दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
संपादकीय/प्रेम भरद्वाज
जीवन शोर भरा सन्नाटा
जीवन शोर भरा सन्नाटा
जंजीरों की लंबाई तक सारा सैर सपाटा
निदा फाजली
प्रेम भरद्वाज

साल का अंत। दिसंबर। कैलेंडर बदलने की तैयारी। क्या यह बाकी ग्यारह महीनों से अलग नहीं होता। या मामला सिपर्फ कैलेंडर बदलने का होता है। दिसंबर महीने का मिजाज। कुछ अलसाया हुआ। ठहरा। गति में एक स्पीड ब्रेकर। सर्दी का बढ़ता प्रकोप। बपर्फ जमने का मौसम। दम तोड़ता सूरज। छोटे होते दिन। बढ़ती रात। दिन मतलब रोशनी। यानी निराशा। पूरे साल कुछ खास न कर पाने की छटपटाहट। सब कुछ हाथ से निकल जाने की हताशा। बचे हुए दिनों में बहुत कुछ हासिल कर लेने की बेचैनी। ईसा मसीह के सूली पर चढ़ने। बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने का महीना। लेकिन इसी महीने की छाती पर गड़ा एक कील- अंत क्या सचमुच किसी चीज का समाप्त होना होता है... क्या अंत में केवल प्रार्थना ही बचती है? हारे को हरिनाम... आ रहा जीवन का सांध्य। मगर अंत में ही प्रारंभ छिपा हुआ। कभी इच्छा होती है इस महीने के अंत की अंतिम द्घड़ी और अगले साल के प्रथम क्षण के बीच के लमहे को मुट्ठी में पकड़ने की कोशिश करूँ। पारे को पकड़ने जैसी कोशिश। यकीन मानिए यह राजेन्द्र अवस्थी का काल चिंतन नहीं, न अध्यात्मिक यात्राा... मेरा वैसा इरादा भी नहीं... मैं तो इतना भर चाहता हूँ, इस महीने के मौसम में धंसकर कुछ जिंदगियों के आखरी महीने, अंतिम वक्त में उनके अंदर की टूटन, उदासी, अजनबीपन को एक बार महसूस करूँ। बेशक यह रूप एक कोलाज का हो सकता है।
'ओल्ड मैन एंड सी' का नायक बूढ़ा मछुआरा। अदम्य जिजीविषा से भरा हुआ। आशावाद का मजबूत किला। वह थकता नहीं, हारना नहीं जानता। हताशा-निराशा के द्घटाटोप अंधेरे में भी उसे रोशनी के बिम्ब दिखाई देते हैं। दिलासों की वो अंगुलियां नजर आती हैं जिनको थामकर अंधेरी मुश्किल पगडंडियों पर लड़खड़ाते ही सही, मगर आगे बढ़ा जा सकता है। ऐसे मजबूत हौसले वाले बूढ़े मछुआरे का चरित्रा गढ़ने वाला हेमिंग्वे साल भर तक गर्दन पर राइपफल रखकर क्यों आत्महत्या की प्रैक्टिस या रिहर्सल करता रहा और एक दिन उसने आत्महत्या कर भी ली। कृति और कृतिकार के बीच के गैप को समझ पाना किसी के लिए भी मुश्किल है। जब भी इस विषय पर सोचता हूँ तो कुछ भी नहीं सोच पाता। हेमिंग्वे ने क्यों की होगी आत्महत्या? अंतिम क्षण में क्या सोचा होगा? किसके बारे में। क्या याद नहीं आया होगा 'ओल्ड मैन एंड सी' का बूढ़ा मछुआरा। हेमिंग्वे पर सोचते सोचते सहसा ही गोरख पाण्डेय याद आते हैं। अपने आशावादी और जोश भरे गीतों से आंदोलन और जन-जन में प्राण पफूंकने वाले। क्रांतिकारी
गीतकार। वह पहले असहज होते हैं। पिफर खुद ही जीवन का क्रूर अंत कर डालते हैं। मगर क्यों?
क्या हत्या और आत्महत्या के बीच कोई बारीक रेखा होती है। वह कौन से हालात होते हैं जब हत्या और आत्महत्या, जिंदगी और मौत का पफासला मिट जाता है। कोई भी आत्महत्या, आत्महत्या नहीं होती। खुद को कोई कभी नहीं मारता। दरअसल मारता कोई और है। हत्यारा जब मूर्त्त रूप में सामने होता है तो हत्या, नहीं तो हत्या और आत्महत्या के कोहरे में छिपा जीवन का दर्दनाक अंत। हर आत्महत्या, हत्या है। हत्यारा का छिप जाना। नजर नहीं आना और उसकी ओर हत्या का अंदेशा न जाना। हत्यारे की चालाकी है-होशियारी। इसलिए वान वॉग, गुरुदत्त, गोरख पाण्डेय, वाल्टर बेंजामिन की आत्महत्या भी हत्या है। इनकी हत्या की गई है। हत्यारे को पकड़ना तो दूर हम यह मानने को तैयार ही नहीं कि इनको किसी ने छलपूर्वक मारा। कुछ का अंत हत्या और आत्महत्या के बीच आज भी झूलता रहता है। जैसे मर्लिन मुनरो की मौत। कुछ उसकी हत्या मानते हैं। कुछ आत्महत्या। इतना ही नहीं कुछ प्रतिभाओं का असमय अंत भी हत्या की परिधि में आता है- मसलन भुवनेश्वर, काफ्रका, राजकमल चौधरी। ये या इनके जैसे बहुत से लोग होते हैं जिनके जीवन के दोपहर में ही रात द्घिर आती है। इनका कसूर यह कि इनके पास बड़े सपने होते हैं और जब उन सपनों में रंग भरने के लिए कुछ नहीं बचता तो आक्रोश, नाराजगी, उदासी, निराशा, उब,
बेचैनी, इनका रसायन उनके रंगों में खून बनकर दौड़ने लगता है। वे धीमे जहर का शिकार हो जाते हैं और इसका अहसास न उनको होता है न जमाने को। अपनी बदत्तर स्थितियों से मुक्ति की कोशिश कभी आत्महत्या की ओर ले जाती है तो कभी धीमा जहर पीने की ओर। राजकमल चौधरी लिखते हैं-''मैं मुक्ति चाहता हूँ। यह मुक्ति वास्तविक जीवन में असंभव है। आत्महत्या को मैं मुक्ति की प्रार्थना कहता हूँ, अपराध या पलायन नहीं...'' एक और सवाल जो आज भी प्रासंगिक है-''हमें आईंस्टीन से क्या मिला? एटमी अस्त्राों की भयानकता, मृत्यु का आतंक, हिरोशिमा-नागासाकी के ध्वंसावशेष मिले हैं। और मार्क्स-एंगेल्स से क्या मिला? रोटी मिली। लेकिन वह रोटी कितनी महंगी है? हम आदमी नहीं रह गए हैं, स्टील-लोहे के मशीन बन गए हैं। हमने अपनी स्वतंत्राता बेच दी है। पिफर आईंस्टीन नहीं, मार्क्स, बर्नाड शॉ नहीं, या बंट्रेड रसेल नहीं तो क्या? पिफर किससे आशा की जाए?
ठीक इसी जगह वह हालात खड़े होते हैं जहां हताशा आत्महत्या की ओर ले जाती है। जहर पीने को मजबूर किया जाता है। माहौल रचा जाता है। यह कभी एक व्यक्ति तो कभी व्यक्तियों के समूह द्वारा जो रचता है वह धर्म, समाज, परिवार और सत्ता है। सत्ता के रूप अलग-अलग हो सकते हैं। चेहरे भी। जो समय के साथ बदलते रहते हैं। अक्सर इन चेहरों पर नकाब होता है। जिसे मुक्तिबोध ने 'अंधेरे में' देखने की
कोशिश की। लेकिन वो नकाब न हटा सके। आज भी अंधेरे में वे सपफेद नकाबपोश टहल रहे हैं। किसी की हत्या करके लौट रहे हैं। किसी की हत्या करने जा रहे हैं। वह सिलसिला मुक्तिबोध के पहले भी था। आज भी बदस्तूर जारी है। किसी रचनाकार का असमय और अस्वाभाविक अंत, केवल जिंदगी का थम जाना नहीं। उससे ज्यादा कुछ और भी है। रचनाकार का जीवन समुंदर का कोई लहर नहीं है, जो उठा और किनारे जाकर पफना हो गया। वह समुंदर की छाती या काल के सीने पर कुछ लिखने के लिए भी होता है। यह सच है कि सारे सामाजिक नियम, पूर्वग्रह कुंठाएं एवं वर्जनाओं का निर्धारण मनुष्य की आर्थिक स्थिति ही करती है। नैतिकता आर्थिक जरूरतों के सामने बेहद लचीली और परिवर्तित हो जाती है। ऐसे में आप किसी को भी चरित्राहीन कह दीजिए। पागल, आवारा कुछ भी। यह भी कि वह अपने बदहाली का जिम्मेदार खुद है। लेकिन कोई भी खुद की बर्बादी नहीं चाहता। न होरी, न द्घीसू माधव, न हल्कू, न मृणाल। जाहिराना तौर पर हेमिंग्वे, गुरुदत्त, वॉग, गोरख पाण्डेय भी नहीं। इनके जीवन में दिसंबर स्वाभाविक तौर पर नहीं आया। जबरन लाया गया। हालात कैसे हत्या का माहौल रचती है। इसे कई रूपों में देखा जा सकता है। गोदान के होरी को कोई व्यक्ति नहीं लूटता। मगर उस समय की व्यवस्था उसे मजबूर कर देती है। किताबों से बाहर आकर और आज के समय में धंसकर देखें तो स्थिति और भयावह दिखाई देती है। विदर्भ में लाखों किसानों ने आत्महत्या किया है। यह खतरनाक अमानवीय सिलसिला वहां कुछ दशकों से जारी है। अब तो वो आत्महत्याएं, हत्या का आभास देने लगी हैं। कोई कहने नहीं जाता-तुम आत्महत्या करो। लेकिन वो क्या करें? मुश्किलों के भंवर से कैसे निकलें। इन सवालों से टकराते हुए वे आत्महत्या करने को विवश हैं। गरीबी लोगों को मार रही है। आने वाले शीतलहर में हर साल की भांति गरीब ही मरेंगे। वे हर मौसम में मरेंगे। हर महीने में। उनका मरना खबर नहीं। सत्ता की संरचना में किसी किस्म की कोई जुम्बिश नहीं। राजेश जोशी की कविता है-'जो अपराधी नहीं हैं, वो सारे के सारे मारे जाएंगे।' इसको बदल कर। इसे और विस्तार देते हुए इस तरह भी समझा जा सकता है-'जो गरीब हैं वो सारे के सारे मारे जाएंगे।' गरीब सिपर्फ कागजों पर है। आंकड़ों में। गंदी बस्तियों में। सेमिनारों में। मुश्किल यह है कि जब गरीबों पर बहस चलती है उसमें कोई भी गरीब शरीक नहीं होता। खतरनाक बात यह है कि अब इन चंद जगहों पर पनाह पाए गरीब भी धीरे-धीरे मिटाये जा रहे हैं उनके नामोनिशान मिटाने की सुदीर्द्घ तैयारी जोरों पर है। तब वे न बस्ती में रहेंगे, न धरती पर। वे होंगे। मगर नजर नहीं आएंगे। इनके लिए
दिसंबर क्या, और जनवरी क्या? यही हालात साहित्य में भी है। साहित्य के गरीब वो हैं जो मुख्यधारा में नहीं है। गौण रचनाकार हैं। जो तिकड़म, जुगाड़, पुरस्कार के राजपथ पर नहीं चलते। ये सारे के सारे खारिज कर दिए जाएंगे। अलबत्ता किए जा रहे हैं। काफ्रका समझाते हैं-'दुनिया में हर चीज अपने छद्म नाम से चल रही है। शब्दों और सच्चाईयों में संगति नहीं बैठती... हम परस्पर काटती हुईघ्रेखाओं और भ्रमों से लदे समय में जी रहे हैं।'

 
 
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