज आरवेल के उपन्यास 'एनीमल पफार्म' का सूरज प्रकाश द्वारा किया गया बहुत अच्छा अनुवाद है। हिन्दी व्यंग्य के बादशाह थे हरिशंकर परिसाई। अब उनके व्यंग्य की चिन्गारी को प्रेम जनमेजय पफूंक-पफूंककर जीवंतता के साथ उठा रहे हैं तो इसकी तारीपफ की जानी चाहिए।
५. बया ;जुलाई-सितंबर २०११द्ध, संपादक- गौरीनाथ, संपर्क-अंतिका प्रकाशन, सी-५६/यूजीएपफ-४, शालीमार गार्डन एक्सटेंशन-टू, गाजियाबाद-२०१००५ ;उ.प्र.द्ध मूल्य एक प्रति ३० रुपये।
बया एक ऐसी सुसंपादित पत्रिाका है, जिसकी अभी तक हिन्दी संसार में ठीक से नोटिस नहीं ली गई है। प्रस्तुत अंक की विषय सूची पर आप गौर करें तो इसमें साहित्य और समाज की चिंता का विमर्श भी है और साहित्य और जनतंत्रा ;मैनेजर पांडेयद्ध के साथ दलित साहित्य का इतिहास भी है। इसमें कहानियाँ भी हैं और कविताएँ भी। अच्छी बात यह है कि इसमें एक सापफ-सुथरी संपादकीय दृष्टिकोण भी है।
६. उद्भावना ;अगस्त २०११द्ध, संपादक- अजेय कुमार, संपर्क : ए-२१, झिलमिल इंडस्ट्रियल एरिया, जी.टी.रोड, शाहदरा, दिल्ली-११००९५, मूल्य २५ रुपये।
पत्रिाका का यह अंक बाबा नागार्जुन पर केंद्रित है। नामवर जी ने उन्हें आधुनिक कबीर कहा था। लेकिन इस कबीर को जन्म शताब्दी वर्ष में हम समझने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन नागार्जुन हमारे समय के एक ऐसे औधड़ कवि हैं, जिनकी कविता के अनेक छोर हैं, जिन्हें हम ठीक से पकड़ नहीं पा रहे हैं। पिफर भी इस अंक में नामवर जी, विष्णुनागर, कर्ण सिंह चौहान, विश्वनाथ त्रिापाठी और शिवकुमार मिश्र ने उनकी कविता के आकाश-पाताल की जिस तरह पड़ताल की है, नागार्जुन की कविता के अनेक आयाम सामने आते हैं।
७. शेष ;अक्टूबर-दिसंबर २०११द्ध, संपादक- हसन जमाल, संपर्क : पन्ना िनवास ;साइकिल मार्केट के पासद्ध, लोहारपुरा, जोधपुर-३४२००२, मूल्य २० रुपये।
कथाकार हसन जमाल बौड़म आदमी हैं। उन्हें खुद पता नहीं कि 'शेष' के रूप में 'दो जबानों की एक किताब' कितनी अच्छी तरह ही निकालते हैं और उनकी 'गुजारिश' ;संपादकीयद्ध पर मैं लहालोट होता हूँ। पत्रिाका के हर अंक में उर्दू की दुनिया से नायाब मोती निकालकर पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। इसी अंक में ओरहान पामुक का इंटरव्यू, जां निसार अखतर का भानुमान और मुनव्वर 'राना' की आपबीती देखी जा सकती है। हमेशा मुझे 'शेष' का इंतजार रहता है।
८. क ;संयुक्तांक मार्च-जून २०११द्ध, संपादक-विजय शंकर, संपर्क : ४३४, गणेश नगर-टू, गली नं.-२ शकरपुर, दल्ली-११००९२ मूल्य ४० रुपये।
लद्घु पत्रिाकाओं की भीड़ में अलग हटकर कला संपदा एवं वैचारिकी की दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाली इस पत्रिाका में 'राग विराग का वैभव ;डॉ. राम मनोहर लोहियाद्ध है, और लोहिया के जीवन-चिंतन का एक खुला वैचारिक संसार है।
आधारशिला ;अक्टूबर-नवंबर २०११द्ध, संपादक-दिवाकर भट्ट, संपर्क : बड़ी मुखानी, हल्द्वानी, नैनीताल-२६३१३९ ;उत्तराखण्डद्ध मूल्य : २० रुपये।
दिवाकर भट्ट युवा चेतना के लिए प्रतिब( संपादक हैं। आधारशिला पत्रिाका के पूर्व प्रकाशित अंकों में उन्होंने नागार्जुन ही नहीं, त्रिालोचन को भी याद किया है। बल्कि पंकज सुबीर की एक कहानी 'महुआ द्घटवारिन' भी प्रकाशित की थी, जिसे 'नया ज्ञानोदय' ने पुनर्प्रकाशित किया। प्रस्तुत अंक में भी उन्होंने नए-पुराने लेखकों को छापा है। उनमें संपादकीय अंतर्द्वंद्व ही नहीं, अपने समय की चेतना भी है।
नए प्रकाशन ;चयनद्ध
१. रह गईं दिशाएँ इसी पार ;उपन्यासद्ध, लेखक-संजीव, प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन, १-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य : ३५० रुपये।
२. सुनंदा की डायरी ;३४द्ध लेखक-राजकिशोर, प्रकाशन-किताबद्घर, २४, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य ३९० रुपये।
३. सातवीं औरत का द्घर ;कहानी संग्रहद्ध, लेखक-नीला प्रसाद, प्रकाशन-शिल्पायन, १०२९५, लेन नं.-१, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली-११००३२, मूल्य २२५ रुपये।
४. नदी जो अब भी बहती है ;कहानी, लेखक-कविता, प्रकाशन- सामायिक प्रकाशन, ३३२०-२१, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२ मूल्य : २५० रुपये।
५. अमीरी रेखा ;कविताद्ध, लेखक- कुमार अंबुज,
प्रकाशन राधाकृष्ण प्रकाशन ७/३१, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२ मूल्य १५० रुपये।
६. लगभग अनामंत्रिात ;कविताद्ध, लेखक- अशोक कुमार पांडेय, प्रकाशन-शिल्पायन, १०२९५, लेन नं.-१, वेस्ट गोरखपार्क, शाहदरा, दिल्ली-११००३२, मूल्य १७५ रुपये।
७. पहर दोपहर, ठुमरी ;कहानीद्ध, लेखक-प्रत्यक्षा-प्रकाशक हार्पर कालिंस, ए-५३, सेक्टर-५७, नोएडा-२०१३०१, मूल्य १७५ रुपये।
८. औरत की बोली ;स्त्राी विमर्शद्ध- गीताश्री-प्रकाशन-सामयिक प्रकाशन, ३३२०-२१, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य २५० रुपये।
९. गांधी एक असंभव संभावना ;विमर्शद्ध, लेखक-सुधीर चंद्र-प्रकाशन राजकमल प्रकाशन, १-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य १५० रुपये।
१०. मार्क्सवादी आलोचना और शिवदान सिंह चौहान ;आलोचनाद्ध-लेखक-मधुरेश, प्रकाशक-आधार प्रकाशन, एस.सी.एपफ-२६७, सेक्टर-१६, पंचकूला-१३४ ११३ ;हरियाणाद्ध, मूल्य २५० रुपये।
११. तुलसीदास ;आलोचनाद्ध- नंदकिशोर नवल,
प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन, १-बी, नेताजी सुभाषमार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य २०० रुपये।
१२. कल परसों के बरसों ;संस्मरणद्ध, लेखक ममता कालिया, प्रकाशक-वाणी प्रकाशन, २१-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य २२५ रुपये।
१३. लखनऊ ब्यॉय ;आत्मकथा-अंग्रेजीद्ध, लेखक विनोद मेहता, प्रकाशक-पेंगुईन इंडिया, ११, कम्युनिटी सेंटर, पंचशील पार्क, नई दिल्ली-११००१७, मूल्य ४९९ रुपये।
;स्तंभकार हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक और म.ग.अ.हि.वि., वर्धा द्वारा प्रकाशित द्वैमासिक समीक्षा पत्रिाका 'पुस्तक-वार्ता' के संपादक हैं।द्ध
२११, आकाश दर्शन अपार्टमेंट्स, मयूर विहार, पफेज-१
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