दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
उपन्यास अंश

विस्थापन

 

रणीराम गढ़वाली

जन्म : ६ जून १९५७

कई विधओं में लेखन। कहानी लेखन पर ज्यादा जोर। हाल ही में अब तक तीन कहानी संग्रह खण्डहर, बुरांस के पफूल, और 'शिखरों के बीच' प्रकाशित। शीद्घ्र प्रकाशय उपन्यास 'कस्स' का यह एक अंश है।
जी ई ;प्रो.द्ध, ईस्ट दिल्ली कैंट
मो. ०९९५३८७८४२६

  रणीराम गढ़वाली
छज्जे में बैठी हुई कमली की आँखों में भरपुरा गाँव का एक-एक दृश्य द्घूमने लगा था। सत्या भौजी व मौली का खूबसूरत चेहरा तथा उनकी बातों के साथ-साथ माँ का आँसुओं से भीगा हुआ चेहरा तथा बरखा का उसकी आवाज सुनकर रम्भाना तथा पिता की रोबीली व गरजदार आवाज उसे वह रह-रहकर याद आने लगी थी। और याद आने लगी थी वह रात जब उसके द्घर के आंगन में पंचायत हुई थी, उस वक्त उस पंचायत में लखा भी आया हुआ था।
ठंडियां शुरू होने वाली थी। सितंबर का आधा महीना बीत चुका था। सभी गाँव वाले जानते थे कि जब कड़ाके की ठंड पड़ेगी तो बपर्फ गिरने लगेगी, ऐसे समय में लोग द्घरों से बाहर नहीं निकलेंगे।अगर उस वक्त द्घरों में लकड़ियां जमा नहीं होंगी तो कापफी मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा। ठंड से बचने के लिए लकड़ियों का होना अति आवश्यक है।

गाय-भैंसों को भी पानी गरम करके पिलाने के साथ-साथ गौशालाओं के अंदर आग जलानी पड़ती है। अगर आग नहीं जलाई गई तो ठंड के कारण पशु मर जाएँगे।
इसीलिए गाँव में पंचायत बुलाई गई थी, ताकि बपर्फ गिरने से पहले ही लोग लकड़ियाँ जमा करके रख सकें। गाँव के लोग जमा हुए पंचायत हुई, और पंचायत में पफैसला लिया गया कि कल सुबह दो-तीन लोग जंगल में जाकर पेड़ों पर निशान लगाकर नम्बर लगा लें ताकि शाम पिफर पंचायत में पर्चियाँ निकाल कर पेड़ों को बांट दिया जाएगा। जिस नंबर की पर्ची जिसे मिलेगी, वह उसी नंबर के पेड़ को काटेगा।
पंचायत में लोग पेड़ों को लेकर बातें कर रहे थे, और वह टुकुर-टुकुर लखा को देखे जा रही थी। लखा के चेहरे से वह अपनी नज़रें हटाने में असमर्थ हो रही थी। वह बार-बार लखा से बातें करने की तरकीब निकाल रही थी। लेकिन उसे लखा से बातें करने का मौका ही नहीं मिल रहा था, यही कारण था कि वह बार-बार लखा को देखे जा रही थी, और लखा उसे देखे जा रहा था। जब दोनों की नज़रें आपस में टकरातीं तो दोनों के होठों पर मुस्कराहट दौड़ने लगती थी, अपने आंगन में लखा को देखकर कमली के मन में बार-बार यह खयाल आता कि उनके आँगन में होने वाली पंचायत कभी खत्म ही न हो, और वह टकटकी लगाए लखा को इसी तरह से देखती रहे।
लेकिन कुछ ही देर बाद पंचायत समाप्त हो गई थी, लोग अपने-अपने द्घरों को जाने लगे थे। लेकिन वह अब भी लखा को देख रही थी, जो कि अपने द्घर जाने से पहले कमली को मुस्कराते हुए देखकर कुछ इशारे कर चुका था। एकाएक उसकी मां की नज़रें कमली के चेहरे पर आकर टिक गई थीं, उसने एक बार लखा की ओर देखा और पिफर उसने कमली से कहा।
''क्या देख रही है कमली?''
''अं... कु... कुछ भी तो नहीं।'' अपनी माँ की आवाज सुनकर कमली सकपका गई थी।
''चल... सो जा...।''
कमली अपनी माँ के साथ कमरे में चली गई तो उसकी माँ ने चारपाई में लेटते हुए कमरे में जल रही चिमनी की लौ को बुझा दिया था, कुछ ही देर में उसकी माँ को गहरी नींद आ गई थी। लेकिन कमली की आँखों में नींद नहीं थी। बार-बार लखा का मुस्कराता हुआ चेहरा उसकी नींद में खलल डाल रहा था।
ऐसा नहीं था कि उसने लखा को अपने आंगन में पहली बार देखा हो, आज से पहले भी उसने लखा को कई बार देखा था। लेकिन वह उससे बातें नहीं कर पा रही थी। उसका मन करता कि लखा उसके सामने खड़ा-खड़ा मुस्कराता रहे, लेकिन लखा अचानक ही उसके सामने आता और पलक झपकते ही गायब हो जाता।
छज्जे में बैठी हुई कमली को एक-एक पल याद आ रहा था। सारा का सारा भरपुरा गाँव उसकी आँखों के आगे तैर रहा था।
उसे वह दिन याद आया। जब वह खेतों के बीच में अपने गाँव के रास्ते वाले खेत में अपनी माँ के साथ निराई कर रही थी। तभी उसे लखा दिखाई दिया। कमली को देखते ही लखा के होंठों पर मुस्कराहट दौड़ गई थी। लेकिन जब लखा उसके नजदीक आया तो उसने अपनी माँ से कहा,
''बोई मेरी दथड़ी ;दरान्तीद्ध की धार मोटी हो गई है। द्घास काटते वक्त मेरे हाथों में दर्द होता है। इसलिए तू इसे मेरी दथड़ी पर धार लगाने के लिए कह दे।'' ''ठीक है।'' कहते हुए राधा ने लखा को आवाज़ देते हुए कहा, ''लखा... वो लखा...।''
आवाज़ सुनते ही लखा के कदम रुक गए थे। उसने पीछे मुड़कर देखा तो कमली की माँ राधा उसे ही बुला रही थी। वह वापस राधा के पास आकर बोला, ''आपने मुझे बुलाया बोड़ी ;ताईद्ध?''
''हाँ...।''
''क्या बात है?''
''कमली की दथड़ी की धार बहुत मोटी हो गई है। उससे अब द्घास नहीं काटा जा रहा है, इसलिए तू कमली की दथड़ी ले जा,'' कहते हुए राधा ने कमली की ओर देखते हुए कहा, ''अपनी दथड़ी उसे दे दे कमली?'' ''ये वाली दथड़ी नहीं बोई। वो... जो दूसरी द्घर में रखी है।'' कमली ने लखा की ओर देखते हुए कहा।
''ठीक है। मैं शाम को आकर दथड़ी ले लूँगा।'' कहते हुए उसने कमली की ओर देखा तो उसके होंठों पर मुस्कराहट दौड़ गई थी।
लखा के चले जाने के बाद कमली पिफर अपने काम में लग गई थी। लेकिन अब उसका मन खेत की निराई में नहीं लग रहा था। उसका मन तो अब उस वक्त का इंतजार करने लगा था जब लखा उसके द्घर में आकर केवल उसी से दथड़ी मांगे। कई दिनों से वह सोच रही थी कि लखा से वह कभी बातें भी करेगी? लेकिन आज उसे लखा से बातें करने का मौका मिल गया है। इसलिए वह इस मौके को हाथ से नहीं जाने देगी। दोपहर का समय होने के कारण धूप सुबह की अपेक्षा बहुत तेज हो गई थी। चिड़ियों का चहचहाना शांत हो गया था। धीरे-धीरे खेतों में काम करने वाली औरतें अपने-अपने द्घरों को लौटने लगीं तो कमली का मन भी द्घर लौटने का हुआ। तभी उसे कट-कट की आवाजें़ सुनाई दीं। वह कुछ पल तक उस दिशा की आवाज़ देखती रही... और पिफर उसने अपनी माँ से कहा, ''बोई यह आवाज़ कहाँ से आ रही है?''
''लखा है। वह अपने खेत के किनारे का सूखा पेड़ काट रहा है।''
कमली समझ गई थी कि लखा अब इतनी जल्दी द्घर आने वाला नहीं है। इसलिए उसने अपनी माँ से कहा,
''बोई मुझे बहुत प्यास लग रही है।''
''तू द्घर चल कमली।''
''तू नहीं चलेगी?''
''मैं थोड़ी देर में आऊँगी। तेरे पिता द्घर में होते तो मैं कब की द्घर चली जाती। वैसे भी गाँव की अधिकांश औरतें तो अभी खेतों में ही हैं। जंगल से द्घसियारियां अभी तक द्घास लेकर नहीं लौटी हैं। तू चल मैं आ जाऊँगी।''
''पिफर मैं जाऊँ?''
''हाँ...। और सुन... तू हरी द्घास की चार पूलियां लेती जा, दो पूली अभी भैंस को दे देना और एक पूली बरखा को दे देना। और बची हुई एक पूली को सूखी द्घास के नीचे छिपा देना। ताकि वह सूखे नहीं।''
कमली ने हरी द्घास की चार पूलियां बांधते हुए अपने सिर पर रखी और पिफर वह तेजी से छनी ;गौशालाद्ध की ओर चल पड़ी थी। वह तेज कदम बढ़ाती हुई, गुनगुनाती हुई गौशाला की ओर बढ़ी जा रही थी कि एकाएक पफत्तेकाका ने उसका रास्ता रोकते हुए कहा,
''हिरनी की तरह कहाँ दौड़ रही है? धीरे-धीरे चल। अन्यथा तेरे खूबसूरत पैरों में मोच आ जाएगी। अगर ऐसा हो गया तो ससुराल वाले तुझे लंगड़ी कहकर नहीं ले जाएँगे।''
''रास्ता छोड़ काका...?''
''तू जब बोलती है कमली तो बहुत सुंदर लगती है।''
''सोच समझकर बोल काका।''
''अच्छा... अच्छा... अरे वही तो कर रहा हूँ। सोच समझकर ही तो बोल रहा हूँ। सुन... तू किसी को मत बताना?''
''क्या...?'' कमली ने चौंकते हुए कहा,
''तू बहुत सुंदर है। बोलती है तो जैसे द्घुगती बोल रही हो, हाय रे... मैं क्या करूँ?'' पफत्ते काका ने अपनी छाती पर अपना हाथ रखते हुए कहा।
''जा कहीं डूब मर...। चल हट...। रास्ता छोड़ अन्यथा माँ को आवाज़ दूँगी।'' कमली ने गुस्से में कहा।
कमली के शब्दों को सुनकर पफत्तेकाका मुस्कराते हुए एक ओर हट गया था। उसे रास्ते से हटते देखकर कमली ने कुछ कदम आगे जाकर कहा, ''तेरी बकरी को बाद्घ मारेगा काका, अब बोल... मैं कैसी लगती हूँ।''
कहते हुए कमली जोर-जोर से हँसने लगी थी। जब कमली की हँसी रुकी तो उसने कहा, ''मैंने ठीक कहा न काका? कि तेरी बकरी को बाद्घ मारेगा?''
कहते हुए कमली सरपट दौड़ गई थी, पफत्तेसिंह का मुँह खुला का खुला ही रह गया था। उसे इस बात की उम्मीद नहीं थी कि कमली उसे ऐसे शब्द कहेगी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह कमली को क्या कहे? लेकिन कमली जो कह गई है उसकी तो उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वह ऐसा कहेगी कि तेरी बकरी को बाद्घ मारेगा। तभी पफत्तेसिंह इस तरह से चौंका जैसे कि वह सोचते हुए अचानक ही अपने खयालों से लौटा हो। उसने एक बार अपने सिर को खुजाया और पिफर वह अपने मन ही मन में बड़बड़ाया था कि बाद्घ तुम्हारी छनी को पफोड़कर तुम्हारी भैंस को मारकर वहीं कीले पर ही खाएगा। मेरा नाम भी पफत्तेसिंह ऐसे-वैसे ही नहीं है। लोग मुझे गलादार कहते हैं। पफत्ते गलादार...। मैं तेरे बाप कलम सिंह से ऐसा बदला लूँगा कि तुम्हारी सात पीढ़ियाँ भी कांप उठेंगी। अगर मुझे अपने बाप का बदला लेने के लिए तेरी हत्या या तेरी इज्जत पर हाथ भी डालना पड़े तो मैं वह भी करूँगा। कलमसिंह... साला... कुत्ता...कमीना...। जिं़दगी में मैं उसे ऐसा मजा चखाऊँगा कि चित्ता में जलते हुए भी वह रोता ही रहेगा। आज जिस तरह से बदले की आग में व अपनी माँ की आँखों में बहते हुए आँसुओं को देखकर मैं तड़प रहा हूँ, इसी तरह से मैं तुझे तड़पा-तड़पा कर मारूँगा। तू मौत भी मांगेगा कलमसिंह लेकिन मैं मौत भी तेरे नज़दीक नहीं आने दूँगा।
पफत्तेसिंह गुस्से में बड़-बड़ाते हुए चला गया था। आज से पहले पफत्तेसिंह ने कभी भी कमली की बातों का बुरा नहीं माना था। वह जब भी कमली के सामने आया। कमली ने उसे कुछ न कुछ जरूर कहा। उस वक्त पफत्तेसिंह मुस्कराने लगता था। उसे कभी भी इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि कमली उसे ऐसी बातें भी कह सकती है। वैसे भी गलती तो उसी की है। क्यों वह कमली का रास्ता रोकता है? लेकिन अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए उसे कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा। थोकदार कलमसिंह हो या राधा हो या पिफर कमली। वह इन तीनों से अपने बाप का बदला जरूर लेगा।
लेकिन जब उसे यह मालूम हो गया कि वह हर प्रकार की कोशिश करने के बाद भी कमलसिंह का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है तो उसने कमली को ही निशाना बनाना उचित समझा। यही कारण था कि वह कमली से मिलने का समय तलाशता रहता था।
लेकिन आज कमली के मुँह से तेरी बकरी को बाद्घ मारेगा जैसे कडुवे शब्दों को सुनकर वह तड़प उठा था। वह मन ही मन में बड़बड़ाया था। मैं तुझे जिंदा नहीं छोडूँगा कलम सिंह। जब भी मुझे मौका मिलेगा कलम सिंह मैं तुझे मारूँगा।'' कुदबुदाते हुए उसने 'पच' करके थूक दिया था।
गौशला में पहुँचते ही कमली ने अपनी माँ के कहे अनुसार दो पूलियाँ द्घास की भैंस को दी। और जब वह एक पूली द्घास की बरखा को देने लगी तो बरखा रम्भाने लगी थी।
''तुझे भूख लगी है?'' कमली ने बरखा के सामने द्घास की पूली खोलकर डालते हुए कहा।
''आँ...।'' बरखा रम्भाई थी।
''कामधाम तो कुछ करती नहीं। और भूख तुझे बहुत जल्दी लग जाती है। चुपचाप खाले। मैं जा रही हूँ।''
कहते हुए जैसे ही कमली बाहर आने लगी तो बरखा रम्भाई। आँ...।
''क्या हुआ...?'' वापस बरखा के पास जाकर कमली ने कहा तो बरखा ने अपना सिर ऊपर की ओर उठा दिया था।
''मुझे बहुत देर हो रही है। सुन...आज मैं लखा से ढेर सारी बातें करूँगी। तूने लखा को देखा है?
अच्छा ये बता कि वह कैसा लगता है? ये बरखा, बता न? अच्छा है न? तुझे भी मेरी तरह लखा अच्छा लगता है न?''
कहते हुए वह बरखा के गले में अपनी पतली-पतली उँगलियों से खुजली करने लगी थी।
''तुझे यह सब अच्छा लगता है न? तो तू अपने आगे के पैरों से अपने गले को क्यों नहीं खुजाती है?''
बरखा शांत खड़ी रही। कमली ने उसका गला खुजाते हुए कहा, ''अच्छा ये बात कि लखा जब मेरे द्घर दथड़ी लेने आएगा तो वह मुझसे बातें करेगा या नहीं? सुन...तू लखा के बारे में किसी को भी कुछ मत बताना। कल मैं तुझे बताऊँगी कि लखा आया था कि नहीं? अच्छा ये बता कि आज लखा दथड़ी लेने आएगा कि नहीं?''
''आँ...!''
''इसका मतलब है कि लखा आएगा। तू बहुत अच्छी है। तुझे कैसे पता चला कि लखा आएगा?''
कहते हुए कमली ने बरखा का मुँह चूमा। और पिफर वह द्घर के लिए चल पड़ी थी।
द्घर पहुँचते ही कमली ने दथड़ी को छिपा लिया था। ताकि अगर उसकी माँ राधा के द्घर में रहते हुए लखा दथड़ी मांगने आए तो उसकी माँ दथड़ी न दे सके। बल्कि वह खुद ही अपने हाथों से लखा को दथड़ी देते हुए उससे ढेर सारी बातें कर सके। यही कारण था कि लखा को लेकर कमली के मन में कई तरह के असंख्य विचार पनप रहे थे। लखा से मिलने के लिए जो बेचैनी उसके अंदर थी। वह पल-पल बढ़ती ही जा रही थी। उसे एक-एक पल बिताना भारी पड़ रहा था। तभी तो वह कभी छज्जे में आती तो कभी टकटकी लगाए रास्ते की ओर देखती। कभी वह सत्या व मौली से मिलती। और पिफर कभी-कभी वह दथड़ी को अपने हाथों में लेकर चूमने लगती थी।
उसे एक-एक पल बिताना भारी पड़ रहा था। जिसके कारण उसकी भूख भी शांत हो गई थी। जब राधा ने उससे कहा कि वह खाना खा ले तो उसने सापफ-सापफ कह दिया था कि उसे भूख नहीं है। और न ही वह अब खेतों में काम करने जाएगी।
कमली जानती थी कि अगर वह अपनी माँ के साथ खेतों में दुबारा चली गई तो वह लखा से नहीं मिल सकेगी। लखा उसके द्घर आएगा और बिना दथड़ी लिए ही वापस लौट जाएगा। यही कारण था कि जब शाम के समय उसकी माँ राधा ने उसे खेतों में चलने के लिए कहा तो कमली ने अपने पैरों में दर्द होने का बहाना बना लिया था। और पिफर उसने जानबूझकर अपने एक पैर में कपड़ा लपेट लिया था। ताकि उसकी माँ उसे खेतों में जाने के लिए विवश न कर सके। उसके बाद राधा अकेली ही खेतों में चली गई थी। और अब कमली अकेली ही द्घर में रह गई थी।
लखा के इंतजार में कमली जैसे पागल सी हो गई थी। कभी वह ओबरे में जाकर बर्तनों को सजाने लगती तो कभी वह चारपाई में चादर को झाड़ते हुए दुबारा बिछाती। कभी वह आइने के सामने खड़ी होकर गौर से अपने मुखड़े को देखते हुए अपने लम्बे-लम्बे बालों की दो धमेिलयाँ ;बेणियांद्ध बनाकर उन्हें आगे की ओर रखकर अपने हाथों में पकड़े शीशे के सामने देखती कि वह कैसी लग रही है? क्योंकि वह लखा के सामने सज संवर कर ही जाना चाहती थी। तभी सत्या ने उसे आवाज देते हुए कहा,
''कहाँ हो ननद जी?''
''यहीं तो हूँ।'' छज्जे पर आकर कमली ने कहा।
''क्या बात है कमली आज तो तू बहुत सुंदर लग रही है? कोई खास बात है या पिफर आज तेरे 'वो' आ रहे हैं?'' सत्या ने अपनी आँखें मटकाते हुए कहा।
''भाभी...। कैसी बातें कर रही हो?''
''ठीक ही तो कह रही हूँ। अब एक न दिन तेरे 'वो' भी तो तुझे लिवाने आएँगे। अच्छा ये बता आज द्घर में रहने का विचार कैसे कर लिया?''
''वो... क्या है न भाभी कि, मेरी एक टाँग में दर्द हो रहा है।''
''एक बात कहूँ कमली?''
''हाँ...।''
''आज तू पूरणमासी के चाँद की तरह बहुत खूबसूरत लग रही है।''
''क्यों मजाक कर रही हो भाभी?''
''मैं तेरा मजाक नहीं उड़ा रही हूँ। तेरी इन दो धमेलियों के बीच में तेरा खूबसूरत चेहरा इस तरह से दिखाई दे रहा है। जैसे कि रात में आकाश में छाए बादलों के बीच में से जून दिखाई देती है। तू आज के बाद हमेशा ही दो धमेलियाँ बनाना। अगर इस वक्त कोई तुझे देख लेगा तो बेचारे की आँखों की नींद उड़ जाएगी।''
सत्या की बातों को सुनकर कमली ने अपनी दोनों हथेलियों से अपना चेहरा छिपा लिया था। लेकिन वह अपनी उंगलियों के बीच की खाली जगहों में से सत्या के चेहरे पर अपनी नज़रें गड़ाए हुए थी।
''मेरे साथ चलोगी ननद जी?''
सत्या के शब्दों को सुनकर कमली एकाएक चौंक पड़ी थी। उसके दोनों हाथ अब उसके चेहरे से हट चुके थे। पफलस्वरूप वह विस्पफारित नेत्राों से सत्या की ओर देखने लगी थी।
''क्या हुआ...?''
''वो क्या है न भाभी कि मेरे पैरों में दर्द हो रहा है। इसलिए मैं नहीं आ सकूँगी।'' कमली ने अपना मुँह कुछ इस तरह से बनाते हुए कहा, जैसे कि सचमुच में ही उसके पैरों में जोर का दर्द हो रहा हो।
सत्या चुपचाप मुस्कराते हुए चली गई थी। उसके जाने के बाद कमली ने अपने सीने पर हाथ रखते हुए दो-तीन लम्बी-लम्बी साँसें ली और पिफर वह वहीं छज्जे पर बैठते हुए बड़बड़ाने लगी थी। 'बड़ी मुश्किल से जान बची है। अन्यथा सत्या भाभी तो चिपक ही गई थी। तभी उसने अपने सिर को हल्का सा झटका दिया। और पिफर वह कमरे में जाकर खिड़की पर रखे शीशे के सामने अपने चेहरे को निहारने लगी थी।
उसने अपनी दोनों धमेलियों को अपने हाथों में लिया तो उसके चेहरे पर लालिमा तैरने लगी थी। कुछ देर तक वह शीशे के सामने खड़ी रही और पिफर बुदबुदाई थी कि सत्या भाभी ठीक ही कह रही थी वह दो धमेलियों में बहुत

लखा के इंतजार में कमली जैसे पागल सी हो गई थी। कभी वह ओबरे में जाकर बर्तनों को सजाने लगती तो कभी वह चारपाई में चादर को झाड़ते हुए दुबारा बिछाती। कभी वह आइने के सामने खड़ी होकर गौर से अपने मुखड़े को देखते हुए अपने लम्बे-लम्बे बालों की दो धमेलियाँ ;बेणियांद्ध बनाकर उन्हें आगे की ओर रखकर अपने हाथों में पकड़े शीशे के सामने देखती कि वह कैसी लग रही है? क्योंकि वह लखा के सामने सज संवर कर ही जाना चाहती थी

सुंदर दिखाई देती है।
वह बड़ी देर तक शीशे के सामने खड़ी होकर अपनी दोनों धमेलियों को निहारती रही। और पिफर एकाएक लखा का चेहरा उसकी आँखों में तैरने लगा था। मन में एकाएक खयाल आया कि अगर इस समय लखा उसे दथड़ी ;दरांतीद्ध मांगने आएगा तो क्या सत्या भौजी की ही तरह कमली उसे सुंदर लगेगी? बातों के दौरान क्या लखा उसकी तारीपफ करेगा? लेकिन अगर लखा नहीं आया तो...? उसका द्घर में रहने का क्या पफायदा? इससे अच्छा तो यह होता कि वह अपनी माँ या पिफर सत्या भौजी के साथ खेतों में चली जाती। ससुराल जाने से पहले उसे सारा काम भी तो सीखना है। माँ कहती है कि तेरी शादी बचपन में ही हो गई थी। कैसी शादी हुई? जो कि मैंने अपने दूल्हे को देखा ही नहीं। भला यह भी कोई शादी हुई? मैं इस शादी को नहीं मानती। और न ही ससुराल जाऊँगी। लेकिन लखा ने कहा था कि वह दथड़ी को लेने जरूर आएगा। लेकिन कब आएगा? वह तो अभी तक आया ही नहीं।
शीशे के सामने वह खड़ी होकर सोच ही रही थी कि इस गाँव में उसने लखा जैसा कोई सुंदर लड़का नहीं देखा है। जब वह मुस्कराता है तो मन करता है कि उसे देखती ही रहूँ। लेकिन उसने उसे तो कभी हँसते ही नहीं देखा है। पता नहीं वह कैसा हँसता होगा? हो सकता है कि वह हँसते हुए सुंदर नहीं लगता होगा। नहीं...नहीं... वह तो और भी सुंदर लगता होगा। निगोड़ी शाम... जल्दी भी नहीं होती। पता नहीं आज दिन इतना लंबा क्यों लग रहा है? लेकिन एकाएक उसे क्या हो रहा है? जो कि वह लखा के लिए बहुत बेचैन हो रही है। सत्या भौजी ठीक ही कहती है कि दिल बड़ा नाजुक है। इसे संभालना बहुत मुश्किल है।
कमली लगातार खयालों में उलझी हुई थी। आज की अपेक्षा दिन अन्य दिनों में जल्दी ढल जाया करता था। लेकिन आज का दिन तो बहुत लम्बा हो रहा है। पहाड़ी के परली तरपफ छिपने में सूरज को पता नहीं अभी कितना वक्त लगेगा? पागल है लखा भी। जो कि उसने माँ से कहा था कि वह आएगा। क्या पता आज शाम ही न हो। अगर ऐसा हो गया तो वह लखा को पिफर कैसे मिलेगी? माँ ने तो उससे कहा था कि दथड़ी ले जाना। लेकिन वह अभी तक नहीं आया।
'हे कुल देवता मैं तेरे लिए हाथ जोड़ती हूँ। तू जल्दी से पहाड़ी की परली तरपफ सूरज को ले जाकर छिपा दे। और जब लखा मेरे से दथड़ी लेकर चला जाएगा तो पिफर तू सूरज को पहाड़ी की परली तरपफ से इधर ले आना। बाबा कहते हैं कि महाभारत के समय में भी सूरज कुछ देर के लिए छिप गया था। हे कुल देवता तूने उस वक्त भी सूरज को छिपाया था। तो पिफर आज भी छिपा दे, मैं तुझे गुड़ की भेली चढ़ाऊँगी। तू खुद ही छिप जा न सूरज देवता।' बड़बड़ाते हुए कमली ने सूरज देवता के लिए अपने दोनों हाथ जोड़ दिए थे।
कमली कुछ देर तक अपने दोनों हाथों को जोड़े खड़ी रही। और पिफर उसने सूरज को चिढ़ाने के लिए अपना मुँह टेढ़ा करते हुए अपनी जीभ दिखाते हुए कहा, ''मत छिप...। मेरा कहना मत मान। लेकिन तुझे छिपना तो पड़ेगा ही। आज नहीं तो कल। जब तू छिपेगा तभी लखा आएगा, आज नहीं तो कल...। लेकिन कल तो मुझे पिफर माँ के साथ खेतों में जाना पड़ेगा। पिफर क्या होगा? नहीं... नहीं... मुझे मापफकर दे सूरज देवता तू आज ही छिप जा। तेरी कोई बेटी है? मुझे पता नहीं। तू मुझे अपनी बेटी बना ले न? मुझे लखा से मिलना है। इसलिए तू जल्दी से छिप जा।''
कहते हुए कमली शीशे के सामने से निकलकर आँगन में आ गई थी। उसने आँगन में एक छोटे से पत्थर से कुछ लकीरें खीचकर लम्बे-लम्बे खाने बनाए। अैर पिफर वह एक टाँग पर उछल-उछल कर खानों में रखे हुए पत्थर को अपने एक ही पैर से ठोकर मारकर बाहर निकालने लगी थी। कुछ ही देर में वह उस खेल में इतनी मस्त हो गई थी कि उसे पता ही नहीं चला कि पत्थर की सीढ़ियों के पास लखा टकटकी लगाए उसे ही देख रहा है।
कमली ने आखिरी खाने में से पत्थर को ठोकर मारकर बाहर निकाला तो उसके मुँह से निकला।
'मैंने राजा का ताज छीन लिया है।''
''गलत।'' लखा के मुँह से निकला।
''कैसे...? तू खेलेगा?'' अचानक ही कमली के मुँह से निकला और पिफर वह लखा को देखकर चौंक पड़ी थी। ''तेरे पैर से पफेंका गया पत्थर लाइन में ही रुक गया था।''
कमली टकटकी लगाए लखा को देखने लगी थी।
''ऐसा क्या देख रही है। दथड़ी दे न?''
''रुक, मैं ढूंढ़ कर लाती हूँ।''
कहते हुए कमली ने अपनी दोनों धमेलियों को पीछे की ओर से हटाकर आगे की ओर किया तो लखा की नज़रें उसके चेहरे पर पिफसलती हुई उसकी धमेलियों पर टिक गई थीं।
''क्या देख रहा है?'' कमली ने मुस्कराते हुए कहा।
''तू बहुत सुंदर है।'' लखा का स्वर धीमा था।
''क्या कहा तूने?'' कमली ने लखा के शब्दों को सुनकर भी अनसुना करते हुए कहा।
''तू बहुत सुंदर है।''
''मैं तुझे अच्छी लगती हूँ?''
''हाँ...।''
''कब से...?''
''जब से तुझे देखा है।''
''कब से देखा है तूने मुझे?''
''पता नहीं...।''
''नहीं... क्यों झूठ बोल रहा है?''
''मैं क्यों झूठ बोलूँगा। तू है ही सुंदर। दथड़ी दे न?''
''लाती हूँ। ढूंढ़नी पड़ेगी। पता नहीं माँ ने कहाँ रखी होगी। लेकिन तुझे इतनी जल्दी क्यों है?''
कहते हुए कमली ने शीशे के पास जाकर एक बार अपना चेहरा देखते हुए अपने बालों को ठीक किया। और पिफर वह लखा से बोली।
''दथड़ी तो मिल ही नहीं रही है।''
''पिफर मैं जाऊँ?''
''रुक ना। ढूंढ़ तो रही हूँ। कल मैं द्घास कैसे काटूँगी? एक बात कहूँ?''
''बोल...।''
''तू बहुत सुंदर है लखा।''
लखा के चेहरे पर मुस्कराहट तैर गई थी। उसका चेहरा लाल हो गया था। उसने इधर-उधर देखा। और पिफर उसने कहा, ''तू भी तो अच्छी है। तू मुझे बहुत अच्छी लगती है।''
''तू मुझे रोज मिलेगा?''
''हाँ मिलूँगा। तू सुंदर है। तेरी दोनों धमेलियाँ बहुत सुंदर हैं।''
''छूकर देखेगा?'' कमली ने उसके पास आते हुए कहा।
''कोई देख लेगा तो...?''
''कह दूँगी कि बिच्छू था। छू न...? कोई नहीं है।''
''मुछे डर लगता है।''
''धत तेरे की...। मैं तो नहीं डरती।'' कहते हुए उसने लखा के दोनों गालों को अपनी हथेलियों से छूते हुए कहा।
''तेरे गाल तो बहुत अच्छे हैं लखा। मैंने तेरे गालों को छू लिया। अब तू मेरी दोनों धमेलियों को अपने हाथों में लेकर देख?''
लखा ने इधर-उधर देखा। उसकी साँसें तेज-तेज चलने लगी थीं। चेहरा एकाएक लाल हो गया था। शरीर में कंपकंपाहट सी होने लगी थी।
''अगर तूने मेरी धमेलियों को नहीं छुआ तो पिफर मैं कभी भी तेरे से बातें नहीं करूँगी। तुझे पिफर कभी नहीं मिलूँगी। तुझे मेरी धमेलियाँ अच्छी लगती हैं न?''
''हाँ...।''
''तो पिफर देख न?''
लखा ने एक बार पिफर इधर-उधर देखा कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है। और जब उसे इत्मीनान हो गया कि आस-पास कोई नहीं है, तो उसने कंपकंपाते हाथों से कमली की धमेलियों को पकड़ लिया था। ऐसा करते वक्त उसके शरीर में सनसनी सी पफैल गई थी। जबकि कमली चुपचाप मुस्कराते हुए उसके चेहरे पर अपनी नज़रें गड़ाए हुए थी।
'दथड़ी दे न?'' लखा के स्वर में कंपकंपाहट थी।
''पहले ये बता कि तुझे मेरे बालों पर हाथ लगाना कैसा लगा?'' कमली का स्वर बहुत धीमा था।
''अच्छा लगा।''
''पिफर छुएगा?''
''अभी नहीं...। कोई देख लेगा।''
''पिफर कब...?''
''जब भी मुझे मौका मिलेगा। मैं तेरे बालों को छुऊँगा। तुझे मिलूँगा। तुझसे ढेर सारी बातें करूँगा। अब तो दथड़ी दे दे न?''
''लाती हूँ।''
कहकर कमली दथड़ी लेने अपने कमरे में चली गई थी। तभी पफत्तेसिंह ने उसके पास आकर कहा,
''कैसे खड़ा है लखा?''''पता नहीं यह कहाँ से आ धमका?'' मन ही मन में बड़बड़ाते हुए लखा ने कहा, ''दथड़ी लेने आया हूँ।''
''किसने बुलाया था?''
''मैंने बुलाया था।'' कमली ने कमरे में से बाहर निकलते हुए कहा। तो पफत्तेसिंह चौंक पड़ा था। ''कल इसकी धार तेज करके ले आना लखा।'' कहते हुए कमली ने दथड़ी लखा को पकड़ा दी थी।
''ठीक है। मैं बाबा से कह दूँगा।''
कहकर लखा चला गया था। उसके जाते ही पफत्तेसिंह भी वहाँ से चला गया था।
''पता नहीं कहाँ से यह गलादार काका बीच में टपक जाता है।'' कमली बड़बड़ाई थी। वह कुछ देर तक अपनी जगह पर किसी पत्थर के बुत की तरह खड़ी रही। और पिफर उसने शीशे के सामने अपनी दोनों धमेलियों को चूमते हुए कहा। ''तू बहुत सुंदर है लखा।''
उस रात कमली की आँखों में नींद नहीं थी। लखा का चेहरा लगातार उसकी आँखों में तैर रहा था। वह बड़ी देर तक लखा से बातें करना चाहती थी। लेकिन पफत्ते काका के आ जाने से सब कुछ गड़बड़ा गया था। कितना सुंदर है लखा। और तभी लखा के शब्द उसके कानों में गूंजने लगे थे- तू भी तो अच्छी है।
लखा के ये शब्द याद आते ही उसने चारपाई पर लेटे-लेटे अपना चेहरा अपने दोनों हाथों की हथेलियों में कुछ इस तरह से छिपा लिया था, जैसे कि वह लखा की बातों को सुनकर एकाएक शर्मा गई हो।
करवटें बदलते हुए वह लगातार अपनी धमेलियों को चूमती रही। सहलाती रही। तभी उसके मन में खयाल आया कि अगर उस वक्त किसी ने लखा को देख लिया होता तो...? देख लेता तो क्या...? मैं या तो कह देती कि बिच्छू था, या पिफर कह देती कि चिमोड़ा ;पहाड़ी ततैयाद्ध था। अगर लखा उसे नहीं हटाता तो वह उसे काट देता। पिफर भी अच्छा ही हुआ न माँ द्घर पर थी। और न ही पिता द्घर पर थे। लेकिन गलादार पफत्ते काका के सिर में कोई कीड़ा द्घुस गया है। जब वह उसे अकेले में देखता है। तुरंत उसके सामने आकर खड़ा हो जाता है।
कमली लगातार करवटें बदल रही थी। जबकि उसकी माँ गहरी नींद में सोई हुई थी। कमली ने अपना सिर उठाकर कुछ पल तक अपनी माँ के चेहरे को देखा। लेकिन कमरे में द्घुप्प अंधेरा होने के कारण वह अपनी माँ का चेहरा स्पष्ट रूप से नहीं देख सकी। वह चुपचाप अपनी चारपाई के उठी। कुछ पल तक अपनी माँ की चारपाई से पास खड़ी रही। और पिफर वह धीरे से दरवाज़ा खोलकर उस जगह को देखने लगी थी, जहाँ पर लखा उसके साथ बातें कर रहा था। लेकिन द्घुप्प अंधेरा होने के कारण उसे कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था।
उसने अपनी आँखों को अपनी हथेलियों से दो-तीन बार रगड़ते हुए अपनी पलकों को झपकाते हुए दो-तीन बार खींचा। पिफर भी जब उसे कुछ भी नहीं दिखाई दिया तो वह मन ही मन बड़बड़ाई थी। जरूरी था कि आज ही इतनी अंधेरी रात को होना था। कम से कम मैं वह जगह तो देख लेती। जहाँ पर लखा बैठा था। उससे दथड़ी मांगते हुए उसकी धमेलियों को सहला रहा था। इस चंदा को भी आज ही छिपना था क्या? ये चंदा आजा न। सुन...। मैं तेरी छोटी बहिन हूँ। तू मेरा कहना मान। ये चंदा... आजा। थोड़ा उजाला कर जा। मैं पल भर के लिए वह जगह देखना चाहती हूँ। जहाँ पर लखा मेरी धमेलियों को छू रहा था। मुझसे मीठी-मीठी बातें कर रहा था। लेकिन शायद तू भी नहीं आएगा। क्योंकि लखा की तरह तू भी अपने द्घर में सो रहा होगा। अगर जागता रहता तो तू जरूर दिखाई देता। निगोड़ा चंदा...। मेरा कहना भी नहीं मानता। लेकिन चंदा के पास इतनी दूर तक मेरी आवाज़ कैसे जाएगी? मौली तो कहती है कि भगवान सबकी सुनता है। तो क्या चंदा मेरा कहना भी सुन रहा होगा? सत्या भौजी भी तो यही कहती है।
लेकिन एक बात समझ में नहीं आती कि चंदा तो आकाश में रहता है। वह किसी से बातें भी नहीं करता है। किसी के द्घर भी नहीं जाता है। पिफर वह मामा कैसे हो गया है? किसी-किसी का मामा हो तो बात मान भी लें। लेकिन चंदा मामा सबका मामा कैसे? क्या चंदा मामा की इतनी सारी बहिनें हैं।
ही...ही...ही...। -वह अपने आप ही हँस पड़ी थी। लेकिन मैं तो उसे भैया ही कहूँगी। सुन चंदा, मैं तुझे अपना भाई बना रही हूँ, क्योंकि मेरा कोई भाई नहीं है न। तुझे बुरा तो नहीं लगा न? भैया आ जा न। थोड़ा सा उजाला कर दे? तू बहुत अच्छा है। लेकिन तू तो सो रहा होगा। मेरी माँ की तरह। निगोड़ी चंदा।
कमली मन ही मन में बड़बड़ा रही थी। और पिफर वह दरवाज़ा बंद करते हुए बड़ी देर तक अपनी चारपाई में बैठी रही। आज उसे किसी भी चीज का डर नहीं लग रहा था। अन्यथा अगर रात को थोड़ा सा भी पत्ता पफड़पफड़ाता तो वह अपनी माँ की चारपाई पर जाकर लेटते हुए कहती कि माँ डर लग रहा है। बाहर आँगन में शायद बाद्घ आ गया है।
''कुछ भी नहीं है कमली। तू डरा मत कर।'' उसकी माँ उसे हौसला देते हुए कहती।
''लेकिन माँ मौली कहती है कि उसने बाद्घ को देखा है। उसके द्घर के सामने जो पेड़ था। बाद्घ उसके नीचे दुबका पड़ा था। उसकी आँखें चमक रही थीं। ''कमली अगर तू इसी तरह से डरती रही तो तू अपने ससुराल में कैसे रहेगी?''
''मुझे नहीं जाना ससुराल-वसुराल। मैं तो हमेशा तेरे साथ ही रहूँगी।''
''अच्छा... अच्छा...। अब तू सो जा।''
कहते हुए राधा उसके बालों में अपनी उंगलियां डालकर उसके सिर को खुजलाने लगी थी। ऐसे करने से कमली को कुछ ही देर बाद नींद आ गई थी।
लेकिन आज उसे न तो डर ही लग रहा था। और न ही उसे नींद ही आ रही थी। चारपाई में बैठे-बैठे अचानक उसका ध्यान पफत्तेकाका की ओर चला गया था। वह सोचने लगी कि पफत्तेकाका हमेशा उसके आगे-पीछे किसी साये की तरह क्यों द्घूमता है? क्या चाहता है पफत्तेकाका? मौली के आगे-पीछे तो वह नहीं द्घूमता। ऐसा क्यों करता है पफत्तेकाका?
सोचते हुए कमली को कब नींद ने आ द्घेरा, उसे पता ही नहीं चला, उसे गहरी नींद आ जाने के कारण रात के सन्नाटे में ऐसा लग रहा था, जेसे कि वह कमरा बरसों से बीरान पड़ा हो।

बारिश अब भी बहुत तेज हो रही थी। जिसके कारण अंधेरा धीरे-धीरे अपना पैर पफैलाने लगा था। जबकि कमली छज्जे में दीवार से अपनी पीठ सटाए अपनी बीती यादों में खोई हुई थी। उसे यह ध्यान ही नहीं रहा कि दूध निकालने का वक्त हो गया है। उसे हंसी व कपफली को द्घास देकर दोनों छनियों ;गौशालाओंद्ध के दरवाज़े भी बंद करने हैं। क्योंकि रात को बाद्घ का डर होता है। और दरवाज़े खुले होने के कारण बाद्घ रात को किसी भी गाय को मार सकता है।
कमली को खयालों में खोई देखकर आभा ने उसे झकझोरते हुए कहा, ''कमली... ये कमली... उठ, कहाँ खो गई है तू?''
''अ... आभा तू...? कब आई?''
कहते हुए कमली उसके गले से लगकर रोने लगी थी। उस वक्त कमली यह भी भूल गई थी कि आभा सिर से लेकर पैरों तक पूरी तरह से भीग चुकी है। उसके कपड़ों से अभी तक पानी टपक रहा था। तेज बारिश में गीले होने के कारण उसके स्तनों का उभार पूरी तरह से नज़र आ रहा था। लम्बे-लम्बे बालों में बारिश की बूंदें अभी भी उलझी हुई थीं। इन सब बातों से बेखबर होकर कमली आभा के गले से लग कर रोने लगी थी। ''क्या बात है कमली?'' आभा ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा।
''मैं... मैं अकेले नहीं रह सकती। आज पता नहीं क्यों मुझे अचानक ही अपने गाँव, अपनी बोई व बाबा की याद आ गई थी। अकेले रहकर मैं तड़पने लगती हूँ। मैं सो नहीं पाती। पफत्तेकाका ने मुझे ये कैसा दुख दे दिया है। मेरे बाबा ने उसे मेरी हत्या का जिम्मा सौंपा था। पिफर उसने मेरी हत्या क्यों नहीं की?''
''अच्छा... अच्छा... अब तू शांत रह। अब मैं आ गई हूँ न। हंसी और कपफली रम्भा रही हैं।''
''तू कपड़े बदल। मैं दूध निकालकर ले आती हूँ। काकी कैसी है?''
''बोई अब पहले से बहुत अच्छी है।''
''तू इतनी तेज बारिश में द्घर से बाहर क्यों निकली।''
''मैं जब आधे रास्ते तक आ गई थी। तब बारिश शुरू हुई थी। इतनी तेज बारिश में द्घने जंगलों से आते हुए बहुत डर लग रहा था। बार-बार रिक व बाद्घ का डर लग रहा था।''
''तू आज अपने ही मैत में रुक जाती तो क्या हो जाता। तेरी कपफली को तो मैं ही देख रही थी। अगर इतनी तेज बारिश में द्घने जंगलों से आते हुए कोई रिक ;भालूद्ध या बाद्घ तुझ पर हमला कर देता तो तू क्या कर लेती?''
''मर जाती और क्या होता?''
''छि! ऐसा नहीं कहते। तू कपड़े बदल मैं पफटापफट गौशाला गई और पफटापफट आई। पिफर दोनों मिलकर ढेर सारी बातें करेंगे।''
कहते हुए कमली ने ओबरे में जाकर डोलची को उठाया, और पिफर वह तेज बारिश में ही छनी में पहुँच गई थी। उसके कदमों की आवाज सुनकर हंसी रम्भाने लगी थी। इधर हंसी रम्भाई तो उधर कपफली भी रम्भाने लगी थी।
''आ गई मैं। तुझे बहुत भूख लग गई होगी।''
कहकर कमली ने हरी द्घास की दो पूलियाँ हंसी के सामने डालते हुए कहा। ''खा ले।'' और पिफर वह अपने दोनों द्घुटनों के बीच डोलची को दबाए हंसी के थन से दूध निकालते हुए बोली, ''आज बहुत देर हो गई है हंसी। बारिश भी तो बहुत तेज थी न। पूछेगी नहीं तू कि आज मुझे देर क्यों हो गई है?''
''आँ...।''
''मुझे लखा की याद आ गई थी हंसी। उसके खयालों में खो गई थी मैं। उस दिन भी तो इतनी ही भयंकर बारिश हो रही थी। रौली-गदेरियां लबालब भरी हुई थीं। बहुत डर लग रहा था हंसी। अच्छा एक बात बता हंसी? क्या मैं मरने से पहले लखा को मिल सकूँगी? उससे बातें कर सकूँगी या नहीं? क्या कभी प्यार करने वालों का जीवन हंसी-खुशी से भी बीतता होगा? हमारा कसूर तो सिपर्फ इतना ही था न हंसी कि लखा लोहार के द्घर पैदा हुआ और मैं थोकदार के द्घर में। पता नहीं लखा कैसा होगा?
हंसी चुपचाप द्घास खाती रही। तभी कपफली की आवाज़ कमली के कानों से टकराई तो कमली ने जल्दी-जल्दी दूध निकाला। छनी के दरवाज़े बंद किए और अब वह कपफली को द्घास देने के बाद उसके थन से दूध निकालते हुए बोली-
''तू कभी किसी से प्यार मत करना कपफली, प्यार में तड़प व द्घुटन के अलावा कुछ नहीं मिलता। न तो मौत ही आती है, और न ही जीने का मन करता है। न तो भूख ही लगती है। और न ही खाना खाया जाता है। उस दिन भी तो ऐसी ही बारिश हो रही थी। जब लखा और मैं एक दूसरे से चिपके खड़े-खड़े बारिश में भीग रहे थे। तू बता कपफली कि क्या लखा मुझे पिफर कभी मिलेगा?''
''आँ...।''
''मिलेगा न...?''
''आँ...।''
''क्या पिफर कभी ऐसा मौका आएगा? जब हम दोनों उस दिन की तरह एक दूसरे से चिपके बारिश में एक बार पिफर खड़े-खड़े भीगते रहें।''
''आँ...।'' कपफली रम्भाई थी।
''अगर मुझे लखा मिलेगा न तो मैं उसे तेरे पास लाकर कहूँगी कि कपफली ये देख, ये रहा मेरा प्यार। तू उसे बहुत प्यार करना। उसके हाथों को चाटना। उसका मुँह चूमना। तू लखा को देखकर खुश तो होगी न?''
''आँ...।''
''तू बहुत अच्छी है कपफली।'' कहते हुए कमली बाहर निकलने लगी तो कपफली पिफर रम्भाई थी। आँ...। ''अब आ गई है तेरी गुसाणी। कल से वही आएगी। अब चुपचाप द्घास खा और सो जा।''
कहते हुए कमली ने दरवाज़ा बंद किया। सांकल चढ़ाई और पिफर तेज कदम बढ़ाती हुई द्घर की ओर चल पड़ी थी।
बारिश पहले की ही तरह अब भी तेज हो रही थी। रौली-गदेरियाँ सभी छलछलाने लगी थीं। जंगलों का वातावरण। बिलकुल शांत हो गया था। चिड़ियों का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। ऐसे में अगर बिजली कड़कती तो आँखों के आगे रोशनी की एक लहर दौड़ जाती थी। लेकिन उसके बाद बादलों की द्घोर डरावनी गरजना सुनते ही भय की एक लहर सारे शरीर में व्याप्त हो जाती थी।
कमली द्घर पहुँची तो आभा चाय बना चुकी थी। ''ले संभाल दूध को।'' आभा के सामने दूध की डोलची रखते हुए कमली ने कहा, ''कल सुबह होते ही अपनी कपफली से मिल लेना।''
''क्यों...?''
''बस्स...मिल लेना। तेरी याद में सूख गई है बेचारी।''
''तू तो ऐसे कह रही है जैसे कि कपफली को मेरी याद सता रही हो।''
''ते नहीं जानती आभा। ये पशु बोल नहीं सकते। लेकिन इन्हें भी इंसान से, अपने साथियों से, अपने बच्चों से व अपनी जगह से उतना ही प्यार है, जितना कि हमको होता है।''
''कमली बहुत ठंड लग गई है।''
''चाय बना और गरम-गरम पी जा। पत्ती थोड़ी तेज कर लेना। अच्छा अब बता काकी की तबियत कैसी है?'' ''बोई ;माँद्ध अब ठीक है। वह मरते-मरते बची। तेरे बारे में पूछ रही थी। बीमार होने के बाद भी बोई ने तेरे लिए खीर बनाकर भेजी है।''
''खीर...? जल्दी दे न। भूख लग गई है।'' कमली ने अपने होंठों पर जीभ पफेरते हुए कहा।
''बोई कह रही थी कि अगर अब तू आएगी तो कमली को भी साथ ले आना।''
''अच्छा... और क्या कह रही थी?''
''मैं जब भी तेरे बारे में बातें करती हूँ तो माँ की आँखों से आँसू बहने लगते हैं।''
''बहुत भूख लगी है आभा तू पहले खीर खाने को दे। काकी को कहना कि कमली के लिए रोना ठीक नहीं है। वह तो उस दिन मर गई, जिस दिन उसके पिता ने उसे रात के सन्नाटे में द्घर से पफत्तेकाका के साथ भेजा था।''
आभा ने अपने मैत से लाई गई पोटली में से खीर का बर्तन कमली को देते हुए कहा।
''माँ ने खीर के साथ-साथ तेरे लिए साड़ी और ब्लाउजभी भेजा है।'' कहकर आभा ने साड़ी और ब्लाउज कमली को पकड़ा दिए थे।
कमली अपने हाथों में लेकर साड़ी व ब्लाउज को बड़ी देर तक टकटकी लगाए देखती रही। नीली साड़ी व नीले रंग के ब्लाउज को देखकर उसकी आँखों में गीलापन तैरने लगा था। उसे अपना बचपन याद आने लगा था। अक्सर वह बचपन में ज्यादातर नीले रंग के कपड़े ही पहना करती थी। गाँव वाले उसे देखकर कहते कि कमली तेरे गोरे रंग पर ये नीले कपड़े बहुत सुंदर दिखाई देते हैं।
''अब क्या सोचने लगी?'' आभा ने कमली के चेहरे पर अपनी नजरें गड़ाते हुए कहा।
''मेरे पास सोचने के अलावा है ही क्या?'' कहते हुए उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे थे।
''कमली...।'' कहते हुए आभा ने उसे अपने सीने से लगाते हुए कहा, ''क्यों द्घुट-द्घुट कर जीना चाहती है तू? जो हुआ उसे भूल जा।''
''कैसे भूलूँ? तू ही बता। हमेशा तीज-त्योहारों पर मैं निराश हो जाती हूँ। माँ के हाथ का कभी कुछ नहीं मिलता।''
''कैसे मिलेगा? पता हो कि तू कहाँ है? जिं़दा है भी या नहीं। बोई ने तेरे लिए साड़ी भेजी है। उसे रख ले।''
कमली ने एक बार साड़ी को खोलकर देखा तो उसके अंदर से सौ-सौ रुपये के दो नोट जमीन पर गिर पड़े थे।
''ये रुपये...?''
''बोई ने तेरे लिए रखे हैं। ले खीर खा।'' कहते हुए आभा ने कमली के सामने खीर का डब्बा खोल दिया था।
''पहले तू खा।''
''नहीं पहले तू खा। माँ ने तेरे लिए ही बनाकर भेजी है।''
कमली जैसे ही बर्तन में से खीर निकालने लगी। वैसे ही उसके हाथ रुक गए थे। उसने खीर को वैसे ही वापस बर्तन में डाला और पिफर वह पफबक-पफबक कर रोने लगी थी।
''क्या बात है कमली?''
''जिस दिन पफत्ते काका मेरी हत्या करना चाहता था, उस दिन उसने पहले मुझे मेरी माँ के हाथ की खीर खाने को दी थी। बचपन में जब भी बोई खीर बनाती तो सबसे पहले मुझे ही खाने को देती थी। कहती थी कि सबसे पहले कन्या को खीर खिलाने से माँ पार्वती खुश होती है। और उस कन्या को अच्छा द्घर, अच्छा वर मिलता है। द्घर में सुख संपत्ति का वास होता है। मुझे खीर खिलाते हुए माँ कहती- ''खा बेटी खा। क्या पता तुझे ससुराल में खीर खाने को मिले या न मिले। और अगर मिलेगी भी तो तू सबसे पीछे खाएगी। क्योंकि द्घर के मरदों को सबसे पहले खाना खिलाया जाता है।'' ''कितनी बार तुझे कहा है कमली कि ज्यादा मत सोचा कर। क्या मिलता है तुझे ज्यादा सोचने से? अगर तेरे पिता ने जरा भी तेरे बारे में सोचा होता तो वे तेरी हत्या का हुक्म चोरी-चोरी क्यों देते? वाह रे पिता! अपनी शॉन के आगे अपनी बेटी को भी कुछ नहीं समझा। लेकिन एक तू है कमली कि आज भी उनकी यादों में रोए जा रही है। जिनके लिए तू आज से बीस साल पहले मर गई थी। माँ ऐसी रही कि वह तेरी हत्या का विरोध नहीं कर सकी। जिस माँ के लिए तू रो रही है उस वक्त वह गूंगी हो गई थी क्या? जब तेरे पिता ने तेरी हत्या का हुक्म दिया था। तू उस भुवन चंद के बारे में तो नहीं सोच रही है। जिसने तुझे अपने द्घर में पनाह दी। लोग तुझे उसकी पत्नी समझते रहे। और वह तुझे अपनी बेटी की तरह समझता रहा। जब तक वह जिया। तेरे को बेटी जैसा प्यार दिया। तेरे बदन को छुआ तक नहीं। चल... खीर खा। माँ ने बड़ी मेहनत से तेरे लिए खीर बनाकर भेजी है।''
कहकर आभा ने बर्तन में से खीर निकालकर कमली के मुँह में डालते हुए कहा।
''बीते दिनों में लौटकर तुझे दुःख के अलावा कुछ भी नहीं मिलेगा कमली। तेरा लखा तो अब यहाँ आने वाला है नहीं। खीर खा कमली खीर खा।''
कमली चुपचाप खीर खाने लगी थी। ''ले चाय भी पी।'' आभा ने गिलासों में चाय डालते हुए कहा, ''इतनी ठंड तो मुझे कभी ज़िंदगी में नहीं लगी जितनी कि आज लग रही है। चूल्हे की आग भी मेरी ठंड को नहीं भगा पा रही है। मन करता है कि चुपचाप रजाई ओढ़ कर सो जाऊँ।'' आभा ने गिलास में से चाय का द्घूंट भरते हुए कहा।
तभी गाँव की दो-तीन औरतें आ गई थीं। कमली को खीर खाते देखकर वे उसके बर्तन में से खीर खाने लगी थीं।
खीर खाते हुए वे खिलखिलाकर हँसते हुए आपस में बातें करने लगी थीं। लेकिन कमली अब भी गुमसुम उदास व खोई-खोई सी थी।
जबकि बाहर एक बार पिफर जोर से बादल गरजे और पिफर तेज बारिश शुरू हो गई थी।


 

 
 
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