दिसम्बर २०११
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
विरासत

सफल लेखन सबसे बड़ी कला है
उद्भ्रांत
मेरा क्या प्रायः सभी विद्वानों का मानना है कि साक्षात्कार का लक्ष्य वस्तुतः सम्मुख बैठे व्यक्ति के अंतर्मन का प्रकटीकरण होना चाहिए। इसके लिए आपको तमाम तरह की प्रश्न-क़वायद करनी पड़ती है जिससे साक्षात्कार देने वाले का अंतर-बाह्‌य अच्छी तरह खंगाला जा सके और भीतर छुपी तस्वीर अपने वास्तविक रूप में चमक कर प्रत्यक्ष हो।
यह साक्षात्कार नागर जी के चौक वाले द्घर में नहीं लिया गया। वहाँ से दो-तीन पफ़र्लांग की दूरी पर एक कमरा उन्होंने लिखने के उद्देश्य से किराये पर ले रखा था। वहाँ पहुँच कर बोले-''इस जगह का पता किसी को नहीं है, क्योंकि यहाँ का पता लोगों को लगे तो मेरा तो लिखना ही बंद हो जाएगा!''-''रोज सुबह नहा-धोकर छह बजे हम यहाँ आ जाते हैं। शाम चार बजे तक रहते हैं। रात को सोते समय सुबह के काम का ध्यान करना। उतने से ही काम का तार उठ आता है। बीच में कोई काम आ गया तो उसे करने के बाद मूड बनाना पड़ता है। हमारी एक इनर डिसिप्लिन ऐसी है जो हमें बांधती है।
इसमें कहाँ हमारे संस्कार हैं, कहाँ हमारी विल पॉवर है-इसे कह पाना मुश्किल है।''मैं कुछ पफल लेकर गया था। एक किलो सेब चौक के मार्केट से ही खरीद लिए थे। बोले-''ये सब क्यों लाते हो? एक बार पहाड़ से मनोहरश्याम जोशी हमारे लिए हरी-हरी पत्तीनुमा सोंधी सब्ज़ी लाया था। वो हमें बहुत अच्छी लगी थी। लेकिन हमने उसे भी मना किया था।''
इंदिरा गांधी पर गहरा आक्रोश है-''आज की पॉलिटिक्स पर क्षोभ होता है।'' यह १९७१ या १९७२ का वर्ष है।
मैंने कहा-''बाबूजी! गुटबंदी से साहित्य का भला नहीं होता पिफर भी साहित्यकार क्यों ग्रुपिज़्म के चक्कर में पड़ जाते हैं?''
बोले-''हम तो इस चक्कर में नहीं पड़ते। वैसे इसके लिए अकेले साहित्यकार को क्यों दोष देते हो? देखो, साहित्य पैसा चाहे न दे, पर नाम देता है। इसे स्ट्रगल पफॉर ब्रेड या स्ट्रगल पफॉर यश कह सकते हो। गुटबंदी दो तरीक़े से होती है। कोई विचार जो नया आरंभ होता है उसे मानने वालों का गुट बन जाता है। मज़े की बात है कि उन्हें बाद में सांप्रदायिक खांचे में डाल दिया जाता है। विचार का आरंभ होता है समुदाय से। प्राचीन आँषि यज्ञवादी थे। वे यज्ञ की बात करते थे। उपनिषद् वाले उद्दालक आदि ने कहा कि यज्ञ आदि में कुछ नहीं रक्खा। मार्क्सवाद आरंभ हुआ। उसे मानने वाला एक छोटा-सा संप्रदाय बना। आज मार्क्स के विचार छोटे से छोटे व्यक्ति के विचार हो गए। गुटबाज़ी को तोड़कर वह व्यापक सत्य को अपनाता है। यह गुटबाज़ी समझ में आती है। आर्य समाज आंदोलन, विश्व शांति... ये तो एक प्रोसेस है। नादिरशाह के ज़माने में जो काम सहज था उसी को हिटलर ने किया तो पाप किया।''
मैंने पूछा-''साहित्यकार व्यवस्था से जुड़कर ईमानदार लेखन कर सकता है?''
''देखो 'साहित्यिक' शब्द बड़ा व्यापक है। दैनिक पत्रा के सम्पादक को छोड़कर साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्रा का सम्पादक भी साहित्यकार की कोटि में आ जाता है। वह श्रेष्ठ सामग्री का संकलन करके आपके समक्ष प्रस्तुत करता है। मैं उन
लोगों के साथ हूँ। जैसे हिन्दी साहित्य सम्मेलन को देखो। दर्शन का विभाग अलग, ललित साहित्य का अलग, विज्ञान का अलग। जब दुनिया में इतने विचार हैं तो उन्हें प्रस्तुत करने वाला साहित्य भी कई तरह का होगा। तुम इलाहाबाद जाओ तो चौंक उठोगे। वहाँ दाल, चावल, मसाले का साहित्य भी मिलेगा। पर साहित्य का एक विशेष पक्ष है जो सृजनशील साहित्य का होता है। यह कार्य कठिन है। यह मोस्टली ऑरिजिनल होता है। इस प्रकार का साहित्यिक अगर एक प्रकार की व्यवस्था से जुड़ जाए तो उसको थोड़ा नुक़सान होता है, क्योंकि जो सृजन-प्रक्रिया है, वह-अक्सर यह भी होता है कि-ऊपर से तो चलती हुई नहीं दिखाई देती, लेकिन भीतर बराबर चलती रहती है। जैसे द्घड़ी में मिनट की सुईं कभी-कभी आठ-दस दिन मैं कुछ नहीं करता। उन दिनों सोचता रहता हूँ। यह अवकाश मैं रेडियो की नौकरी में नहीं पा सकता था। लेकिन साहित्यकार अगर अनुशासन में नहीं है तो वह अच्छा रिसीवर नहीं हो सकता। जैसे तुलसी वाले उपन्यास में-बार-बार द्घूम पिफर कर उधर आ जाता हूँ-'जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पफनि जहाज पै आवै।' उन दिनों कोई ऐसी बात स्पौंटेनियसली आकर टकराती है जो ह्‌यूमन कांशसनैस को आगे बढ़ाती है भैक्षये!''
इस बात को मैंने थोड़ा और आगे बढ़ाने का निश्चय किया। पूछा-''अब देखिये, आपने पिफल्मी दुनियाँ में भी कार्य किया और आकाशवाणी में भी। दोनों ही जगह आप सपफल माने जा सकते हैं। पिफल्म में तो डबिंग का कार्य भी, सुनते हैं, आपने ही प्रारंभ किया। इसके बाद भी पिफल्मी जीवन को त्याग देना और आकाशवाणी में भी कुछ समय कार्य करके अलग हो जाने से ऐसा लगता है कि आपके लेखक को इन दोनों जगहों की परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं लगीं और वह अवसर पाते ही सारे बंधनों को तोड़कर स्वतंत्रा हो गया और मुक्त हृदय से साहित्याकाश में उड़ान भरने लगा। मेरा यह विश्लेषण कहाँ तक सही है इसे जानना चाहूँगा?''
नागरजी बोले-''आमतौर से कृती साहित्यकार का कृतित्व व्यवस्था से बंधकर मुरझाता ज़रूर है, पर पापी पेट का सवाल भी तो है। अब हम अपने में न चाहें कि पंखा नहीं है तो कोई बात नहीं, पर दूसरे की तो ऐसी इच्छा नहीं होती। जोशी मनोहर श्याम और भारती को देखो। हम पिफ़ल्म में थे। सन्‌ ४२ से '४३ तक हमारा बड़ा बिजी ज़माना रहा। हमको पफुऱसत ही नहीं मिल पाती थी कि कुछ लिख सकें। १९४४ में हम इतने दुखी हुए कि अब मैं लेखक नहीं रहा। हाय, मेरी ज़िंदगी चौपट हो गई! मेरे भीतर की करुणा जागे, मेरा लेखक जागे-इसलिए '४३ में मैं बंगाल का अकाल देखने गया। जब 'महाकाल' लिखना शुरू कर दिया तो लगा कि लेखक की ज़िंदगी में कुछ ताज़गी आईं। अब जब हम इसके साहित्य के हो गए तो तुम हमें राष्ट्रपति की गद्दी दे दो तो दो-चार दिन बाद हमारा नशा उतर जाएगा। देखो भैक्षये! लगन भी होती है। अब तो हम किसी काम के रहे ही नहीं। एक बात ज़रूर है कि अब कभी-कभी ऐसी इच्छा होती है कि कुछ दिनों के लिए-तुलसी के बाद-लिखना बंद कर दें। मुड़कर पेट की राइटिंग तो करेंगे ही पर वो पेट के लिए करेंगे। चार-छह महीने शांत रहने के बाद कुछ नया ही देंगे।''
मेरे सवाल के जवाब में नागरजी बहुत गहरे उतर गए थे। शांत हुए तो पूछा-''नये लेखक की मुद्रा आक्रोश भरी होती जा रही है। आप इसकी क्या वज़ह देख रहे हैं? ऐसे नौजवानों को देखकर आपको गुस्सा ज़रूर आता होगा?
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नागरजी बोले-''हर नया लेखक, हर नौजवान अपने ढंग से आदर्शवादी होता है, इसलिए उसे पिछली पीढ़ी के ऐसे लोगों को देखकर-जो आदर्श और व्यवहार में एक तरह का समझौता कर लेते हैं-आक्रोश उत्पन्न होता है। मान लो तुमने मुझे पढ़कर कोई आदर्श निर्मित किये हैं और तुम देखो कि मैं उनसे अलग हो रहा हूँ। तो तुम्हें ज्य़ादा धक्का लगेगा। तुम्हें गुस्सा आएगा। तो आक्रोश को समझना चाहिए। लेकिन कुछ लोग पफ़ैशन के तौर पर आक्रोश को ओढ़े रहते हैं। सामने मिलेंगे तो नमस्कार नहीं करेंगे। ऐसे लोगों के लिए मुझे एक ही शब्द नज़र आता है-'उल्लू के पट्ठे'! ऐसा गुस्सा जब मेरा भी हुआ तो मैं नयी पीढ़ी के गुस्से से क्यों नाराज़ होऊँगा?''
नागरजी की इस बात ने मुझे उनके बारे में कही गई यशपाल जी की बात का स्मरण करा दिया-''उनकी एक कमज़ोरी से भी परिचित हूँ। वह कमज़ोरी है उनका अन्याय के प्रति उन्मेष में आपे से बाहर हो जाना''। यह शिकायत प्रायः युवकों से ही की जाती है इसलिए नागरजी का यह जवाब उनकी प्रकृति के अनुकूल ही था। 'सारिका' के किसी पुराने अंक में 'आईने के सामने' स्तम्भ के अन्तर्गत उन्होंने स्वयं लिखा था-''गालों की हड्डियाँ उभरी हैं, विद्रोही व्यक्तित्व की सूचक हैं।'' स्पष्ट है कि अन्याय स्वीकार लेना उनका स्वभाव नहीं है। चाहे साहित्य में, चाहे दुनिया में कहीं भी।
मैंने कहा-''बांग्लादेश में पाकिस्तान द्वारा निर्दोष आम लोगों का जो क़त्लेआम किया जा रहा है।''
बात पूरी होने से पहले ही नागरजी बोले-''इसके मूल में दोषी वे हैं जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान में जनता का शोषण किया। मैं यहाँ भारत सरकार का समर्थन करता हूँ। मान्यता देना बांग्लादेश को-उद्भ्रांत शु( राजनीतिक सवाल है, जिसके दो पहलू हैं। मान्यता न देकर हम समस्या को आगे बढ़ा सकते थे या और अधिक उलझा सकते थे। हम इस बात से संतुष्ट हैं कि बांग्लादेश के बारे में स्टैप उठाकर भारत सरकार ने अपनी सच्चाई के साथ उसे शामिल कर लिया है। विद्रोह को सही मार्ग पर चैनलाइज़ करना ही होगा। विद्रोह को कोई दबा तो सकता ही नहीं।''
''आपकी राजनीतिक विचारधारा? याद आ रहा है कि एक जगह-'आत्म प्रश्नोत्तरी' में-आपने स्वयं को मार्क्स से प्रभावित बताया है?''-मैंने पूछा।
''देखो! आरंभ तो गांधी से ही हुआ, मगर बाद में मैं मार्क्सिज़्म से बहुत अधिक प्रभावित हुआ। अभी भी हूँ, इससे इन्कार नहीं करूँगा। मगर हमारे सामने कुछ सवाल आते हैं। क्यों येव्तुशेंको इस निज़ाम का विरोध करता है जिसका मैं भक्त हूँ? वो बात दीगर है। खुश्चेव ने रूस के लिए बहुत काम किया, किन्तु उसने नेशन को बढ़ाया अधिक। द्घटाया भी, पर बढ़ाया अधिक। यह सब होते हुए एक जगह मार्क्सिज़म का प्रभाव मेरे ऊपर बहुत गहरा है। लेनिन को मैं किसी भी महापुरुष से कम नहीं मानता।''
''बाबूजी! आजकल आलोचना डगमगाती नज़र आ रही है। पूर्वाग्रहों से मुक्त आलोचना पढ़ने में नहीं आती। ऐसा क्यों है?''
''देखो! आलोचना की एक दिक्क़़त हो गई है। एक तो यह कि हिन्दी में, किसी हद तक पूरे हिन्दी साहित्य में काव्यालोचना की परंपरा तो रही, गद्यालोचन की नहीं। इसलिए काव्यालोचना में बारीक़ी से किसी बात को ढूंढ़ पाना आसान है-गद्य में नहीं। दूसरी बात गद्य काव्य का निकष है। काव्य में बीच-बीच में फ्ऱलैशेज़ आते हैं। वे गद्य में विकसित होते हैं। मान लीजिए 'अमृत और विष' में एक-डेढ़ सदी की बारीकिय़ों को चित्रिात करने में हमने तो मेहनत की किन्तु उसकी प्रशंसा करने वाले आलोचकों ने भी उन पर नज़र नहीं डाली। तुम्हारे कृती साहित्यकारों में नयों में भी और पुरानों में भी ऐसे साहित्यकार हैं जो स्वच्छंदतापूर्वक जीवन बिताते हुए साहित्य सृजन करते हैं। दूसरी खराबी यह आई कि आलोचक की सीमित बु(ि से चिढ़कर कृति साहित्यकार जब आलोचक बनता है तो हमेशा अपने दही को मीठा देखता है। नतीज़ा यह हुआ कि उसका बैलेंस बिगड़ गया।''
''यह बताइये कि अगर स्वतंत्रा लेखन पर ही निर्भर रहा जाए तो क्या लेखन में व्यावसायिकता आना अनिवार्य स्थिति होगी? व्यावसायिकता न भी आए तो ऐसे लेखकों को गुपचुप कुछ दूसरी तरह का अथवा व्यवसायोन्मुख साहित्य लिखना पड़ जाता है जैसे मनहर चौहान, कुणाल श्रीवास्तव, आनंद प्रकाश जैन जैसे लेखक छद्म नामों से जासूसी उपन्यास लिखते हैं। क्या इससे उनकी रचनात्मकता का ह्रास नहीं होता?''
''भाई! देखो, यह एक ऐसी समस्या है जिसका सीधा उत्तर दिया ही नहीं जा सकता। मैं केवल आत्मानुभव ही बखान सकता हूँ। आत्मानुभव यह कहता है कि एक अमृतलाल नागर है और एक हैं नागरजी। अमृतलाल नागर गृह-गृहस्थी वाला आदमी है, उसे पेट पालने की भी चिंता है। मैंने आरंभ से अपने आपको हठपूर्वक इतना तो अवश्य साधा कि लेखन से हटकर कोई दूसरा काम न करूँ और उसी में रहकर हम पिफ़ल्म में भी गये, रेडियो में भी गये। लेकिन वहाँ ऐसा लगा कि हम पफँस गए। तब हम स्वतंत्रा हो गए। तब दिक्क़़त यह आई कि हम उतनी कमाई नहीं कर सकते थे। अब दो तरह की राइटिंग्स हो जाती हैं। एक वह जो अपने मन की समस्याओं के समाधान की खोज में लिखी जाती है, जैसे 'बूँद और समुद्र', 'अमृत और विष', 'एकदा नैमिषारण्ये', तुलसी वाला उपन्यास तब लिखा जा रहा था जो बाद में 'मानस का हंस' नाम से प्रसि( हुआ-उद्भ्रांत। दूसरी हो जाती हैं 'सुहाग के नुपूर', 'सात द्घूंद्घट वाला मुखड़ा'-जोकि पुरानी सि( अनुभूतियों का मुनापफ़ा मात्रा हैं। लेकिन इतना करके भी हमारा मन शु( व्यावसायिक दृष्टिकोण का नहीं बन पाता। और उसे पनपा लें तो कोई दिक्क़़त की बात नहीं। पर यहाँ एक चीज़ का और विचार करना ही होगा। वह यह कि हम जन की सही अभिरुचि को समझने का प्रयत्न करें या न करें? मैं समझता हूँ कि जहाँ तक कृति साहित्यकार की अविकसित आशाएं और अभिलाषाएं तथा उसके समाज की अविकसित आशाएं और अभिलाषाएं एक होकर सामने आती हैं, वहाँ हमें अपने समाज या पाठक वर्ग के दृष्टिकोण को भी लेना ही होगा। यह कोई समझौता नहीं, बल्कि एक रास्ता है। जैसे आजकल बहुत से लेखकों के मन में यह बात आती है कि उपन्यास, कहानी आदि में सेक्स को ही तरह-तरह से चित्रिात करना एक वर्ग के लिए कला है, दूसरे वर्ग के लिए द्घिनौनापन। मैं समझता हूँ कि सेक्स की समस्या को इनमें से किसी भी सीमा से अति की हद तक नहीं बांधा जाना चाहिए। जहाँ हम अपने पाठक को मात्रा रिझाने के लिए ही सेक्स से बांधते हैं वहाँ हम शु( व्यावसायिकता करते हैं। जहाँ सेक्स से उत्पन्न मानवीय समस्याएं आती हैं वहाँ उसके चित्राण को नकारूँगा भी नहीं और न उसको व्यावसायिक हथकंडा ही मानूँगा।''
''बाबू जी! आपने साहित्य में सेक्स के चित्राण संबंधी बात को बेहतर तरीक़े से समझाया। इसी से जुड़ा सवाल अश्लीलता का है। साहित्य में किसे श्लील मानेंगे किसे अश्लील? हालांकि आपके जवाब में परोक्ष रूप से तो इसको भी स्पर्श किया ही गया है।''
नागरजी थोड़ी देर रुके पिफर बोले-''एक बड़ा मोटा उत्तर दूँगा। जो विशु( व्यावसायिक दृष्टिाकेण से सेक्स लिखा जाता है तो वह निश्चित रूप से अश्लील है, बाक़ी सब श्लील है। अश्लीलता तो तुम्हारे मोटिव में है। पुरुष को नारी देह भाती है। मैं अपने पुरुष पाठकों को पकड़ने के लिए नारी देह को तरह-तरह से पकडूँ और बखानूँ, यह बिलकुल अश्लील है। उसमें कला-वला कुछ नहीं। मैं तुमको एक मिसाल दूँ। कई बरस पहले अंग्रेज़ी में एक डाक्यूमेंट्री पिफ़ल्म आई थी। वह शायद मेडिकल छात्राों के प्रशिक्षण के लिए तैयार की गई थी। उसमें स्त्राी द्वारा बच्चा जनने की प्रक्रिया का चित्राण था। स्त्राी का वह अंग जो पुरुष के लालच का केन्द्र है, उस पिफ़ल्म में देखते हुए भी मेरे मन में कोई रसीला लालच नहीं जागा। मेरी दृष्टि में वह पिफ़ल्म कतई अश्लील नहीं थी, बल्कि बहुत उपयोगी थी। तुम्हारा मोटिव अगर कलात्मक रूप से पाठकों की रुचि को ऐक्सप्लॉयट करने का है तो वह अश्लील है।''
''आपने ऐतिहासिक उपन्यासों की भी रचना की है। 'शतरंज के मोहरे' में आपने ऐतिहासिक सत्य को बनाये रखा है किंतु 'सुहाग के नूपुर'-जो बाद में लिखा गया-में
ऐतिहासिक तथ्यों की उपेक्षा की गई है। प्रायः सभी द्घटनाओं और पात्राों पर कल्पना के रंग छिड़क दिये हैं। ऐतिहासिक तथ्यों की उपेक्षा करके क्या सपफल ऐतिहासिक उपन्यास की रचना की जा सकती है?''
नागरजी थोड़ा रुके पिफर बोले-''देखो! यह दरअसल लेखक के मूड पर निर्भर करता है और उसके आकलन पर कि वह जिस ऐतिहासिक द्घटना को आधार बना रहा है उस पर लिखे जा रहे उपन्यास में ऐतिहासिक तथ्यों को ज्यों का त्यों रक्खा जा सकता है या नहीं? यह तो समझ ही लो सारे तथ्यों को वैसे ही लेने के बाद भी कथानक में कल्पना के रंग तो भरने ही पड़ेंगे। बिना कल्पना के कोई उपन्यास-पिफर वह ऐतिहासिक उपन्यास ही क्यों न हो-नहीं लिखा जा सकता।''
''अच्छा बाबूजी! एक सवाल और उठ रहा है मन में। आपने अपने उपन्यासों में विविध प्रयोग किये हैं। 'सेठ बाँकेमल' अपने ढँग का अकेला उपन्यास है। 'बूँद और समुद्र' में एक विराट कैनवेस लेते हुए लखनऊ के चौक मोहल्ले के माध्यम से आपने भारतीय नागरिक जीवन और समाज के मध्यवर्ग के समूचे चित्रा को प्रस्तुत किया है। इसके बाद 'अमृत और विष' में दोहरे कथानक को लेकर आधुनिक समाज-व्यवस्था में एक स्वतंत्रा लेखक की स्थिति का दिग्दर्शन कराते हुए आपने एक और अद्भुत प्रयोग किया है। इधर सुनने में आया है कि पौराणिक संदर्भों को लेकर 'एकदा नेमिषारण्ये' नामक एक नवीनतम वृहद् कृति का प्रणयन आप कर रहे हैं। इसलिए अगर यह अपेक्षा की जाए कि इस नवीनतम कृति में भी आपकी यह प्रयोगात्मक परंपरा अविच्छिन्न रहेगी तो अनुचित तो नहीं होगा?''
''कन्टेन्ट के आधार पर लेखक अपनी हर रचना का शिल्प तय करता है। कथावस्तु कैसी है-पौराणिक, ऐतिहासिक या सामाजिक? इस आधार पर नये-नये प्रयोग भी होते हैं। मेरे उपन्यासों में भी जो नये-नये प्रयोग हुए हैं, इसी कारण तुम्हारे देखने में आये हैं। 'एकदा नेमिषारण्ये' अलग तरह का उपन्यास होगा, यह तुम्हारा सोचना ठीक है।''
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दूसरी वार्ता चौक स्थित उनकी हवेली में हुईं शाम का समय था। 'हरित क्रांति' हो चुकी थी! नागरजी तखत पर मस्ती में लेटे हुए थे-दो तकिये लगाये। बोले-''उद्भ्रांत! रामविलास पर एक ग्रंथ तैयार होना चाहिए। सुमन, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, नरेन्द्र शर्मा, अमृतलाल नागर, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, डॉ. नत्थन सिंह, धर्मवीर भारती, शमशेर, द्घनश्याम अस्थाना के लेख रहें।''
मैंने कहा, ''जी, यह तो बहुत अच्छा विचार है, लेकिन नत्थन सिंह जी का नाम मेरे लिए नया है। इन्हें मैं नहीं जानता।''
बोले-''तुम द्घनश्याम से संपर्क करो। उससे नत्थन सिंह का पता मिल जाएगा। पुराने विद्वान हैं। द्घनश्याम का पता है-डॉ. द्घनश्याम अस्थाना, गोकुलपुरा, आगरा-२।''
मैंने कहा-''ठीक है।''
यह काम हो नहीं पाया। मैं इस सिलसिले में एक बार रामविलास जी से आगरा के राजामंडी स्थित द्घर में भी मिला, लेकिन रामविलास जी ने इसमें रुचि नहीं दिखाईं मुझे लगता है कि नागरजी के मन में यह विचार बच्चन जी की शष्ठिपूर्ति पर उनके समकालीन साहित्यकारों द्वारा लिखित संस्मरणों की पुस्तक 'बच्चन निकट से'-जिसे अजित कुमार और ओंकारनाथ श्रीवास्तव ने संपादित किया था-को देखकर आया था। रामविलास जी अन्य साहित्यकारों पर होने वाले ऐसे आयोजनों में तो उत्साहपूर्वक शरीक़ होते थे-अगर मेरी स्मृति धोखा नहीं दे रही तो 'बच्चन निकट से' में उनका भी लेख शामिल था-पर अपने ऊपर इस तरह के आयोजनों को लेकर उनमें विरक्ति का भाव रहता था। खैऱ!
मैंने पूछा-''बाबूजी! आपका खान-पान कैसा रहता है?''
बोले-''मांसाहारी नहीं हूँ। एक बार मांसाहार के पफेर में किशोर साहू ने हमको ख़ासा चकमा देना चाहा। उनकी बांबे टॉकीज़ की पिफ़ल्म बनी थी-'पुनर्मिलन'। पिफ़ल्म पूरी होने के बाद वे अपने द्घर नागपुर चले गये। उनका आग्रह हुआ कि हम और महेश कौल नागपुर आयें। महेश भी नागपुर के रहने वाले थे।''
इस बीच चाय आ गई थी। नागरजी बैठ गए शॉल ओढ़कर। मेरी चाय के कप में चीनी डालते हुए बोले-''तुम्हें दो चम्मच?'' मैेंने सिर हिलाकर हामी भरी।
''तो भाई क्या हुआ कि हम दोनों नागपुर पहुँच गए। किशोर साहू नागपुर के मौरिस कॉलेज में पढ़े थे। वहाँ के मुस्लिम प्राचार्य ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रिात किया। हम किशोर के द्घर ठहरे थे। उन्होंने सोचा कि आज मौक़ा मिला है पंडित जी को आदमी बनाने का! हमें मुस्लिम के यहाँ खाने में परेशानी नहीं थी लेकिन मांस नहीं खा सकते थे।... जब वहाँ पहुँचे तो हमने स्वाभाविक रूप से पूछा। साहू ने धीरे से कहा-'पंडित जी, शोर न मचाओ! खा लो, खा लो।' तब हमने भोजन परोसने वाले सज्जन से पूछा। अब वे उदास हो गए, क्योंकि हम उनके भोजन की बढ़िया चीज़ें नहीं खा सकते थे। पिफर हमने ली चपाती और सब्ज़ी। रूस में हमें कोई कष्ट नहीं हुआ। ये कहना सही नहीं है कि रूस में मांस के बिना काम नहीं चल सकता। देखो, शाकाहार में हम सब तरह की चीज़ें पसंद करते हैं और मिठाई के तो गुलाम हैं। तुम चाय में पीते हो दो चम्मच चीनी और हमने तीन चम्मच डाली हैं। एक ज़माने में हरी मिर्च बहुत खाते थे पर अब मन नहीं करता। सबसे आनंददायक हमारे लिए है खिचड़ी। मोइन पड़े टिक्कड़ और उड़द की दाल बहुत पसंद है। साथ में चूरमा लड्डू हो तो वह तो बहुत ही पसंद है। प्याज़, लहसुन से परहेज़ नहीं है, पर आमतौर से नहीं खाते।''
''अच्छा बाबूजी! कुछ शुरू के दिनों की बातें बतायें। लेखक बनने का सपना कब देखा? सुना है बचपन में आपके बाबा लाड़ में आपको जज होने का आशीर्वाद देते थे। बाद में उनकी इच्छा आपकी महत्त्वाकांक्षा भी बनी, किंतु आप जज न बनकर आज हिन्दी के मूर्धन्य उपन्यासकार के रूप में हमारे सामने हैं। क्या उन कारणों पर प्रकाश डालेंगे जिन्होंने आपको लेखक बनने के लिए विवश कर दिया?''
चाय ख़त्म हो गई थी। कप को एक तरपफ रखा और पानदान से एक पान निकाला, सरौते से सुपारी के कुछ महीन टुकड़े कर उसमें डाले पिफर ऊपर से ज़र्दा डालकर पान मुँह में दबाया। बोले-''लेखक बनने की विवशता शायद हम जन्म से ही लेकर आये होंगे, क्योंकि हम पढ़ाई में तेज़ होते तो शायद जज ही बन जाते। लेकिन चूंकि स्कूली पढ़ाई के समय ही पुस्तकालय की पढ़ाई का चस्का लग गया था, इसलिए वैसा तेज़ विद्यार्थी साबित न हो सका जैसा जज होने के लिए मुझे होना चाहिये था। पर जज तो हैं ही, अब भी!'', नागरजी हँसते हैं-''मैं अपने समाज के प्रति न्याय का पोषक हूँ। साहित्य में अभिरुचि के कई कारण रहे। हमको बचपन से ही एक साहित्यिक वातावरण अपने आस-पास अवश्य मिला। हमारे द्घर में तो हमसे पहले कोई साहित्यकार नहीं हुआ, पर साहित्य रसिक, कला रसिक अवश्य हुआ। हमारे ठेठ बचपन में हिन्दी रंगमंच के उन्नायक और प्रसि( राष्ट्रीय कवि पंडित माधव शुक्ल लखनऊ आने पर हमारे ही यहाँ ठहरते थे। आचार्य श्यामसुंदर दास उन दिनों लखनऊ के कालीचरण स्कूल के हेडमास्टर थे और सुबह कंपनी बाग द्घूमने के बाद वे एक चक्कर हमारे यहाँ अवश्य लगाते थे। बाबा के साथ बैठते थे। पड़ोस में थोड़ी ही दूर पर 'आनंद' पत्रा के संपादक पंडित शिवनाथ जी शर्मा रहते थे। इन सब जाने-पहचाने लोगों के नाम छापे के अक्षरों में ढले होते देखकर ही शायद हमारे मन में लेखक बनने की आकांक्षा जागी होगी। पढ़ने का चस्का बहुत पहले से लग गया था, क्योंकि बचपन में दोस्त ज्य़ादा नहीं थे हमारे। ये ही सब कारण मिल-मिलाकर हमें लेखक बना गए होंगे। बाकी जनमपत्राी के ग्रह-नक्षत्राों में भी रहा होगा। किसी ज्योतिषी से पूछ कर बतला सकेंगे तुम्हें।''
आखिऱी वाक्य में नागरजी का विनोदी भाव मुखर हो गया था। मैंने पूछा-''आमतौर से लेखक अपने लेखकीय जीवन की शुरुआत कविता से करते हैं। क्या आपके साथ भी ऐसा ही हुआ?''
''कुछ तुकबंदियां शुरू में की थीं। वो अब न तो याद हैं हमें और न वो हमारे पास हैं। लेकिन पद्य से गद्य की ओर हमारा डाइवर्जऩ बहुत जल्दी हो गया था। कविताएं एक ज़माने में हमें बड़ी याद थीं-बहुत ज्य़ादा। 'बूँद और समुद्र' में कविताएं कोट करने का एक सज्जन को जो मर्ज़ है और उसमें कविता का जो एक रंग आ गया है वो हमारा पुराना अटैचमेंट ही है। पिफर कविताओं की ओर मन नहीं लगा। 'चकल्लस' के ज़माने में निराला, महादेवी, प्रसाद जी की कविताओं की पैरोडियां लिखीं, पर सीरियस लेखन नहीं किया। हाँ, सन्‌ '४२ में एक पिक्चर 'संग्राम' मास्टर विनायक की पिफ़ल्म, 'कुंआरा बाप', 'किसी से न कहना' लीला
चिटनिस की पिफ़ल्म में गीत भी लिखे थे। 'संग्राम' में हमने प्रसाद जी के एक साहित्यिक गीत-'अरे कहीं देखा है तुमने, मुझे प्यार करने वाले' इस्तेमाल करवाया था। किशोर साहू की 'राजा' में भगवती बाबू का 'हम दीवानों की क्या हस्ती' इस्तेमाल करवाया था।''
''आप पर किन बड़े साहित्यकारों का प्रभाव पड़ा?''
''बंकिम, शरत्‌, प्रेमचंद, निराला। उग्र भी शुरू में हमको बड़े अच्छे लगते थे। बाद में कुछ दिनों तक चंडी प्रसाद 'हृदयेश' और जयशंकर प्रसाद की गद्यशैली का बुखार भी हम पर चढ़ा रहा। हमारी शुरू की कुछ कहानियां हैं वैसी। पिफर 'माधुरी' के संपादक पंडित रूपनारायण पांडेय बोले-'भैक्षया, तुम बहुत विद्वान हो गए। डिक्शनरी से छांट-छांट कर क्लिष्ट-संस्कृत शब्द लिखते हो!' सन्‌ '२८ से '३६ तक का काल हमारी प्रारंभिक निर्मिति का काल है-तब हम दूसरे प्रभावों से अधिक परिचालित रहे। 'शकीला की माँ', 'बूँद और समुद्र' के लेखक की पहली कहानी है। मेरे ख़याल में ये १९३६ में लिखी गईं इसके बाद तो हमारा लेखक अपना पफ़ॉर्म ले लेता है।''
कापफ़ी देर से नागरजी और उनके साहित्यकार पर ही केन्द्रित था मैं। लगा कि बहस कुछ व्यापक होनी चाहिए। मैंने कहा-''बाबूजी! निराला को आपने निकट से देखा और जाना है। उनके लिए आपके मन में बड़ा सम्मान है, और हम लोगों के तो वे आराध्य ही हैं। मेरी समझ में यह नहीं आता कि जब उन्होंने साहित्य की अन्य विधाओं में भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया, तो उन्हें कवि के रूप में ही सबसे अधिक मान्यता क्यों मिली? आप क्या सोचते हैं?''
नागर जी बोले-''एक सवाल हम तुमसे पूछें? मैंने रेडियो नाटक लिखे, कहानियां लिखीं और उपन्यास भी लिखे। पर हमको उपन्यासकार ही क्यों माना जाता है? कहानीकार क्यों नहीं? इट्स जस्ट ए थिंग। लेखक की कोई एक विधा जनता द्वारा अधिक स्वीकृति पा जाती है, इसलिए लेखक की यह ट्रेजेडी हो जाती है कि दूसरी विधाओं में वह महत्त्वपूर्ण भी लिखे तो भी उसे अधिक जाना जाएगा उसी एक विधा में किये गए काम से! पिफर यह भी देखो कि उपन्यास के क्षेत्रा में निराला ने कम रचनाएं कीं। प्रेमचंद शेर की तरह जे़हन में बैठा था, इसलिए उधर अधिक काम नहीं किया। उन्होंने काव्य के क्षेत्रा में लड़त अधिक की। छायावाद के लिए प्रोपैगेन्डा भी उनका था, इसलिए जनता कवि के रूप में उन्हें मान्यता देने लगी। पर निराला जी का गद्य भी बहुत अच्छा था। हम समझते हैं कि ऐसा सुंदर गद्य लिखने वाले हिन्दी में इने-गिने लोग ही हैं। उनके गद्य का गद्य की तरह से परीक्षण होना चाहिये। ये बड़ी ग़लती करते हैं हिन्दी वाले जो ऐसा नहीं करते। उन्होंने रेखाचित्रा भी बहुत सुंदर लिखे हैं। 'कुल्लीभाट' और 'बिल्लेसुर बकरिहा' अपने आप में नायाब हैं। हाँ, उपन्यासकार के रूप में मैं उन्हें अधिक सम्मान नहीं दे पाता। 'प्रभावती' को छोड़कर मुझे उनका कोई उपन्यास अच्छा नहीं लगा-'अलका' भी नहीं।''
''अपफ़सोस है कि हिन्दी वालों ने इतने बड़े कवि को किसी अच्छे पुरस्कार से नहीं नवाज़ा।''
''ये कोई क्राइटेरिया नहीं है! टॉल्सटाय को, शॉ को नोबेल प्राइज़ नहीं मिला।''
''अच्छा यह बताइये कि आज के युग में क्या स्वतंत्रा लेखन संभव है? यह एक सवाल है जो मेरे मन-मस्तिष्क को आंदोलित करता है कि क्या मात्रा साहित्य-सृजन द्वारा लेखक जीवन-यापन कर सकता है? जीवन-यापन के लिए व्यावसायिक लेखन के दबाव में सच्चे साहित्य पर ख़तरे की द्घंटियाँ मँडराने लगती हैं। आपने भी एक बार कहा था कि 'मेरी एक तमन्ना ज़रूर है कि एक दिन अपनी किताबों की रॉयल्टी पर ही जीवन-निर्वाह करने लायक़ बन जाऊँ! आप क्या सोचते हैं? आज के समय में स्वतंत्रा लेखन से जीवन ठीक तरह चल सकता है?''
''पेट को काट कर पफेंक दो तब तो स्वतंत्रा लेखन हो सकेगा? लेकिन पेट तो है, सो स्वतंत्रा लेखक के लिए भी यह आवश्यक होगा कि वह उसके लिए भी कुछ करे। नहीं करेगा तो भीख मांगेगा या 'हमारी माँगें पूरी करो' का नारा लगाकर विद्रोह का झंडा खड़ा करेगा। ये दोनों ही बातें ग़लत हैं। पिफर एक बात और है। सृजनात्मक लेखन के क्षण और व्यावसायिक लेखन के क्षण एक ही समय नहीं आते। उन दोनों में अंतर होता है तो बाक़ी समय लेखक क्या करे? मैंने दोनों को ही साधा है। न साधता तो जिंदा कैसे रहता? हाँ अपने व्यावसायिक लेखन और सृजनात्मक लेखन के बीच अपने जीवन-मूल्यों को दो हिस्सों में बांट कर नहीं देखा। वो यथावत एक है। व्यावसायिक लेखन कल्पना और साधना के उन प्रयोगों के आधार पर करता हूँ जो सि( कर चुका हूँ और सृजनशील लेखन के समय मैं उसी क्षेत्रा से अपने लिए नयी उपलब्धियां अर्जित करता हूँ।''
इसे सुनकर एक दिलचस्प सवाल भीतर द्घुमड़ा-''बाबूजी! दोनों में भिडं़त नहीं होती?''
नागर जी हँसे तो पान की लालिमा से युक्त उनके दांतों की छटा मुग्ध करने लगी। बोले-''सृजनशील लेखक और व्यावसायिक लेखक-मेरे अंदर जो दो हैं-उनमें जब सीधी टक्कर होती है तो सृजनशील लेखक जीत जाता है और व्यावसायिक लेखक को कम्प्रोमाइज़ करना पड़ता है। बंबई में पिफल्मी लेखन के समय मैं लिखता चौबीसों द्घंटे था, पर मन को संतोष नहीं होता था। इसी तरह रेडियो में भी जो काम करना चाहता हूँ, जब रेडियो का काम उसे करने की पफुरसत नहीं दे तो उसे छोड़ना चाहिए। यानी दो कामों को चलना चाहिये। दो काम में एक काम चले और दूसरा न चले तो अडंग़ा लगेगा ही। दूसरे, देखो हमारे लेखक के लिए कितनी चीज़ें ज़रूरी रहीं-ये भी मार्क करो। कितनी जातियां, कितनी व्यवस्थाएं, बोलचाल के मुहावरे-ये सब ऐसे ही नहीं आ सकते। इन्हें समझने के लिए समय चाहिये। और जब व्यावसायिक काम करते हुए वह समय न मिले तो स्वाभाविक है कि वह अखरेगा।''
''आजकल तुलसी बाबा पर आपका काम चल रहा है। उसमें शिल्प की दृष्टि से क्या प्रयोग कर रहे हैं?''
''भैक्षये, इसमें प्रयोग करने की हमें पफुरसत ही नहीं मिली। इसमें टेक्नीक का कोई प्रयोग हमने नहीं किया, क्योंकि इसमें बेसिक सब्जैक्ट मैटर बिल्कुल नया है-पौराणिक संदर्भों को लेकर। उसी को जस का तस आना चाहिए था और प्रयोग तो भैक्षया हमने 'अमृत और विष' में भी प्रयोग के लिए नहीं किया था। वह तो स्वतः उद्भूत हुआ था। हम महज़ चमत्कार के लिए ही नयापन नहीं लाते। कभी नहीं लाते।''
मैंने कहा-''कुछ लोग आज प्रेमचंद के महत्त्व को नकार कर मात्रा ऐतिहासिक बताने की चेष्टा कर रहे हैं। उनके ये प्रयत्न क्या हास्यास्पद नहीं हैं? इन लोगों का कहना है कि प्रेमचंद के साहित्य की तुलना में आज की कविता और कहानी में मानवीय संवेदना उस तरह नहीं दिखाई दे रही! इस संदर्भ में मुझे अज्ञेय का कथन याद आ रहा है कि 'प्रेमचंद को हम पीछे छोड़ आए, यह दावा हम उसी दिन कर सकेंगे जिस दिन उससे बड़ी मानवीय संवेदना हमारे बीच प्रकट होगी।' आपका इस बारे में क्या विचार है?''
''देखो, ये मानवीय संवदेना वाली बात तो हमारी समझ में नहीं आईं। क्योंकि, वह तो प्रेमचंद में भी थी, नये लेखकों में भी है। वह आगे भी रहेगी। जो कहते हैं कि प्रेमचंद पीछे छूट गए, वे महज़ दंभ दिखलाते हैं। पीछे तो उनको छूटना ही था, क्योंकि वे मर गए! आगे आने वाले थीम्स को उठाने का उन्हें अवसर ही नहीं मिला। और ऐसा कहने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रेमचंद वह नींव का पत्थर है, जिसके ऊपर उनके यश का किला खड़ा है। प्रेमचंद के ऐतिहासिक महत्त्व को कोई नहीं नकार सकता।''
''इधर के साहित्य में यौन-कुंठाओं का चित्राण जिस तरह से किया जा रहा है, उसे किस तरह देखते हैं? ये चीज़ें साहित्य को कहाँ ले जायेंगी?''
''देखो भइया, यह संक्राति काल के एक चरण का चित्राण है-पूरे संक्राति काल का भी नहीं। अतएव मात्रा इसे लेकर भविष्य की बात कहना ग़लत है। यौनाचार की ओर बढ़ती हुई प्रवृत्ति एक तो नौजवानी में हर लेखक के साथ कमोबेश होती है, दूसरे वह व्रिदोह का प्रतीक भी है। इससे अधिक कोई गहरा प्रभाव साहित्य पर ये रचनाएं नहीं छोड़ पातीं। पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने एक बात कही थी कि 'इस प्रकार का साहित्य आगे के साहित्य की खेती के लिए खाद का काम ज़रूर कर रहा है।' कुंठाएं हमारे सामाजिक-आर्थिक जीवन के कारण हैं। जो आज कुंठित हैं वही कल उसमें से विद्रोह के स्वर भी उभारेंगे। क्योंकि कुंठा शाश्वत स्थिति नहीं है।''
''बाबूजी! एक सवाल बहुत उलझन में डालता है। हिन्दी साहित्य के हमारे विद्वान आलोचक पश्चिमी विद्वानों के उ(रण देकर अपनी बात की पुष्टि करने की ही कोशिश क्यों करते हैं? बात-बात में नीत्शे, लारेंस, सार्त्रा, कामू, काक़ा, नोबाकोव, ॉयड और मार्क्स का हवाला देते दिखाई देते हैं! क्या भारतीय चिंतन समृ( नहीं? क्या अपने यहाँ युगान्वेषी दृष्टि देने वाले दार्शनिक नहीं हुए? हमारी अपनी संस्कृति इतनी समृ( है, उत्तम काव्य के निकष भी हमारे प्राचीन आचार्यों ने सदियों पहले निर्धारित कर लिये थे। क्या वे आज की रचना की पड़ताल के लिये कोई मामूली-सा आधार भी नहीं बनाते? हिन्दी में भी आचार्य शुक्ल, आचार्य द्विवेदी, आचार्य वाजपेयी, रामविलास जी, शिवदान सिंह चौहान, देवीशंकर अवस्थी और नामवर सिंह जैसे आलोचक मौजूद हैं। पिफर हमें विदेशी विद्वानों की तरपफ भागने की क्या ज़रूरत है और क्यों?''
नागरजी गंभीर हो गए। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोले-''भाई असल में है क्या, कि पिछले सत्तर वषर्ोें में अपने राष्ट्रीय, सामाजिक और बौ(कि उत्थान के लिए हम पश्चिम के दरवाजे़ ही खटखटाते रहे हैं। यह स्वाभाविक भी था। लेकिन अब जो प्रश्न तुम्हारे मन में उठा है वह बहुतों के मन में उठने लगा है और अध्ययन के क्षेत्रा में पौर्वात्य और पाश्चात्य विचारों का संतुलन करने का प्रयत्न अब आरंभ हो गया है। मेरा ख़याल है कि आगामी दस-पंद्रह वर्षों में भारतीय साहित्य के लेखक क्रमशः पूर्व और पश्चिम के विचारों का संतुलन करते हुए एक नयी दिशा अवश्य पायेंगे।''
''पश्चिम के विचारों को ग्रहण करना चाहिए?''
''क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए, लेकिन जैसा मैंने कहा कि संतुलन ज़रूरी है। केवल पश्चिम के विचारों से हमारा भला नहीं होगा।''
''सृजनात्मक लेखन में अनुभव की प्रामाणिकता पर बहुत ज़ोर दिया जा रहा है।''
''यह तो ठीक ही है भैक्षये! बिना उसके तुम्हारे लेखन में विश्वसनीयता नहीं आएगी। और देखो, एक अनुभूति होती है जो स्वयं उमगती है, मगर दूसरों की अनुभूति से स्वानुभूति भी उमगती है।''
''लेखक के निजी व्यक्तित्व का कितना योगदान होता है?''
''देखो, व्यक्तित्व से कृतित्व बनता है और कृतित्व से व्यक्तित्व उभरता है। बस इतनी बात ध्यान रखो।''
''एक बात और। इधर अपनी कृतियों पर आपको पुरस्कार मिलने शुरू हुए हैं। क्या पुरस्कार मिलना ही किसी कृति की उत्कृष्टता की माप का सही मानदंड है? निराला को पुरस्कार नहीं मिले, मुक्तिबोध को नहीं मिले, प्रेमचंद को नहीं मिले! किसी ईमानदार लेखक को क्या पुरस्कार ग्रहण करना चाहिए? क्या उससे उसकी लेखन-क्षमता पर
नकारात्मक असर नहीं पड़ता?''
''ज़रूर पड़ सकता है अगर लेखक की साधना मज़बूत नींव पर नहीं टिकी है। पुरस्कारों का कृति या कृतिकार की उत्कृष्टता से कोई संबंध नहीं होता। लेकिन बिना अपनी ओर से प्रयास किये लेखक को यदि कोई पुरस्कार मिलता है तो उसे क्यों नहीं लेना चाहिए? आखिऱ लेखक का एक परिवार भी होता है जिसे चलाने की उसकी सामाजिक ज़िम्मेदारी होती है।''
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एक बार नागरजी मेरे तत्कालीन कार्यालय दैनिक 'आज' के बांसमंडी कानपुर स्थित कार्यालय भी पहुँचे थे।
गर्मियों के दिन थे और दोपहर का समय था। वे किसी काम से कानपुर आये थे और रिक्शे से द्घंटाद्घर जा रहे थे। द्घंटाद्घर पर बस अड्डा है और उसके ठीक सामने कानपुर सेंट्रल स्टेशन है। द्घंटाद्घर से वे लखनऊ के लिए बस, टैक्सी या ट्रेन पकड़ते। मैं दिन की पाली होने से अख़बार के दफ्रतर में अपनी सम्पादकीय डेस्क पर कार्यरत था कि रिसैप्शन से बुलाहट हुईं पहुँचा तो नागरजी! तुरंत संपादक मंगल जायसवाल के कमरे में ले गया, जहाँ कूलर उन दिनों ज्य़ादातर संपादकों के केबिनों में कूलर, ही रहता था! ए.सी. तो किसी-किसी व्यवस्थापक या मालिक के कमरे में ही दिखाई देता था! ठंडा पानी पिलाने के थोड़ी देर बाद, चाय पीने के बाद वे कुछ प्रकृतिस्थ हुए तो मैंने कहा-''बाबूजी! अख़बार के दफ्रतर में आये हैं तो एक इंटरव्यू तो देते जाइये।'' नागर जी तैयार हो गए। तब मैंने इंटरव्यू लिया और वहाँ से निकलकर उन्हें द्घंटाद्घर तक छोड़ने गया। लौटकर आया तो इंटरव्यू को कागज़ पर उतार अगले दिन के अख़बार में छपने दे दिया।
लखनऊ में दो और मौक़ों पर उनके भावविभोर होकर बोलने की याद है। एक तो बाल साहित्यकार परिषद् के तत्वावधान में हुए द्विदिवसीय बाल साहित्यकार सम्मेलन-जिसमें मंच संचालन मेरा ही था-में अध्यक्षता करते हुए, पिफर सुरेन्द्र चतुर्वेदी की स्कूटर दुर्द्घटना में दुखद मृत्यु के बाद हुई शोकसभा में।
एक बार मिलने गया तो अपनी बैठक में तखत पर नहीं, ज़मीन पर बिछे बिछावन पर बैठे थे पालथी मारे। पास में एक छोटी-सी मेज़ और गद्दीदार कुर्सी थी। पीछे स्टूल पर पान की डिबिया रक्खी थी। मुझे देखते ही कुर्सी की ओर संकेत करते हुए बोले-''बैठो उद्भ्रांत!''
यह धृष्टता मैं कैसे कर सकता था! मैं भी द्घुटने मोड़कर उनके सामने ही बैठ गया। बगल के रैक की ओर नज़र गईं ऊपर के खाने में विनयपत्रिाका, कवितावली, दोहावली, 'तुलसी काव्य-मीमांसा' डॉ. उदयभानु सिंह, अर्( कथानक, हिन्दू धर्म, काशी का इतिहास मोतीचंद्र, रश्किन और 'पंतजलि योग प्रदीप' जैसी किताबें दिखाई दे रही थीं, जबकि नीचे के खाने में रामचंद्र जी की तपस्या करते हनुमान जी और सबसे ऊपर खजुराहो की शिव-पार्वती की पफोटो।
थोड़ी देर तक हालचाल लेते और इधर-उधर की बातें करते रहे। तरंग में थे, मगर नज़र उनकी तेज़ थी। मेरी नज़र कहाँ-कहाँ जा रही है, इसे देख चुके थे। बोले-''तुलसी बाबा के बारे में किंवदंती है कि पीपल के भूत ने उन्हें राम के दर्शन कराये। हनुमान जी कोढ़ी के रूप में मिले। उन्होंने चित्राकूट जाने की सलाह दी।'' थोड़ी देर रुक कर बोले-''भूत, प्रेत की आराधना करने वाला गणिका का पत्रा कहलाता है इसलिए यह किंवदंती खंडित हो जाती है।''
मैंने कहा-''हनुमान जी राम के सबसे बड़े भक्त थे और तुलसी बाबा राम के भक्त तो थे मगर वे राम के सबसे बड़े भक्त के सबसे बड़े भक्त थे, और मानते थे कि उन्हें राम के दर्शन हनुमान जी के द्वारा चित्राकूट में हुए। भक्त और भगवान का यह जो संबंध है इसे आप कैसे देखते हैं?''
नागर जी हँसे। कहने लगे-''देखो भैक्षये, हमें तो लगता है कि भक्तों से बढ़कर झूठा कोई नहीं होता। वे ऐसी
सात्विकता के रस में झूठ बोलते हैं कि उसका कोई जवाब नहीं! हिन्दी का पूर्ववर्ती समालोचक बड़ा भारी चूतिया था।'' पिफर बोले-''ये लिखना मत। उसने कृतियों पर अपनी क्षेत्राीयता लादी। तुलसी पर हिन्दी के पहले प्रामाणिक विद्वान डॉ. माता प्रसाद गुप्त हुए। उन्होंने क्या लिखा है इसे देखना। देखो, रेशम का कीड़ा अपने अंदर से रेशम के तार निकालता है। हिन्दू भक्त अपने अंदर से झूठ के तार निकालता है।''
यह भक्त और भगवान के, कवि और आलोचक के आपसी संबंधों पर नागरजी की मुक्त टिप्पणी थी, जो ठंडाई की तरावट लिये थी। मैं मन ही मन आनंद ले रहा था।
एक और प्रसंग याद आता है। एक दिन अचानक पहुँचा तो देखा नातिनी आँचा के साथ खेल रहे हैं। उसे कभी-कभी वे एक और नाम मेधा से भी संबोधित करते थे। बोले-''कल तो बाबा हम सोच रहे थे अमृत आ रहा है, अमृत आ रहा है, लेकिन आ गए तुम! बैठो, बैठो।''-अमृत यानी अमृतराय। उनके अच्छे मित्रा थे। सामने जब होते तो उन्हें नाम से
संबोधित नहीं करते-'नामाराशी' कहते। तरंग में थे। मामा वरेरकर की बात करने लगे। पिफर बात जे. कृष्णमूर्ति की तरपफ़ द्घूमी। कई प्रसंग अपने अंदाज़ में। कहने लगे-''कल्चर, पफ़ोक कल्चर, हिस्ट्री-सब मिलेगा-जीवन के करुण हास्य प्रसंगों से जुड़ा पाओगे। यह हमारी मिट्टी इम्पौर्टेन्ट है जो मुझे इन्स्पाइरेशन देती है। जैसे कि ये रूमी दरवाज़ा है, इसके तीन दरवाजे़ हैं, आसपफुद्दौला ने बनवाया था। इसे देखकर मुझे लगा कि ज़रूर आज से दो हज़ार वर्ष पूर्व भी यहाँ एक वैसा ही द्वार बना होगा। हमने उसका नाम 'लक्ष्मण द्वार' रख दिया।''
बांग्ला की बात आई तो शरत्‌ बाबू कैसे याद न आते? बोले-''शरत्‌ बाबू ऊपर रहते थे। मैं उनके दर्शन कर चलने लगा तो बोले-'आमी तोमार संगे नीचे जाबो।' रुपए की गड्डी जैसी चांदी की डिबिया में अपफ़ीम रखते थे। टूटी-पफूटी हिन्दी बोल लेते थे। कहते-'नेशा-वेशा नीं करना। बस साहित्यिक नेशा। बाक़ी नीं करना।' शरत्‌ वाज़ ए ग्रेट मैन। आहा, वो कितना पॉपुलर थे। मेरे साथ बाज़ार के अंदर द्घुसे तो लोग एकदम से पफैल गए। बहुत बढ़िया पर्सनाल्टी... बहुत बढ़िया पर्सनाल्टी। विभूतिभूषण वंद्योपाध्याय, ताराशंकर वंद्योपध्याय भी बड़े लेखक थे। पिछले साल कलकत्ते जाने पर उनसे भी मिला।'' आदि-आदि।
थोड़ी देर रुके पिफर बोले-'' 'माँ' को मैं हिन्दी का क्लासिक मानता हूँ। लेखक मेहनत से बनता है। जीनियस में चालीस प्रतिशत प्रकृति-दत्त होता है, मगर उसका साठ प्रतिशत श्रम मांगता है। टैगोर सत्राह-अट्ठारह द्घंटे अपनी मेज पर मेहनत करते थे। सपफल लेखन बहुत बड़ी कला है।''
मुझे देखकर कानपुर की याद अक्सर आ ही जाती थी-''बहुत मस्त आदमी थे कौशिक जी। पेट पर तकिया रख लेते और बातें करते। हमसे बड़े प्रसन्न रहते थे। हम 'चकल्लस' का 'भाभी अंक' निकाल रहे थे। हमसे बिना पूछे, हमारे बिना मांगे हमें एक कहानी भेज दी तो हम उनके बड़प्पन पर दंग रह गए। पफीलखाने में द्घर था उनका। हम एक-दो बार मिले थे उनसे।''
कापफ़ी देर हो गई थी। नागरजी बोलते-बोलते थकने लगे थे। मैंने चलने की अनुमति मांगी। बोले-''हम चाहते हैं कि तुम लोग काम करो। हमारे काम करने का सबसे बढ़िया रिवार्ड यही है कि तुम लोग आगे बढ़ो। तुम लोग जब काम करते हो तो हमारी जवानी के प्रतीक बन जाते हो।... आगे बढ़ने का तो सुख होता ही है बेटे, पर दूसरों को बढ़ाने का सुख बहुत बड़ा होता है।''
समय कापफ़ी हो गया था। मैंने विदा ली और कानपुर के लिए रवाना हो गया।

'अनहद',

बी-४६३, केन्द्रीय विहार, सेक्टर-५१, नोएडा-२०१३०३ मोबाइल - ०९८१८८५४६७८

 
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